देहरादून में राजभवन घेराव के जरिए कांग्रेस ने न केवल प्रदेश सरकार की कानून-व्यवस्था और बेरोजगारी पर सवाल उठाए बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी संगठनात्मक एकजुटता और राजनीतिक आक्रामकता का स्पष्ट संकेत भी दे दिया है
प्रदेश में बिगड़ती कानून व्यवस्था, बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और देहरादून में हाल के दिनों में हुई सनसनीखेज हत्याओं के विरोध में कांग्रेस ने 16 फरवरी को देहरादून में राजभवन घेराव का आह्वान कर जिस तरह शक्ति प्रदर्शन किया, उसने उत्तराखण्ड की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। परेड ग्राउंड से निकली यह रैली केवल विरोध दर्ज कराने तक सीमित नहीं रही बल्कि उसने यह संदेश भी दिया कि लम्बे समय से बिखरी दिखाई दे रही कांग्रेस अब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में संगठनात्मक रूप से सक्रिय और आक्रामक भूमिका में आने की कोशिश कर रही है।
देहरादून जिले में विगत पंद्रह दिनों के भीतर तीन महिलाओं और एक गैंगस्टर की दिनदहाड़े हत्या ने कानून-व्यवस्था को लेकर गम्भीर सवाल खड़े किए हैं। महिला अपराध, युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई, जंगली जानवरों के हमलों से हो रही मौतें, पलायन, आपदा राहत में देरी और किसानों को फसलों का उचित मुआवजा न मिलने जैसे मुद्दों को कांग्रेस पहले भी उठाती रही है लेकिन इस बार जनआक्रोश को संगठित रूप देने की उसकी रणनीति अधिक सुनियोजित दिखी। परेड ग्राउंड में हजारों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और राजभवन की ओर बढ़ते कदमों ने यह संकेत दिया कि कांग्रेस केवल प्रेस बयान तक सीमित रहने के बजाय सड़क पर संघर्ष की राजनीति की ओर लौटना चाहती है। पुलिस-प्रशासन ने रैली को रोकने के लिए बैरिकेडिंग और सख्ती का सहारा लिया जिससे धक्का-मुक्की और हल्का हंगामा भी हुआ और कई कार्यकर्ता चोटिल भी हुए परंतु इससे कार्यकर्ताओं के उत्साह में कमी नहीं आई। बीते चार वर्षों में जिस तरह का ठहराव कांग्रेस संगठन में दिखाई देता था, उसकी जगह इस बार ऊर्जा और सामूहिकता का प्रदर्शन नजर आया।
इस रैली का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू पार्टी के भीतर गुटीय समीकरणों का संतुलन भी रहा। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत, वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह, गणेश गोदियाल, प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा की एक साथ उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि पार्टी अब आंतरिक मतभेदों को किनारे रखकर सामूहिक रणनीति पर काम करना चाहती है। वर्षों बाद ऐसा अवसर आया जब बड़े नेता अपने-अपने व्यक्तिगत बैनरों के बजाय केवल कांग्रेस के बैनर तले एकजुट दिखाई दिए और मंच से अनावश्यक भाषणबाजी से भी परहेज किया गया।
प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा की सक्रिय भागीदारी भी इस रैली का अहम बिंदु रही। उन पर यह आरोप लगता रहा है कि वे उत्तराखण्ड की राजनीति में अपेक्षाकृत कम समय देती रही हैं किंतु इस बार उन्होंने न केवल उपस्थिति दर्ज कराई बल्कि रैली का नेतृत्व करते हुए संगठन को सक्रिय करने का संकेत भी दिया। यदि यह सक्रियता लगातार बनी रहती है तो कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को मजबूती मिल सकती है।
दूसरी ओर सत्ताधारी भाजपा ने इस रैली को हल्के में लेने की रणनीति अपनाई। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र प्रसाद भट्ट ने इसे ‘भाड़े की भीड़’ करार दिया जबकि प्रदेश महामंत्री दीप्ति रावत भारद्वाज ने इसे उद्देश्यहीन और पूरी तरह फ्लाॅप बताया। रैली में कुछ युवकों द्वारा मुस्लिम यूनिवर्सिटी की मांग से जुड़े बैनर लहराने की घटना को भाजपा ने तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़ते हुए कांग्रेस पर हमला बोला। हालांकि राजनीतिक रैलियों में इस तरह की बयानबाजी सामान्य मानी जाती है परंतु यह भी स्पष्ट है कि भाजपा रैली के राजनीतिक प्रभाव को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर पा रही।
अब निगाहें 2027 के विधानसभा चुनाव पर टिक गई हैं। उत्तराखण्ड की राजनीति में सत्ता परिवर्तन का इतिहास रहा है लेकिन पिछली बार भाजपा ने इस परम्परा को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी। ऐसे में कांग्रेस के लिए आगामी चुनाव राजनीतिक अस्तित्व और पुनरुत्थान की कसौटी बन सकता है। यदि कांग्रेस संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखती है, ज्वलंत मुद्दों को निरंतर जनआंदोलन का रूप देती है, स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाकर क्षेत्रीय असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने की रणनीति अपनाती है और युवाओं, महिलाओं तथा किसानों के लिए ठोस और विश्वसनीय वैकल्पिक रोडमैप प्रस्तुत करती है तो मुकाबला त्रिकोणीय नहीं बल्कि सीधा और कड़ा हो सकता है।
भाजपा के सामने चुनौती केवल विपक्षी प्रदर्शन नहीं बल्कि जनता की अपेक्षाओं का बढ़ता दबाव भी है। कानून-व्यवस्था, रोजगार सृजन, महंगाई नियंत्रण और आपदा प्रबंधन जैसे विषयों पर यदि सरकार ठोस परिणाम नहीं दिखा पाती तो विपक्ष को राजनीतिक लाभ मिल सकता है। कुल मिलाकर 16 फरवरी की यह रैली केवल एक दिन का विरोध कार्यक्रम नहीं बल्कि 2027 की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार करने की शुरुआत के रूप में देखी जा रही है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि कांग्रेस इस ऊर्जा को निरंतर राजनीतिक अभियान में बदल पाती है या नहीं लेकिन इतना तय है कि इस शक्ति प्रदर्शन ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और सत्ताधारी दल को भी रणनीतिक पुनर्विचार के लिए मजबूर कर दिया है।
इस रैली का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू पार्टी के भीतर गुटीय समीकरणों का संतुलन भी रहा। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत, वरिष्ठ नेता प्रीतम सिंह, गणेश गोदियाल, प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा की एक साथ उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि पार्टी अब आंतरिक मतभेदों को किनारे रखकर सामूहिक रणनीति पर काम करना चाहती है। वर्षों बाद ऐसा अवसर आया जब बड़े नेता अपने-अपने व्यक्तिगत बैनरों के बजाय केवल कांग्रेस के बैनर तले एकजुट दिखाई दिए और मंच से अनावश्यक भाषणबाजी से भी परहेज किया गया।
प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा की सक्रिय भागीदारी भी इस रैली का अहम बिंदु रही। उन पर यह आरोप लगता रहा है कि वे उत्तराखण्ड की राजनीति में अपेक्षाकृत कम समय देती रही हैं किंतु इस बार उन्होंने न केवल उपस्थिति दर्ज कराई बल्कि रैली का नेतृत्व करते हुए संगठन को सक्रिय करने का संकेत भी दिया। यदि यह सक्रियता लगातार बनी रहती है तो कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को मजबूती मिल सकती है।
दूसरी ओर सत्ताधारी भाजपा ने इस रैली को हल्के में लेने की रणनीति अपनाई। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र प्रसाद भट्ट ने इसे ‘भाड़े की भीड़’ करार दिया जबकि प्रदेश महामंत्री दीप्ति रावत भारद्वाज ने इसे उद्देश्यहीन और पूरी तरह फ्लाॅप बताया। रैली में कुछ युवकों द्वारा मुस्लिम यूनिवर्सिटी की मांग से जुड़े बैनर लहराने की घटना को भाजपा ने तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़ते हुए कांग्रेस पर हमला बोला। हालांकि राजनीतिक रैलियों में इस तरह की बयानबाजी सामान्य मानी जाती है परंतु यह भी स्पष्ट है कि भाजपा रैली के राजनीतिक प्रभाव को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर पा रही।
अब निगाहें 2027 के विधानसभा चुनाव पर टिक गई हैं। उत्तराखण्ड की राजनीति में सत्ता परिवर्तन का इतिहास रहा है लेकिन पिछली बार भाजपा ने इस परम्परा को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी। ऐसे में कांग्रेस के लिए आगामी चुनाव राजनीतिक अस्तित्व और पुनरुत्थान की कसौटी बन सकता है। यदि कांग्रेस संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखती है, ज्वलंत मुद्दों को निरंतर जनआंदोलन का रूप देती है, स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाकर क्षेत्रीय असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने की रणनीति अपनाती है और युवाओं, महिलाओं तथा किसानों के लिए ठोस और विश्वसनीय वैकल्पिक रोडमैप प्रस्तुत करती है तो मुकाबला त्रिकोणीय नहीं बल्कि सीधा और कड़ा हो सकता है।
भाजपा के सामने चुनौती केवल विपक्षी प्रदर्शन नहीं बल्कि जनता की अपेक्षाओं का बढ़ता दबाव भी है। कानून-व्यवस्था, रोजगार सृजन, महंगाई नियंत्रण और आपदा प्रबंधन जैसे विषयों पर यदि सरकार ठोस परिणाम नहीं दिखा पाती तो विपक्ष को राजनीतिक लाभ मिल सकता है। कुल मिलाकर 16 फरवरी की यह रैली केवल एक दिन का विरोध कार्यक्रम नहीं बल्कि 2027 की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार करने की शुरुआत के रूप में देखी जा रही है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि कांग्रेस इस ऊर्जा को निरंतर राजनीतिक अभियान में बदल पाती है या नहीं लेकिन इतना तय है कि इस शक्ति प्रदर्शन ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और सत्ताधारी दल को भी रणनीतिक पुनर्विचार के लिए मजबूर कर दिया है।

