आज का भारत एक अजब किस्म की विडम्बना का देश बन गया है, ऐसा देश जिसका संविधान उसे समाजवादी और पंथ निरपेक्ष कहता है लेकिन असल में दोनों ही धरातल पर नजर नहीं आते। पंथनिरपेक्षता पर बहुत कुछ लिखता आया हूं। आज बात समाजवादी भारत की जहां श्रम कानून मौजूद तो हैं लेकिन श्रम की बात कोई नहीं करता। जहां मजदूर करोड़ों में हैं, लेकिन मजदूर आंदोलन गिने-चुने रह गए हैं, जहां श्रम का शोषण रोजाना की हकीकत है लेकिन सार्वजनिक विमर्श में श्रमिक की पीड़ा लगभग अनुपस्थित है। कभी यूनियनों की ताकत, ट्रेड यूनियन संस्कृति और श्रम अधिकारों की बहस भारत की राजनीति की रीढ़ मानी जाती थी पर अब यह सब जैसे इतिहास के धूल भरे पन्नों में दबा दिया गया है। इसकी वजह समझने के लिए बहुत गहराई में जाने की जरूरत नहीं है क्योंकि आज भारत में बाजार सरकार की नीति पर हावी हो चुका है। ‘ईज ऑफ़ डूइंग बिजनेस’, ‘स्टार्टअप’, ‘इन्वेस्टमेंट’ और ‘ग्राॅथ’ के नारे इतने ताकतवर हो चुके हैं कि श्रम की गरिमा, मजदूर की सुरक्षा और काम के अधिकार उनके नीचे दबते चले गए। नीतियां अब नागरिक के अधिकारों से कम और उद्योग के लाभ से ज्यादा संचालित होती दिखती हैं। यही कारण है कि देश में रोजगार की चर्चा तो होती है लेकिन रोजगार की गुणवत्ता पर चुप्पी है। नौकरी के अवसरों की बात होती है लेकिन नौकरी की सुरक्षा का प्रश्न गायब है। डिजिटल अर्थव्यवस्था का ढोल पीटा जाता है लेकिन उसी डिजिटल अर्थव्यवस्था को चलाने वाले मजदूर को ‘कर्मचारी’ मानने से इनकार कर दिया जाता है। यह उसी राजनीतिक अर्थव्यवस्था का परिणाम है जिसमें सरकार और काॅरपोरेट का गठजोड़ इतना स्वाभाविक हो गया है कि श्रमिक के लिए जगह ही नहीं बचती, अगर बचती है तो वह केवल ‘डेटा’ और ‘अल्गोरिदम’ में एक संख्या की तरह बचती है।

इस पृष्ठभूमि में ‘10 मिनट में डिलीवरी’ वाला भारत उभरा। पहली नजर में यह आधुनिक सुविधा का प्रतीक लगता है, शहरी मध्यवर्ग की भागती जिंदगी के लिए एक वरदान सरीखा कि दूध खत्म हो जाए तो चिंता नहीं, मेहमान आ जाएं तो चिंता नहीं, बच्चे का सामान चाहिए तो चिंता नहीं, एक क्लिक और दरवाजे पर पैकेट। क्विक काॅमर्स कम्पनियों ने इसी सुविधा को अपने साम्राज्य का आधार बनाया। विज्ञापन, सोशल मीडिया, ब्रांडिंग, हर जगह यही संदेश ठोक दिया गया कि हम ‘10 मिनट’ में सामान देंगे लेकिन इस चमकदार संदेश के पीछे जिस अंधेरे को छिपाया गया वह है भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का नया मजदूर जिसे गिग वर्कर कह पुकारा जाता है। वह मजदूर जो न संगठित क्षेत्र में है, न असंगठित क्षेत्र जैसा दिखता है। जो ‘कर्मचारी’ भी नहीं कहलाता और फिर भी हर दिन किसी कर्मचारी से ज्यादा जोखिम उठाता है। वह ऐप पर लाॅगिन करता है, आदेश मिलता है, सड़क पर दौड़ता है, डिलीवरी करता है और फिर उसकी कमाई रेटिंग, टाइमर और अल्गोरिदम के हिसाब से तय होती है। उसकी
नौकरी का काॅन्ट्रैक्ट नहीं, बस एक ‘टम्र्स एंड कंडीशंस’ है, जिसे वह पढ़े बिना स्वीकार करता है और जिसके आधार पर कभी भी उसकी आईडी ब्लाॅक हो सकती है। यही वह व्यवस्था है जिसमें शोषण पुराने जमाने जैसा नहीं दिखता क्योंकि यह अब ‘ऑटोमैटेड’ हो गया है और ‘तकनीक’ की भाषा में नैतिकता से मुक्त हो गया है।

गिग वर्कर्स कौन हैं यह समझना आज भारत की राजनीति के लिए उतना ही जरूरी है जितना किसी चुनाव में जाति गणित समझना। गिग वर्कर्स वे श्रमिक हैं जो स्थायी नौकरी की जगह प्लेटफार्म आधारित काम करते हैं जैसे- कैब ड्राइवर, बाइक टैक्सी, घर-घर सेवाएं देने वाले, वेयरहाउस के अस्थायी वर्कर। इन्हें ‘डिलीवरी पार्टनर’ जैसे सम्मानजनक शब्द से पुकारा जाता है लेकिन इनके लिए न न्यूनतम वेतन की गारंटी है, न पेंशन, न छुट्टी, न नियमित स्वास्थ्य बीमा, न भविष्य निधि। बीमार पड़े तो कमाई शून्य। दुर्घटना हो जाए तो इलाज खुद। मौत हो जाए तो परिवार के लिए मुआवजा भी ‘पाॅलिसी’ और ‘कम्पनी की इच्छा’ के भरोसे। यह श्रम का वह आधुनिक रूप है जिसमें शोषण का चेहरा मुस्कराता है और भाषा ‘पार्टनरशिप’ की होती है ताकि कानूनी जिम्मेदारी शून्य रहे। यही कारण है कि आज गिग अर्थव्यवस्था को देखकर यह भ्रम पैदा होता है कि रोजगार बढ़ रहा है जबकि असल में रोजगार नहीं, असुरक्षा बढ़ रही है।

यह असुरक्षा आज करोड़ों में है। नीति आयोग के अनुमान के मुताबिक भारत में 2020-21 में गिग प्लेटफाॅर्म वर्कर्स की संख्या करीब 77 लाख थी। 2024-25 तक यह संख्या लगभग 1 करोड़ मानी गई और 2029-30 तक इसके 2.35 करोड़ पहुंचने का अनुमान है। यानी आने वाले कुछ वर्षों में भारत के पास ढाई करोड़ के आस-पास ऐसा श्रमिक वर्ग होगा जो हर दिन डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनेगा लेकिन सामाजिक सुरक्षा के बिना। इनके परिवार, इनके आश्रित और इनके सामाजिक दायरे को जोड़िए तो यह 7 से 10 करोड़ आबादी को प्रभावित करने वाला राजनीतिक वर्ग बनता है। इसलिए जो लोग यह समझते हैं कि गिग वर्कर्स का सवाल केवल ऐप कम्पनियों या शहरों तक सीमित है वे भारत के भविष्य को नहीं समझ रहे। यह भविष्य की राजनीति है और यह भविष्य का सबसे बड़ा श्रम प्रश्न भी है।

इसीलिए ‘10 मिनट में डिलीवरी’ का दावा हटना कोई साधारण व्यापारिक घटना नहीं है। यह पहली बार है जब सरकार को यह समझना पड़ा कि अल्ट्राफास्ट डिलीवरी की ब्रांडिंग केवल मार्केटिंग नहीं है वरन् यह सड़क पर मजदूर की जान से खेल है। दिसम्बर 2025 के अंत में और फिर 25 दिसम्बर तथा 31 दिसम्बर को हुई डिलीवरी वर्कर्स की हड़ताल ने इस झूठे चमकदार माॅडल की असल कीमत उजागर कर दी। गिग वर्कर्स ने कहा कि कमाई घट रही है, काम का दबाव बढ़ रहा है, रेटिंग और इंसेंटिव के नाम पर मनमानी चल रही है और सबसे बढ़कर ‘10 मिनट’ जैसी समय-सीमा उन्हें ट्रैफिक नियम तोड़ने और जोखिम उठाने को मजबूर कर रही है। यह एक तरह से बाजार की सुविधा-लालसा के खिलाफ मजदूर की पहली बड़ी सामूहिक चेतावनी थी। जब यह चेतावनी देश के कई हिस्सों में एक साथ गूंजी तब सरकार भी हरकत में आई। श्रम मंत्री के स्तर पर बैठक हुई, कम्पनियों को सलाह दी गई कि वे फिक्स्ड डिलीवरी टाइम कमिटमेंट जैसे ‘10 मिनट’, को अपने विज्ञापनों, प्रचार अभियानों और सोशल मीडिया से हटाएं ताकि दबाव घटे और सुरक्षा सुधरे। कम्पनियां अब यही कर रही हैं लेकिन यह बदलाव जितना बड़ा दिखता है, उतना ही यह एक आधा कदम भी है क्योंकि इससे मजदूर की कानूनी स्थिति नहीं बदलती, उसकी सामाजिक सुरक्षा तय नहीं होती, उसकी कमाई का पारदर्शी ढांचा नहीं बनता। यह ‘ब्रांडिंग’ का सुधार है। ‘श्रम अधिकार’ का सुधार अभी कोसों दूर है।

यह बात समझना जरूरी है कि गिग वर्कर्स के प्रश्न को सबसे पहले राष्ट्रीय बहस का रूप देने वालों में राहुल गांधी अग्रणी रहे हैं। 2023 में कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान बेंगलुरु में उन्होंने डिलीवरी पार्टनर्स के साथ मुलाकात की, उनकी स्थितियां सुनीं, उनके साथ सार्वजनिक संवाद किया और गिग वर्कर्स की सुरक्षा, वेलफेयर बोर्ड, न्यूनतम आय और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों को राजनीति के केंद्र में धकेला। उस समय यह बहुतों को एक ‘इवेंट’ लगा होगा, पर आज उसी इवेंट के अर्थ बदल गए हैं। आज यह स्पष्ट होता जा रहा है कि राहुल गांधी ने इस मुद्दे को ‘राष्ट्रीय मुद्दा’ बनाया यानी इस वर्ग को राजनीतिक पहचान दी, उसे यह विश्वास दिया कि उनकी समस्या चुनावी राजनीति में भी जगह पा सकती है। एक लोकतंत्र में यही सबसे बड़ा कदम होता है, अदृश्य को दृश्य बनाना। यही कारण है कि आज जब कम्पनियां ‘10 मिनट’ का दावा हटाने की घोषणा करती हैं तो उसे केवल सरकार की सलाह या कम्पनियों की समझदारी कहना सत्य का अपमान होगा। इसके पीछे मजदूरों की एकता है, राष्ट्रीय माहौल है और विपक्ष विशेषकर राहुल द्वारा मुद्दे को जीवित रखने की राजनीति भी है। यही वह बिंदु है जहां भाजपा के लिए संकट पैदा होता है। भाजपा की राजनीति ने पिछले एक दशक में दो बड़े आधार गढ़े, पहचान की राजनीति और विकास/बाजार की राजनीति। लेकिन गिग वर्कर्स का सवाल बाजार की राजनीति को भीतर से चुनौती देता है। यह बताता है कि ‘विकास’ के नीचे किसका खून पसीना है, ‘सुविधा’ की चमक के पीछे किसका जीवन दांव पर है और ‘स्टार्टअप इंडिया’ के नारे के भीतर किसके अधिकार काटे जा रहे हैं। यह वही संघर्ष है जिसमें सरकार उद्योग को राहत देती है और उद्योग श्रम से लागत निकालता है। गिग इकोनाॅमी इस गठजोड़ का सबसे नंगा उदाहरण है। यहां कम्पनी कहती है हम मालिक नहीं, हम प्लेटफाॅर्म हैं और सरकार इस भ्रम को बचाए रखने में मदद करती है क्योंकि इससे बेरोजगारी की तस्वीर थोड़ी सुंदर दिखने लगती है। परिणाम यह कि श्रम कानून हाशिए पर चले जाते हैं, यूनियनें कमजोर होती हैं और मजदूर अपनी ही सड़क पर अकेला रह जाता है। ऐसे में यदि कोई नेता उसके साथ खड़ा होकर कहे कि तुम्हारा सवाल देश का सवाल है तो वह नेता स्वाभाविक रूप से एक नए वोट बैंक की नींव रख देता है।

कांग्रेस के लिए गिग वर्कर्स का प्रश्न सिर्फ श्रम अधिकार नहीं, राजनीतिक पुनर्निर्माण का अवसर है। यह वर्ग युवा है, शहरी, अर्ध- शहरी है, मोबाइल पर है, रोजमर्रा की महंगाई और असुरक्षा से जूझता है। इसकी पीड़ा किसी धर्म-जाति के फ्रेम में सीमित नहीं होती बल्कि इसकी समस्या पेट्रोल, किराया, कमाई, दुर्घटना, स्वास्थ्य और सम्मान है। यह वह वोट बैंक है जिसे लम्बे समय से राजनीति ने केवल ‘सेवा प्रदाता’ की तरह देखा, नागरिक की तरह नहीं। राहुल गांधी यदि इस वर्ग की आवाज को लगातार उठाते हैं तो वे कांग्रेस के लिए एक नया सामाजिक आधार तैयार कर सकते हैं, ऐसा आधार जो भावनात्मक उन्माद से नहीं, सुरक्षा और अधिकार की मांग से बनेगा।

क्विक काॅमर्स का कारोबार बताता है कि यह संघर्ष कितना बड़ा है। इस सेक्टर को करीब 11.5 बिलियन डाॅलर यानी लगभग 1,03,730 करोड़ रुपए का बताया गया है। यही वह पैसा है जो सुविधा की चमक बनकर जनता के सामने आता है। लेकिन सुविधा की यह चमक मजदूर की कीमत पर खड़ी होती है। इसलिए ‘10 मिनट’ वाले दावे को हटाना एक प्रतीकात्मक जीत है पर निर्णायक जीत नहीं। निर्णायक जीत तब होगी जब गिग वर्कर को कर्मचारी का दर्जा मिलेगा या कम से कम उसकी सामाजिक सुरक्षा कानून के दायरे में आएगी। आज भारत में श्रम आंदोलन कमजोर है क्योंकि बाजार ताकतवर है क्योंकि सरकार की नीतियां बाजार को प्राथमिकता देती हैं। मगर इतिहास बताता है कि जब बाजार बहुत आगे निकल जाता है तब एक दिन श्रम अपनी कीमत मांगता है। गिग वर्कर्स की हड़ताल उसी की दस्तक है। ‘10 मिनट’ के झूठ का हटना उसी दस्तक का पहला परिणाम है और यदि राहुल गांधी इस वर्ग की राजनीति को लगातार मजबूत करते हैं तो यह केवल एक श्रम प्रश्न नहीं रहेगा बल्कि भाजपा के विकास नैरेटिव के भीतर उठता वह प्रश्न बन जाएगा जिसका जवाब विज्ञापनों, ट्रोलिंग और उपनामों से नहीं दिया जा सकता।

यह कहना गलत नहीं होगा कि राहुल गांधी ने गिग वर्कर्स की आवाज उठाकर कांग्रेस के लिए एक नया वोट बैंक तैयार करने की दिशा में सबसे ठोस काम किया है। वोट चोरी या एजेंसियों के दुरुपयोग जैसे मुद्दे लोकतंत्र की रक्षा के लिए जरूरी हैं लेकिन गिग वर्कर्स का मुद्दा रोजमर्रा की जिंदगी के सबसे निचले तल से जुड़ा है। यह रोटी और सुरक्षा का मुद्दा है और यही मुद्दा राजनीति में सबसे स्थायी आधार बनाता है। इसलिए अब यह सवाल सिर्फ कम्पनियों के ‘10 मिनट’ से पीछे हटने का नहीं है बल्कि यह सवाल उस राजनीति का है जो आने वाले वर्षों में भारत की सड़कों पर दौड़ते इन लाखों-करोड़ों मजदूरों को अधिकार देगी या उन्हें ऐप की स्क्रीन के पीछे अदृश्य ही रहने देगी। अगर देश ने आज भी इसे एक सामान्य खबर समझकर टाल दिया, तो कल यही ‘10 मिनट’ फिर किसी और नाम से लौट आएगा और मजदूर की जान फिर उसी तरह दांव पर लगाई जाएगी लेकिन यदि इसे राष्ट्रीय प्रश्न माना गया, नीति बनी, अधिकार तय हुए और राजनीतिक इच्छाशक्ति बनी तो यह पहली बार होगा जब भारत का नया डिजिटल मजदूर अपनी जगह केवल सड़क पर नहीं, संविधान में भी पाएगा।

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