यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हां
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।
आखिरी बात
बिल्कुल साफ
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार

     -सर्वेश्वर दयाल सक्सेना


बीते कुछ समय से ऐसा देखने को मिल रहा है कि वर्तमान सरकार देश के नागरिकों से बहुत सारे सच छुपाना चाहती है। एक दौर था जब प्रधानमंत्री मोदी को प्रधानमंत्री बने मात्र तीन बरस ही हुए थे और तब वे हर मंच से दावा करते थे कि देश के नागरिकों को हर सच जानने का अधिकार है और एक वर्तमान समय है जब एक रिटायर्ड थल सेना अध्यक्ष की पुस्तक को प्रकाशित नहीं होने दिया जा रहा है और नेता विपक्ष को लोकसभा में उस पुस्तक के अंश पढ़ने नहीं दिए जा रहे हैं। संसद में इस विषय पर हंगामा चल ही रहा था कि अब जानकारी सामने आई है कि केंद्र सरकार नहीं चाहती कि प्रधानमंत्री केयर फंड के बारे में कोई भी प्रश्न लोकसभा में उठे। यह मामला केवल एक संसदीय प्रक्रिया का नहीं बल्कि जवाबदेही, वैधानिक स्थिति और लोकतांत्रिक पारदर्शिता का प्रश्न बन चुका है।

पीएम केयर फड अर्थात प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और आपातकालीन स्थिति निधि (Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations Fund) की स्थापना 27 मार्च 2020 को एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के रूप में की गई थी, ठीक उसी समय जब देश कोविड-19 महामारी के कारण राष्ट्रीय आपदा की स्थिति से गुजर रहा था। इसके अध्यक्ष स्वयं नरेंद्र मोदी हैं जबकि इसके अन्य पदेन ट्रस्टी रक्षा, गृह और वित्त मंत्री बनाए गए हैं। फंड की स्थापना के तुरंत बाद देशभर में आधिकारिक अपीलें जारी हुईं, सरकारी वेबसाइट और सरकारी प्रतीकों का उपयोग हुआ और कॉरपोरेट जगत को भी इसमें योगदान देने के लिए कहा गया। हजारों करोड़ रुपए इस कोष में जमा हुए जिनमें बड़ी संख्या में सार्वजनिक उपक्रमों और निजी कम्पनियों की राशि भी शामिल थी।

यहीं से वैधानिक प्रश्न खड़ा होता है और एक अजब किस्म के संकट की शुरुआत होती है। 28 मार्च 2020 को काॅरपोरेट कार्य मंत्रालय ने एक आदेश जारी किया जिसमें स्पष्ट कहा गया कि पीएम केयर्स में दिया गया योगदान कम्पनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची-टप्प् के अंतर्गत सीएसआर (CSR) व्यय के रूप में मान्य
होगा। अनुसूची-VII का प्रावधान कहता है कि सीएसआर के तहत वही योग माना जाएगा जो ‘केंद्र सरकार द्वारा स्थापित किसी कोष’ में दिए गए हों। इसके बाद 26 मई 2020 को गजट अधिसूचना जारी कर कम्पनी अधिनियम में संशोधन किया गया और पीएम केयर्स फंड को नाम सहित अनुसूची-VII में शामिल किया गया और इसे 28 मार्च 2020 से प्रभावी माना गया। इससे स्पष्ट होता है कि यह सरकारी संस्था है।

इसके बावजूद सरकार की जिद है कि पीएम केयर्स कोई सरकारी संस्था नहीं है, इसलिए यह सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2(एच) के अंतर्गत नहीं आती है। इतना ही नहीं इसका नियमित कैग ऑडिट भी नहीं सम्भव हो पा रहा है और न ही विस्तृत व्यय विवरण सार्वजनिक रूप से साझा किया जा रहा है। इस बारे में उच्चतम न्यायालय में भी याचिकाएं दायर हुईं जिनमें मांग की गई थी कि पीएम केयर्स की राशि को राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष में स्थानांतरित किया जाए या कम से कम कैग से ऑडिट कराया जाए किंतु न्यायालय ने आश्चर्यजनक रूप से फंड को गैर सरकारी मानते हुए हस्तक्षेप से इंकार कर डाला।

अब जो ताजा विवाद सामने आया है, वह इस पूरे प्रकरण को ज्यादा पेंचिदा बना रहा है। राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक विस्तृत पत्र लिखकर यह आपत्ति दर्ज की है कि यदि लोकसभा सचिवालय को यह सलाह दी है कि पीएम केयर्स फंड, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष और समान राहत कोषों से सम्बंधित प्रश्न स्वीकार न किए जाएं तो यह संसदीय अधिकारों का हनन है। अपने पत्र में उन्होंने विस्तार से मार्च 2020 के मंत्रालयी ज्ञापन और मई 2020 की गजट अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा कि सरकार का आधिकारिक रिकाॅर्ड स्वयं यह स्थापित करता है कि पीएम केयर्स केंद्र सरकार द्वारा स्थापित कोष की श्रेणी में आता है। उन्होंने लिखा कि यदि कोई कोष कम्पनी अधिनियम में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है और सीएसआर के लिए वैधानिक पात्रता दी गई है तो उसे ‘सरकार के प्रति उत्तरदायी नहीं’ बताना विधिक रूप से असंगत है। ब्रिटास ने यह भी तर्क दिया कि संसद का मूल कार्य कार्यपालिका की निगरानी करना है और यदि ऐसे कोष जिनमें व्यापक सार्वजनिक और काॅरपोरेट धन लगा हो उन पर प्रश्न पूछने की अनुमति नहीं होगी तो संसदीय लोकतंत्र का सार ही कमजोर हो जाएगा। उन्होंने इसे संवैधानिक जवाबदेही से जुड़ा प्रश्न बताया और आग्रह किया कि ऐसी किसी भी कार्यपालिका सम्प्रेषणा को अस्वीकार किया जाना चाहिए जो सांसदों के प्रश्न पूछने के अधिकार को सीमित करती हो। उनके अनुसार, सरकार एक ओर कानून में संशोधन कर वैधानिक मान्यता देती है और दूसरी तरफ संसदीय परीक्षण से बचने का प्रयास करती है, यह स्थिति ‘आंतरिक रूप से विरोधाभासी’ और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत है।

यदि इस पूरे विवाद को व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो यह पारदर्शिता को लेकर हाल के वर्षों में उभरे अन्य प्रकरणों से अलग नहीं है। प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्री से जुड़ी जानकारी को लेकर उठे विवाद में सम्बंधित विश्वविद्यालय द्वारा सूचना देने से इनकार किया गया और मामला न्यायालय तक पहुंचा। चुनावी बांड योजना के संदर्भ में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने बांड खरीदारों की जानकारी साझा करने से मना किया था, यह कहते हुए कि यह गोपनीय बैंकिंग सूचना है। बाद में यह विषय सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई में आया। 2016 की नोटबंदी से जुड़ी निर्णय प्रक्रिया और फाइल- नोटिंग से सम्बंधित सूचनाओं को लेकर रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया और वित्त मंत्रालय ने जानकारी देने से इनकार किया, यह तर्क देते हुए कि यह संस्थागत गोपनीयता और आर्थिक हितों से सम्बंधित है।

इन सभी उदाहरणों को जोड़कर देखें तो एक पैटर्न उभरता है, महत्वपूर्ण सार्वजनिक महत्व के मामलों में सूचना साझा करने को लेकर हिचक या प्रतिरोध। अब जब पीएम केयर्स जैसे कोष, जिसे विधायी रूप से मान्यता प्राप्त है और जिसमें व्यापक जनधन लगा है, उस पर संसद में प्रश्न उठाने की सम्भावना को ही सीमित करने की बात सामने आती है तो यह केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं रह जाता। यह उस बुनियादी सिद्धांत से जुड़ जाता है जिस पर लोकतंत्र खड़ा है, सत्ता की जवाबदेही और नागरिकों का जानने का अधिकार। प्रश्न यह है कि क्या पारदर्शिता को अपवाद और गोपनीयता को सामान्य बनाया जा रहा है या फिर संसद और जनता दोनों को वह जानकारी मिलेगी जिसकी वे संवैधानिक रूप से हकदार हैं।

अंततः यह पूरा प्रकरण केवल पीएम केयर्स या किसी एक संसदीय प्रश्न तक सीमित नहीं रह जाता बल्कि शासन की उस व्यापक मानसिकता की ओर संकेत करता है जिसमें सूचना पर नियंत्रण और प्रश्नों पर अंकुश एक प्रवृत्ति के रूप में उभरते दिखाई देते हैं। लोकतंत्र की मूल आत्मा पारदर्शिता और जवाबदेही में निहित होती है। संसद इसलिए है कि कार्यपालिका से सवाल पूछे जाएं, निर्णयों की समीक्षा हो, सार्वजनिक धन के उपयोग पर चर्चा हो और नीतियों की वैधानिकता पर बहस हो। यदि उन्हीं प्रश्नों को प्रारम्भिक स्तर पर ही रोक देने की कोशिश की जाए तो यह लोकतांत्रिक ढांचे के संतुलन को प्रभावित करता है।

पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि महत्वपूर्ण सार्वजनिक महत्व के मामलों, चाहे वे वित्तीय निर्णय हों, चुनावी फंडिंग से जुड़े मुद्दे हों या संवेदनशील प्रशासनिक प्रक्रियाएं, में सूचना देने से बचने के लिए तकनीकी या विधिक तर्कों का सहारा लिया गया है। कभी ‘निजी निकाय’ कहकर, कभी ‘गोपनीयता’ का हवाला देकर तो कभी यह कहकर कि सम्बंधित संस्था सूचना के अधिकार अधिनियम की परिभाषा में नहीं आती। यह तर्क भले ही कानूनी भाषा में प्रस्तुत किए जाएं लेकिन उनका प्रभाव राजनीतिक और लोकतांत्रिक होता है। जब नागरिक यह अनुभव करने लगते हैं कि जानकारी तक पहुंच कठिन होती जा रही है तो शासन और जनता के बीच भरोसे की दूरी बढ़ने लगती है।

सवाल पूछना लोकतंत्र में विरोध नहीं बल्कि व्यवस्था का अनिवार्य अंग है। संसदीय प्रश्न केवल औपचारिकता नहीं होते। वे नीति-निर्माण की पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं, प्रशासनिक जवाबदेही तय करते हैं और सार्वजनिक धन के उपयोग पर निगरानी रखते हैं। यदि किसी कोष, योजना या निर्णय पर प्रश्न उठाने को ही अनुचित या अस्वीकार्य ठहराया जाए तो इससे यह संदेश जाता है कि जवाबदेही सीमित की जा रही है। यह प्रवृत्ति दीर्घकाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है। इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि सूचना का अधिकार केवल एक कानून नहीं बल्कि नागरिकों की संवैधानिक चेतना का विस्तार है। यह उस विचार पर आधारित है कि सत्ता जनता से प्राप्त होती है और इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके नाम पर, उसके धन से और उसके हित में क्या निर्णय लिए जा रहे हैं। यदि जानकारी देने से बार-बार परहेज किया जाता है तो यह भावना मजबूत होती है कि पारदर्शिता अपवाद बनती जा रही है और गोपनीयता सामान्य।

पीएम केयर्स को लेकर उठा विवाद इसी व्यापक चिंता का प्रतीक है। मुद्दा यह नहीं कि कोई एक फंड निजी है या सार्वजनिक, असली प्रश्न यह है कि क्या शासन व्यवस्था प्रश्नों का सामना करने के लिए तैयार है। यदि लोकतंत्र में प्रश्नों पर पहरा लगाया जाएगा और जानकारी को नियंत्रित किया जाएगा तो यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे संस्थागत संस्कृति का हिस्सा बन सकती है। लोकतांत्रिक परम्पराएं तभी मजबूत रहती हैं जब सत्ता आलोचना को स्थान देती है, प्रश्नों को अवसर मानती है और पारदर्शिता को कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति के रूप में स्वीकार करती है। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा और स्थायी प्रश्न है।

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