दावोस में विश्व इकोनाॅमिक फोरम के दौरान ट्रम्प ने जिस ‘बोर्ड आॅफ पीस’ की घोषणा कर दुनिया को चैंकाया है, वह गाजा के पुनर्निर्माण के नाम पर एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था खड़ी करने का प्रयास माना जा रहा है जो संयुक्त राष्ट्र को बायपास कर सकती है। कई देश इसके साथ आ गए हैं, कई ने साफ मना कर दिया जबकि भारत, चीन, रूस और यूरोप के कई देश अभी चुप हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या शांति की आड़ में ट्रम्प एक नई ‘विश्व राजनीति’ लिख रहे हैं?

दावोस में विश्व इकोनाॅमिक फोरम के मंच से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस आत्मविश्वास के साथ कहा कि ‘‘हमारे बिना दुनिया के ज्यादातर देश काम नहीं करते’’, वह महज भाषण नहीं था बल्कि उस राजनीतिक मनोवृत्ति का संकेत था जिसके सहारे ट्रम्प अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के परम्परागत ढांचे को चुनौती देने निकल पड़े हैं। इसी पृष्ठभूमि में ट्रम्प प्रशासन ने जिस संस्था को दुनिया के सामने रखा है ‘बोर्ड आॅफ पीस’ वह अब केवल गाजा के पुनर्निर्माण की योजना भर नहीं रह गई है। इसे वैश्विक व्यवस्था को नए सिरे से ढालने का प्रयास माना जाने लगा है।

अमेरिका ने 22 जनवरी को ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ के लिए एक औपचारिक साइनिंग सेरेमनी आयोजित है। यह साइनिंग सेरेमनी दावोस में हुई जहां पहले से ही दुनिया के बड़े नेता, कारोबारी और राजनयिक मौजूद हैं। यही कारण है कि यह कार्यक्रम ट्रम्प के लिए एक तरह का ‘शक्ति प्रदर्शन’ भी बन गया।
 
गाजा की आड़ में शक्ति प्रदर्शन

‘बोर्ड ऑफ़  पीस’ को ट्रम्प गाजा की तबाही के बाद ‘शांति और पुनर्निर्माण’ का अगला चरण बताते हैं। कहा जा रहा है कि यह बोर्ड गाजा की प्रशासनिक संरचना, पुनर्निर्माण के ठेके, निवेश और सुरक्षा प्रबंधन जैसे विषयों पर निगरानी करेगा। लेकिन इसी बोर्ड के आधिकारिक चार्टर ने दुनिया में सबसे बड़ी बेचैनी पैदा कर दी है क्योंकि जिस दस्तावेज को इसके मिशन का आधार बताया जा रहा है, उसमें ‘गाजा’ शब्द तक नहीं है। इस चार्टर की भाषा यह संकेत देती है कि ‘बोर्ड आॅफ पीस’ का दायरा केवल गाजा नहीं बल्कि दुनिया के किसी भी संघर्ष क्षेत्र तक फैलाया जा सकता है। इसमें लिखा गया है कि यह संस्था उन क्षेत्रों में ‘स्थिरता, भरोसेमंद और वैध शासन, तथा स्थायी शांति’ सुनिश्चित करेगी जो संघर्ष से प्रभावित हैं या संघर्ष से खतरे में हैं। यही वाक्य कई देशों के लिए खतरे की घंटी बन गया है क्योंकि यह परिभाषा इतनी व्यापक है कि भविष्य में इसे किसी भी देश या क्षेत्र पर लागू किया जा सकता है और फिर अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप के लिए नया वैध तर्क तैयार हो सकता है।
 
संयुक्त राष्ट्र को बायपास करने का माॅडल

अब तक वैश्विक शांति और संघर्ष प्रबंधन के लिए संयुक्त राष्ट्र को सबसे बड़ा मंच माना जाता रहा है। उसके भी दोष हैं, सीमाएं हैं और शक्तिशाली देशों की राजनीति ने उसे कई बार पंगु भी किया है लेकिन फिर भी यूएन की एक वैधता है, लगभग सार्वभौमिक सदस्यता है, नियमों की भाषा है और संस्थागत संतुलन है। ट्रम्प के ‘बोर्ड आॅफ पीस’ में यही वैधता कमजोर दिखती है। सदस्यता किसी वैश्विक सहमति से नहीं बल्कि ट्रम्प के निमंत्रण से तय होगी। निर्णयों की व्याख्या भी अंतिम तौर पर ट्रम्प ही करेंगे। यही कारण है कि ‘बोर्ड आॅफ पीस’ को लेकर यह चिंता बढ़ रही है कि यह संयुक्त राष्ट्र का विकल्प बनने नहीं बल्कि उसे धीरे-धीरे अप्रासंगिक बनाने की दिशा में उठाया गया कदम है।
 
सर्वोच्च सत्ता ट्रम्प के पास

‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ की संरचना एक बहुपक्षीय संस्था जैसी कम और एक अध्यक्ष-केंद्रित व्यवस्था जैसी अधिक प्रतीत होती है। इसके ऊपर एक फाउंडिंग काउंसिल/मुख्य परिषद होगी जिसके नीचे एक एग्जीक्यूटिव बोर्ड होगा और सबसे ऊपर अध्यक्ष के रूप में ट्रम्प की भूमिका होगी।

चार्टर के मुताबिक ट्रम्प के पास केवल अध्यक्ष होने का दर्जा नहीं बल्कि अंतिम व्याख्या का अधिकार, वीटो शक्ति और बड़े निर्णयों को पलटने तक की ताकत है। यदि यह संस्था सचमुच वैश्विक शांति की संस्था होती तो ऐसा केंद्रीकरण सामान्य नहीं माना जाता। लेकिन यहां सत्ता-क्रम का केंद्र किसी तटस्थ अंतरराष्ट्रीय नियम-व्यवस्था के बजाय एक राष्ट्राध्यक्ष की इच्छा बनती दिख रही है। यही कारण है कि यूरोप के कई देशों ने इसे ‘अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खतरा’ मानकर खारिज कर डाला है। इस पहल को लेकर संदेह इसलिए भी बढ़ता है कि एग्जीक्यूटिव बोर्ड में जिन नामों की चर्चा है वे अंतरराष्ट्रीय तटस्थता की बजाय ट्रम्प के करीबियों और शक्तिशाली राजनीतिक चेहरों का समूह नजर आते हैं। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर का नाम इसमें लिया जा रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और ट्रम्प के दामाद जेरेड कुश्नर जैसे नाम भी सामने हैं। यह सूची यह संदेश देती है कि ‘बोर्ड आॅफ पीस’ किसी स्वतंत्र बहुपक्षीय संस्था की तरह नहीं बल्कि ‘व्हाइट हाउस समर्थित शक्ति-संरचना’ की तरह आगे बढ़ सकता है।
 
सैन्य पहलू: ‘स्थिरीकरण बल’ और स्थायी निरस्त्रीकरण

‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ सिर्फ प्रशासन और अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रखा गया है। इसके साथ एक सैन्य स्तम्भ भी जोड़ा जा रहा है, एक ‘अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल’ जिसकी कमान अमेरिकी मेजर जनरल को देने की चर्चा है। इसके उद्देश्य में ‘स्थायी निरस्त्रीकरण’ जैसे शब्द शामिल हैं। यही शब्द कई देशों को असहज कर रहे हैं क्योंकि इसका अर्थ यह निकाला जा रहा है कि पुनर्निर्माण और प्रशासन के साथ-साथ सुरक्षा नियंत्रण भी अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था के हाथ में रहेगा। गाजा के संदर्भ में इसका अर्थ यह भी लगाया जा रहा है कि भविष्य में गाजा किस प्रकार की राजनीतिक संरचना में जाएगा, इसका निर्णय स्थानीय ताकतों से अधिक बाहरी ताकतें करेंगी।
 
अरब और मुस्लिम देशों के समूह का समर्थन

कई देशों ने बोर्ड से जुड़ने की सहमति दी है। खास तौर पर अरब और मुस्लिम देशों के एक समूह ने संयुक्त रूप से समर्थन का ऐलान किया है। इनमें सऊदी अरब, कतर, तुर्किये, इंडोनेशिया, जाॅर्डन, यूएई, मिस्र और पाकिस्तान जैसे देश शामिल हैं। इन देशों ने बयान देकर कहा है कि वे संघर्ष विराम, मानवीय सहायता और गाजा के पुनर्निर्माण के उद्देश्य से इस बोर्ड के साथ काम करने को तैयार हैं। पाकिस्तान ने तो इसे स्थायी सीजफायर और राहत कायोक्त के विस्तार की उम्मीद से भी जोड़ा है लेकिन कई विश्लेषक मानते हैं कि इन देशों के लिए यह मंच केवल मानवीय उद्देश्य नहीं बल्कि ‘व्हाइट हाउस तक पहुंच’ का एक रणनीतिक रास्ता भी है।
 
इजराइल की भागीदारी: निष्पक्षता पर सबसे बड़ा प्रश्न

‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ से जुड़े सबसे विवादित पहलुओं में एक इजराइल की भागीदारी भी है। इजराइल ने इस बोर्ड में शामिल होने की पुष्टि की है और प्रधानमंत्री नेतन्याहू के इसमें सक्रिय रूप से भाग लेने की खबरें हैं।

गाजा में जिस युद्ध ने विनाश का दृश्य रचा, उसी युद्ध के सबसे शक्तिशाली पक्ष का ‘शांति बोर्ड’ में बैठना कई सवाल खड़े करता है। आलोचक कहते हैं कि यदि वही नेतृत्व पुनर्निर्माण की रूपरेखा तय करेगा तो यह ‘शांति’ कम और ‘विजेता की शर्तों’ वाला समाधान ज्यादा हो सकता है।
 
यूरोप के कुछ देशों ने साफ ‘ना’ कहा

इस बोर्ड में शामिल होने से कम से कम पांच देशों ने स्पष्ट इंकार किया है, फ्रांस, डेनमार्क, नाॅर्वे, स्वीडन और स्लोवेनिया। दावोस में स्वीडन के प्रधानमंत्री ने इस फैसले पर सार्वजनिक रूप से बोलते हुए दूरी बना ली। स्लोवेनिया ने इसे खतरनाक हस्तक्षेप जैसा करार दिया। ब्रिटेन ने भी इसमें तत्काल शामिल होने से इंकार कर दिया है। डेनमार्क का इंकार खासतौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका-डेनमार्क में तनाव पहले से मौजूद है। ऐसे में यह संदेश जा रहा है कि यूरोप का एक हिस्सा ट्रम्प के नेतृत्व को केवल ‘साझेदार’ के रूप में नहीं बल्कि ‘दबाव की राजनीति’ के केंद्र के रूप में देख रहा है।
 
भारत, जापान, चीन और रूस की दुविधा

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे रोचक स्थिति उन देशों की है जो न हां कह रहे हैं न ना। भारत, जापान और थाईलैंड जैसे देशों का नाम आमंत्रित देशों में लिया जा रहा है लेकिन इनकी तरफ से कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। यूरोप के बड़े देशों, जर्मनी, इटली और ब्रिटेन की ओर से भी अभी तक स्पष्ट बयान नहीं है। चीन और रूस को भी निमंत्रण दिया गया है लेकिन उनकी तरफ से भागीदारी की पुष्टि नहीं हुई है। माना जा रहा है कि इन देशों के लिए ‘बोर्ड आॅफ पीस’ एक अमेरिकी परियोजना है, इसलिए वे जल्दबाजी नहीं कर रहे। भारत जैसे देश भी इस फैसले को कूटनीतिक संतुलन के तराजू पर तौल रहे हैं क्योंकि इसमें शामिल होना संयुक्त राष्ट्र की पारम्परिक व्यवस्था को कमजोर करने वाली कार्रवाई मानी जा सकती है और बाहर रहना अमेरिका के साथ समीकरणों में जोखिम पैदा कर सकता है।
 
एक अरब डाॅलर से सत्ता खरीदने का माॅडल
 
‘बोर्ड ऑफ पीस’ का सबसे विवादास्पद प्रस्ताव यह है कि जो देश पहले साल में 1 अरब डाॅलर से अधिक योगदान देंगे उन्हें स्थायी सीट मिल सकती है। यह प्रावधान दुनिया में इसलिए आलोचना झेल रहा है क्योंकि यह वैश्विक नेतृत्व को ‘योग्यता या वैधता’ नहीं बल्कि ‘धन- प्रभाव’ के आधार पर तय करने का संकेत देता है। यही माॅडल कई देशों को इस बोर्ड से दूर कर रहा है क्योंकि यह बहुपक्षवाद की आत्मा के खिलाफ माना जा रहा है। यह व्यवस्था एक ऐसे ‘क्लब’ की तस्वीर बनाती है जहां सत्ता का रास्ता आर्थिक ताकत और अमेरिकी निकटता से तय होगा। कुल मिलाकर गाजा की तबाही के बाद पुनर्निर्माण की जरूरत वास्तविक है और दुनिया का यह दायित्व भी है कि वहां स्थायी समाधान निकले लेकिन ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ जिस ढंग से सामने आया है, उसने यह शंका पैदा कर दी है कि क्या यह सचमुच गाजा के लिए एक अंतरराष्ट्रीय समाधान है या फिर गाजा के बहाने एक नए वैश्विक नेतृत्व माॅडल की स्थापना?

यही कारण है कि यह बहस तेज हो रही है कि ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ के जरिए ट्रम्प केवल ‘शांति’ नहीं बेच रहे बल्कि वे दुनिया को यह संदेश दे रहे हैं कि अब वैश्विक फैसले संयुक्त राष्ट्र की सहमति से नहीं बल्कि अमेरिका के नेतृत्व वाले मंचों से तय होंगे। उस व्यवस्था के केंद्र में स्वयं ट्रम्प होंगे। इसीलिए कई देशों को लगता है कि यह बोर्ड गाजा का प्रशासनिक ढांचा भर नहीं है बल्कि ‘नई विश्व-सत्ता’ की पटकथा है और ट्रम्प की वह चाह, जिसमें वे गाजा के बहाने खुद को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का ‘विश्व सम्राट’ स्थापित करना चाहते हैं।

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