Uttarakhand

सिमटते जंगल और बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्षडर के साए में जीवन

नरेंद्र नगर में दो भालुओं संग जिंदगी की जंग
उत्तराखण्ड में मानव-वन्यजीव संघषज् अब किसी एक क्षेत्र, एक वन प्रभाग या किसी एक-दो घटनाओं तक सीमित नहीं रह गया है। यह समस्या गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक पूरे प्रदेश में फैल चुकी है और धीरे-धीरे एक स्थायी संकट का रूप लेती जा रही है। गुलदार, भालू और अन्य वन्य प्राणियों के हमले अब अपवाद नहीं बल्कि ग्रामीण जीवन की रोजमराज् की भयावह सच्चाई बनते जा रहे हैं। इस संकट को केवल श्जंगली जानवरों का आतंक्य कहकर टाल देना वास्तविकता से मुंह मोडने जैसा होगा क्योंकि इसके मूल में दशकों से चला आ रहा वन कटान, अनियंत्रित विकास और प्रकृति के साथ बिगड़ता संतुलन है


उत्तराखण्ड जैसे पहाड़ी राज्य में जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते बल्कि आजीविका, जलस्रोत, पशुपालन और जीवनशैली का आधार हैं। लेकिन बीते वषोज्ं में सड़कों के जाल, पयज्टन परियोजनाओं, हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स, शहरी विस्तार और रियल एस्टेट गतिविधियों ने जंगलों को टुकड़ों में बांट दिया है। इसे पयाज्वरणीय भाषा में आवास खंडन (Habitat Fragmentation) कहा जाता है। जब जंगल छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाते हैं तो वन्यजीवों के पारम्परिक रास्ते, उनके सुरक्षित गलियारे और शिकार क्षेत्र नष्ट हो जाते हैं। नतीजा यह होता है कि गुलदार जैसे अवसरवादी शिकारी भोजन और पानी की तलाश में मानव बस्तियों की ओर बढने लगते हैं। यही स्थिति आज गढ़वाल और कुमाऊं, दोनों अंचलों में साफ दिखाई दे रही है।

गढ़वाल वन प्रभाग की विभिन्न रेंजों में गुलदार की दहशत लम्बे समय से बनी हुई है। पौड़ी जनपद के अंतर्गत आने वाले कई गांवों में हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि लोगों का दिन ढलते ही घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। इस वषज् गढ़वाल वन प्रभाग के चार वन प्रभागों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इस साल अब तक 8 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं जबकि 124 से अधिक लोग घायल हुए हैं। ये आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं बल्कि हर आंकड़े के पीछे उजड़े परिवार, डर में जीते गांव और असुरक्षित भविष्य की तस्वीर छिपी है।

वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार मानव-वन्यजीव संघर्ष को न्यून करना और संवेदनशील क्षेत्रों का आकलन कर जोखिम को घटाना विभाग की प्राथमिकता बताई जा रही है। विभागीय अधिकारियों को संघर्ष की समस्याओं के निराकरण और जन जागरूकता बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन जमीनी हालात यह संकेत देते हैं कि प्रयास और परिणाम के बीच एक बड़ा अंतर बना हुआ है।

वन संरक्षक गढ़वाल आकाश कुमार वर्मा के अनुसार, गढ़वाल वन विभाग क्षेत्र में वर्ष 2025 में जनवरी से अब तक गुलदार के हमलों में चार लोगों की जान जा चुकी है। रुद्रप्रयाग वन प्रभाग में एक व्यक्ति और बद्रीनाथ वन प्रभाग में दो लोगों की मौत गुलदार के हमलों में हुई है। घायलों के आंकड़े और भी चिंताजनक हैं, गढ़वाल वन प्रभाग में 77, रुद्रप्रयाग में 31 और बद्रीनाथ वन प्रभाग में 16 लोग घायल हुए हैं। इसके साथ ही भालू के हमलों में भी इस वर्ष खासा इजाफा हुआ है, विशेष रूप से मई और नवम्बर के महीनों में। विभाग द्वारा इसके कारणों की पड़ताल किए जाने की बात कही जा रही है।

वन विभाग की समीक्षा बैठकों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं, घटना स्थलों पर कार्मिकों की तैनाती, संसाधनों की उपलब्धता, आवश्यकताओं, जन जागरूकता और सुरक्षा को लेकर विस्तृत चर्चा की गई है। प्रभागवार संवेदनशील स्थानों की पहचान की जा रही है जहां लगातार घटनाएं सामने आ रही हैं या जहां नए हमले हो रहे हैं। वन्य जीवों के व्यवहार और हमलों के पैटर्न का गहन विश्लेषण किया जा रहा है। विभाग की ओर से लोगों से अपील की जा रही है कि वे प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखें, जंगलों में समूह में जाएं, अंधेरे में बाहर न निकलें, बुजुर्गों और बच्चों को अकेला न छोड़ें और जंगलों में पिकनिक जैसी गतिविधियों से बचें।

गढ़वाल वन प्रभाग के भीतर ही हालात की गम्भीरता कई गांवों में साफ दिखाई देती है। पोखड़ा रेंज के देवराड़ी गांव में बीते 10 दिसम्बर को घास काट रही महिला पर गुलदार ने हमला कर उसे घायल कर दिया। पोखड़ा के साथ-साथ बगडीगाड़, मटगल, घंडियाल जैसे गांवों में गुलदार की सक्रियता बनी हुई है। वन विभाग ने देवराड़ी सहित आस-पास के गांवों में पिंजरे लगाए हैं और टीमें लगातार गश्त कर रही हैं, लेकिन इसके बावजूद लोगों में भय कम नहीं हुआ है। पोखड़ा ब्लॉक में एक के बाद एक हो रहे हमलों के कारण ग्रामीणों का सामान्य जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

पौड़ी रेंज में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। कोटी से लेकर ढांढरी और गजल्ड गांवों तक गुलदार की सक्रियता ने दहशत फैला रखी है। कोटी गांव में 20 नवंबर को एक महिला को गुलदार ने मार डाला था। इसके बाद ढांढरी गांव में भी एक महिला गुलदार के हमले में घायल हुई। बीती 4 दिसम्बर को गजल्ड गांव में एक व्यक्ति की गुलदार के हमले में मौत हो गई। इसके बाद वन विभाग की टीम ने एक गुलदार को मार गिराया, लेकिन इसके बावजूद इन गांवों में गुलदार दिखाई देने की घटनाएं जारी हैं। पौड़ी मुख्यालय के आस-पास भी रात के समय सड़कों पर गुलदार घूमते देखे जा रहे हैं जो यह दर्शाता है कि समस्या केवल दूरस्थ गांवों तक सीमित नहीं रही।
इन हालातों ने वन विभाग की चुनौतियां भी बढ़ा दी हैं। एक ही रेंज में कई स्थानों पर गुलदार के सक्रिय होने के कारण मैनपावर की कमी साफ महसूस की जा रही है। गढ़वाल वन प्रभाग में पहले ही रेंजर से लेकर फॉरेस्ट गार्ड तक 40 से अधिक पद रिक्त हैं। सीमित संसाधनों और कर्मचारयों के साथ पूरे क्षेत्र में निगरानी रखना विभाग के लिए आसान नहीं है। गढ़वाल वन प्रभाग की एसडीओ आयशा बिष्ट के अनुसार, गुलदार प्रभावित गांवों में पिंजरे लगाए गए हैं और विभागीय टीमें लगातार नजर बनाए हुए हैं। साथ ही लोगों से भी अपील की जा रही है कि वे गुलदार सक्रिय क्षेत्रों में पूरी सतर्कता बरतें और महिलाएं जंगलों में अकेले न जाएं।

गुलदार के लगातार हमलों का सबसे गहरा असर बच्चों और शिक्षा व्यवस्था पर पड़ा है। बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए जिलाधिकारी के आदेश के बाद गुलदार प्रभावित क्षेत्रों के स्कूलों में वन विभाग और ग्राम प्रहरी बच्चों को स्कूल छोडने और लाने की व्यवस्था कर रहे हैं। इससे पहले पौड़ी ग्रामीण क्षेत्र की 55 से अधिक स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा था। पोखड़ा क्षेत्र में भी कुछ दिनों तक एक दर्जन से अधिक स्कूल बंद रहे। कल्जीखाल की डांगी और पोखड़ा की बासई प्राइमरी स्कूल आज भी गांव के पंचायत भवन में संचालित हो रही हैं। डीएम पौड़ी ने खिर्सू, पोखड़ा, पौड़ी, जयहरीखाल और द्वारीखाल ब्लॉकों की 20 स्कूलों में बच्चों को एस्कॉर्ट देने के निर्देश दिए थे जिसके बाद वन कर्मी और ग्राम प्रहरी यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं। कई स्थानों पर बच्चों को लाने-ले जाने के लिए वाहन भी उपलब्ध कराए गए हैं।

यह पूरा परिदृश्य केवल गढ़वाल तक सीमित नहीं है। कुमाऊं अंचल में भी मानव-वन्यजीव संघर्ष उतनी ही भयावह शक्ल अख्तियार कर चुका है। अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़, चम्पावत और ऊधमसिंह नगर जैसे जिलों में गुलदार और भालू के हमले लगातार सामने आ रहे हैं। नैनीताल और हल्द्वानी के बाहरी इलाकों में रात के समय गुलदार का सड़कों पर घूमना आम होता जा रहा है। अल्मोड़ा और द्वाराहाट क्षेत्र में खेतों और घरों के आस-पास गुलदार की आवाजाही ग्रामीणों के लिए स्थायी डर का कारण बन चुकी है। पिथौरागढ़ और चम्पावत में भालू के हमलों में भी वृद्धि दर्ज की गई है। तराई क्षेत्रों में जंगल और आबादी की सीमा लगातार धुंधली होती जा रही है जिससे संघर्ष की आशंका और बढ़ रही है।

राज्य भर में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं सैकड़ों में पहुंच चुकी हैं। इन घटनाओं में बड़ी संख्या महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की है क्योंकि पहाड़ी ग्रामीण जीवन में यही वर्ग सबसे अधिक जंगल, खेत और प्राकृतिक संसाधनों पर निभज्र रहता है। यह स्पष्ट हो चुका है कि यह समस्या किसी एक वन प्रभाग की प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि पूरे राज्य की वन एवं विकास नीति की असफलताओं को उजागर करती है।

इन्हीं हालातों के बीच मानव-वन्यजीव संघर्ष को लेकर राजनीति भी तेज हो गई है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल की अगुवाई में पौड़ी में जनाक्रोश रैली निकाली गई जिसमें पौड़ी के साथ-साथ कल्जीखाल, कोट और श्रीनगर से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल हुए। रैली और जनसभा में कांग्रेस ने सरकार को मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने में नाकाम बताया। गणेश गोदियाल ने कहा कि पूरे पहाड़ में वन्यजीव हमलावर हैं और सरकार आराम से सो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार को यहां के लोगों की जान की कोई चिंता नहीं है।

गणेश गोदियाल ने स्पष्ट किया कि विपक्ष हमलों की वजह से नहीं बल्कि उन्हें रोकने में सरकार की विफलता को लेकर सवाल उठा रहा है। उन्होंने कहा कि एक के बाद एक हमले हो रहे हैं और सरकार जनता का ध्यान डेमोग्राफी बदलाव, लव जिहाद और लैंड जिहाद जैसे मुद्दों की ओर मोड़ने की कोशिश कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि अपराधी का कोई धर्म नहीं होता और यदि सरकार काम नहीं करती तो विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह आवाज उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केवल माला पहनकर वाहवाही लूट रही है लेकिन लोगों की जान बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठा रही।

जनसभा में गोदियाल ने यह भी कहा कि जब तक गुलदार एक से अधिक लोगों को नहीं मार देता, तब तक सरकार की नींद नहीं खुलती। राठ क्षेत्र के कुचैली, कठ्यूड और सौंठ गांवों में भालू द्वारा 60 से अधिक मवेशियों को मार दिए जाने और पौड़ी-पोखड़ा क्षेत्र में गुलदार द्वारा चार लोगों की जान लेने का हवाला देते हुए उन्होंने सरकार से मांग की कि गुलदार प्रभावित गांवों में पांच-पांच लोगों की स्थायी तैनाती की जाए और इसकी जिम्मेदारी ग्राम प्रधानों को दी जाए। साथ ही गुलदारों को ट्रैंक्यूलाइज कर उन पर जीपीएस सिस्टम लगाने की मांग भी की गई ताकि उनकी लोकेशन पर नजर रखी जा सके।

पौड़ी में आयोजित जनाक्रोश रैली के दौरान गणेश गोदियाल ने तंज कसते हुए कहा कि जब सरकार वन्यजीवों के हमलों को नहीं रोक पा रही है तो फिर जॉय हुकिल को ही कोई जिम्मेदारी दे दी जाए, कम से कम लोग सुरक्षित तो रहेंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के पास न तो पर्याप्त प्रशिक्षित शूटर हैं और न ही ठोस रणनीति।

गढ़वाल और कुमाऊं, दोनों अंचलों में लगातार बढ़ रहे वन्यजीव हमलों से यह साफ प्रतीत होता है कि वन विभाग और सरकार द्वारा मानव- वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयास फिलहाल नाकाफी साबित हो रहे हैं। यह संकट केवल पिंजरे लगाने या गश्त बढ़ाने से हल होने वाला नहीं है। जब तक वन कटान पर सख्ती से रोक, वन्यजीव गलियारों का संरक्षण, पर्याप्त स्टाफ की नियुक्ति, तकनीकी निगरानी और स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक यह संघषज् यूं ही गहराता रहेगा।

आज उत्तराखण्ड के सामने असली सवाल यह नहीं है कि गुलदार गढ़वाल में ज्यादा हैं या कुमाऊं में बल्कि यह है कि क्या राज्य विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बना पाने में सफल हो पा रहा है या नहीं। यदि समय रहते इस संतुलन को नहीं साधा गया तो आने वाले वर्षों में मानव-वन्यजीव संघर्ष और भी भयावह रूप ले सकता है जिसकी कीमत पूरे प्रदेश को चुकानी पड़ेगी।

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