भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) ने साझा मंच पर आकर गठबंधन की वापसी की घोषणा की है। ये पुनर्गठित गठबंधन तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरणों की शुरुआत है। एक ओर यह एक वैचारिक विरोधाभास को पाटने का प्रयास है, वहीं दूसरी ओर रणनीतिक विवशताओं का समझौता भी। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह गठबंधन राज्य के मतदाताओं को यह विश्वास दिला पाएगा कि यह केवल सत्ता की साझेदारी नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य के लिए एक वैकल्पिक दृष्टिकोण है
तमिलनाडु की सियासत एक बार फिर नए दौर में प्रवेश कर रही है। आगामी विधानसभा चुनावों से लगभग एक साल पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) ने साझा मंच पर आकर गठबंधन की वापसी की घोषणा की है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और एआईएडीएमके महासचिव ई. पलानीस्वामी ने चेन्नई में आयोजित एक संयुक्त प्रेस वार्ता में इस गठबंधन को स्थायी और व्यापक बताते हुए आगामी विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ने का संकल्प लिया। यह घटनाक्रम ऐसे समय आया है जब दोनों दलों के बीच 2023 में गम्भीर मतभेद हुए थे। लेकिन अब यह समझौता भाजपा की रणनीतिक दक्षिण भारत नीति और एआईएडीएमके की चुनावी मजबूरियों के तहत हुआ है।
तमिलनाडु की राजनीति दशकों से द्रविड़ आंदोलन की विचारधारा पर केंद्रित रही है, जिसकी जड़ें 20वीं शताब्दी के मध्य में ‘पेरियार’ ई.वी. रामास्वामी द्वारा शुरू किए गए आत्मसम्मान आंदोलन (सेल्फ रेसपेक्ट मूवमेंट) में थीं। यह आंदोलन ब्राह्माणवाद, हिंदी थोपे जाने और उत्तर भारतीय प्रभुत्व के विरोध में खड़ा हुआ।
1950 के दशक से ही द्रविड़ राजनीति ने कांग्रेस को तमिलनाडु से बाहर कर दिया। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) और बाद में उससे निकली एआईएडीएमके ने राज्य की सत्ता पर बारी-बारी से शासन किया। एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर), जे. जयललिता, और करुणानिधि जैसे नेताओं ने दशकों तक राज्य की जनता की भावनाओं और सांस्कृतिक पहचान को सियासी ताकत में बदला।
भाजपा जैसी राष्ट्रवादी विचारधारा की पार्टी तमिलनाडु की इस विशेष राजनीतिक संस्कृति में लम्बे समय तक हाशिए पर रही। सनातन परम्परा, हिंदी भाषा का पक्ष और उत्तर भारतीय मूल के नेतृत्व के चलते उसे तमिल अस्मिता के विरोधाभास के रूप में देखा गया।
भाजपा की तमिल रणनीति और सीमित सफलता
भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तमिलनाडु में कई सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रयोग किए। उन्होंने तमिल भाषा और संस्कृति की सार्वजनिक मंचों पर प्रशंसा की, मंदिरों की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया और ‘विकास बनाम भ्रष्टाचार’ का नैरेटिव गढ़ा। इसके बावजूद, 2021 के चुनावों में भाजपा को केवल 4 सीटों पर जीत मिली, जबकि एआईएडीएमके विपक्ष में बैठ गई। एआईएडीएमके और भाजपा ने इससे पहले 2019 के लोकसभा और 2021 के विधानसभा चुनाव भी गठबंधन में लड़े थे। हालांकि सफलता सीमित रही, परंतु भाजपा को एआईएडीएमके का साथ मिलने से राज्य में अपनी जड़ें जमाने का अवसर मिला।
गठबंधन का टूटना और अब वापसी
सितम्बर 2023 में एआईएडीएमके ने भाजपा से अलग होकर गठबंधन समाप्त कर दिया था। इसका कारण बना भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई द्वारा जयललिता और अन्नादुरई जैसे एआईएडीएमके के पूज्य नेताओं के विरुद्ध दिए गए विवादास्पद बयान। यह मतभेद सार्वजनिक रूप से इतना तीखा हुआ कि एआईएडीएमके ने भाजपा पर ‘तमिल गौरव के अपमान’ का आरोप लगाया और सम्बंध तोड़ दिए। लेकिन अब परिस्थितियां बदली हैं। भाजपा ने अन्नामलाई को हटाकर नैनार नागेंद्रन को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है – जो थेवर समुदाय से आते हैं और एआईएडीएमके के जातीय आधार के अनुकूल हैं। यह जातीय समीकरण गठबंधन को मजबूती देने वाला कदम माना जा रहा है।
डीएमके की तीखी प्रतिक्रिया
सत्तारूढ़ डीएमके ने इस गठबंधन को ‘तमिलनाडु के साथ सबसे बड़ा धोखा’ बताया है। पार्टी का कहना है कि यह समझौता राज्य की आत्मसम्मान आधारित राजनीति के खिलाफ है और केंद्र के अधीनता को दर्शाता है। डीएमके ने भाजपा और एआईएडीएमके दोनों को ‘तमिल विरोधी’ करार देते हुए चुनाव में कड़ा मुकाबला देने का संकेत दिया है।
गठबंधन के मायने: रणनीति और वास्तविकता
एआईएडीएमके के लिए यह गठबंधन एक आवश्यक चुनावी मजबूरी है, क्योंकि पार्टी अपने कैडर में उत्साह की कमी और डीएमके की बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित है। वहीं भाजपा के लिए यह गठबंधन दक्षिण भारत में पैर जमाने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है। जहां भाजपा केंद्र की सत्ता में है, वहीं एआईएडीएमके तमिलनाडु में जमीनी ढांचे, जातीय समीकरण और लोकप्रिय चेहरों के जरिए राज्य की राजनीति में अपना प्रभाव बनाए हुए है। इस गठबंधन में यदि सामंजस्य बना रहा तो यह 2026 के चुनावों में डीएमके को कड़ी टक्कर देने वाला मोर्चा बन सकता है।

