‘बंगाल की शेरनी’ कही जाने वाली ममता बनर्जी इस बार सचमुच बुरी तरह फंसती नजर आ रही हैं। वर्षों से holier-than-thou जीवन (खुद को सबसे शुद्ध, सबसे ईमानदार दिखाने) वाले अंदाज में केंद्र, ईडी और भाजपा पर हमले करने वाली मुख्यमंत्री को अब अपनी ही ‘राजनीतिक मशीनरी’ के संदिग्ध लेन-देन का बोझ उठाना पड़ रहा है। ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ में 22 जनवरी को एक समाचार प्रकाशित हुआ है जिसके अनुसार आई-पैक के खातों में दिखाया गया 13.5 करोड़ के लोन का मामला सिर्फ एक वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि सत्ता तंत्र, चुनावी प्रबंधन और सम्भावित मनी ट्रेल के उस अंधेरे गलियारे की ओर इशारा करता है, जिसे विपक्ष ‘टीएमसी माॅडल’ कहकर ममता को घेरता रहा है। ऊपर से कट मनी, शारदा, भर्ती घोटाला और अभिषेक बनर्जी पर लगे आरोपों की पृष्ठभूमि ममता के नैतिक तेवर को खोखला कर देती है। यही वजह है कि इस बार उनका ‘राजनीतिक बदले’ वाला नैरेटिव कमजोर पड़ रहा है और वे बचाव की मुद्रा में आ गई हैं


राजनीति में कुछ मुहावरे नेताओं के व्यक्तित्व से चिपक जाते हैं। ‘बंगाल की शेरनी’ ममता बनर्जी के लिए ऐसा ही एक सम्बोधन रहा है, आक्रामक, निर्भीक, भिड़ने वाली, झुकने से इंकार करने वाली। लेकिन अब वही ‘शेरनी’ अपने सबसे कठिन दौर में दिख रही है। इस बार मामला सिर्फ केंद्र बनाम बंगाल का नहीं है, न ही यह मात्र जांच एजेंसियों की छापेमारी का सामान्य राजनीतिक तमाशा है। यह संकट उससे बड़ा है। यह संकट ममता बनर्जी के नैतिक दावे का संकट है और नैतिक दावे की टूटन राजनीति में सबसे महंगी पड़ती है क्योंकि नेता का सबसे बड़ा पूंजी-भंडार, ‘भरोसा’ उसी से बनता और उसी से टूटता है।

ममता बनर्जी की कार्यशैली और उनका रवैया हमेशा से holier-than-thou  जीवन सरीखा रहा है यानी खुद को बाकी सबसे पवित्र, ज्यादा ईमानदार, ज्यादा नैतिक और ज्यादा जन-हितैषी साबित करने की कोशिश और दूसरों को हर हाल में भ्रष्ट और जन-विरोधी बताने की रणनीति। भारतीय राजनीति में यह शैली नई नहीं है लेकिन ममता ने इसे बंगाल में एक स्थायी हथियार बना डाला। जब-जब ईडी, सीबीआई या केंद्र की कोई कार्रवाई हुई, ममता ने इसे ‘लोकतंत्र पर हमला’, ‘संघीय ढांचे पर हमला’ और ‘राजनीतिक बदला’ बताया। उनके पास यह कहने के लिए पर्याप्त कारण भी रहे क्योंकि देश में एजेंसियों की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं। पर राजनीति हमेशा आशंका और धारणा से नहीं चल सकती है। बंगाल की जनता के अनुभव में तृणमूल शासन के वर्षों ने ऐसे बहुत से सवाल, आरोप और शिकायतें जोड़ी हैं, जिनके सामने ममता का नैतिक प्रमाणपत्र अब फीका पड़ने लगा है।

दरअसल ममता बनर्जी की मुश्किल यह है कि वे जिस ऊंचे मंच पर खड़ी होकर केंद्र के खिलाफ नैतिक भाषण देती हैं, उस मंच के नीचे उनकी पार्टी का संगठन और शासन-तंत्र भ्रष्टाचार के आरोपों से लगातार घिरा रहा है। कट मनी का आरोप बंगाल की राजनीति का वह स्थायी घाव है जिसने तृणमूल के स्थानीय कैडर को जनता के लिए सेवक से ज्यादा ‘वसूली तंत्र’ बना दिया। विकास कायोक्त में कमीशन, योजनाओं के लाभ में कटौती, नियुक्तियों में सिफारिश, ये शब्द बंगाल में सिर्फ राजनीतिक स्लोगन नहीं रहे बल्कि कई इलाकों में ‘लोकल सच्चाई’ का हिस्सा बन गए। एक समय ममता को खुद सार्वजनिक रूप से पार्टी कार्यकर्ताओं को चेतावनी देनी पड़ी थी कि कट मनी जैसी वसूली की शिकायतें खत्म हों, पैसा लौटाया जाए। लेकिन जिस समस्या को शीर्ष नेतृत्व को सार्वजनिक चेतावनी देकर रोकना पड़े, वह समस्या खत्म नहीं होती, वह सिर्फ दब जाती है। फिर वक्त आने पर वही दबा हुआ सच, ‘आरोप’ नहीं रहता, ‘चरित्र’ बन जाता है।

इसी बीच बंगाल में घोटालों के आरोपों की एक श्ृंखला लगातार चर्चा में रही। ‘शारदा चिट फंड घोटाला’ बंगाल की स्मृति में आज भी ताजा है। लाखों छोटे निवेशकों की कमाई डूबी, घर उजड़े, उम्मीदें टूटीं। भले ही
राजनीतिक बहस में ‘कानूनी आरोपी कौन?’ यह प्रश्न अलग हो लेकिन जनता के मन में ‘शासन के दौरान हुआ, शासन ने रोका क्यों नहीं? संरक्षण किसका था?’ ये सवाल कहीं ज्यादा भारी होते हैं। शारदा ने ममता बनर्जी पर सीधा कानूनी ठप्पा भले न लगाया हो, लेकिन टीएमसी से जुड़े कई चेहरों और उस इकोसिस्टम के साथ इस प्रकरण का राजनीतिक संबंध बना रहा। यानी यह केस ममता के नैतिक दावे के लिए एक स्थायी चुनौती बन गया कि जिनकी सरकार में इतना बड़ा पोंजी घोटाला हुआ, वे दूसरों को भ्रष्ट कहकर ‘ईमानदारी’ का झंडा क्यों लहराएं?

फिर आया भर्ती घोटालों का दौर। स्कूल सर्विस कमीशन भर्ती विवाद ने बंगाल में सबसे संवेदनशील जगह पर चोट की, युवाओं के सपनों पर। नौकरी सिर्फ रोजगार नहीं होती, वह परिवार की इज्जत, पीढ़ी का भविष्य और सामाजिक सम्मान होती है। अगर भर्ती में घोटाले की गंध आती है तो जनता सिर्फ नाराज नहीं होती, वह टूटती है। जब जनता टूटती है तो सत्ता का नैरेटिव भी टूटता है। यही वजह है कि ममता के पास अब वह नैतिक पूंजी नहीं बची जिसके भरोसे वे हर जांच को ‘राजनीतिक बदला’ कहकर हवा में उड़ा दें।

इस पृष्ठभूमि में अब आईपैक प्रकरण सामने आया है। यह प्रकरण खास इसलिए है क्योंकि यह ममता बनर्जी के लिए केवल ‘एक और जांच’ नहीं है। यह उस मशीनरी से जुड़ा है जिसे राजनीतिक रणनीति और चुनावी प्रबंधन का आधुनिक उपकरण माना जाता रहा। आईपैक इंडियन पाॅलिटिकल एक्शन कमेटी के बारे में आम धारणा यह रही है कि यह चुनावी गणित, डेटा, रणनीति और अभियान प्रबंधन में माहिर एक प्रोफेशनल संगठन है। यानी ऐसा संगठन जो राजनीति को ‘मैनेज’ करता है लेकिन अब इसी संस्था पर यह प्रश्न खड़ा हो गया है कि उसने एक ऐसी कम्पनी से 13.5 करोड़ का अनसिक्योर्ड लोन लेने की घोषणा की, जिसका अस्तित्व ही कागजों पर संदिग्ध बताया जा रहा है और जिस पते पर उसका होना दिखाया गया, वहां उसका नामोनिशान नहीं मिला। इससे बड़ा सवाल यह है कि अगर वह कम्पनी कई साल पहले रजिस्ट्रार आॅफ कम्पनीज रिकाॅर्ड में समााप्त हो चुकी थी तो फिर 2021 में उसके द्वारा लोन कैसे दिया गया? और अगर आईपैक ने बाद में यह भी कहा कि लोन में से 1 करोड़ चुका दिया गया और बाकी 12.5 करोड़ बकाया है तो यह महज ‘टाइपो’ या ‘कागजी गलती’ नहीं रह जाती, यह एक सक्रिय, जारी और गम्भीर वित्तीय कथानक बन जाता है।

राजनीति में यह कहानी इसलिए खतरनाक है क्योंकि यह ‘लेन-देन’ को ‘मनी-ट्रेल’ बना देती है। और मनी-ट्रेल जब बनता है तो जांच की दिशा बदलती है। तब सवाल केवल यह नहीं रहता कि ‘लोन लिया या नहीं’, सवाल यह बन जाता है कि पैसा आया कहां से, दिखाया किसके नाम पर गया और किस उद्देश्य से ‘गायब कम्पनी’ को माध्यम बनाया गया? ऐसे मामलों में शक की उंगली सीधे ‘एंट्री मैनेजमेंट’ या ‘लेयरिंग’ जैसे शब्दों तक पहुंचती है जो मनी लाॅन्ड्रिंग के संदर्भ में इस्तेमाल होते हैं। और यही कारण है कि इस बार ममता का बचाव भी उल्टा पड़ता दिख रहा है क्योंकि वे जिस संस्था के पक्ष में एजेंसियों पर हमला कर रही हैं, वही संस्था अब प्रथम दृष्टि में संदेह के घेरे में है।

ममता बनर्जी के लिए यह संकट इसलिए भी गहरा है क्योंकि तृणमूल के भीतर अभिषेक बनर्जी को लेकर पहले से ही लगातार राजनीतिक विवाद और आरोप चलते रहे हैं। अभिषेक बनर्जी पार्टी में ममता के बाद सबसे प्रभावशाली चेहरा माने जाते हैं और यही ‘उत्तराधिकार’ का प्रश्न तृणमूल की राजनीति का सबसे संवेदनशील बिंदु भी है। विपक्ष वर्षों से यह तर्क देता आया है कि तृणमूल का शासन-तंत्र एक ऐसे नेटवर्क में बदल गया है जिसमें संगठन, प्रशासन और संसाधन एक ही धुरी पर घूमते हैं। अब आईपैक प्रकरण उस विपक्षी तर्क को और धार देता है। क्योंकि यह केवल भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है, यह सत्ता के ‘मैनेजमेंट’ का आरोप है। यानी चुनाव जीतने की मशीनरी के भीतर धन, डेटा और नियंत्रण का जो गठजोड़ है, उसकी परतें खुल रही हैं।

इस पूरे दृश्य का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रभाव यह है कि ममता बनर्जी का केंद्र द्वारा सताई जार रही (victim narrative) कमजोर हो रहा है। वे अब तक यह कहकर जनता की सहानुभूति हासिल करती थीं कि ‘केंद्र बंगाल को दबा रहा है, एजेंसियां बदले की कार्रवाई कर रही हैं।’ लेकिन अब जनता के सामने दो तस्वीरें हैं, एक तस्वीर में केंद्र की आक्रामकता, दूसरी तस्वीर में बंगाल के भीतर भ्रष्टाचार के आरोप। जब दोनों तस्वीरें आमने-सामने आती हैं तो जनता सहानुभूति भी देती है और सवाल भी पूछती है। जब सवाल भारी हो जाते हैं, सहानुभूति काम नहीं आती। यही वजह है कि इस बार ममता बनर्जी ‘फंसी हुई’ दिख रही हैं, भाषा उनकी पहले जैसी आक्रामक है, मंच भी उनका ही है, पर नैतिक जमीन खिसक रही है। राजनीति में जमीन खिसके तो सबसे तेज आवाज भी खोखली लगने लगती है।

इस संकट का एक राष्ट्रीय संकेत भी है। ममता बनर्जी खुद को राष्ट्रीय विपक्ष की बड़ी नेता की तरह देखती रही हैं। वे बार-बार यह संदेश देती हैं कि भाजपा को रोका जा सकता है और वे उसे रोकने की धुरी बन सकती हैं। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में नेतृत्व का दावा सिर्फ भाषण से नहीं टिकता, उसके पीछे स्वच्छ छवि और विश्वसनीय सरकार की पूंजी चाहिए। बंगाल में घोटालों की पृष्ठभूमि, कट मनी का आरोप और अब आईपैक जैसा संदिग्ध प्रकरण, ममता को उस राष्ट्रीय मंच पर कमजोर कर सकता है क्योंकि विरोधियों के पास अब यह कहने के लिए पर्याप्त हथियार होंगे कि ‘आप लोकतंत्र बचाने निकली हैं, पहले अपने घर को साफ कीजिए।’

अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि ममता बनर्जी के लिए यह समय सबसे निर्णायक है। अगर वे इस बार भी एजेंसियों के खिलाफ लड़ाई को केवल ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ के फ्रेम में बांधती हैं तो यह रणनीति टिकेगी नहीं, क्योंकि उनके पास उसे साबित करने के लिए नैतिक पूंजी कम बची है। यदि वे जांच, पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में गम्भीर कदम उठाती हैं तो उन्हें सबसे पहले अपनी ही पार्टी और संगठन के भीतर के ‘सिस्टम’ से टकराना पड़ेगा जो शायद किसी भी नेता या मुख्यमंत्री के लिए सबसे कठिन लड़ाई है। यही वह मोड़ है जहां ‘बंगाल की शेरनी’ अब घायल नजर आती है क्योंकि इस बार हमला बाहर से नहीं, अंदर की सच्चाई से है। अंदर की सच्चाई सबसे खतरनाक होती है, वह झूठे नैरेटिव को काट देती है और सत्ता को बचाव में धकेल देती है।

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