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अब ग्रीनलैंड पर ट्रम्प की कुदृष्टि

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर बार-बार दिए जा रहे आक्रामक बयान केवल एक द्वीप पर नियंत्रण की चाह नहीं हैं बल्कि यह आर्कटिक क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक संतुलन, प्राकृतिक संसाधनों की वैश्विक होड़ और अमेरिका-चीन-रूस के बीच उभरती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का संकेत हैं। वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन के बाद ट्रम्प की यह मंशा और अधिक स्पष्ट होकर सामने आई है जिसने यूरोप, विशेषकर डेनमार्क और नाटो सहयोगियों को गहरी चिंता में डाल दिया है


वेनेजुएला की राजधानी कराकस में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादूरो को सत्ता से हटाए जाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की विदेश नीति को लेकर दुनिया भर में हलचल तेज हो गई है। लम्बे समय से केवल बयानबाजी समझी जाने वाली उनकी धमकियां अब ठोस कार्रवाई में बदलती दिख रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में ट्रम्प की एक पुरानी लेकिन लगातार दोहराई जाने वाली इच्छा फिर से केंद्र में आ गई है, ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण। ग्रीनलैंड जो औपचारिक रूप से डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है। पिछले कुछ महीनों से वाशिंगटन की रणनीतिक सोच के केंद्र में है। ट्रम्प कई बार सार्वजनिक मंचों से यह कह चुके हैं कि ‘‘अमेरिका को ग्रीनलैंड की जरूरत राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए है।’’ वेनेजुएला प्रकरण के बाद इस बयान की गूंज और भी गम्भीर हो गई है क्योंकि अब यह केवल कूटनीतिक दबाव नहीं बल्कि सैन्य शक्ति के संकेतों के साथ जुड़ता दिख रहा है।

 
बर्फ में ढका लेकिन रणनीति में तपता द्वीप

ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है जिसका क्षेत्रफल लगभग 21.6 लाख वर्ग किलोमीटर है। आबादी महज 56 हजार के आस-पास है और यह दुनिया के सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों में से एक है। यहां की लगभग 81 प्रतिशत भूमि बर्फ से ढकी है। राजधानी नूक पश्चिमी तट पर बसी है जहां रंग-बिरंगे घर, पहाड़ और समुद्र का अनोखा संगम दिखाई देता है। आबादी का बड़ा हिस्सा इनुइट समुदाय से आता है और परम्परागत रूप से यहां की अर्थव्यवस्था मछली पकड़ने पर आधारित रही है लेकिन बदलती जलवायु और पिघलती बर्फ ने ग्रीनलैंड को एक नए वैश्विक संघर्ष के केंद्र में ला खड़ा किया है जो द्वीप कभी दुनिया के नक्शे में हाशिए पर था आज वह वैश्विक शक्तियों की प्राथमिकता बन चुका है।
 
अमेरिका और यूरोप के बीच की चाबी

ग्रीनलैंड की सबसे बड़ी ताकत उसकी भौगोलिक स्थिति है। यह अमेरिका और यूरोप के बीच स्थित है और तथाकथित जीआईयूके गैप (ग्रीनलैंड-आइसलैंड-यूनाइटेड किंगडम) पर नियंत्रण रखता है। यह समुद्री मार्ग आर्कटिक महासागर को अटलांटिक महासागर से जोड़ता है और सैन्य व व्यापारिक दोनों दृष्टियों से बेहद अहम है। शीत युद्ध के दौरान यह क्षेत्र सोवियत संघ की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अमेरिका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। आज भी यह क्षेत्र उतना ही रणनीतिक है बल्कि रूस और चीन की बढ़ती सक्रियता के कारण इसका महत्व और बढ़ गया है। रूस के लिए आर्कटिक उसका प्राकृतिक विस्तार है, उसका एक चैथाई से अधिक भू-भाग इसी क्षेत्र में आता है। वहीं चीन ने 2018 में खुद को ‘नियर-आर्कटिक स्टेट’ घोषित कर दिया और आर्कटिक शिपिंग के लिए ‘पोलर सिल्क रोड’ की अवधारणा पेश की।
 
बर्फ के नीचे छिपा खजाना

ग्रीनलैंड केवल रणनीतिक मार्ग ही नहीं बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का विशाल भंडार भी है। यहां तेल, गैस और विशेष रूप से दुर्लभ खनिज (रेयर अर्थ एलिमेंट्स) पाए जाते हैं। ये खनिज आधुनिक दुनिया की रीढ़ हैं, इलेक्ट्रिक वाहन, पवन ऊर्जा संयंत्र, स्मार्टफोन और अत्याधुनिक सैन्य उपकरण इन्हीं पर निर्भर हैं। चीन इस समय वैश्विक रेयर अर्थ आपूर्ति पर हावी है और अमेरिका इसे अपनी रणनीतिक कमजोरी मानता है। ऐसे में ग्रीनलैंड के खनिज भंडार वाशिंगटन के लिए एक सम्भावित विकल्प के रूप में देखे जा रहे हैं। हालांकि ट्रम्प सार्वजनिक रूप से कहते रहे हैं कि ‘हमें ग्रीनलैंड खनिजों के लिए नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चाहिए’ लेकिन उनके पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बयान इस दावे से अलग तस्वीर पेश करते हैं।
 
जलवायु संकट और नई समुद्री राहें

जलवायु परिवर्तन ने ग्रीनलैंड के महत्व को कई गुना बढ़ा दिया है। पिघलती बर्फ के कारण उत्तरी समुद्री मार्ग साल के अधिक हिस्से में नौवहन योग्य होते जा रहे हैं। इससे एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच समुद्री व्यापार के रास्ते छोटे और सस्ते हो सकते हैं लेकिन इसके साथ ही सुरक्षा चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। कौन इन मार्गों को नियंत्रित करेगा, यही अगला बड़ा सवाल है।
 
वेनेजुएला का संदर्भ क्यों अहम?

वेनेजुएला में अमेरिकी हस्तक्षेप ने ट्रम्प की बातों को नई धार दी है। जिस तरह से वहां सत्ता परिवर्तन को अंजाम दिया गया, उसने यह संकेत दिया कि अमेरिका अब केवल बयान तक सीमित नहीं रहना चाहता। इसी के अगले दिन ट्रम्प ने फिर कहा कि ‘ग्रीनलैंड राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से जरूरी है’ और दावा किया कि वहां ‘रूसी और चीनी जहाज भरे पड़े हैं।’ व्हाइट हाउस ने भी यह स्वीकार किया है कि ग्रीनलैंड को लेकर ‘कई विकल्पों पर विचार’ किया जा रहा है और सैन्य विकल्प को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने फिलहाल सैन्य कार्रवाई की सम्भावना को कमतर बताया है।
 
डेनमार्क और नाटो की चिंता

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मैटी फ्रेडीरिक्सन ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ‘‘ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है और वहां के लोग अमेरिका का हिस्सा बनना नहीं चाहते।’’ उन्होंने यहां तक चेतावनी दी कि यदि किसी नाटो देश पर दूसरे नाटो देश ने सैन्य कार्रवाई की तो गठबंधन की नींव हिल जाएगी। यूरोप के कई बड़े देशों, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली और पोलैंड, ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के समर्थन में संयुक्त बयान जारी किया है। नाटो ने भी आर्कटिक क्षेत्र को अपनी प्राथमिकता बताया है।
 
ग्रीनलैंड के लोगों की राय

ग्रीनलैंड की राजनीति लम्बे समय से डेनमार्क के औपनिवेशिक अतीत से प्रभावित रही है। 1953 में इसे डेनमार्क में शामिल किया गया। 1979 में होमरूल मिला और 2009 में स्वशासन। हालांकि विदेश और रक्षा नीति अब भी डेनमार्क के हाथ में है। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स फ्रेडरिक नीलसन ने अमेरिकी बयानों को ‘पूरी तरह अस्वीकार्य’ बताया है। उनका कहना है कि ‘‘ग्रीनलैंड अपने भविष्य का फैसला खुद करेगा। जनमत सर्वेक्षण भी दिखाते हैं कि भले ही लोग डेनमार्क से पूरी स्वतंत्रता न चाहते हों लेकिन अमेरिका में शामिल होने के पक्ष में बहुत कम समर्थन है।’’
 
ऐतिहासिक अमेरिकी मौजूदगी

अमेरिका की ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी कोई नई बात नहीं है। 1951 में डेनमार्क के साथ रक्षा समझौते के तहत वहां अमेरिकी सैन्य अड्डा स्थापित किया गया था जो आज भी सीमित रूप में सक्रिय है। इससे पहले 1946 में अमेरिका ने ग्रीनलैंड खरीदने की कोशिश की थी जिसे डेनमार्क ने ठुकरा दिया था। ट्रम्प की कुदृष्टि केवल एक द्वीप पर नजर नहीं बल्कि यह 21वीं सदी की उस वैश्विक लड़ाई का प्रतीक है जिसमें भूगोल, संसाधन, जलवायु और शक्ति, सब एक साथ टकरा रहे हैं। वेनेजुएला से लेकर आर्कटिक तक ट्रम्प की नीति यह संकेत देती है कि अमेरिका अपने हितों के लिए आक्रामक रुख अपनाने से नहीं हिचकेगा। लेकिन ग्रीनलैंड का सवाल केवल अमेरिका का नहीं है बल्कि यह यूरोप, नाटो और अंतरराष्ट्रीय कानून की विश्वसनीयता की भी परीक्षा है।

‘ नाटो’ में बगावत, ग्रीनलैंड को बचाने प्लान तैयार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ‘अमेरिका फस्र्ट’ नीति ने वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल मचा दी है। पहले जहां यह नीति अमेरिका के विरोधियों तक सीमित थी, वहीं अब उसके सहयोगी देश भी इसकी चपेट में आ गए हैं। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प के आक्रामक तेवर लगभग आठ दशक पुराने नॉर्थ अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) समझौते की नींव को हिलाते नजर आ रहे हैं। दूसरी तरफ ग्रीनलैंड पर अमेरिकी बयानबाजी के बाद यूरोपीय देश सतर्क हो गए हैं। उनका मानना है कि कम आबादी वाला डेनमार्क अकेले ग्रीनलैंड की सुरक्षा नहीं कर सकता इसलिए नाटो की सामूहिक जिम्मेदारी अहम हो जाती है। लेकिन जब खुद अमेरिका ही नाटो सहयोगी की सुरक्षा के लिए चुनौती बन जाए तो गठबंधन के सामने गम्भीर सवाल खड़े हो जाते हैं। इसी संकट का जवाब तलाशते हुए जर्मनी नए नाटो मिशन की तैयारी में जुटा है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक जर्मनी और ब्रिटेन की अगुवाई में यूरोपीय देश ग्रीनलैंड में सैन्य तैनाती पर विचार कर रहे हैं। इस पहल का मकसद आर्कटिक क्षेत्र, यूरोप और नाटो की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इस कदम से यूरोपीय देश ट्रम्प को स्पष्ट संदेश देना चाहते हैं कि ग्रीनलैंड अकेला नहीं है। इसी कड़ी में जर्मनी आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा और निगरानी के लिए संयुक्त नाटो मिशन का प्रस्ताव रखने की तैयारी कर रहा है।

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