भारतीय न्याय व्यवस्था की मूलाधारा यह रही है कि न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि वह निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। यही वह सिद्धांत है जो अदालतों को नैतिक वैधता प्रदान करता है लेकिन जब किसी बड़े राजनीतिक चेहरे द्वारा खुली अदालत के भीतर यह कहा जाता है कि उसे न्याय मिलने को लेकर आशंका है तो यह एक असहज स्थिति पैदा करता है। यह असहजता केवल अदालत के लिए नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए है क्योंकि यदि न्यायपालिका पर से भरोसा डगमगाता है तो उसके परिणाम केवल एक केस तक सीमित नहीं रहते।
केजरीवाल की आपत्ति का आधार केवल भावनात्मक नहीं था बल्कि उन्होंने कुछ ठोस कारण भी बताए। उनका कहना था कि जस्टिस शर्मा ऐसे कार्यक्रमों में शामिल हो चुकी हैं जो वैचारिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से जुड़े माने जाते हैं। ये आरोप अपने आप में गम्भीर है क्योंकि यह सीधे-सीधे न्यायिक निष्पक्षता के उस सिद्धांत को चुनौती देते हैं जो किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होता है लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है, क्या किसी जज की सार्वजनिक उपस्थिति को उसके न्यायिक निर्णयों से जोड़कर देखा जाना चाहिए? या यह एक खतरनाक ढलान है जहां हर सार्वजनिक गतिविधि को राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगेगा?
केजरीवाल का तर्क यह है कि उनकी पार्टी आम आदमी पार्टी वैचारिक रूप से उन संगठनों के विरोध में खड़ी है और ऐसे में यदि जज उन मंचों से जुड़ी दिखाई देती हैं तो एक स्वाभाविक आशंका उत्पन्न होती है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘सिर्फ शामिल होना ही पर्याप्त है।’ यह कथन उस मनोवैज्ञानिक आयाम को सामने लाता है जिसे न्यायशास्त्र में पूर्वाग्रह की उचित आशंका (reasonable apprehension of bias) कहा जाता है। यानी भले ही वास्तविक पक्षपात सिद्ध न हो लेकिन यदि एक सामान्य व्यक्ति को यह लगे कि निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है तो भी यह एक वैध चिंता मानी जाती है।
इस तर्क की अपनी सीमाएं भी हैं। यदि केवल उपस्थिति के आधार पर निष्कर्ष निकाले जाने लगे तो न्यायपालिका के लिए कार्य करना अत्यंत कठिन हो जाएगा। जज भी समाज का हिस्सा होते हैं, वे विभिन्न मंचों पर जाते हैं और हर उपस्थिति को वैचारिक झुकाव का प्रमाण मान लेना न्यायिक स्वतंत्रता के लिए खतरा बन सकता है। यही कारण है कि अदालतों ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि ‘वास्तविक पूर्वाग्रह’ और ‘गड़े हुए पूर्वाग्रह’ के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
केजरीवाल ने केवल वैचारिक जुड़ाव का मुद्दा ही नहीं उठाया बल्कि उन्होंने जस्टिस शर्मा के पूर्व आदेशों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में अदालत की टिप्पणियां उन्हें पहले से बने निष्कर्ष जैसी लगीं। विशेष रूप से सत्येन्द्र जैन से जुड़े मामलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने यह संकेत दिया कि न्यायिक टिप्पणियां निष्पक्ष सुनवाई से पहले ही एक दिशा तय करती प्रतीत हुईं। यह आरोप और भी गम्भीर हो जाता है क्योंकि यह न्यायिक प्रक्रिया के उस मूल सिद्धांत पर प्रश्न उठाता है कि हर व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है।
यहीं पर ‘प्राकृतिक न्याय’ का सिद्धांत प्रासंगिक हो जाता है, जिसे ‘audi alteram partem’ के रूप में जाना जाता है, अर्थात दोनों पक्षों को समान रूप से सुना जाए। यदि किसी भी पक्ष को यह महसूस होता है कि उसकी बात पूरी तरह सुनी नहीं गई या निर्णय पहले से तय था तो यह केवल एक तकनीकी कमी नहीं बल्कि न्याय के मूल ढांचे में दरार का संकेत होता है। केजरीवाल की आपत्ति इसी बिंदु को केंद्र में रखती है।
हालांकि इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष भी उतना ही मजबूत है। अदालत में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि इस प्रकार की आपत्तियां न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर कर सकती हैं। उन्होंने ‘बेंच हंटिंग’ शब्द का उपयोग किया जो यह दर्शाता है कि यदि पक्षकार अपनी सुविधा के अनुसार जज बदलने की मांग करने लगें तो न्यायिक प्रणाली में अराजकता फैल सकती है। यह चिंता भी उतनी ही वास्तविक है क्योंकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल बाहरी हस्तक्षेप से ही नहीं बल्कि आंतरिक दबावों से भी प्रभावित हो सकती है।
यही वह बिंदु है जहां यह पूरा विवाद एक गहरे वैचारिक विमर्श में बदल जाता है। यहां केवल एक केस या एक जज का सवाल नहीं है बल्कि यह उस व्यापक सिद्धांत का परीक्षण है जिस पर न्यायपालिका खड़ी है। इसी संदर्भ में भारत के प्रसिद्ध विधिवेत्ता फली एस. नरीमन की पुस्तक God Save the Hon’ble Supreme Court’ अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। नरीमन ने इस पुस्तक में जिस स्पष्टता और ईमानदारी से न्यायपालिका की कार्यप्रणाली का विश्लेषण किया है, वह आज के इस विवाद को समझने में मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है।
नरीमन का पहला और शायद सबसे महत्वपूर्ण विचार यह है कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता केवल उसके अंतिम निर्णयों से नहीं बनती बल्कि उस पूरी प्रक्रिया से बनती है जिसके माध्यम से निर्णय दिए जाते हैं। यदि प्रक्रिया पर ही संदेह उत्पन्न हो जाए तो निर्णय चाहे कितना भी न्यायपूर्ण क्यों न हो, उसकी नैतिक स्वीकार्यता कम हो जाती है। यही वह बिंदु है जहां केजरीवाल की आशंका को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका मूल तर्क प्रक्रिया पर केंद्रित है न कि केवल परिणाम पर।
नरीमन ने यह भी कहा कि जजों को केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उन्हें पारदर्शी भी होना चाहिए। पारदर्शिता का अर्थ केवल यह नहीं है कि निर्णय खुले तौर पर दिए जाएं बल्कि यह भी है कि जजों का आचरण ऐसा हो जिसमें किसी प्रकार की शंका की गुंजाइश न बचे। यह एक उच्च मानक है लेकिन न्यायपालिका जैसी संस्था के लिए यह अनिवार्य भी है। जब जज किसी सार्वजनिक मंच पर जाते हैं तो यह जरूरी हो जाता है कि उनकी उपस्थिति से कोई ऐसा संकेत न जाए जो उनकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर सके।
सबसे महत्वपूर्ण बात जो नरीमन ने कही, वह लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता (institutional integrity) की अवधारणा है। उनके अनुसार, किसी भी न्यायिक संस्थान की विश्वसनीयता व्यक्तिगत जजों के निर्णयों से कहीं ऊपर होती है। यदि किसी एक मामले में भी ऐसा प्रतीत होता है कि निष्पक्षता संदिग्ध है तो इसका प्रभाव पूरे संस्थान की साख पर पड़ता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो केजरीवाल की आपत्ति केवल एक व्यक्ति विशेष के खिलाफ आरोप नहीं है बल्कि यह उस व्यापक चिंता को व्यक्त करती है जिसमें न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा दांव पर दिखाई देती है लेकिन यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है, क्या हर आशंका को वैध मान लिया जाए? यदि किसी भी पक्ष को केवल वैचारिक असहमति के आधार पर जज बदलने का अधिकार मिल जाए तो क्या यह न्यायपालिका को राजनीतिक दबावों के प्रति अधिक संवेदनशील नहीं बना देगा? यही वह संतुलन है जिसे बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। एक ओर न्यायपालिका को पारदर्शी और निष्पक्ष दिखना है, वहीं दूसरी तरफ उसे अपनी स्वतंत्रता की रक्षा भी करनी है।
भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती इसी संतुलन में है। यहां न तो न्यायपालिका को अचूक माना गया है और न ही उसे राजनीतिक आलोचना से पूरी तरह मुक्त रखा गया है लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब कोई बड़ा राजनीतिक नेता अदालत के भीतर इस प्रकार की आशंका व्यक्त करता है तो यह आवश्यक हो जाता है कि उस पर गम्भीरता से विचार किया जाए लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि यह प्रवृत्ति एक खतरनाक परम्परा में न बदल जाए।
अंततः यह विवाद हमें उसी मूल प्रश्न पर वापस ले आता है कि न्याय क्या है? क्या यह केवल कानून के अनुसार दिया गया निर्णय है या यह वह विश्वास है जो लोगों के मन में उस निर्णय के प्रति होता है? शायद इसका उत्तर दोनों के बीच कहीं है। न्यायपालिका को न केवल कानून के प्रति उत्तरदायी होना है बल्कि जनता के विश्वास के प्रति भी। यही वह कसौटी है जिस पर हर जज, हर फैसला और हर प्रक्रिया को परखा जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम में अरविन्द केजरीवाल की आशंका और तुषार मेहता की आपत्ति दोनों ही अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। एक पक्ष न्यायिक निष्पक्षता की मांग कर रहा है तो दूसरा न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा की बात कर रहा है और शायद सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं स्थित है। अब भारतीय न्यायपालिका को अपनी राह तय करनी है, ऐसी राह जहां न तो निष्पक्षता पर कोई प्रश्न उठे और न ही स्वतंत्रता पर कोई आंच आए। हमारे मुल्क में न्याय और न्यायपालिका की वर्तमान स्थिति पर अशोक कुमार पाण्डेय ने बहुत खूबसूरती से सच सामने रखा है।
कानून सिर्फ इंसानों के लिए है
इंसानों की हैवानी भीड़ का केस लिए यांह क्यों आ गए तुम न्यायालय में?
एक आदमी की हत्या का फैसला अभी-अभी छह सौ पन्नों में टाइप हुआ है
एक हजार लोगों की हत्या का मामला पांच साल बाद तय कर लेना चुनाव में।