कुमाऊं के प्रवेश द्वार और उत्तराखण्ड की ‘वीआईपी सीट’ मानी जाने वाली हल्द्वानी विधानसभा का राजनीतिक इतिहास बेहद प्रभावशाली रहा है। अलग राज्य बनने के बाद 2002 में डाॅ. इंदिरा हृदयेश यहां से विधायक चुनी गईं और नारायण दत्त तिवारी सरकार में राज्य की सबसे ताकतवर मंत्रियों में शुमार रहीं, इसी दौर (2002-2007) को हल्द्वानी में सड़क, पेयजल योजनाओं, ट्यूबवेल और ओवरहेड टैंकों के विकास काल के रूप में याद किया जाता है। 2007 में भाजपा के बंशीधर भगत ने डाॅ. हृदयेश को हराया लेकिन 2012 और 2017 में इंदिरा हृदयेश ने फिर लगातार जीत दर्ज की। अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम, आईएसबीटी और अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर जैसे बड़े प्रोजेक्टों की परिकल्पना इसी दौर में सामने आई। डाॅ. इंदिरा हृदयेश के निधन के बाद वर्तमान में कांग्रेस के सुमित हृदयेश हल्द्वानी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जहां एक ओर शहर में सीवरेज, एसटीपी, सौंदर्यीकरण और चैड़ीकरण जैसे काम चलते दिखते हैं, वहीं दूसरी तरफ नजूल भूमि, पेयजल संकट, जाम और जलभराव जैसे मुद्दे आज भी हल्द्वानी की स्थायी चुनौती बने हुए हैं
कुमाऊँ का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले हल्द्वानी की विधानसभा सीट नैनीताल जिले की वह सीट है जो उत्तराखण्ड बनने के बाद हमेशा वीआईपी सीट के रूप में जानी जाती रही। काठगोदाम-हल्द्वानी नगर निगम के 40 वार्डों को समाहित करती इस विधानसभा सीट का वर्तमान में प्रतिनिधित्व सुमित हृदयेश कर रहे हैं। यहां से कांग्रेस नेता स्व. डाॅ. इंदिरा हृदयेश तीन बार और भाजपा के बंशीधर भगत एक बार विधायक चुनकर विधानसभा में गए हैं। अलग राज्य बनने के बाद 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में डॉक्टर इंदिरा हृदयेश हल्द्वानी से चुनी गई और नारायण दत्त तिवारी सरकार में दूसरे नम्बर की ताकतवर मंत्री बनीं। 2002 से 2007 का दौर हल्द्वानी के विकास के लिए जाना जाता है। सड़कों का जाल, खासकर आंतरिक सड़कों का जाल, पेयजल की योजनाएं, ट्यूबवेल, पानी के ओवरहेड टैंक इन्हीं पांच बरसों में बने। कभी हल्द्वानी विधानसभा हिस्सा रहा। वर्तमान में कालाढूंगी विधानसभा के निवासी आज भी इंदिरा हृदयेश की विकास योजनाओं को याद करते हैं, भले ही अब वह वोट भाजपा को देते हैं, खासकर जज फार्म और उससे जुड़ा आस-पास का इलाका। 2007 में इंदिरा हृदयेश भारतीय जनता पार्टी के बंशीधर भगत से चुनाव हार गई, साथ ही विकास की लहर का पहिया भी थम सा गया। उस दौरान हल्द्वानी में कांग्रेस शासन के समय किए गए शिलान्यासों का उदघाटन ही होता रहा लेकिन विकास के नाम पर बंशीधर भगत मात्र पत्थर ही लगा पाए। 2012 और 2017 में लगातार इंदिरा हृदयेश हल्द्वानी से जीतीं। यह दौर हल्द्वानी और उसके विकास में एक बार फिर मील का पत्थर साबित हुआ। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम, अंतरराज्यीय बस अड्डा (आईएसबीटी) और अंतरराष्ट्रीय स्तर के चिड़ियाघर (जू) के प्रोजेक्ट की परिकल्पना की गई। अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम तो इंदिरा हृदयेश ने अपने 2012 के कार्यकाल में ही तैयार कर लिया था लेकिन अंतरराज्यीय बस अड्डा जो पहले कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति, फिर 2017 के बाद भाजपा की राजनीति का शिकार बन गया। आज भी अंतरराज्यीय बस अड्डा अपने लिए जगह के इंतजार में है। अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर (जू) भी सरकारी उपेक्षा को झेल रहा है।
हल्द्वानी का अधिकतर हिस्सा नजूल की भूमि पर बसा है और यही शायद हल्द्वानी की सबसे बड़ी समस्या है। यहां पर अधिकतर भूमि पर जो बसावट है, वह नजूल भूमि पर है और उस नजूल भूमि के चलते मकान बनाने के लिए विकास प्राधिकरण का दबाव आम जनता पर ज्यादा है। इसका समाधान अभी तक सरकारें खोज नहीं पाई हैं। नजूल भूमि को फ्री होल्ड करवाने और मालिकाना हक देने की योजनाएं सरकारों ने समय- समय पर निकाली जरूर लेकिन अधिकतर लोग सरकार की शर्तों के अनुसार शुल्क देने में असमर्थ रहे।
शनि बाजार निवासी जमील अहमद का कहना है कि उन्होंने 100 रुपए के स्टाम्प पर जमीन खरीदी थी अब यदि उसे अतिक्रमण के नाम पर अगर अवैध घोषित कर दिया गया तो उनकी सारी मेहनत की कमाई डूब जाएगी। इसी प्रकार बनभूलपुरा के लोग अतिक्रमण हटाने के नाम पर डर के साये में जी रहे हैं।
बनभूलपुरा निवासी आजम का कहना है कि हम सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। नजूल भूमि के चलते समस्या अभी भी बनी हुई है। हालांकि अभी नजूल भूमि के फ्री होल्ड होने पर रोक लगी है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के 25 साल बाद भी सरकारें नजूल भूमि के लिए ऐसी ठोस नीति नहीं ला पाई हैं जो आम जनता के हित में हों।
हीरानगर वार्ड के कृपाल सिंह कहते हैं कि भूमि के फ्री होल्ड ना होने के चलते लोगों को मकान बनाने के लिए प्राधिकरण से नक्शा पास करने में खासी परेशानी होती है और हद यह कि आप अपने मकान को ठीक तक नहीं कर सकते। दमुआढुंगा क्षेत्र की लम्बे समय से चली आ रही राजस्व ग्राम की मांग को पूरा करने में सरकार जरूर आगे बढ़ी है।
पेयजल : हल्द्वानी नगर में पेयजल की योजनाएं तो बहुत बनी लेकिन लगातार बढ़ती आबादी के चलते समस्या जस की तस बनी हुई है। गर्मी के समय पेयजल की समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है। गौरतलब है कि हल्द्वानी का एक बड़ा हिस्सा शुरुआत से ही पेयजल के लिए गौला नदी पर निर्भर है। पानी के लिए ट्यूबवेल और ओवरहेड टैंक बड़ी संख्या में बना तो दिए गए लेकिन भूजल का गिरता स्तर भविष्य में पेयजल संकट बढ़ा सकता है।
स्थानीय विधायक सुमित हृदयेश कहते हैं कि भाजपा शासन में पेयजल की जो व्यवस्था होनी चाहिए थी वो तो हुईं नहीं लेकिन बजट खपाने में अधिकारी पीछे नहीं रहे। अमृत योजनाओं के तहत पानी की लाइनें तो बिछा दी गईं लेकिन पानी कहां है?
पूर्व मेयर डाॅ. जोगेंद्र पाल सिंह रौतेला का कहना है कि जमरानी बांध बनने के बाद हल्द्वानी ही नहीं, तराई के बड़े हिस्सों में पेयजल की समस्या का एक हद तक समाधान हो जाएगा। नगर निगम के सभी वार्डों में पानी की समस्या लगभग गर्मियों में हमेशा दिखाई देती है। जहां तक सीवर व्यवस्था का सवाल है शहर के बड़े हिस्से में सीवर लाइन बिछा दी गई है और कहीं काम चल रहा है लेकिन पूरे हल्द्वानी विधानसभा को सीवर व्यवस्था से पूरा करने में अभी काफी समय लगेगा। सीवर ट्रीटमेंट प्लांट बन चुका है।
सड़कें : इंदिरा हृदयेश जब 2002 में मंत्री बनी तो उन्होंने हल्द्वानी में सड़कों का जाल फैला दिया था। हल्द्वानी की शायद ही कोई गली ऐसी होगी जहां पर उन्होंने सड़क को ना पहुंचाया हो, विधायक सुमित हृदयेश बताते हैं कि राज्य योजना के अंतर्गत मुख्यमंत्री की घोषणा पर उन्होंने राज्य सरकार को 10 करोड़ की सड़कों के प्रस्ताव दिए थे जिसमें 8 करोड़ की प्रस्ताव स्वीकृत होकर आए हैं। अभी 10 करोड़ की प्रस्ताव और मांगे गए हैं, साथ ही 2 करोड़ जो पुराना लम्बित था वह भी आने की पूरी उम्मीद है। हल्द्वानी में सड़क चैड़ीकरण का काम भी इस वक्त काफी तेजी से चल रहा है। काठगोदाम से लेकर तीन पानी तक सड़क के चौड़ीकरण के लिए अतिक्रमण चिह्नित किए गए हैं, कुछ अतिक्रमण पहले हटा दिए गए थे।
जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल का कहना है कि सड़क के मध्य से दोनों और 12-12 मीटर की चैड़ाई देकर सड़क को बनाया जाना है। जितने भी अतिक्रमण हैं, उनको हटाकर यातायात व्यवस्था को सुचारू और जाम से मुक्त करने के लिए ये काम किया जा रहा है।
पत्रकार दिव्य प्रकाश रावत कहते हैं कि रिंग रोड हल्द्वानी की मुख्य सड़कों से यातायात का दबाव कम करने का बेहतर विकल्प हो सकता था। 2017 में जब त्रिवेंद्र सिंह रावत पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में हल्द्वानी आए थे तो उन्होंने रिंग रोड की घोषणा की थी लेकिन अभी तक वो परियोजना सिर्फ घोषणा मात्र रह गई। उल्लेखनीय है कि अंतरराज्यीय बस अड्डा और रिंग रोड मात्र ‘लग्जरी’ परियोजनाएं नहीं बल्कि हल्द्वानी के लिए भविष्य की जीवन रेखा हैं। अंतरराज्यीय बस अड्डा (आईएसबीटी) का निर्माण रुकना और फिर उसका ठंडे बस्ते में चला जाना, यातायात के मामले में हल्द्वानी को कई वर्ष पीछे ले गया। मुख्य बाजार में बस अड्डा यातायात की समस्या और जाम का सबसे बड़ा कारण है। हालांकि यातायात के दबाव को कम करने के लिए काठगोदाम में पर्वतीय इलाकों को जाने वाली बसों के लिए नए बस अड्डे का निर्माण हो रहा है।
स्वास्थ्य सेवाएं : जहां तक सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बात है तो हल्द्वानी में जनसंख्या का दबाव बढ़ने के साथ हल्द्वानी की स्वास्थ्य सेवाएं कम पड़ती जा रही हैं। हल्द्वानी में सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय के अलावा शोबन सिंह जीना बेस चिकित्सालय और एक महिला अस्पताल है। सुशीला तिवारी अस्पताल में सिर्फ हल्द्वानी का ही नहीं, उत्तर प्रदेश, पहाड़ों से रेफर होकर मरीज आते हैं जिसके चलते इस अस्पताल पर अन्य अस्पतालों की अपेक्षा दबाव ज्यादा है। हालांकि सरकार ने यहां नई सुविधाएं जुटाने की कोशिश जरूर की है लेकिन सुशीला तिवारी अस्पताल की पूरी क्षमताओं का सरकार उपयोग नहीं कर पाई है।
सुमित हृदयेश कहते हैं कि यहां पर इंफ्रास्ट्रक्चर की कोई कमी नहीं है, बस सरकार को चाहिए कि यहां पर वह नई सुविधाएं, नए उपकरण दे, डाॅक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ उपलब्ध कराए। हृदय रोगियों के लिए बन रही कैथलैब का भवन निर्माण पूरा होने से पहले ही विवाद के घेरे में आ चुका है। उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए सांसद अजय भट्ट ने कार्यदायी संस्था मंडी परिषद को लताड़ लगाई थी। स्टेडियम रोड पर हृदय रोग संस्थान सरकारी उपेक्षा का शिकार है। स्वामी राम कैंसर हाॅस्पिटल को एक बड़ा केंद्र बनाने की बात होती जरूर है लेकिन वह भी अभी अधूरा है। सुशीला तिवारी अस्पताल अव्यवस्थाओं का शिकार है। खासकर तीमारदारों के रहने की व्यवस्था समुचित ना होने के कारण यहां बाहर से आने वाले मरीजों के तीमारदारों के लिए परेशानी हमेशा बनी रहती है। बेस अस्पताल में कोविड के समय खुली आईसीयू यूनिट लम्बे समय तक उपेक्षा का शिकार हुई थी लेकिन स्वास्थ्य मंत्री धनसिंह रावत के प्रयासों और नए जिलाधिकारी के आने के बाद अब उसकी व्यवस्थाएं कुछ दुरुस्त हुई है।
जलभराव : हल्द्वानी में बरसात के दिनों में जलभराव सबसे बड़ी समस्या है। पानी की समुचित निकासी की व्यवस्था न होने के कारण बरसात का पानी बेतरतीब ढंग से सड़कों में बहता है, खासकर हल्द्वानी की मुख्य सड़क नैनीताल रोड पर। देवखड़ी नाले से आने वाले पानी की निकासी वाली जगह कई जगह अतिक्रमण के चलते बाधित है जिसके चलते नालों का पानी पहले की तरह गौला नदी में नहीं जा पाता। प्रशासन की अनदेखी के चलते नाले के प्रवाह को गौला नदी में ले जाने रौखड़ अतिक्रमण के शिकार हो गए हैं लेकिन प्रशासन इन अतिक्रमणों को नहीं हटा पा रहा है। खासकर हल्द्वानी के रसूखदार लोगों पर हाथ डालने की हिम्मत जुटा नहीं पा रहा है।
कुल मिलाकर हल्द्वानी विधानसभा में पिछले 4 सालों में विकास की रफ्तार धीमी तो नहीं पड़ी। विपक्षी दल का विधायक होने के बावजूद सुमित हृदयेश लगातार विकास योजनाओं के लिए जुटे रहे हैं और एक प्रमुख शहर होने के नाते तथा कांग्रेस के हाथों से इस सीट को न छीन पाने का दंश भाजपा नेताओं को भी लगातार यहां के लिए विकास येाजनाएं लाने में लगा रहा है। यही कारण है कि विधायक सुमित हृदयेश के खिलाफ यहां असंतोष कम देखने को मिलता है।
डाॅ. जोगेंदर रौतेला, पूर्व मेयर, नगर निगम, हल्द्वानी
विधायक हल्द्वानी का कार्यकाल, क्योंकि वह विपक्षी पार्टी से आते हैं संतोषजनक कहलाएगा। वे सर्वप्रथम आमजन हेतु आसानी से उपलब्ध रहते हैं। ज्यादा अपेक्षा करना न्यायसंगत नहीं होगा क्योंकि अब राजनीति का उसूल हो गया है, विपक्ष के आदमी के लिए बाधा उत्पन्न करना, यही इस केस में भी लागू होता है। आज राजनीति विकास की जगह हिंदुत्व कार्ड को चमकाने की है। कार्यकाल कुल मिलाकर रस्सी पर चलने के समकक्ष रहा है। रूलिंग पार्टी में गट्स होना आवश्यक है कि वो अन्य पार्टी विधायकों को उनकी योजनाओं के लिए स्पेस दे जो कि वर्तमान प्रजातंत्र में विलुप्त हो चुका है।
अमित खोलिया, समाज सेवी
विधायक जी के कार्यकाल के विषय में कुछ कहने लायक है ही नहीं। वे कुछ लोगों तक ही सीमित हैं। लोगों की जरूरत के समय काम नहीं आते। उत्पीड़न के मामलों में भी साथ देते नजर नहीं आते। इंदिरा जी और इनके दौर में काफी फर्क है।
अब्दुल मतीन सिद्दीकी, महासचिव, समाजवादी पार्टी, उत्तराखण्ड
- नेतृत्व व जनता से उपलब्धता/सम्पर्क रिपोर्ट के अनुसार विधायक ‘आसान उपलब्ध’ रहे, विपक्ष में रहते हुए जनता से संवाद बना रहा 7/10
- नजूल भूमि (सबसे बड़ी स्थायी समस्या) फ्री होल्ड, मालिकाना नीति ठोस नहीं, बनभूलपुरा-शनिबाजार जैसे इलाकों में भय/अनिश्चितता 4/10
- पेयजल व्यवस्था अमृत योजनाओं में लाइनें बिछीं पर ‘पानी कहां है’ सवाल, गर्मियों में संकट, भूजल गिरावट चिंता 5/10
- सीवरेज/एसटीपी/शहरी बुनियादी ढांचा एसटीपी बन चुका, कई इलाकों में लाइनें बिछीं/काम जारी, पर पूर्ण कवरेज में समय 6/10
- सड़कें व आंतरिक कनेक्टिविटी 10 करोड़ प्रस्ताव में 8 करोड़ स्वीकृत, चैड़ीकरण तेज, पर जाम/बस अड्डा समस्या बनी 7/10
- ट्रैफिक प्रबंधन/आईएसबीटी/रिंग रोड रिंग रोड 2017 घोषणा के बाद भी ठहरा, आईएसबीटी जमीन के इंतजार में, बाजार बस अड्डा जाम का कारण 3.5/10
- स्वास्थ्य सेवाएं (सुशीला तिवारी, बेस महिला अस्पताल) मरीज दबाव अत्यधिक, इंफ्रा है पर स्टाफ/उपकरण की कमी, कैथलैब गुणवत्ता विवादय संस्थान उपेक्षित 5.5/10
- जलभराव/नाले/अतिक्रमण बरसात में जलभराव विकराल, देवखड़ी नाला आउटलेट/रौखड़ अतिक्रमण की समस्याय रसूखदारों पर कार्रवाई कमजोर 4/10
- विकास परियोजनाएं/शहरी सुविधाएं (पार्क, एसटीपी,सिटी फाॅरेस्ट, शवदाह गृह आदि) पूर्व मेयर के अनुसार बड़ा काम सरकार के नाम, जनता में काम दिखने की धारणा 6.5/10
- विपक्ष में प्रभावशीलता/सरकारी समन्वय रिपोर्ट में एक मत: ‘विपक्ष के विधायक के लिए बाधाएं’, दूसरे मत: ‘सदन में भूमिका कमजोर/आवेश’ 5/10
औसत : 5.4/10 फाइनल ग्रेड : पास
विधायक के रूप में आपके कार्यकाल को 4 वर्ष पूरे होने को हैं, अपने इस कार्यकाल से आप कितने संतुष्ट हैं?
देखिए, सवाल मेरे संतुष्ट होने का नहीं है, जनता मेरे कार्यकाल से कितनी संतुष्ट है ये जानना जरूरी है। क्षेत्र के लिए काम करने की मेरा पूरा प्रयास रहा लेकिन हर अपेक्षा को पूरा करना सम्भव नहीं है। हां इतना ईमानदारी से कह सकता हूं कि मैंने अपने प्रयासों में कभी कोई कमी नहीं की। सड़क हो या सदन या व्यक्ति विशेष या सामूहिक विषय हो इन विषयों पर लगातार कोई पीड़ित हो, कमजोर गरीबों का साथ देने में मैं कभी पीछे नहीं रहा। बेहतर जवाब आपको हल्द्वानी की जनता ज्यादा दे पाएगी, बनिस्पत पर मेरे। यह आप जनता से पूछिए कि उसे कठिनाई या परेशानी हुई तो मैं जनता तक पहुंचा या नहीं उनकी समस्या के लिए लड़ाई लड़ी या नहीं।
विपक्षी विधायक होने के नाते क्षेत्र के विकास के लिए कितनी चुनौतियां होती हैं?
चुनौतियां हैं, पक्षपात है, पिछले विधानसभा सत्र के विशेष रजत जयंती सत्र में भाजपा विधायकों से खूब सुनने को मिला। भाजपा के विधायक कह रहे थे कि किसी के यहां 200 करोड़ किसी के 150 करोड़ के काम हुए। लेकिन मुझे तो राज्य योजना में मुख्यमंत्री की एक घोषणा के अंतर्गत मात्र 10 करोड़ की सड़क योजना मिली और उसमें से भी मात्र 8 करोड़ ही मिले। अब करीब 10 करोड़ की सड़कों के प्रस्ताव और मांगे गए हैं और 2 करोड़ की लम्बित राशि भी शायद मिल जाएगी। जो मुझे विधायक निधि मिलती है मैंने उसका शत-प्रतिशत खर्च किया है, इसमें हम अन्य विधायकों से बहुत आगे हैं। बाकी आईएसबीटी, अंतरराष्ट्रीय चिड़ियाघर बनने चाहिए थे।
रिंग रोड की घोषणा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत जी ने की थी। उसमें क्या सर्वे हुआ? क्या डीपीआर बनी? कुछ पता नहीं। अब जो सुनने में आ रहा है कि उसकी लागत 4 गुना ज्यादा हो गई है। उसमें मानवीय दृष्टिकोण भी देखना पड़ेगा। प्रस्तावित रिंग रोड को ऐसी जगह से प्रस्तावित कर दिया गया है जहां लोगों के घर हैं तो लोगों का विरोध हो रहा है। हमारी सरकार में भी विकास हुआ लेकिन आम लोगों के घर नहीं टूटे, फालतू के लाल निशान नहीं लगे। जनता के सवाल बड़े गहरे हैं जनता जो प्रताड़ना हल्द्वानी में झेल रही है, उसे भी मैं कम नहीं मानता।
पेयजल की समस्या अक्सर बनी रहती है इसके निदान के लिए आपका क्या प्रयास रहा है?
देखिए पेयजल की जो योजनाओं पर कांग्रेस सरकारों में जो काम हुआ था उससे आगे ये सरकार कुछ कर ही नहीं पाई। समस्या के कई कारण हैं। बढ़ती जनसंख्या और पहाड़ों से पलायन जो हल्द्वानी की ओर हो रहा है तथा जो भी पहाड़ से आ रहा है वह हल्द्वानी को अपने लिए मुफीद मानता है। पेयजल की जो व्यवस्थाएं होनी चाहिए वह दीर्घकालिक होनी चाहिए लेकिन बजट खपाने के चक्कर में ‘अमृत योजना’ हो या ‘जल जीवन मिशन’ या फिर ‘हर घर नल, हर घर जल’ की बात करने वालों ने पाइप लाइन तो बिछा दी गई लेकिन पानी कहां है? विकास की एक सोच होनी चाहिए और जनता को देखना चाहिए कि पूर्व की सरकार में विकास कैसे हुआ? वर्तमान की सरकार में विकास कैसे हो रहा है?
हल्द्वानी में जिस प्रकार जनसंख्या का दबाव बढ़ता जा रहा है, सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं और डाॅक्टरों के नए पदों की जरूरत है। इस पर आपके क्या प्रयास हैं?
हल्द्वानी के परिपेक्ष में तो इतना ही कहूंगा कि नारायण दत्त तिवारी जी ने सुशीला तिवारी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और कैंसर अस्पताल की स्थापना की। उसका इंफ्रास्ट्रक्चर पर्याप्त है लेकिन उसके बाद भी आप सुविधा नहीं दे पा रहे हैं, आप वहां डॉक्टर नहीं दे पा रहे हैं और यदि डॉक्टर दे रहे हैं तो उपकरण नहीं दे पा रहे हैं, उपकरण हैं तो टेक्नीशियन नहीं हैं। आप एक समग्र व्यवस्था नहीं कर पाए। हैरानी यह कि चिकित्सा मंत्री कहते हैं कि डॉक्टर मरीज को ढूंढ रहे हैं। सच तो यह कि स्वास्थ्य की व्यवस्थाएं सिर्फ हल्द्वानी विधानसभा में ही नहीं, सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में खराब है। इसलिए सरकार को गम्भीरतापूर्वक काम करना चाहिए। जो सीमांत क्षेत्र से व्यक्ति अल्मोड़ा रेफर होकर आता है या वह अल्मोड़ा से आता है, उसके लिए आप पूरी व्यवस्था तो दीजिए। अल्मोड़ा, हल्द्वानी, श्रीनगर यह सब मेडिकल काॅलेज कांग्रेस ने बनवाए। रुद्रपुर के मेडिकल काॅलेज की नींव कांग्रेस सरकार के दौरान रखी गई। सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने नया क्या किया? वह पुराने अस्पतालों को ही दुरुस्त कर दे तो स्वास्थ्य व्यवस्था एक हद तक पटरी पर आ जाएंगी लेकिन उनके पास विकास का विजन नहीं है वह हर चीज पर राजनीति करना जानते हैं। मैं लगातार इस मांग को सरकार के सामने या सदन में रखता रहा हूं। सवाल यह कि हमारी सुनेगा कौन?
आपका जनता से संवाद बेहतर है लेकिन इस संवाद के दौरान आपको जनता से प्राप्त होने वाली समस्याओं में आप कितनों का निराकरण कर पाते हैं?
देखिए शायद आपका मुझसे यह सवाल पूछना ही गलत है। यह सवाल आप जनता से करें तो बेहतर है, इसका जवाब आपको वह ज्यादा बेहतर तरीके से दे पाएगी लेकिन मैंने अपने कार्यकाल के दौरान जनता से संवाद हमेशा बनाए रखा। अपनी कुछ समस्याओं को लेकर अगर जनता मेरे तक नहीं पहुंच पाई तो मैं उस तक पहुंचा हूं और जनता के सुख-दुख में मैं हमेशा उनके साथ खड़ा रहा हूं। ठीक है कुछ समस्याएं हल भी हो जाती हैं और कुछ समस्याएं नहीं भी हो पाती हैं लेकिन मैंने उनके निराकरण का पूरा प्रयास किया है।
लोगों की शिकायत है कि अतिक्रमण के नाम पर वर्षों पुराने भवन तोड़े जा रहे हैं क्या इसका समाधान सिर्फ यही है या कोई दूसरा रास्ता निकालकर लोगों को परेशानी से बचाया जा सकता है?
देखिए, अतिक्रमण का एक नैरेटिव गढ़ दिया गया है। तकनीकी तौर पर समझिए तो उत्तराखण्ड की 85 प्रतिशत आबादी जो नगर निगम और नगर पंचायत में निवास करती है, सरकारी भूमि पर बसी हुई है। मात्र 15 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिनके पास रजिस्ट्री की फ्री होल्ड जमीन है। क्या गरीब इंसान को जीने का अधिकार नहीं है? क्या सरकार ने अपना मन बना लिया है कि 85 फीसदी जनता को परेशान करना ही है? इसका मतलब है कि 85 प्रतिशत जनता अतिक्रमणकारी है। जिन लोगों की आर्थिक स्थिति ठीक थी उन्होंने जमीन को फ्री होल्ड करवा लिया। लेकिन गरीबों के पास इतना पैसा नहीं है। हल्द्वानी में मेरी विधानसभा में 40 वार्ड हैं उसमें से 85 प्रतिशत नजूल भूमि है। उनके क्या अधिकार हैं? इसलिए इस समय सबसे बड़ी आवश्यकता है और मैंने अपने हाईकमान चाहे प्रीतम सिंह जी हों, हरीश रावत जी हों या यशपाल आर्य जी हों, इन सब से कहा है कि उत्तराखण्ड राज्य में जब हमारी सरकार आए तो एक समिति बने जो कि इन लोगों को किस आधार पर मालिकाना हक मिले उसकी एक प्रक्रिया शुरू करें। दुखद है कि उत्तराखण्ड में एक उपद्रवी प्रकोष्ठ बन गया है जो अपने आरटीआई के शक्ति का उपयोग जनता की भलाई के लिए नहीं उसे परेशान करने के लिए उपयोग करता है।
विकास एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है, क्या राजनीतिक मतभेदों को विकास की प्रक्रिया में बाधा बनना चाहिए?
बिल्कुल विकास एक सतत् प्रक्रिया है, सरकारें तो आती जाती रहती हैं लेकिन कोई भी दल हो उसे विकास के नाम पर कम से कम राजनीति नहीं करनी चाहिए। आईएसबीटी बनता तो उससे मुझे या कांग्रेस पार्टी को व्यक्तिगत लाभ नहीं होता। उससे लाखों लोगों को रोजगार मिलता और जू बनता तो एक बड़ी परिकल्पना करके इसे नानकमत्ता डैम तक का एक सर्किट बनता और भविष्य में आप एक नया काॅर्बेट तैयार कर सकते थे, ऐसे ही अगर आईएसबीटी पर अड़ंगा न लगता तो आज हल्द्वानी को जाम से 90 प्रतिशत से अधिक निजात मिल चुकी होती।

