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‘मास्टर स्ट्रोक’ या बदले की राजनीति

वोटर लिस्ट शुद्धिकरण के नाम पर शुरू हुए विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) ने कई राज्यों में सियासी हलचल बढ़ा दी है। एक ओर जहां उत्तर प्रदेश में सपा प्रमुख अखिलेश यादव आरोप लगा रहे हैं कि फर्जी फार्म-7 भरवाकर उनके समर्थकों के नाम मतदाता सूची से कटवाए जा रहे हैं और अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है तो दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने सात अधिकारियों को निलम्बित किया है। यहां भाजपा ने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी सरकार के प्रभाव में मतदाता सूची में गलत तरीके से नाम जोड़े गए। वहीं कर्नाटक में ‘वोटर डेटा चोरी’ की वापसी हो गई है। प्रदेश की सियासत में ‘स्कैम बनाम स्कैम’ का एक नया और खतरनाक अध्याय शुरू हो गया है। मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (मुडा) घोटाले और वाल्मीकि निगम मामले में चौतरफा घिरे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अब अपनी सियासी ढाल को तलवार में बदल दिया है। उन्होंने 2022 के बहुचर्चित ‘वोटर डेटा चोरी’ मामले (चिलुम ट्रस्ट घोटाले) की जांच पुलिस से छीन कर विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंपने का आदेश दिया है। यह खबर सिर्फ एक पुरानी फाइल के खुलने की नहीं है बल्कि इसके पीछे एक गहरी सियासी बिसात बिछी हुई है।

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये आरोप सिर्फ चुनावी रणनीति का हिस्सा हैं या सचमुच ‘वोट चोरी’ जैसा कोई बड़ा खेल चल रहा है? इसके सियासी संदेश क्या है? क्या था ‘चिलुम ट्रस्ट’ मामला? अब क्यों खुली फाइल? क्या यह मुडा स्कैम से ध्यान हटाने की चाल है या सियासी बदले की कार्रवाई? क्या यह सिद्धारमैया का मास्टर स्ट्रोक है या बदले की राजनीति जैसे तमाम सवाल मीडिया, सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में गूंज रहे हैं।

असल में देशभर में जहां एसआईआर को लेकर राजनीतिक दलों में तकरार जारी है वहीं कर्नाटक की
की राजनीति में ‘स्कैम बनाम स्कैम’ का नया अध्याय खुलता दिख रहा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया जो मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (मुडा) जमीन विवाद और वाल्मीकि निगम प्रकरण को लेकर विपक्ष के निशाने पर हैं उन्होंने 2022 के ‘चिलुम ट्रस्ट’ मामले की जांच पुलिस से छीनकर विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंपने का फैसला लिया है। उनके इस कदम को सिर्फ एक पुरानी फाइल खोलने का नहीं बल्कि एक सोची- समझी सियासी चाल के तौर पर देखा जा रहा है। 2022 में जब राज्य में बसवराज बोम्मई के नेतृत्व में बीजेपी सरकार थी तब ‘चिलुम ट्रस्ट’ नामक एक एनजीओ पर आरोप लगे कि उसने वोटर जागरूकता के नाम पर बूथ लेवल अधिकारियों के फर्जी आईडी बनाकर घर-घर से मतदाताओं का निजी डेटा (जाति, उम्र, लिंग, आधार विवरण) जुटाया। कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि इस डेटा का इस्तेमाल कर अल्पसंख्यक और दलित मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। उस समय इसे लोकतंत्र की हत्या कहा गया था। हालांकि बीजेपी सरकार के दौरान जांच की रफ्तार धीमी रही और मामला ठंडा पड़ गया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुडा विवाद में घिरे सिद्धारमैया बीजेपी को बैकफुट पर धकेलना चाहते हैं। पुलिस पहले ही चार्जशीट दाखिल कर चुकी थी लेकिन वरिष्ठ नेताओं को आरोपी नहीं बनाया गया। राज्य सरकार का तर्क है कि बड़ी मछलियों को बचाया गया। एसआईटी जांच का दायरा बढ़ने का मतलब है कि पूर्व मंत्रियों और तत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठान तक जांच की आंच पहुंच सकती है। कांग्रेस ने पहले ही तत्कालीन बीजेपी मंत्री सी.एन. अश्वथ नारायण पर चिलुम ट्रस्ट को संरक्षण देने का आरोप लगाया था। अब एसआईटी जांच के बाद कई वरिष्ठ नेताओं को पूछताछ या समन का सामना करना पड़ सकता है।

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल और कर्नाटक तक मतदाता सूची और वोटर डेटा का मुद्दा अब महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहा। यह सियासी हथियार बन चुका है। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि कर्नाटक में अब विकास से ज्यादा फाइल वाॅर की राजनीति तेज होगी। बीजेपी जहां मुडा को मुद्दा बना रही है तो वहीं सिद्धारमैया ‘वोट चोरी’ के संवेदनशील मुद्दे को फिर से उभार रहे हैं। संदेश साफ है कि अगर आप मुडा पर वार करेंगे तो जवाब चिलुम ट्रस्ट घोटाले के मुद्दे से मिलेगा। जहां तक सवाल है क्या ये लोकतंत्र की शुचिता के लिए जरूरी कदम है या फिर बदले की राजनीति का नया दौर का तो आने वाले चुनावी महीनों में यह सवाल और तेज होगा और जवाब भी सियासत की इसकी बिसात पर तय होंगे।

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