Uttarakhand

संवाद है, प्रयास है, जमीनी बदलाव नहीं

अल्मोड़ा जनपद की द्वाराहाट विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास लगातार बदलावों से भरा रहा है। उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद 2002 में यह सीट उत्तराखण्ड क्रांति दल के खाते में गई थी जहां से बिपिन चंद्र त्रिपाठी विधायक चुने गए। इसके बाद 2004 में उपचुनाव हुआ और पुष्पेश त्रिपाठी ने जीत दर्ज की। 2007 में भी पुष्पेश त्रिपाठी एक बार फिर विधायक बने। 2012 के चुनाव में जनता ने पहली बार कांग्रेस के मदन सिंह बिष्ट को विधायक चुना लेकिन 2017 में भाजपा ने यह सीट कांग्रेस से छीन ली और महेश सिंह नेगी विधायक बने। इसके बाद 2022 में द्वाराहाट ने एक बार फिर करवट बदली और मदन सिंह बिष्ट ने चुनाव जीतकर सीट कांग्रेस के खाते में वापस ला दिया। इस विधानसभा यात्रा के दौरान हमारी संवाददाता ने पाया किया यहां की जनता विकास कार्य न होने के चलते असंतुष्ट तो है लेकिन उसकी नाराजगी विधायक के प्रति न होकर राज्य सरकार से ज्यादा है


द्वाराहाट उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले की एक विधानसभा सीट है जो राज्य की 70 सीटों में से एक, 48वीं विधानसभा सीट है और वर्तमान में यहां से विधायक मदन सिंह बिष्ट हैं। द्वाराहाट के विधानसभा चुनाव 2022 में कांग्रेस से मदन सिंह बिष्ट ने भाजपा के अनिल शाही को मात्र 182 वोटों के अंतर से हराया था। द्वाराहाट विधानसभा क्षेत्र में कई गांव और क्षेत्र शामिल हैं जिनमें मुख्य रूप से द्वाराहाट ब्लाॅक और चौखुटिया ब्लाॅक हैं, जिनमें कफड़ा, गगास, बग्वालीपोखर, बिनता, बाराखाम, दूनागिरी जैसे मुख्य गांव शामिल हैं।

द्वाराहाट विधानसभा अपनी भौगोलिक सुंदरता और ऐतिहासिक पहचान के लिए जानी जाती है। ‘दि संडे पोस्ट’ ने जब द्वाराहाट विधानसभा में कफड़ा, गगास, बग्वालीपोखर, बिनता, बाराखाम, दूनागिरी, चैखुटिया, द्वाराहाट आदि क्षेत्र में व्यापक सर्वेक्षण किया तो सर्वे के दौरान यह पाया गया कि इन क्षेत्रों सहित पूरी विधानसभा पेयजल आपूर्ति व स्वास्थ्य बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रही है। क्षेत्र के अधिकांश गांवों में जंगली जानवरों का बढ़ता प्रकोप आम जनजीवन को लगातार प्रभावित कर रहा है। चौखुटिया में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की बदहाल व्यवस्था को लेकर महीनों से आंदोलन तो हो रहा है लेकिन परिणाम शून्य है। स्थानीय लोगों के अनुसार विधायक का क्षेत्र में लगातार आना-जाना रहा है। वे आम जनता से मुलाकात करते रहे हैं, उनकी समस्याएं सुनते हैं और अपने स्तर पर समाधान के प्रयास भी करते हैं। इसके बावजूद कई बुनियादी सुविधाएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं।
 
पानी : आज भी सबसे बड़ी और स्थायी समस्या

द्वाराहाट विधानसभा के लगभग पूरे क्षेत्र में पेयजल संकट गम्भीर रूप ले चुका है। कई गांवों में जल योजनाएं मौजूद हैं लेकिन नल सूखे पड़े हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि योजनाएं अक्सर कागजों में पूरी दिखाई जाती हैं जबकि वास्तविकता में उन्हें आज भी दूर-दराज के स्रोतों से पानी ढोना पड़ता है। गर्मी के महीनों में हालात और भी खराब हो जाते हैं, जब प्राकृतिक जलस्रोत सूख जाते हैं और वैकल्पिक व्यवस्था नाकाफी साबित होती है।
 
स्वास्थ्य व्यवस्था : सुविधाएं नाममात्र

क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था बेहद चिंताजनक स्थिति में है। सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्थायी डाॅक्टरों की कमी, गायनेकोलाॅजिस्ट का अभाव, अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे मशीनों का या तो न होना या खराब स्थिति में होना, किसी भी प्रकार के विशेषज्ञ डाॅक्टरों की पूर्ण अनुपस्थिति जैसी समस्याएं लम्बे समय से बनी हुई हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गम्भीर रोगियों को इलाज के लिए अल्मोड़ा या हल्द्वानी भेजना मजबूरी बन चुका है जो पहाड़ी क्षेत्र के लिए जोखिम भरा और खर्चीला साबित होता है। लोगों का कहना है कि कई बार समय पर इलाज न मिलने से हालात जानलेवा तक हो जाते हैं।

‘दि संडे पोस्ट’ से बातचीत में डाॅ. प्रांझन शाह ने अस्पताल की वास्तविक चुनौतियों का विवरण देते हुए कहा कि ‘‘मुझे यहां आए हुए चार साल हो गए हैं। अस्पताल में अल्ट्रासाउंड मशीनें काफी पुरानी हैं, नई नहीं हैं।
अल्ट्रासाउंड के लिए डाॅक्टर भी सप्ताह में सिर्फ एक बार आते हैं। एक्स-रे मशीन डिजिटल नहीं है, उसके लिए हमने आवेदन किया हुआ है। डीएम साहब ने कहा था कि यह करवा दिया जाएगा। यहां कुल स्वीकृत मेडिकल ऑफिसर डाॅक्टरों के पद पांच हैं। इनमें से एक-दो डाॅक्टरों का पीजी में चयन हो गया है जो चार-पांच दिनों में यहां से चले जाएंगे। लोकल मेडिकल ऑफिसर (एलएमओ) के तीन पद हैं जिनमें से एक का भी पीजी में चयन हो गया है वह भी जाने वाले हैं। ऐसे में अब यहां नियमित रूप से बैठने वाले डाॅक्टरों की संख्या पांच ही रह जाएगी।
जाड़ों में अस्पताल का समय सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक और गर्मियों में सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक रहता है। दवाइयां यहां पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं लेकिन कुछ दवाइयां ऐसी होती हैं जो जरूरत के हिसाब से हमें बाहर की लिखनी पड़ती हैं। अस्पताल की सबसे बड़ी जरूरत अच्छी डिजिटल मशीनों और स्पेशलिस्ट डाॅक्टरों की है। कई बार इमरजेंसी केस आते हैं जिनमें इंजेक्टेबल दवाइयों की जरूरत होती है लेकिन उस समय वे उपलब्ध नहीं होतीं। ऐसे में मरीजों को काफी परेशानी होती है। जैसे किसी मरीज का बीपी बहुत ज्यादा या बहुत कम हो जाए तो उसे रेगुलर इंजेक्टेबल ड्रिप की जरूरत होती है जो कई बार नहीं मिल पाती।

यहां रोजाना 80 से अधिक मरीज आते हैं। अस्पताल में 24 बेड हैं। एक्स-रे मशीन है लेकिन महीनों में एक बार ही उपयोग हो पाता है। ईसीजी की सुविधा है, बाकी जांचें भी होती हैं। समय-समय पर स्वास्थ्य कैंप भी लगाए जाते हैं।

अस्पताल में पानी की व्यवस्था नहीं है, जिससे काफी परेशानी होती है। इस सम्बंध में हमने प्रशासन को बहुत पहले सूचना दी थी, करीब दो-तीन साल हो गए हैं। विधायक को भी इस बारे में अवगत कराया गया है। उनका कहना है कि इस पर कार्य किया जा रहा है।

यहां गर्भवती महिलाओं के लिए कोई गायनेकोलाॅजिस्ट डाॅक्टर नहीं है। एक ओटी रूम मौजूद है लेकिन वह बंद पड़ा है क्योंकि कोई स्पेशलिस्ट डाॅक्टर नहीं है। जब कभी इमरजेंसी होती है तो मरीजों को रानीखेत रेफर कर दिया जाता है।’’
 
शिक्षा : गिरता स्तर, संसाधन कम, अवसर सीमित, बढ़ता पलायन

द्वाराहाट में शिक्षा व्यवस्था भी चुनौतियों से घिरी है। शिक्षा का स्तर भी संतोषजनक नहीं है। कई सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, संसाधन सीमित हैं। इसका सीधा असर यह हो रहा है कि छात्र बेहतर शिक्षा के लिए क्षेत्र से बाहर जाने को मजबूर हैं जिससे पलायन की समस्या और गहराती जा रही है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल विकास के अवसर होते तो पलायन को काफी हद तक रोका जा सकता था।
 
रोजगार : योजनाएं हैं, जमीन पर असर नहीं

रोजगार द्वाराहाट की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। स्थानीय स्तर पर रोजगार के स्थायी साधन लगभग न के बराबर हैं। स्थानीय स्तर पर न तो कोई उद्योग है और न ही स्थायी रोजगार के साधन। स्थानीय युवाओं का कहना है कि सरकारी योजनाओं का जिक्र तो होता है लेकिन ऐसी कोई ठोस योजना जमीन पर नहीं दिखती जिससे उन्हें अपने ही क्षेत्र में काम मिल सके। नतीजतन, युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।
 
जंगली जानवर : काश्तकारी पर बड़ा संकट

द्वाराहाट विधानसभा में जंगली जानवरों का प्रकोप भी एक गम्भीर समस्या बन चुका है। स्थानीय लोग बताते हैं कि जो थोड़ी-बहुत काश्तकारी वे करते हैं, वह भी अक्सर जंगली सूअर, बंदर, अन्य वन्य जीवों द्वारा नष्ट कर दी जाती है। इससे न केवल आर्थिक नुकसान होता है बल्कि लोग खेती से भी धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं। किसानों का कहना है कि वन विभाग और प्रशासन की ओर से न तो प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था है और न ही मुआवजे की प्रक्रिया सरल।

स्थानीय निवासी कुंदन सिंह जीना अवसाद भरे स्वर में कहते हैं कि ‘‘मैं 15 साल से यहां हूं। मैं गांधी आश्रम में जॉब कर रहा हूं। यहां पानी की सबसे मुख्य दिक्कत है। यहां स्वास्थ्य की दिक्कत है क्योंकि स्पेशलिस्ट नहीं है यहां, यहां आवारा पशु से दिक्कत है। बंदरों से निजात नहीं मिल रहा है। बाघ आए दिन आदमी का शिकार कर दे रही है। सूअर खेती को चैपट कर दे रहे हैं। पानी की सप्लाई न होने की वजह से खेती चैपट हो गई जो कि सैकड़ों हेक्टेयर जमीन जो है आज यहां बंजर होने की कगार पर आ गई है। पहले खेती हुआ करती थी। हमारी अपनी जो पारम्परिक खेती होती थी उससे भी रोजगार हो जाता था लेकिन अब रोजगार का कोई जरिया नहीं है। यहां 1 इंजीनियरिंग काॅलेज है, 1 पाॅलिटेक्निक काॅलेज है, 1 उच्च विद्यालय है द्वाराहाट में, 1 मासी में  है, बाकी ऐसा नहीं है कि विधायक जी आते नहीं- पूछते नहीं, वो अपनी तरफ से मदद भी करते हैं, प्रयास भी करते हैं लेकिन कहीं न कहीं विपक्ष की सरकार होने की वजह से उनके प्रयास जमीनी स्तर पर नहीं उतर पाते।’’
 
राजनीतिक असंतुलन और जमीनी अड़चन

द्वाराहाट विधानसभा से विधायक मदन बिष्ट कांग्रेस पार्टी से हैं जबकि केंद्र और राज्य दोनों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह राजनीतिक असंतुलन भी एक बड़ा कारण हो सकता है, जिसकी वजह से कई योजनाएं या तो स्वीकृत होने में देरी का शिकार होती हैं या फिर जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पातीं। हालांकि जनता यह भी मानती है कि विधायक क्षेत्र की समस्याओं से अवगत हैं, लोगों से संवाद करते हैं, समस्याएं सुनते हैं और अपनी ओर से प्रयास भी करते हैं लेकिन कई मामलों में काम कागजी प्रक्रियाओं तक ही सीमित रह जाते हैं।
 
प्राथमिकता का सवाल

स्थानीय नागरिकों का सवाल है कि जब द्वाराहाट जैसी पहाड़ी विधानसभा पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझ रही है तो उसे विकास की प्राथमिक सूची में ऊपर क्यों नहीं रखा जा रहा। लोग मानते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याएं अक्सर नीतिगत निर्णयों में हाशिए पर चली जाती हैं।

द्वाराहाट विधानसभा क्षेत्र में बीते चार वर्षों के दौरान विकास की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी ही रही है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में कार्य हुए हैं। सड़कों की स्थिति में सुधार देखा गया है और अधिकांश गांवों तक सड़क पहुंच सुनिश्चित हुई है। स्वास्थ्य सेवाओं के तहत अस्पतालों में समय-समय पर स्वास्थ्य शिविर लगाए गए वहीं शिक्षा के क्षेत्र में कुछ नए काॅलेजों की शुरुआत भी हुई है। लेकिन सबसे गम्भीर समस्या पेयजल संकट की है, जो वर्षों से बनी हुई है। इसके साथ ही स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भी असंतोष है, क्षेत्र में विशेषज्ञ डाॅक्टरों की कमी, उपकरणों की अनुपलब्धता और स्थायी सुविधाओं का अभाव अब भी लोगों की प्रमुख शिकायतें हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इन समस्याओं के समाधान में यह तर्क अक्सर सामने आता रहा है कि केंद्र और राज्य में अलग-अलग सरकारें होने के कारण अपेक्षित सहयोग और संसाधन नहीं मिल पाए जिसका असर सीधे विकास कार्यों पर पड़ा है।
कुल मिलाकर द्वाराहाट विधानसभा में कुछ सकारात्मक पहलुओं के बावजूद बुनियादी आवश्यकताओं से जुड़ी समस्याएं आज भी क्षेत्र के विकास की राह में बड़ी चुनौती बनी हुई हैं।

‘सरकार और जनप्रतिनिधि दोनों को अपनी जिम्मेदारी तय करनी होगी’
 
पुष्पेश त्रिपाठी, पूर्व विधायक द्वाराहाट 

द्वाराहाट विधानसभा क्षेत्र में पिछले 10 से 12 वर्षों से अधिकांश विकास कार्य ठप पड़े हुए हैं। मेरे कार्यकाल में जिन सड़कों का निर्माण किया गया था, वे आज तक डामरीकरण से वंचित हैं। कई सड़कें अत्यंत जर्जर स्थिति में हैं।

उदाहरण के तौर पर धोनभटकोरी-खाचैरा मोटर मार्ग का उल्लेख करना चाहूंगा। वर्ष 2013 में बनी इस सड़क का एक हिस्सा उसी वर्ष आई आपदा में बह गया था लेकिन बीते 12-14 वर्षों में जबकि इस अवधि में भाजपा और कांग्रेस, दोनों दलों के विधायक रहे परंतु आज तक उस टूटे हिस्से का निर्माण नहीं हो पाया। यही स्थिति दुधोली सड़क की भी है। ऐसे लगभग एक दर्जन उदाहरण हैं जो क्षेत्र में विकास की उपेक्षा को दर्शाते हैं।
पेयजल व्यवस्था की स्थिति भी अत्यंत चिंताजनक है। मेरे कार्यकाल में बनी बड़ी पम्पिंग पेयजल योजनाएं जैसे खीरोघाटी, रामपुर भनोटिया, टोडरा और द्वाराहाट पम्पिंग पेयजल योजनाएं, आज सुचारू रूप से पानी उपलब्ध कराने में विफल हैं। ‘हर घर नल, हर घर जल’ योजना के नाम पर केवल नल लगाए गए हैं लेकिन उनमें पानी नहीं है। यह योजना भ्रष्टाचार और लापरवाही का शिकार बन चुकी है।

क्षेत्र में पानी की समस्या सबसे गम्भीर मुद्दा है जिसकी पुष्टि स्वयं क्षेत्र भ्रमण और स्थानीय लोगों से बातचीत के दौरान होती है। इसके अलावा जंगली जानवरों द्वारा खेती को लगातार नुकसान पहुंचाया जा रहा है जिससे किसानों की आजीविका पर संकट गहराता जा रहा है।

स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी दयनीय है। अस्पतालों में न तो विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं और न ही आधुनिक चिकित्सा उपकरण। एक्स-रे जैसी मशीनें अत्यंत पुरानी हैं, जिनसे नियमित और प्रभावी जांच तक सम्भव नहीं हो पा रही है।

जहां तक वर्तमान विधायक द्वारा यह कहा जा रहा है कि वे विपक्ष में होने के कारण उनकी बात नहीं सुनी जाती तो यह तर्क स्वीकार्य नहीं है। विधायक का दायित्व होता है कि वह अपने क्षेत्र की वास्तविक स्थिति पर नजर रखे और समाधान के लिए लगातार प्रयास करे। हमने भी अपने समय में विपक्ष में रहते हुए द्वाराहाट अस्पताल में डाॅक्टरों की तैनाती और सुविधाओं में सुधार कराया था।

आज जिन पम्पिंग पेयजल योजनाओं में पानी नहीं आ रहा है, वे योजनाएं भी हमारे कार्यकाल में बनी थीं और वे उस समय सुचारू रूप से संचालित हो रही थीं। ये 10-15 करोड़ रुपए की बड़ी योजनाएं थीं। आज इनकी बदहाली स्पष्ट रूप से प्रशासनिक लापरवाही, विभागीय निगरानी की कमी और समय पर समीक्षा बैठकों के अभाव का परिणाम है। कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिलना, ठेकेदारी व्यवस्था में गड़बड़ी और जवाबदेही तय न होना भी इन समस्याओं को और गम्भीर बना रहा है। जब इतनी बड़ी योजनाएं विपक्ष में रहते हुए बनाई जा सकती हैं तो आज सत्ता पक्ष के विधायकों के रहते नलों में पानी न पहुंचना गम्भीर सवाल खड़े करता है। सदन में मुद्दों को मजबूती से न उठाने और लगातार दबाव न बनाने की स्थिति में स्वाभाविक है कि उपेक्षा होती है। क्षेत्र की समस्याओं को लेकर सरकार और जनप्रतिनिधियों, दोनों को अपनी जिम्मेदारी तय करनी होगी।

बात अपनी-अपनी

विकास कार्य नहीं हुए हैं, जो सड़कें बनाई थी उन सड़कों की मरम्मतें नहीं हुई हैं, विधायक निधि की जो सड़कें थी वो ट्रांसफर होकर गांव-गांव को जोड़ने के लिए बननी थी, वो नहीं हुई है।

अनिल शाही, भाजपा नेता द्वाराहाट

देखिए स्वास्थ्य, पानी और सड़क की समस्या तो है ही क्षेत्र में। अगर विधायक जी ये कह रहे हैं कि फाइलें नहीं आगे बढ़ती हैं या उन्हें सुना नहीं जाता तो वो कभी सदन में मुद्दा रखते ही नहीं हैं अपने क्षेत्र का। विधायक जी यहां की समस्याओं को अच्छे से उठा नहीं पाए, चाहे वो सदन में हो या सदन के बाहर, दोनों ही स्तर पर विधायक विफल हैं। अभी द्वाराहाट में सेंटर स्कूल खुल रहा है, अगले सत्र से उसमें क्लास शुरू हो जाएगी। 31 सड़कें प्रधानमंत्री ग्राम सभा योजना में हो रखी हैं। ऐसा नहीं है कि कुछ काम नहीं हुए या नहीं हो रहे। विपक्ष के विधायक होने के कारण नहीं बल्कि विधायक जी के सक्रिय न होने की वजह से यहां का विकास रुका है।

महेश नेगी, पूर्व विधायक द्वाराहाट

क्षेत्र की वास्तविक स्थिति यह है कि यह इलाका सिंचाई और कृषि प्रधान होने के बावजूद बुनियादी सुविधाओं के गम्भीर अभाव से जूझ रहा है। सिंचाई की समुचित व्यवस्था न होने के कारण किसानों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वहीं डिजिटल युग में भी नेटवर्क और कनेक्टिविटी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। कई क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क लगभग न के बराबर है, जिससे संचार और आपात सेवाएं प्रभावित होती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंताजनक है। स्थानीय अस्पताल में विशेषज्ञ डाॅक्टरों की भारी कमी है। यह मुद्दा अब सार्वजनिक बहस का विषय बन चुका है। शिक्षा के क्षेत्र में सरकार द्वारा किए गए कुछ प्रयासों के कारण समाज का एक वर्ग जागरूक अवश्य हुआ है लेकिन व्यापक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में ठोस पहल दिखाई नहीं देती। यहां यह सवाल भी उठता है कि विधायक की भूमिका केवल सदन तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि जनता को इन मुद्दों पर संगठित और सक्रिय करना भी आवश्यक है। यदि सरकार जनहित के प्रश्नों को नजरअंदाज कर रही है तो विपक्ष की जिम्मेदारी बनती है कि वह बड़े पैमाने पर आंदोलन करे, सड़कों पर उतरे और जनदबाव बनाए। क्षेत्र की सबसे गम्भीर समस्या गांवों का लगातार खाली होना है। कई इलाकों में पूरे के पूरे गांव पलायन का शिकार हो चुके हैं। इसके पीछे रोजगार की कमी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और जंगली जानवरों का बढ़ता आतंक प्रमुख कारण हैं। फसलें लगातार नष्ट हो रही हैं, जिससे ग्रामीण जीवन असुरक्षित और अलाभकारी होता जा रहा है।

पी.सी तिवारी, अध्यक्ष उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी

द्वाराहाट विधानसभा 2026 : विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : मदन सिंह बिष्ट (अवधि: 4 वर्ष, 1 कार्यकाल)
 
क्र. क्षेत्र                                     मुद्दा/जमीनी स्थिति अंक             (10 में)

  1. पेयजल संकट योजनाएं हैं, पर नल सूखे, गर्मियों में हालात गम्भीर 4/10
  2. स्वास्थ्य व्यवस्था (सीएचसी/पीएचसी) स्पेशलिस्ट/गायनेकोलॉजिस्ट नहीं, रेफर मजबूरी 4.5/10
  3. सीएचसी द्वाराहाट (डाॅ. प्रांझन शाह बयान आधारित) मशीनें पुरानी, अल्ट्रासाउंड सप्ताह में 1 बार, ओटी बंद, पानी तक नहीं 4/10
  4. आंदोलन बनाम समाधान (चौखुटिया सीएचसी) आंदोलन जारी, समाधान नहीं 4/10
  5. शिक्षा शिक्षक/संसाधन संकट, पर कुछ पहल 5.5/10
  6. रोजगार ठोस असर नहीं, पलायन 4/10
  7. जंगली जानवर व खेती संकट नुकसान बड़ाय राहत/मुआवजा जटिल 4/10
  8. सड़कें व कनेक्टिविटी सुधार/सड़क पहुंच, स्पष्ट सकारात्मक 8/10
  9. विधायक का जनता से जुड़ाव संवाद, मौजूदगी, सुनवाई, जनस्वीकृति 8/10
  10. सरकारी क्रियान्वयन/स्वीकृति प्रयास हैं, पर सरकार स्तर पर अड़चनें 5/10
औसत :  5.4/10     फाइनल ग्रेड : औसत/मध्यम

‘यह सरकार सिर्फ लूट में लगी है’
 
अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट सीट से कांग्रेस विधायक मदन सिंह बिष्ट 2012 के चुनाव में पहली बार विधायक बने लेकिन 2017 में भाजपा के महेश नेगी से पराजित हो गए। इसके बाद 2022 में द्वाराहाट की जनता ने एक बार फिर मदन सिंह बिष्ट को जीताकर विधानसभा में भेजा। क्षेत्र की जनता विकास कार्य न होने के चलते असंतुष्ट तो है लेकिन उसकी नाराजगी बिष्ट के प्रति न होकर राज्य सरकार से ज्यादा है। पेश है उनकी ‘दि संडे पोस्ट’ की संवाददाता दिव्या भारती संग  बातचीत

द्वाराहाट विधानसभा के लगभग पूरे क्षेत्र में पेयजल संकट बना हुआ है। पिछले चार वर्षों में इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए क्या ठोस कार्य हुए हैं?

पेयजल समस्या 70 प्रतिशत गांव की समस्या है, घर घर नल लगाने से पानी की समस्या हल नहीं होती है क्योंकि नल तो लगा दिए लेकिन जल तो है नहीं। ऐसा है कि जब ठेकेदारों की पेमेंट ढाई सालों से नहीं हो रही है, जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर ये लोग कह तो देते हैं ‘पहाड़ का पानी, पहाड़ की जवानी’ और यही कह-कहकर इन लोगों ने पहाड़ का पानी भी खत्म कर दिया और पहाड़ की जवानी भी खत्म कर दी। 70 प्रतिशत अभी तक ठेकेदारों की पेमेंट नहीं हुई है जहां स्त्रोत होता है वहां से पानी आना चाहिए न, एक नल बदलने से पानी की समस्या दूर नहीं होती है। जगह-जगह पाइप लगा दिए लेकिन पानी नहीं दिया, अगर किसी अधिकारी से कहो, सुप्रीटेंडेंट इंजिनियर से कहो तो उनका कहना होता है कि ठेकेदार के पास पैसे नहीं हैं इसलिए उन्होंने काम करना बंद कर दिया। पूरे पहाड़ की यही हालत है, यह हर घर नल सिर्फ सरकार की भ्रमित करने की चाल है और कुछ नहीं। मैंने सरकार के सामने यह मांग रखी थी कि द्वाराहाट में पानी की समस्या है लेकिन मेरी बातों पर ध्यान नहीं दिया गया। कहा गया कि नल लग रहेहैं, यह भारत सरकार का नाबाड़ का पैसा है।

स्थानीय अस्पतालों में डाॅक्टरों की भारी कमी, गायनेकोलॉजिस्ट, अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। क्या आप नहीं मानते कि यह स्थिति गम्भीर है? अस्पताल में न विशेषज्ञ हैं न जरूरी मशीनें तो गर्भवती महिलाओं और गम्भीर मरीजों को अल्मोड़ा या हल्द्वानी रेफर करना ही एकमात्र विकल्प रह जाता है, क्या आपने स्वास्थ्य विभाग या सरकार से स्थायी डाॅक्टरों की तैनाती और उपकरणों के लिए लिखित मांग की है? अगर हां, तो उस पर क्या प्रगति हुई?

मेरे यहां चैखुटिया में लोग धरने पर बैठे, सवा महीने भूख हड़ताल की, उसके बाद पैदल मार्च करते हुए देहरादून तक आए 400 किलोमीटर, हमने सदन में भी उठाया, सड़क पर भी उठाया, अपने क्षेत्र में भी उठाया इस मामले को लेकिन आज तक डाॅक्टर नहीं है। हमसे मंत्री कह देते हैं कि करा देंगे, इंटरव्यू में बस कह देते हैं, कोई ज्वाइन नहीं करता, कोई क्षेत्र में आना नहीं चाहता, मैं इसका जिम्मेदार सरकार को मानता हूं। मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, सारे प्रयास किए लेकिन मेरी मांगों को अनदेखा किया गया। हम तो विपक्ष के विधायक हैं हम अपनी मांग रख सकते हैं, धरना-प्रदर्शन कर सकते हैं, लोगों से मिलकर, अधिकारियों से मिलकर समाधान निकालने की बात कर सकते हैं लेकिन कौन समझेगा इस बात को? जूं  भी नहीं रेंगती सरकार के कानों में।

क्या आपने क्षेत्र में अच्छे इंटर कॉलेज, स्किल आधारित शिक्षा या उच्च शिक्षा संस्थान लाने की कोई पहल की?

मैंने शिक्षकों की कमी के लिए भी सरकार को बोला है, कितनी बार इनसे मिलूं? कितनी बार इनके पास जाओ? कोई सुनने को तैयार नहीं है इस सरकार में। भाजपा की 10 साल की सरकार रही। क्षेत्र में न शिक्षा, न चिकित्सा, न रोजगार, किसी में भी काम नहीं हुआ। जो 2 डिग्री काॅलेज थे मेरे कार्यकाल में जब मैं पहले विधायक था, मैंने उसके बाद तीसरा डिग्री कॉलेज भी मासी में खुलवाया। भाजपाई पहले खुद ही अपने लिए, अपने रिश्तेदारों के लिए रोजगार पैदा कर लें उसके बाद ही जनता के लिए करेंगे न। जब मैं विधायक बना था उस वक्त 8 करोड़ का बजट पीडब्ल्यूडी का था, रानीखेत डिविजन का, मैंने 90 करोड़ का डिविजन बनाया 2017 तक। उसके बाद जब हम चुनाव हार गए, आज 6 करोड़, 7 करोड़, 8 करोड़ डिविजन हैं। 7 साल में या 10 साल में सिर्फ टल्ले ही तो लगाए गए हैं और क्या किया गया?

स्थानीय लोग कहते हैं कि आप उनकी समस्याएं सुनते हैं, उनसे संवाद करते हैं लेकिन अधिकतर काम कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं। आप इस आरोप को कैसे देखते हैं? चुनाव सिर पर हैं, जनता को क्या जवाब देंगे?

सरकार हमारी आने दो जो 10 साल में बीजेपी सरकार में काम नहीं हुए, उनको हम कराएंगे। हम देखेंगे न कि कैसे अस्पताल ठीक नहीं होते। मैं अभी घोषणा करके आया था। मैं खुद भुक्तभोगी हूं, मेरी पत्नी को ब्रेन हेमरेज हुआ, मैं उसको नहीं बचा पाया। सरकारी अस्पताल में था, रात का टाइम था, एंबुलेंस तक नहीं मिली। निश्चित तौर पर मेरी सबसे पहले प्राथमिकता स्वास्थ्य के प्रति है। एक 45 लाख रुपए की अच्छी गाड़ी, अच्छे वेंटिलेटर सिस्टम के साथ क्षेत्र के लिए विधायक निधि से उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहा हूं क्योंकि सरकार तो इन सब चीजों में ध्यान नहीं देगी, सरकार तो सिर्फ लूट में लगी हुई है न, सबसे पहले मेरा रहेगा चिकित्सा और शिक्षा। यदि पहाड़ की चिकित्सा और शिक्षा ठीक कर दी जाए तो पहाड़ सुखद हो जाएगा। जिस तरह से बीते 10 साल से भाजपा की नीति है उस हिसाब से 10 साल तो इन्होंने राज कर लिया। ऐसे ही आने वाले 10 साल में यदि यही नीति रही तो पहाड़ पूरी तरह से खत्म हो जाएंगे।

मैं 2012 से 2017 तक विधायक था, चौखुटिया के अंदर बाजार बह जाता था जब नदी आया करती थी। मैंने 9 करोड़ रुपए के तट बंधन बनवाए वहां जिससे आज बाजार सुरक्षित है, गैस रानीखेत से आती थी 15 दिन लग जाते थे, मैंने गैस गोदाम बनाया, वहीं चौखुटिया के अंदर चौखुटिया- मासी मार्ग जो मासी हम 13 किलोमीटर सवा घंटे में पहुंचते थे। आईआईटी रूड़की से 16 लाख रुपए सरकार से दिलाकर उस रोड के लिए रिपोर्ट तैयार करवाई और उसे सीमेंटेंड रोड बनाया। डिग्री कॉलेज की बिल्डिंग बनाई, मासी में डिग्री कॉलेज बनाया और जितने इंटर कॉलेज थे उनके भवन अच्छे से बनाए। अब जब सरकार के पास हम जाते हैं क्योंकि हम भी विधायक हैं। बार-बार हम कितनी बार चले जाएंगे? जब हमें नजरअंदाज कर दिया जाता है।

आपकी वर्तमान प्राथमिकता क्या है, किन क्षेत्रों में कार्य हो रहे हैं?

4 करोड़ 80 लाख रुपए सालाना बजट मिलता है जिसमें सड़कें बनाई, पानी के टैंकर दिए, सोलर सिस्टम भी लगाए, कहीं पर स्कूल टूटे थे वहां दिए। मैं वर्तमान में जिन कार्यों में लगा हूं, वो हैं चौखुटिया अस्पताल का उच्चीकरण जिसका प्रोजेक्ट दिए हुए 4 साल हो गए हैं। द्वाराहाट के अस्पताल का उच्चीकरण और कम से कम 8 सड़कें हैं क्योंकि पीडब्ल्यूडी के पास तो पैसा है नहीं, भारत सरकार का पीएमजेएसवाई का जो पैसा आ रहा है उससे कुछ सड़कें मेरी हो रही हैं। पेयजल भी मेरी प्राथमिकता में है। देखिए ‘हर घर नल-हर घर जल’ सिर्फ नारा मात्र है। पानी कहीं नहीं है क्योंकि पेयजल स्कीम में बहुत बड़ा घपला है। अगर इसकी स्वच्छता से जांच की जाए तो यह सब जेल जाएंगे।

क्या आप आज यह भरोसा दे सकते हैं कि अगले एक वर्ष में कम से कम अस्पताल में डाॅक्टर, पानी की स्थायी व्यवस्था और स्थानीय रोजगार जमीनी स्तर पर दिखेंगे?

मैडम मेरा नाम मदन बिष्ट है, सरकार हमारी आ जाए, सारी व्यवस्था ऐसी करेंगे कि लोग कहेंगे कि हां, द्वाराहाट के अंदर सब कुछ सही है, सुविधा है, सब उपलब्ध है, कोई समस्या नहीं है। मेरा ये मानना है, अगर जनता ने हमें वोट देकर, प्यार देकर जिताया है तो हमें काम भी करना चाहिए, उन्हें सारी सुविधाएं देनी चाहिए।

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