एक तरफ चीन सीमा से जुड़ा संवेदनशील सैन्य प्रसंग, दूसरी ओर उस पर आधारित किताब पर चर्चा को अनुमति के नाम पर रोका जाना और तीसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय दबाव और व्यापार समझौते को लेकर आरोपों से यह धारणा मजबूत होती है कि यह संसद सत्र सरकार पर भारी पड़ रहा है। सरकार नियम, सुरक्षा और कूटनीतिक प्रक्रिया की बात कर रही है। विपक्ष पारदर्शिता, जवाबदेही और सच्चाई सामने लाने की मांग कर रहा है। नरवणे की किताब अब सिर्फ एक सैन्य संस्मरण नहीं रही बल्कि वह इस सत्र की राजनीति का केंद्र बन चुकी है
लोकसभा का मौजूदा बजट सत्र सत्तारूढ़ भाजपा के लिए लगातार असहज होता जा रहा है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक ऐसा मुद्दा उठा दिया जिससे सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आ गई। सबसे बड़ा टकराव पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ (Four Stars of Destiny) को लेकर है हुआ, एक ऐसी किताब जो अब तक बाजार में नहीं आई है क्योंकि वह ‘अनुमति’ और ‘सुरक्षा समीक्षा’ के नाम पर अटकी हुई बताई जा रही है।
राहुल गांधी इस किताब के उन अंशों का हवाला देना चाहते हैं जिनका जिक्र ‘कैरावान’ पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट में सामने आया था। वे सदन में यही मुद्दा उठाना चाहते हैं और यही वजह है कि संसद में बार-बार टकराव की स्थिति बन रही है। हालात गत् सप्ताह इतने विकट हो गए कि प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपना वक्तव्य लोकसभा में रख नहीं पाए और नेता विपक्ष राहुल गांधी को स्पीकर ओम बिड़ला ने बोलने नहीं दिया।
रेचिन ला की वह रात, जिसे पढ़ने नहीं दिया गया
राहुल गांधी जिस घटनाक्रम को सदन में रखना चाहते हैं, वह 31 अगस्त 2020 की रात पूर्वी लद्दाख के रेचिन ला क्षेत्र से जुड़ा बताया जाता है। कथित विवरण के अनुसार, भारतीय सेना ने कैलाश रेंज की सामरिक ऊंचाइयों पर बढ़त बनाई थी। उसी दौरान सूचना मिली कि चीनी पीएलए टैंक खड़ी पहाड़ी के रास्ते भारतीय पोजिशन की ओर बढ़ रहे हैं और कुछ सौ मीटर की दूरी पर पहुंच चुके हैं।
उत्तरी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी ने तत्कालीन सेना प्रमुख नरवणे को स्थिति की गम्भीरता बताई। भारतीय सैनिकों ने चेतावनी स्वरूप इल्यूमिनेटिंग राउंड दागा, लेकिन टैंक आगे बढ़ते रहे। ऊंचाई का हर मीटर रणनीतिक बढ़त तय कर रहा था।
किताब के अनुसार नरवणे ने तुरंत शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व, रक्षा मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, सीडीएस और विदेश मंत्री से सम्पर्क किया और एक ही सवाल पूछा : ‘‘मेरे लिए आदेश क्या हैं?’’
बकौल नरवणे जमीन पर कमांडर आर्टिलरी फायर के लिए तैयार थे लेकिन प्रोटोकॉल कहता था कि ऊपर से मंजूरी के बिना गोली नहीं चलानी है। मिनट बीतते जाते हैं। रात 9ः10 बजे सूचना मिलती है कि टैंक और करीब आ गए हैं। 9ः25 पर फिर स्पष्ट निर्देश मांगे जाते हैं। इसी बीच पीएलए कमांडर मेजर जनरल लियू लिन का संदेश आता है, दोनों पक्ष आगे बढ़ना रोकें और सुबह स्थानीय स्तर पर बातचीत करें। कुछ देर को लगता है कि तनाव कम हो सकता है। लेकिन नॉर्दन कमांड से खबर आती है कि टैंक रुक नहीं रहे, वे चोटी से लगभग 500 मीटर दूर हैं। कमांडर कहते हैं कि उन्हें रोकने का एकमात्र तरीका अपनी मीडियम आर्टिलरी से फायर करना है। किताब के मुताबिक स्थिति बेहद नाजुक थी और एक तरफ जमीनी कमांड फायरिंग चाहता है तो दूसरी ओर ऊपर से स्पष्ट आदेश नहीं आ रहे।
रात लगभग 10ः30 बजे रक्षा मंत्री की ओर से फोन आता है। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री से चर्चा के बाद संदेश है- ‘‘जो उचित समझो, वह करो’’’
नरवणे इस क्षण को ‘गर्म आलू’ जैसी स्थिति बताते हैं यानी अंतिम जिम्मेदारी सैन्य नेतृत्व पर छोड़ दी गई। राहुल गांधी इसी प्रसंग के जरिए सवाल उठा रहे हैं कि गम्भीर सैन्य क्षणों में राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका क्या रही।
संसद में क्या हुआ
जैसे ही राहुल गांधी ने इस कथित घटनाक्रम का हवाला देना शुरू किया रक्षामंत्री राजनाथ सिंह खड़े हो गए। उन्होंने कहा कि यह किताब प्रकाशित नहीं है, इसकी सामग्री अप्रमाणित है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी बातों को इस तरह पढ़ना उचित नहीं। इसके बाद गृहमंत्री अमित शाह उठ खड़े हुए और विपक्ष पर आरोप लगा डाला कि वह अपुष्ट सामग्री के आधार पर सुरक्षा मामलों का राजनीतिकरण कर रहा है। स्पीकर नियमों का हवाला देते रहे। राहुल गांधी को आगे पढ़ने की अनुमति नहीं दी गई। सदन में हंगामा होता रहा और बार-बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।
बहस अब अंतरराष्ट्रीय दबाव तक पहुंची
इसी दौरान राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक और गम्भीर राजनीतिक आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार अंतरराष्ट्रीय दबाव में है, खासकर उद्योगपति गौतम अडानी से जुड़े मामलों और अमेरिका में चल रहे कानूनी विवादों के कारण। उन्होंने एपस्टीन फाइल्स का भी जिक्र किया, यह संकेत देते हुए कि कथित वैश्विक नेटवर्क और कानूनी मामलों का दबाव भारत की नीतिगत स्थिति को प्रभावित कर सकता है। ये आरोप स्वाभाविक रूप से बेहद गम्भीर हैं। लेकिन अभी तक सार्वजनिक क्षेत्र में ऐसा कोई प्रमाणित दस्तावेज, न्यायिक निष्कर्ष या आधिकारिक जांच सामने नहीं आई है जो इन्हें स्थापित तथ्य सिद्ध करे। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सवाल उठाना है, पर आरोप और प्रमाण के बीच की दूरी समझना भी जरूरी है।
व्यापार समझौता और कृषि की आशंका
राहुल गांधी का आरोप है कि सरकार किसी दबाव में आकर अमेरिका के साथ लम्बित व्यापार समझौते पर नरम रुख अपना रही है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल कह चुके हैं कि किसानों और पशुपालकों के हित सुरक्षित हैं और पूरा विवरण अंतिम रूप के बाद साझा होगा। कूटनीति में यह असामान्य नहीं, लेकिन जब अमेरिकी पक्ष अधिक स्पष्ट दावे करता है और भारतीय पक्ष संयमित भाषा बोलता है तो राजनीतिक संदेह बढ़ता है।
सबसे संवेदनशील प्रश्न कृषि का है। भारत की खेती छोटे किसानों पर आधारित है जबकि अमेरिकी कृषि भारी सब्सिडी से चलती है। यदि आयात शुल्क घटते हैं तो सस्ते आयात भारतीय किसानों की कीमतों पर दबाव डाल सकते हैं। यह एमएसपी, डेयरी सहकारिताओं और ग्रामीण आय को प्रभावित कर सकता है। भारत लम्बे समय से कृषि बाजार पूरी तरह खोलने से बचता रहा है क्योंकि खाद्य सुरक्षा को रणनीतिक सम्प्रभुता से जोड़ा जाता है।
1990 के दशक में ‘गैर’ और ‘डंकल ड्राफ्ट’ को लेकर भी ऐसी ही आशंकाएं उठी थीं, जब ‘डब्ल्यूटीओ’, ‘ट्रिप्स’ को भारत में लागू करने की आशंका ने बड़े जनआंदोलन का रूप ले लिया था। तब भी डर था कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियम घरेलू कृषि नीति की स्वायत्तता सीमित कर देंगे। आज वही ऐतिहासिक स्मृति बहस को और तीखा बना रही है।
कुल मिलाकर एक तरफ चीन सीमा से जुड़ा संवेदनशील सैन्य प्रसंग, दूसरी ओर उस पर आधारित किताब पर चर्चा को अनुमति के नाम पर रोका जाना और तीसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय दबाव और व्यापार समझौते को लेकर आरोपाों से यह धारणा मजबूत होती है कि यह संसद सत्र सरकार पर भारी पड़ रहा है। सरकार नियम, सुरक्षा और कूटनीतिक प्रक्रिया की बात कर रही है। विपक्ष पारदर्शिता, जवाबदेही और सच्चाई सामने लाने की मांग कर रहा है। नरवणे की किताब अब सिर्फ एक सैन्य संस्मरण नहीं रही बल्कि वह इस सत्र की राजनीति का केंद्र बन चुकी है।

