ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के रूप में प्रतिष्ठित धार्मिक पद पर आसीन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ प्रयागराज की पॉक्सो कोर्ट के निर्देश पर एफआईआर दर्ज होने से न केवल धार्मिक जगत बल्कि राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। हाल के दिनों प्रयागराज में उनके साथ हुई घटनाओं और बयानों के बाद यह मामला और संवेदनशील हो गया है। भाजपा समर्थक वर्ग के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य के रूप में प्रतिष्ठित धार्मिक पद पर आसीन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ प्रयागराज की पॉक्सो कोर्ट के निर्देश पर एफआईआर दर्ज होने से न केवल धार्मिक जगत बल्कि राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। हाल के दिनों प्रयागराज में उनके साथ हुई घटनाओं और बयानों के बाद यह मामला और संवेदनशील हो गया है। भाजपा समर्थक वर्ग के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं
बीते कुछ दिनों से प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती चर्चा के केंद्र में बने हुए हैं। वे विभिन्न धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने वक्तव्यों के कारण सुर्खियों में हैं। संगम नगरी प्रयागराज, जहां मठ-मंदिरों और अखाड़ों की परम्परा गहरी है, वहां उनका आगमन और सार्वजनिक कार्यक्रम बड़े विवाद का कारण बन गया।
स्थानीय प्रशासन के साथ उनके कार्यक्रमों को लेकर कुछ मतभेद भी सामने आए। कुछ आयोजनों को लेकर अनुमति, सुरक्षा और व्यवस्थाओं पर विवाद हुआ। समर्थकों का आरोप रहा कि प्रशासन ने उनके कार्यक्रमों के प्रति अपेक्षित सहयोग नहीं दिया जबकि प्रशासन का पक्ष था कि कानून-व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन के मद्देनजर आवश्यक कदम उठाए गए।
स्वामी को प्रयागराज से बगैर स्नान किए ही वापस लौटना पड़ा जिसे समर्थक इस सनातन धर्म के अपमान से जोड़कर देख रहे हैं। सत्तारूढ़ भाजपा भीतर भी इस मुद्दे पर गम्भीर मतभेद उभर कर सामने आ चुके हैं।
एफआईआर दर्ज : कोर्ट का निर्देश उत्तर प्रदेश सरकार के पक्ष में उतरे धर्मगुरु रामभद्राचार्य के एक शिष्य द्वारा शंकराचार्य पर गम्भीर यौन दुराचरण के आरोप लगाने के बाद 22 फरवरी 2026 को प्रयागराज की पॉक्सो कोर्ट ने झूंसी थाने के एसएचओ को निर्देश दिया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, उनके शिष्य स्वामी मुकुंदानंद ब्रह्माचारी और 2-3 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) के तहत एफआईआर दर्ज की जाए।
पॉक्सो कोर्ट के एडिशनल सेशन जज विनोद कुमार चौरसिया ने आदेश में कहा कि मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए। साथ ही सर्वाइवर की पहचान और सम्मान की सुरक्षा के स्पष्ट निर्देश दिए गए। अदालत ने पुलिस से कहा कि वह आदेश का तत्काल पालन कर रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, कोर्ट के निर्देश के अनुपालन में मामला दर्ज कर लिया गया है और प्रारम्भिक जांच प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अभी तक इस मामले में किसी गिरफ्तारी की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
आरोप क्या हैं?
मामले में दर्ज शिकायत के आधार पर बाल यौन शोषण से जुड़े गम्भीर आरोप लगाए गए हैं। चूंकि यह मामला पाॅक्सो एक्ट के अंतर्गत है, इसलिए जांच और सुनवाई दोनों संवेदनशील दायरे में होंगे। कानून के अनुसार, सर्वाइवर की पहचान सार्वजनिक नहीं की जा सकती।
पुलिस का कहना है कि वे कोर्ट के निर्देशानुसार सभी पक्षों के बयान दर्ज करेंगे और साक्ष्यों का संकलन करेंगे। मामले की प्रवृत्ति को देखते हुए मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्य भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की प्रतिक्रिया
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अदालत के आदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे न्यायपालिका का सम्मान करते हैं और कानून की प्रक्रिया में सहयोग करेंगे। उन्होंने आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि सच्चाई सामने आएगी। उनके समर्थकों का कहना है कि यह ‘षड्यंत्र’ हो सकता है और धार्मिक नेतृत्व को बदनाम करने का प्रयास है। वहीं आलोचकों का कहना है कि कानून सभी के लिए समान है और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
भाजपा समर्थकों में नाराजगी
इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक आयाम भी ले लिया है। खासकर भाजपा समर्थक वर्ग के एक हिस्से में उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका को लेकर असंतोष देखा जा रहा है।
कुछ समर्थकों का तर्क है कि यदि आरोपों में सच्चाई है तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए लेकिन यदि यह राजनीतिक या वैचारिक कारणों से प्रेरित मामला है तो सरकार को स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। सोशल मीडिया पर ऐसे संदेश भी वायरल हुए जिनमें सरकार से ‘धार्मिक संतों के सम्मान की रक्षा’ की अपील की गई। हालांकि भाजपा या उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से आधिकारिक बयान में यही कहा गया है कि कानून अपना काम कर रहा है और किसी भी मामले में न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां धार्मिक और राजनीतिक विमर्श अक्सर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं, ऐसे मामलों का प्रभाव व्यापक हो सकता है।
धार्मिक संस्थानों की प्रतिक्रिया
ज्योतिर्मठ और अन्य अखाड़ों से जुड़े कुछ संतों ने सावधानीपूर्ण प्रतिक्रिया दी है। कुछ ने कहा कि ‘सत्य की जीत होगी’ जबकि कुछ ने जांच पूरी होने तक टिप्पणी से बचने की बात कही।
धार्मिक जगत में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या ऐसे मामलों से सनातन परम्परा की संस्थाओं की छवि प्रभावित होती है और यदि हां तो उससे निपटने के लिए संस्थागत स्तर पर क्या कदम उठाए जाने चाहिए।
कानून और संवेदनशीलता
पॉक्सो कानून विशेष रूप से बच्चों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण देने के लिए बनाया गया है। इसमें आरोपों की गम्भीरता को देखते हुए त्वरित सुनवाई और कठोर दंड का प्रावधान है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में दो स्तरों पर सावधानी जरूरी है: सर्वाइवर की सुरक्षा और न्याय।
आरोपित के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा
मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि बिना पुष्टि के तथ्य सार्वजनिक करना न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
आगे की राह
अब निगाहें जांच की प्रगति पर टिकी हैं। यदि पुलिस को पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो आगे गिरफ्तारी या चार्जशीट की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। वहीं यदि आरोप गलत पाए जाते हैं तो मामला खारिज भी हो सकता है।
यह मामला सिर्फ एक आपराधिक शिकायत नहीं, बल्कि धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विमर्श के संगम पर खड़ा है। प्रयागराज की पृष्ठभूमि, शंकराचार्य का पद, भाजपा समर्थकों की प्रतिक्रिया और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक संवेदनशीलता, ये सभी तत्व इसे सामान्य आपराधिक मामले से अधिक व्यापक बना देते हैं।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ पाॅक्सो के तहत एफआईआर दर्ज होना एक गम्भीर और संवेदनशील घटना है। न्यायिक प्रक्रिया के तहत जांच आगे बढ़ेगी और सच्चाई अदालत में स्थापित होगी। इस बीच, प्रयागराज में हाल की घटनाओं से लेकर भाजपा समर्थकों की नाराजगी तक, यह प्रकरण उत्तर प्रदेश की राजनीति और धार्मिक परिदृश्य में लम्बे समय तक चर्चा का विषय बना रह सकता है। अब सबसे महत्वपूर्ण है, निष्पक्ष जांच, न्याय की पारदर्शिता और कानून के समक्ष सभी की समानता।