मणिपुर में नई सरकार ने 5 फरवरी को विधानसभा में बहुमत साबित कर सत्ता सम्भाल ली है लेकिन राज्य में असंतोष, अविश्वास और हिंसा का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा। कुकी समुदाय के किसी भी विधायक ने नई सरकार के विश्वास प्रस्ताव कार्यवाही में भाग नहीं लिया। कुकी काउंसिल ने कुकी समुदाय की विधायक नेमचा किपगेन द्वारा उपमुख्यमंत्री पद स्वीकार किए जाने पर कड़ा विरोध जताया है। चुराचांदपुर सहित कई पहाड़ी इलाकों में हिंसक प्रदर्शन, आगजनी और पथराव की घटनाएं सामने आई हैं। कुकी संगठनों ने नई सरकार को मैतेई प्रधान बताते हुए कहा है कि यह सरकार समुदाय की सुरक्षा और राजनीतिक आकांक्षाओं की अनदेखी कर रही है
मणिपुर में नई सरकार का गठन संवैधानिक प्रक्रिया के तहत भले ही पूरा हो गया हो लेकिन जमीनी हालात साफ संकेत दे रहे हैं कि राज्य अब भी गहरे राजनीतिक और सामाजिक संकट से जूझ रहा है। 5 फरवरी को विधानसभा में फ्लोर टेस्ट पास करने के बाद सरकार ने औपचारिक रूप से कामकाज शुरू कर दिया लेकिन उसी दिन से यह स्पष्ट हो गया कि सरकार को राज्य के एक बड़े हिस्से, खासकर कुकी समुदाय का भरोसा हासिल नहीं है। सत्ता परिवर्तन से जिस स्थिरता की उम्मीद की जा रही थी वह फिलहाल दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रही।
गत् सप्ताह शपथ ग्रहण के बाद नवगठित सरकार ने इम्फाल स्थित विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव पेश किया जिसे बहुमत से पारित कर दिया गया। मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में राज्य में शांति बहाल करने, कानून- व्यवस्था मजबूत करने और सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की बात कही। उन्होंने कहा कि मणिपुर लम्बे समय से हिंसा और विभाजन का सामना कर रहा है और अब समय आ गया है कि राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़कर संवाद के रास्ते पर लौटा जाए। हालांकि विधानसभा के भीतर कही गई ये बातें बाहर की सड़कों और पहाड़ी इलाकों में चल रहे घटनाक्रम से बिल्कुल उलट नजर आईं।
फ्लोर टेस्ट के दौरान सबसे अहम और प्रतीकात्मक घटना यह रही कि कुकी समुदाय के किसी भी विधायक ने सदन की कार्यवाही में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया। विधानसभा में कुकी समुदाय के कुल दस विधायक हैं। इनमें से सात विधायक सत्तारूढ़ दल से जुड़े हैं जबकि बाकी अन्य दलों या निर्दलीय हैं। तीन विधायकों को वर्चुअल माध्यम से कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति दी गई थी लेकिन उन्होंने भी मतदान प्रक्रिया से दूरी बनाए रखी। इसे कुकी समुदाय की ओर से नई सरकार के प्रति राजनीतिक असहमति और अविश्वास के स्पष्ट संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार गठन के साथ ही सबसे बड़ा विवाद कुकी समुदाय से आने वाली विधायक नेमचा किपगेन को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने को लेकर खड़ा हो गया। नेमचा किपगेन इससे पहले भी राज्य सरकार में मंत्री रह चुकी हैं और कुकी राजनीति में उन्हें एक प्रभावशाली नेता माना जाता रहा है लेकिन इस बार उनका निर्णय उनके ही समुदाय के एक बड़े हिस्से को स्वीकार्य नहीं है। कुकी काउंसिल ने आरोप लगाया है कि नेमचा किपगेन ने काउंसिल की सहमति और समुदाय की सामूहिक रणनीति के बिना सरकार में शामिल होने और उपमुख्यमंत्री पद स्वीकार करने का फैसला किया।
कुकी काउंसिल का कहना है कि जब पूरा समुदाय हिंसा, विस्थापन और असुरक्षा के गम्भीर दौर से गुजर रहा है, तब किसी भी कुकी विधायक का मौजूदा सरकार का हिस्सा बनना नैतिक रूप से गलत है। काउंसिल ने यह भी कहा कि नई सरकार मैतेई प्रधान है और ऐसे में उसमें शामिल होकर नेमचा किपगेन ने समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। काउंसिल के अनुसार, यह फैसला केवल व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा को दर्शाता है, न कि समुदाय के सामूहिक हितों को।
कुकी संगठनों ने अपने बयानों में यह भी कहा है कि जिन कुकी विधायकों ने सरकार का समर्थन किया है उन्होंने पिछले महीनों में कुकी लोगों द्वारा झेले गए दर्द, जानमाल के नुकसान और विस्थापन की अनदेखी की है। काउंसिल ने संकेत दिए हैं कि ऐसे विधायकों के खिलाफ सामाजिक बहिष्कार जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं। इन बयानों के बाद कुकी समुदाय के भीतर असंतोष और अधिक गहरा गया है।
नेमचा किपगेन के उपमुख्यमंत्री बनने की खबर जैसे ही सामने आई, 5 फरवरी की शाम चुराचांदपुर जिले में हालात तेजी से बिगड़ गए। बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरू हो गई। शुरुआती तौर पर शांतिपूर्ण रहे ये प्रदर्शन कुछ ही घंटों में हिंसक हो गए। कई जगहों पर टायर जलाए गए, मुख्य सड़कों को जाम किया गया और पुलिस तथा सुरक्षा बलों पर पथराव की घटनाएं हुईं।
स्थानीय प्रशासन के अनुसार, विरोध-प्रदर्शन के दौरान सरकारी और निजी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचा। कुछ स्थानों पर वाहनों में आग लगा दी गई और बाजारों को जबरन बंद कराया गया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़ी।
चुराचांदपुर के अलावा आस-पास के पहाड़ी इलाकों में भी विरोध की खबरें सामने आ रही हैं। कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन, कुकी विमेंस ऑर्गेनाइजेशन नाइजेशन फाॅर ह्यूमन राइट्स और अन्य सामाजिक संगठनों ने नई सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इन संगठनों ने 24 घंटे के बंद का आह्वान किया और आरोप लगाया कि नई सरकार कुकी समुदाय की सुरक्षा और राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर रही है।
कुकी संगठनों का कहना है कि सरकार गठन की पूरी प्रक्रिया में पहाड़ी इलाकों की आवाज को हाशिए पर रखा गया। उनका आरोप है कि सरकार ने केवल संख्याबल के आधार पर सत्ता सम्भाली है लेकिन सामाजिक
संतुलन और भरोसे को बहाल करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। संगठनों ने यह भी कहा है कि सरकार में कुकी प्रतिनिधित्व केवल औपचारिक है और वास्तविक निर्णय-प्रक्रिया में उनकी कोई प्रभावी भूमिका नहीं है। इन घटनाओं के बीच राज्य सरकार की ओर से बार-बार यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सभी समुदायों को साथ लेकर चलना उसकी प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि उनकी सरकार किसी एक समुदाय की नहीं बल्कि पूरे मणिपुर की सरकार है। उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ने और संवाद के जरिए समस्याओं के समाधान की अपील की है। सरकार का दावा है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ राजनीतिक समाधान की दिशा में भी काम करेगी।
लेकिन कुकी समुदाय का कहना है कि केवल बयानबाजी से भरोसा बहाल नहीं हो सकता। उनका कहना है कि जब तक सरकार उनकी सुरक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भविष्य को लेकर ठोस आश्वासन नहीं देती, तब तक असंतोष बना रहेगा। समुदाय के भीतर एक बार फिर अलग प्रशासन या पृथक व्यवस्था की मांग तेज होती दिखाई दे रही है जो पहले भी राज्य और केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मणिपुर की मौजूदा स्थिति केवल सरकार गठन का मुद्दा नहीं है बल्कि यह वर्षों से चले आ रहे जातीय और सामाजिक तनाव का परिणाम है। पिछले लम्बे समय से घाटी और पहाड़ी इलाकों के बीच अविश्वास की खाई बढ़ती गई है। हालिया हिंसा ने इस खाई को और गहरा कर दिया है। ऐसे में नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बहुमत साबित करना नहीं बल्कि टूटे हुए सामाजिक ताने-बाने को जोड़ना है।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यदि कुकी समुदाय खुद को पूरी तरह सत्ता से अलग-थलग महसूस करने लगा तो इसका असर राज्य की कानून-व्यवस्था और विकास प्रक्रिया पर पड़ेगा। विरोध-प्रदर्शन और बंद से सामान्य जनजीवन प्रभावित होगा और निवेश तथा प्रशासनिक कामकाज पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।
फिलहाल मणिपुर में सरकार बन चुकी है लेकिन चुराचांदपुर की सड़कों पर जारी आक्रोश, काउंसिल की नाराजगी और विधायकों की दूरी यह साफ कर रही है कि राजनीतिक संकट खत्म नहीं हुआ है। विधानसभा में बहुमत हासिल कर लेने से सरकार को संवैधानिक वैधता जरूर मिल गई है लेकिन सामाजिक वैधता की परीक्षा अभी बाकी है।
मणिपुर के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सरकार बनी या नहीं बल्कि यह है कि क्या यह सरकार राज्य के सभी समुदायों का भरोसा जीत पाएगी। मौजूदा हालात में यही सवाल मणिपुर की राजनीति और भविष्य की दिशा तय करेगा और इसी सवाल का जवाब आने वाले दिनों में राज्य की शांति और स्थिरता का पैमाना बनेगा।
फ्लोर टेस्ट के दौरान सबसे अहम और प्रतीकात्मक घटना यह रही कि कुकी समुदाय के किसी भी विधायक ने सदन की कार्यवाही में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया। विधानसभा में कुकी समुदाय के कुल दस विधायक हैं। इनमें से सात विधायक सत्तारूढ़ दल से जुड़े हैं जबकि बाकी अन्य दलों या निर्दलीय हैं। तीन विधायकों को वर्चुअल माध्यम से कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति दी गई थी लेकिन उन्होंने भी मतदान प्रक्रिया से दूरी बनाए रखी। इसे कुकी समुदाय की ओर से नई सरकार के प्रति राजनीतिक असहमति और अविश्वास के स्पष्ट संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार गठन के साथ ही सबसे बड़ा विवाद कुकी समुदाय से आने वाली विधायक नेमचा किपगेन को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने को लेकर खड़ा हो गया। नेमचा किपगेन इससे पहले भी राज्य सरकार में मंत्री रह चुकी हैं और कुकी राजनीति में उन्हें एक प्रभावशाली नेता माना जाता रहा है लेकिन इस बार उनका निर्णय उनके ही समुदाय के एक बड़े हिस्से को स्वीकार्य नहीं है। कुकी काउंसिल ने आरोप लगाया है कि नेमचा किपगेन ने काउंसिल की सहमति और समुदाय की सामूहिक रणनीति के बिना सरकार में शामिल होने और उपमुख्यमंत्री पद स्वीकार करने का फैसला किया।
कुकी काउंसिल का कहना है कि जब पूरा समुदाय हिंसा, विस्थापन और असुरक्षा के गम्भीर दौर से गुजर रहा है, तब किसी भी कुकी विधायक का मौजूदा सरकार का हिस्सा बनना नैतिक रूप से गलत है। काउंसिल ने यह भी कहा कि नई सरकार मैतेई प्रधान है और ऐसे में उसमें शामिल होकर नेमचा किपगेन ने समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। काउंसिल के अनुसार, यह फैसला केवल व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा को दर्शाता है, न कि समुदाय के सामूहिक हितों को।
कुकी संगठनों ने अपने बयानों में यह भी कहा है कि जिन कुकी विधायकों ने सरकार का समर्थन किया है उन्होंने पिछले महीनों में कुकी लोगों द्वारा झेले गए दर्द, जानमाल के नुकसान और विस्थापन की अनदेखी की है। काउंसिल ने संकेत दिए हैं कि ऐसे विधायकों के खिलाफ सामाजिक बहिष्कार जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं। इन बयानों के बाद कुकी समुदाय के भीतर असंतोष और अधिक गहरा गया है।
नेमचा किपगेन के उपमुख्यमंत्री बनने की खबर जैसे ही सामने आई, 5 फरवरी की शाम चुराचांदपुर जिले में हालात तेजी से बिगड़ गए। बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरू हो गई। शुरुआती तौर पर शांतिपूर्ण रहे ये प्रदर्शन कुछ ही घंटों में हिंसक हो गए। कई जगहों पर टायर जलाए गए, मुख्य सड़कों को जाम किया गया और पुलिस तथा सुरक्षा बलों पर पथराव की घटनाएं हुईं।
स्थानीय प्रशासन के अनुसार, विरोध-प्रदर्शन के दौरान सरकारी और निजी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचा। कुछ स्थानों पर वाहनों में आग लगा दी गई और बाजारों को जबरन बंद कराया गया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों की तैनाती करनी पड़ी।
चुराचांदपुर के अलावा आस-पास के पहाड़ी इलाकों में भी विरोध की खबरें सामने आ रही हैं। कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन, कुकी विमेंस ऑर्गेनाइजेशन नाइजेशन फाॅर ह्यूमन राइट्स और अन्य सामाजिक संगठनों ने नई सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इन संगठनों ने 24 घंटे के बंद का आह्वान किया और आरोप लगाया कि नई सरकार कुकी समुदाय की सुरक्षा और राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर रही है।
कुकी संगठनों का कहना है कि सरकार गठन की पूरी प्रक्रिया में पहाड़ी इलाकों की आवाज को हाशिए पर रखा गया। उनका आरोप है कि सरकार ने केवल संख्याबल के आधार पर सत्ता सम्भाली है लेकिन सामाजिक
संतुलन और भरोसे को बहाल करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। संगठनों ने यह भी कहा है कि सरकार में कुकी प्रतिनिधित्व केवल औपचारिक है और वास्तविक निर्णय-प्रक्रिया में उनकी कोई प्रभावी भूमिका नहीं है। इन घटनाओं के बीच राज्य सरकार की ओर से बार-बार यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सभी समुदायों को साथ लेकर चलना उसकी प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि उनकी सरकार किसी एक समुदाय की नहीं बल्कि पूरे मणिपुर की सरकार है। उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ने और संवाद के जरिए समस्याओं के समाधान की अपील की है। सरकार का दावा है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ राजनीतिक समाधान की दिशा में भी काम करेगी।
लेकिन कुकी समुदाय का कहना है कि केवल बयानबाजी से भरोसा बहाल नहीं हो सकता। उनका कहना है कि जब तक सरकार उनकी सुरक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भविष्य को लेकर ठोस आश्वासन नहीं देती, तब तक असंतोष बना रहेगा। समुदाय के भीतर एक बार फिर अलग प्रशासन या पृथक व्यवस्था की मांग तेज होती दिखाई दे रही है जो पहले भी राज्य और केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मणिपुर की मौजूदा स्थिति केवल सरकार गठन का मुद्दा नहीं है बल्कि यह वर्षों से चले आ रहे जातीय और सामाजिक तनाव का परिणाम है। पिछले लम्बे समय से घाटी और पहाड़ी इलाकों के बीच अविश्वास की खाई बढ़ती गई है। हालिया हिंसा ने इस खाई को और गहरा कर दिया है। ऐसे में नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बहुमत साबित करना नहीं बल्कि टूटे हुए सामाजिक ताने-बाने को जोड़ना है।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यदि कुकी समुदाय खुद को पूरी तरह सत्ता से अलग-थलग महसूस करने लगा तो इसका असर राज्य की कानून-व्यवस्था और विकास प्रक्रिया पर पड़ेगा। विरोध-प्रदर्शन और बंद से सामान्य जनजीवन प्रभावित होगा और निवेश तथा प्रशासनिक कामकाज पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।
फिलहाल मणिपुर में सरकार बन चुकी है लेकिन चुराचांदपुर की सड़कों पर जारी आक्रोश, काउंसिल की नाराजगी और विधायकों की दूरी यह साफ कर रही है कि राजनीतिक संकट खत्म नहीं हुआ है। विधानसभा में बहुमत हासिल कर लेने से सरकार को संवैधानिक वैधता जरूर मिल गई है लेकिन सामाजिक वैधता की परीक्षा अभी बाकी है।
मणिपुर के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सरकार बनी या नहीं बल्कि यह है कि क्या यह सरकार राज्य के सभी समुदायों का भरोसा जीत पाएगी। मौजूदा हालात में यही सवाल मणिपुर की राजनीति और भविष्य की दिशा तय करेगा और इसी सवाल का जवाब आने वाले दिनों में राज्य की शांति और स्थिरता का पैमाना बनेगा।