गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई ‘नमामि गंगे’ परियोजना पर देशभर में हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं इसके बावजूद नदी की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है। कई स्थानों पर गंगा का जल स्नान योग्य भी नहीं रह गया है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 2022-23 की रिपोर्ट ने उत्तराखण्ड में इस महत्वाकांक्षी योजना के क्रियान्वयन की गम्भीर खामियों को उजागर करते हुए बताया है कि करोड़ों रुपए खर्च कर बनाए गए सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) या तो अधूरे हैं या उनका उपयोग ही नहीं हो पा रहा है। कई शहरों में हजारों घरों को जोड़ने के लक्ष्य तय किए गए लेकिन वास्तविकता में सैकड़ों घर भी नहीं जुड़ सके। नालों का पानी अब भी बिना शोधन के गंगा में गिर रहा है और योजनाएं कागजों में सफल दिखाई जा रही हैं। यह रिपोर्ट गंगा सफाई अभियान के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को उजागर करती है
केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2014 में शुरू की गई ‘नमामि गंगे’ परियोजना देश की सबसे महत्वाकांक्षी पर्यावरणीय योजनाओं में से एक मानी जाती है। इसका उद्देश्य गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करना, उसकी अविरलता बनाए रखना और उसके तटों के समग्र विकास को सुनिश्चित करना था। इस मिशन के तहत सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का निर्माण, सीवर नेटवर्क का विस्तार, घाटों का पुनर्विकास, नदी सतह की सफाई और औद्योगिक अपशिष्ट पर नियंत्रण जैसे अनेक कार्य शामिल किए गए।
वर्ष 2018 तक इस परियोजना के अंतर्गत सैकड़ों परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके थे और 2023 तक यह आंकड़ा और बढ़ गया लेकिन इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद गंगा की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई देता। कई स्थानों पर जल की गुणवत्ता मानकों से नीचे बनी हुई है और प्रदूषण का स्तर चिंताजनक है।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 2022-23 की रिपोर्ट ने उत्तराखण्ड में नमामि गंगे मिशन के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति को उजागर किया है। रिपोर्ट बताती है कि परियोजनाओं की योजना, क्रियान्वयन और निगरानी में गम्भीर कमियां रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गंगा के उद्गम राज्य में ही यदि यह स्थिति है तो यह पूरे मिशन की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
श्रीनगर : लक्ष्य बड़ा, उपलब्धि बेहद कम
श्रीनगर का उदाहरण इस विफलता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। यहां एक एसटीपी का निर्माण किया गया, जिसके माध्यम से 6530 घरों को सीवर कनेक्शन से जोड़ने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था लेकिन वास्तविकता में केवल 797 घरों को ही जोड़ा जा सका। यह अंतर न केवल योजना की कमजोरियों को दर्शाता है बल्कि यह भी बताता है कि परियोजना के क्रियान्वयन में किस स्तर की लापरवाही रही।
उत्तरकाशी : हजारों घर योजना से बाहर
उत्तरकाशी में 6089 घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ने की योजना बनाई गई थी लेकिन केवल 572 घरों तक ही कनेक्शन पहुंच पाया। इसका अर्थ यह है कि अधिकांश घर अब भी सीवरेज व्यवस्था से बाहर हैं और उनका अपशिष्ट सीधे या परोक्ष रूप से गंगा में पहुंच रहा है।
चमोली (गोपेश्वर) : संरचना बनी, उपयोग नहीं
चमोली जिले के गोपेश्वर में 5510 घरों के लिए सीवरेज प्रणाली विकसित की गई लेकिन केवल 534 घरों को ही इससे जोड़ा गया। यह स्थिति दर्शाती है कि परियोजना का ढांचा तो खड़ा किया गया लेकिन उसका उपयोग सुनिश्चित नहीं किया गया।
ऋषिकेश-तपोवन-मुनि की रेती : बड़े प्रोजेक्ट, सीमित असर
ऋषिकेश, तपोवन और मुनि की रेती क्षेत्र में 34,756 घरों के लिए 5 एसटीपी स्थापित किए गए लेकिन केवल 9,966 घरों को ही सीवर नेटवर्क से जोड़ा जा सका। इससे यह स्पष्ट होता है कि परियोजनाओं की योजना और उनके क्रियान्वयन के बीच गहरा अंतर बना रहा।
हरिद्वार : आंशिक सफलता लेकिन अधूरा लक्ष्य
हरिद्वार में 68,802 घरों के सापेक्ष 47,728 घरों को सीवर कनेक्शन दिया गया जो लगभग 70 प्रतिशत है। यह अन्य शहरों की तुलना में बेहतर है लेकिन यहां भी लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सका।
कहां-कहां बने कितने एसटीपी
रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में विभिन्न स्थानों पर एसटीपी स्थापित किए गए, बद्रीनाथ में तीन जोशीमठ में दो, श्रीनगर में दो, कर्णप्रयाग में दो और चमोली में एक एसटीपी स्थापित किया गया। इसके अलावा ऋषिकेश और हरिद्वार जैसे शहरों में भी कई एसटीपी बनाए गए। राज्य में कुल 21 एसटीपी का निर्माण किया गया लेकिन इनमें से कई या तो पूरी तरह कार्यशील नहीं हैं या उनका उपयोग सीमित है।
एनजीटी के आदेश के बाद भी नहीं बदली तस्वीर
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के 10 दिसम्बर 2015 के आदेश के बाद इन परियोजनाओं को गति देने की कोशिश की गई और 2016 में इन्हें नमामि गंगे मिशन से जोड़ा गया। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
सीवर नेटवर्क की कमी : सबसे बड़ी कमजोरी
रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि परियोजना की सबसे बड़ी कमजोरी सीवर नेटवर्क का अभाव रहा। कई शहरों में एसटीपी तो बना दिए गए लेकिन उन्हें घरों से जोड़ने की व्यवस्था नहीं की गई। इसके परिणामस्वरूप गंदा पानी सीधे गंगा में गिरता रहा।
एसटीपी हैं लेकिन घरों तक कनेक्शन नहीं
सीएजी ने पाया कि राज्य में 21 एसटीपी ऐसे हैं, जिनकी सीवर लाइनें घरों तक नहीं पहुंचीं। इसका अर्थ यह है कि करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई गई संरचनाएं अपने मूल उद्देश्य को पूरा ही नहीं कर पा रही हैं।
टिहरी और पौड़ी : सेप्टिक टैंक भी समाधान नहीं बने
टिहरी और पौड़ी जिलों में सेप्टिक टैंक का उपयोग किया गया लेकिन उनके अपशिष्ट के निस्तारण की कोई ठोस व्यवस्था नहीं थी। अंततः यह अपशिष्ट भी गंगा में ही पहुंचता रहा।
निर्माण में खामियां और जानलेवा लापरवाही
सीएजी रिपोर्ट में निर्माण गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर गम्भीर सवाल उठाए गए हैं। 18-19 जुलाई 2023 को चमोली के एसटीपी प्लांट में करंट लगने से 28 लोग इसकी चपेट में आए, जिनमें 16 लोगों की मौत हो गई और 12 घायल हुए। यह घटना दर्शाती है कि परियोजनाओं में सुरक्षा मानकों की भी अनदेखी की गई।
जोशीमठ : योजनाओं की विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण
जोशीमठ में वर्ष 2010 में 9.61 करोड़ रुपए की लागत से 27.67 किलोमीटर लम्बी सीवर लाइन बिछाने की योजना बनाई गई थी। 9.57 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी केवल 14.67 किलोमीटर लाइन ही
बिछाई जा सकी और योजना अधूरी छोड़ दी गई। इसके बाद वर्ष 2017 में 48.43 करोड़ रुपए की नई योजना शुरू की गई, जिसमें एसटीपी का निर्माण किया गया लेकिन घरों को कनेक्शन नहीं दिया गया। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि सीवरेज व्यवस्था की कमी जोशीमठ में भू-धंसाव का एक कारण बनी।
बिछाई जा सकी और योजना अधूरी छोड़ दी गई। इसके बाद वर्ष 2017 में 48.43 करोड़ रुपए की नई योजना शुरू की गई, जिसमें एसटीपी का निर्माण किया गया लेकिन घरों को कनेक्शन नहीं दिया गया। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि सीवरेज व्यवस्था की कमी जोशीमठ में भू-धंसाव का एक कारण बनी।
नई टिहरी : एक सकारात्मक अपवाद
नई टिहरी में 5 एमएलडी क्षमता के एसटीपी और 32 किलोमीटर लम्बी सीवर लाइन के माध्यम से 5453 घरों में से 3754 घरों को जोड़ा गया जो लगभग 83 प्रतिशत है। यह एकमात्र उदाहरण है जहां परियोजना
अपेक्षाकृत सफल रही।
अपेक्षाकृत सफल रही।
राज्य नमामि गंगे मिशन की कार्यप्रणाली पर सवाल
राज्य नमामि गंगे मिशन ने 2024 में अपने उत्तर में कहा कि योजना का मुख्य उद्देश्य नालों को एसटीपी से जोड़ना था, घरों को नहीं। सीएजी ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि बिना घरेलू कनेक्शन के गंगा की सफाई सम्भव नहीं है। कुल मिलाकर पूरी रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि योजनाओं में समन्वय की कमी रही, धन का उपयोग प्रभावी तरीके से नहीं हुआ, निगरानी तंत्र कमजोर रहा और क्रियान्वयन अधूरा रहा। हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद गंगा की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। उत्तराखण्ड जैसे उद्गम राज्य में यदि यह हाल है तो यह पूरे नमामि गंगे मिशन की कार्यप्रणाली पर गम्भीर सवाल खड़ा करता है।