अमेरिका में जेफरी एपस्टीन से जुड़े दस्तावेजों के सार्वजनिक होने के बाद भारत में जिस तरह चुने हुए प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों पर संकेतात्मक, बिना सबूत और भविष्यवाणी जैसी भाषा में आरोप लगाए जा रहे हैं, वह लोकतांत्रिक राजनीति के गहरे पतन का संकेत है। ‘एपस्टीन फाइल्स’ में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी का नाम आने के संदर्भ को अपराध की तरह पेश किया जा रहा है जबकि न कोई चार्जशीट है, न कोई अभियोग, न कोई दोष सिद्धि। यह वही आरोपों की संस्कृति है, जिसकी शुरुआत वर्षों पहले विपक्ष को घेरने के नाम पर की गई थी जो आज भस्मासुर बनकर उसी राजनीति को निगलने को तैयार है
अमेरिका की राजनीति और न्याय व्यवस्था में जेफरी एपस्टीन का नाम अब सिर्फ एक अपराधी का नहीं बल्कि सत्ता, पैसे और प्रभाव के गठजोड़ की उस काली कहानी का प्रतीक बन चुका है जिसने वर्षों तक नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण को सम्भव बनाया। एपस्टीन एक प्रभावशाली अमेरिकी फाइनेंसर था जिसके सम्बंध राजनेताओं, उद्योगपतियों और अंतरराष्ट्रीय हस्तियों से बताए जाते रहे। 2008 में फ्लोरिडा में उस पर लगे गम्भीर आरोपों के बावजूद उसे बेहद विवादास्पद ढंग से हल्की सजा मिली। यह वही क्षण था, जब अमेरिकी न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता पर पहला बड़ा सवाल उठा। 2019 में न्यूयाॅर्क में उस पर दोबारा संघीय स्तर पर सेक्स ट्रैफिकिंग के गम्भीर आरोप लगे लेकिन मुकदमे की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही जेल में उसकी मौत हो गई जिसे आधिकारिक रूप से आत्महत्या घोषित किया गया।
इन तथाकथित ‘एपस्टीन फाइल्स’ में हजारों पन्नों का डेटा शामिल है पीड़ितों की गवाही, ई-मेल, कैलेंडर एंट्री, फ्लाइट लाॅग, यात्रा विवरण और सामाजिक सम्पर्कों का उल्लेख। अमेरिकी जांच एजेंसियों ने बार-बार यह स्पष्ट किया कि इन दस्तावेजों का उद्देश्य पारदर्शिता है, न कि बिना सबूत किसी को अपराधी ठहराना। इसके बावजूद दुनिया भर में इन फाइल्स को सनसनी, साजिश सिद्धांत और राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है।
भारत में जैसे ही यह प्रचार शुरू हुआ कि ‘एपस्टीन फाइल्स’ में भारतीय नाम आए हैं’, राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई। बिना यह समझे कि किसी दस्तावेज में नाम का उल्लेख होना और किसी अपराध में संलिप्त होना दो अलग-अलग बातें हैं, आरोपों की झड़ी लग गई। इसी क्रम में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी का नाम भी चर्चा में आया। कुछ दस्तावेजों और कैलेंडर एंट्रीज में यह दिखता है कि एपस्टीन ने अंतरराष्ट्रीय मंचों या कार्यक्रमों के दौरान विभिन्न देशों के राजनयिकों और नेताओं से सम्पर्क या सम्भावित मुलाकात की कोशिशें की थीं। उस समय हरदीप सिंह पुरी एक वरिष्ठ भारतीय राजनयिक थे और संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहे थे।
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में काम करने वाले राजनयिकों के नाम अनेक वैश्विक व्यक्तियों के कैलेंडर या सम्पर्क सूची में दर्ज होते हैं। लेकिन न तो किसी अमेरिकी एजेंसी ने और न ही किसी अदालत ने यह कहा है कि हरदीप सिंह पुरी का एपस्टीन के यौन अपराधों या सेक्स ट्रैफिकिंग से कोई सम्बंध था, न कोई चार्जशीट, न कोई अभियोग, न कोई दोष सिद्धि। इसके बावजूद भारतीय राजनीति में उनके नाम को इस तरह उछाला जा रहा है, मानो कोई बड़ा अपराध उजागर हो गया हो। यह वही खतरनाक प्रवृत्ति है, जिसमें ‘सम्पर्क’ को ‘साजिश’ और ‘उल्लेख’ को ‘अपराध’ में बदल दिया जाता है।
यही पैटर्न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में भी दिखाई देता है। कभी कहा जाता है कि ‘नाम आया है’, कभी ‘ई-मेल का जिक्र है’ और फिर संकेतों के जरिए यह माहौल बनाया जाता है कि कुछ छिपाया जा रहा है। इसी माहौल में भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी के बयान सामने आते हैं और कांग्रेस के महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण यह कह देते हैं कि ‘19 दिसम्बर के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे।’ यह बयान न किसी संवैधानिक प्रक्रिया पर आधारित है, न किसी राजनीतिक यथार्थ पर। यह विशुद्ध रूप से अफवाह, भविष्यवाणी और अस्थिरता पैदा करने की भाषा है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए हमें कुछ साल पीछे जाना होगा। आरोपों की यह संस्कृति अचानक पैदा नहीं हुई। इसकी नींव उसी समय रखी गई, जब विपक्ष को घेरने के नाम पर बिना सबूत आरोपों को वैध राजनीति बताया गया। राहुल गांधी के मामले में यह प्रवृत्ति सबसे साफ रूप में सामने आई। भाजपा के आईटी सेल और उससे जुड़े सोशल मीडिया नेटवर्क ने वर्षों तक राहुल गांधी की निजी जिंदगी को निशाना बनाया। कभी विदेशी महिलाओं के साथ जोड़कर मनगढ़ंत कहानियां चलाई गईं, कभी तस्वीरों को संदर्भ से काटकर चरित्र पर सवाल उठाए गए।
इसका सबसे ठोस और तथ्यात्मक उदाहरण वह वायरल तस्वीर और वीडियो है, जिसमें राहुल गांधी एक युवती के साथ दिखाई दिए थे। सोशल मीडिया पर दावा किया गया कि वह उनकी ‘गर्लफ्रेंड’ हैं और इसे राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। बाद में स्वतंत्र फैक्ट-चेक संस्थाओं ने स्पष्ट किया कि वह युवती कोई और नहीं बल्कि राहुल गांधी की भांजी मिराया वाड्रा, यानी प्रियंका गांधी वाड्रा की बेटी हैं। इसके बावजूद उस झूठे प्रचार को न तो तुरंत रोका गया और न ही अफवाह फैलाने वालों ने माफी मांगी। यह घटना मामूली नहीं थी, यह उस मोड़ का संकेत थी, जहां निजी तस्वीरों और पारिवारिक रिश्तों को राजनीतिक हथियार बनाने की छूट दे दी गई।
राहुल गांधी के मामले में यह तर्क बार-बार दिया गया कि ‘सवाल पूछना अपराध नहीं है’ और ‘राजनीति में सब चलता है।’ बिना ठोस सबूत भी संदेह जताना, संकेत देना और चरित्र पर हमला करना सामान्य कर दिया गया। उस समय यह हथियार सुविधाजनक था क्योंकि निशाने पर विपक्ष था। लेकिन राजनीति का यही जहर धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था में फैल गया।
आज वही तर्क पलटकर सत्ता के शीर्ष पर बैठे प्रधानमंत्री और मंत्रियों पर इस्तेमाल हो रहा है। ‘एपस्टीन फाइल्स’ जैसे गम्भीर अंतरराष्ट्रीय अपराध मामलों के नाम पर संकेतात्मक आरोप लगाए जा रहे हैं। यही वह स्थिति है जिसे रूपक में कहा जा सकता है कि भस्मासुर भाजपा ने स्वयं पैदा किया और अब वही उसे खाने दौड़ रहा है। आरोपों को सामान्य बनाने की राजनीति अंततः किसी एक दल तक सीमित नहीं रहती, वह पूरी राजनीतिक संस्कृति को जहरीला बना देती है।
इसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को होता है। जब चुने हुए प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों के बारे में कहा जाता है कि वे किसी तारीख के बाद पद पर नहीं रहेंगे, बिना चुनाव, बिना संसद, बिना संविधान, तो जनता के मन में यह संदेश जाता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का कोई मूल्य नहीं। राजनीति बहस से हटकर साजिश और बदनामी की ओर खिसक जाती है।
‘एपस्टीन फाइल्स’ को सार्वजनिक करने का उद्देश्य न्याय और पारदर्शिता है, न कि दुनिया भर में चुने हुए नेताओं पर बिना प्रमाण कीचड़ उछालना। हरदीप सिंह पुरी का नाम हो या किसी और का, बिना चार्जशीट, बिना मुकदमे और बिना दोष सिद्धि के इस तरह के संकेतात्मक आरोप लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं। जब यह आरोप उन्हीं औजारों से लगाए जाते हैं, जिन्हें कभी विपक्ष को घेरने के लिए गढ़ा गया था, तो यह साफ हो जाता है कि भस्मासुर अब अपनों को ही भस्म करने की तरफ बढ़ चुका है।
यदि भारतीय राजनीति ने समय रहते इस प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगाई तो यह किसी एक दल या नेता को नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाएगी। आज जरूरत इस बात की है कि असहमति और आलोचना को तथ्यों, तर्कों और नीतियों तक सीमित रखा जाए, न कि अफवाहों, संकेतों और चरित्रहनन तक। वरना भस्मासुर की यह आग सबको झुलसाएगी, और तब दोष किसी एक व्यक्ति का नहीं, उस राजनीतिक संस्कृति का होगा, जिसने आरोपों को नीति बना दिया।

