Editorial

व्यापक सुधारों का दौर

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-111

संयुक्त प्रांत सरकार ने समूचे परिसर को सील करने का आदेश जारी कर माहौल को तात्कालिक तौर पर शांत करने का प्रयास किया। 1986 तक यही स्थिति बनी हुई थी। वर्ष में एक बार यहां रखी गई मूर्तियों की पूजा की जाती थी। बाकी समय विवादित परिसर पूरी तरह बंद रहता था। 1984 में विश्व हिंदू परिषद् नामक संगठन ने बाबरी मस्जिद समेत अनेकों हिंदू धार्मिक स्थलों को, जिन्हें कथित तौर पर मुगल शासकाल के दौरान ध्वस्त कर वहां पर मस्जिदों का निर्माण किया गया था, को वापस हिंदुओं के हवाले करने की मांग बडे पैमाने पर उठानी शुरू कर दी थी। जनवरी, 1986 में फैजाबाद जिला न्यायालय के समक्ष एक स्थानीय वकील उमेशचंद्र पाण्डेय ने याचिका दर्ज कर मंदिर के परिसर को खोले जाने की बात कही। फैजाबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के.एम. पाण्डेय ने 1 फरवरी, 1986 को इस याचिका एवं इस प्रकरण से जुड़ी अन्य याचिकाओं पर निर्णय सुनाते हुए मंदिर पर लगे ताले को खोलने और वहां नियमित पूजा-अर्चना किए जाने का आदेश दे डाला। प्रदेश में तब कांग्रेस की सरकार थी, जिसकी कमान वीर बहादुर सिंह के हाथों में थी। राज्य सरकार की तरफ से पेश हुए वकील एवं केंद्र सरकार के वकील ने जिला जज पाण्डेय के समक्ष सरकारी पक्ष रखते हुए कहा था कि यदि मंदिर से ताले हटा लिए जाते हैं तो उससे किसी प्रकार की कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा नहीं उत्पन्न होगा। केंद्र एवं राज्य सरकार ने इस तरह से विवादित परिसर में पूजा-अर्चना किए जाने का मार्ग साफ कर दिया। न्यायाधीश पाण्डेय का मात्र एक दिन की सुनवाई के बाद उसी शाम अपना फैसला सुनाना और जिला प्रशासन द्वारा इस फैसले के चंद मिनटों बाद परिसर का ताला खोल देना और सरकारी टेलीविजन चैनल दूरदर्शन का अयोध्या पहुंच वहां से इस ताला खोलने की प्रक्रिया का लाइव प्रसारण करना स्पष्ट करता है कि सब कुछ केंद्र सरकार की रजामंदी और निर्देश पर किया गया था।

न्यायाधीश के.एम. पाण्डेय ने 1991 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा ‘वॉइस ऑफ कांशियन्स’ में इस पूरे प्रकरण को ईश्वरीय इच्छा करार दिया था। बकौल पाण्डेय – ‘1 फरवरी, 1986 के दिन अदालत में सुनवाई के दौरान एक काला बंदर न्यायालय के परिसर की छत पर झंडा फहराने वाले खम्भे को पकड़े बैठा रहा था। फैजाबाद और अयोध्या के हजारों लोग वहां मौजूद थे। इन लोगों ने बंदर को नारियल और फल चढाए। आश्चर्यजनक रूप से बंदर ने इस चढ़ावे को छुआ तक नहीं। शाम को जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मुझे मेरे आवास तक छोड़ने आए तो वह काला बंदर मेरे घर में मौजूद था। मैं आश्चर्यचकित हो उठा और उसे ‘दैवी शक्ति’ मानते हुए मैंने उसे प्रणाम किया।’

मंदिर के परिसर का ताला खोले जाने और वहां पर पूजा- अर्चना किए जाने के इस आदेश ने मुस्लिम समाज के भीतर तीव्र प्रतिक्रिया को पैदा कर दिया। 14 फरवरी, 1986 को देशभर में विभिन्न मुस्लिम संगठनों द्वारा ‘काला दिन’ मनाया गया और 15 फरवरी को मस्जिद की रक्षा करने के लिए एक समिति ‘बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी’ के गठन की घोषणा की गई। राजीव सरकार की यह दूसरी बड़ी भूल हिंदुवादी संगठनों को एक करने और धर्म को आगे कर राजनीतिक लक्ष्यों को पाने का प्रयास कर रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मजबूती देने में खासी सहायक साबित हुई।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और संघ से जुड़े दक्षिणपंथी संगठनों ने राजीव सरकार की इस भूल को अपने लिए वरदान मानकर धार्मिक उन्माद का रास्ता तैयार करना तत्काल शुरू कर दिया था। इस समयकाल में विश्व हिंदू परिषद् द्वारा ‘धर्म संसद’ का गठन कर हिंदू धर्म के प्रर्वतकों, शंकराचार्यों आदि को इस ‘धर्म संसद’ के जरिए एकजुट करने का सफलतापूर्वक प्रयास किया गया, जिसका व्यापक प्रभाव भारतीय समाज और राजनीति में आगे चलकर देखने को मिलता है।

राजीव निश्चित तौर पर देश की राजनीति में व्यापक सुधार करने की नीयत रखते थे। 1985 में भारी बहुमत के साथ सत्ता पर आसीन होते ही उन्होंने अपनी इस सदैच्छा का परिचय दलबदल निरोधक कानून को संसद से पारित कराकर दिया था। आजादी के पहले से ही इस ‘बीमारी’ ने भारतीय राजनीति को प्रदूषित करने का काम शुरू कर दिया था। आजादी उपरांत निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के मध्य सत्ता की चाह में दलबदल की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी। 1957 से 1967 के दौरान कांग्रेस ने जमकर इस कुप्रवृत्ति को बढ़ावा देने का काम किया। 1967-72 के मध्य, चौथे एवं पांचवंे आम चुनाव के दौरान लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के 4000 सदस्यों में से लगभग 2000 ने दल बदलने का रिकॉर्ड स्थापित किया था।

इनमें से एक जनप्रतिनिधि ने एक दिन में ही पांच बार ऐसा किया था ओर उन्होंने ऐसा करके दल-बदल कर एक नए मुहावरे को जन्म दे डाला। हरियाणा की होडल विधानसभा सीट से 1967 में बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव जीते गयालाल ने पहले तो कांग्रेस की सदस्यता ली, फिर मात्र कुछ घण्टों के भीतर ही संयुक्त विधायक दल में शामिल हो गए। इसके चंद घंटों बाद से वापस कांग्रेसी बन बैठे। पांच बार ऐसा करने वाले गयालाल जब अंतिम (पांचवीं) बार कांग्रेस में वापस आए तो एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसका ऐलान करते हुए कांग्रेसी नेता राव बिरेंद्र सिंह ने घोषणा की ‘गया राम अब आया राम’ हो चुके हैं। तभी से पाला बदलने की प्रवृत्ति को ‘आयाराम-गयाराम’ कहकर पुकारा जाने लगा है। इस दल बदलने के पीछे सत्ता का सुख और कालेधन का आदान-प्रदान आम बात है। राजीव गांधी ने इस पर रोकथाम के लिए कानून बनाकर अपनी ‘मिस्टर क्लीन’ की छवि को मजबूत करने का काम किया था। शाहबानो प्रकरण और अयोध्या स्थित मंदिर प्रकरण ने उनकी इस छवि को भारी आघात पहुंचाने का काम किया।

1985 में पतझड़ का मौसम उड़ीसा के आदिवासी बाहुल्य इलाकों में भूख से होने वाली मौतों के चलते राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समाचारों की सुर्खियों में छा गया था। उड़ीसा में तब कांग्रेस की सरकार थी और जानकी बल्लभ पटनायक राज्य के मुख्यमंत्री थे। अंग्रेजी पत्रिका ‘इंडिया टुडे’ ने इस आदिवासी इलाके की दुर्दशा को सामने लाने का काम किया था। उसकी खबर में यहां भुखमरी के चलते मां-बाप द्वारा अपने बच्चों को बेचे जाने का विस्तार से वर्णन किया गया था- ‘यहां नरक की तस्वीर है – खाना नहीं, पानी नहीं। बीते कष्टपूर्ण 20 बरसों से यहां कोई मदद देने नहीं आया। जिनके पांव अभी ठीक हैं, वे गांव छोड़कर हमेशा के लिए यहां से जा चुके हैं, कभी वापस नहीं लौटने के लिए। जो बचे हैं, वे मृत हैं या मर रहे हैं। वे समूहों में घूमते हैं और कुत्तों के समान पानी चाटते हैं।  खाने के लिए वे जहरीली जड़ों और पत्तियों पर आश्रित हैं जिन्हें वे उबाल कर तीन दिन इंतजार करने के बाद खाते हैं।’

इस समाचार से कुछ बरस पहले 1981 में ख्याति प्राप्त पटकथा -लेखक और रंगकर्मी विजय तेंदुलकर ने आदिवासी समाज द्वारा घोर गरीबी के चलते अपनी बेटियों को देह व्यापार में धकलने और बेचे जाने का काला सच सामने लाने का काम अपने नाटक ‘कमला’ के जरिए किया था। उन्हें ‘कमला’ को लिखने की प्रेरणा एक सत्य घटना से मिली थी। अंग्रेजी दैनिक ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ के पत्रकार अश्विनी सरीन ने राजस्थान के आदिवासी इलाके धौलपुर से एक लड़की को बकायदा 20 हजार रुपए में खरीद दिल्ली में प्रेस के सामने पेश कर सनसनी फैला दी थी। 1984 में जगमोहन मुद्रा ने इस नाटक पर आधारित फिल्म ‘कमला’ बनाई, जो खासी चर्चित रही। ‘इंडिया टुडे’ में कालाहांडी की बाबत समाचार ने राजीव गांधी को बेहद विचलित करने का काम किया। वे अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ कालाहांडी का दौरा करने गए और उन्होंने वहां के हालात सुधारने की दिशा में कई कदम उठाए। राजीव में सत्ता संभालने के साथ ही व्यवस्था-परिवर्तन करने की आतुरता थी। फरवरी, 1985 में उन्होंने संसद में कहा- ‘हमारी व्यवस्था जब 10 अथवा 20 बरस पुरानी हो तो कैसे हम अन्य देशों के साथ बराबरी कर सकते हैं?’

व्यवस्था बदलने की शुरुआत आर्थिक सुधारों की तरफ पहला कदम बढ़ाने से की गई। राजीव पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने युवा भारत के युवा मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं को समझा। यह युवा भारत विश्वभर में तेजी से हो रहे परिवर्तनों से प्रभावित होने लगा था और अपनी जीवनशैली में बदलाव की बाट जोहने लगा था। राजीव ने इस जनाकांक्षा को निजी पूंजीनिवेश के जरिए आगे बढ़ाने का काम किया। निजी पूंजी निवेश को आकर्षित करने के लिए टैक्स की दरें कम की गईं। आयात की जाने वाली वस्तुओं में भी टैक्स को कम किया गया। भारतीय उत्पाद के निर्यातकों को रियायती दरों पर ऋण उपलब्ध कराने के साथ-साथ उनके लिए कई प्रोत्साहन योजनाओं को लागू किया गया। लाइसेंस परमिट राज में सुधार लाते हुए कपड़ा उद्योग, मशीन उद्योग, दवा निर्माण और कम्प्यूटर इत्यादि को इस व्यवस्था के दायरे से मुक्त कर दिया गया। संसद में राजीव ने इन सुधारों की बाबत कहा- ‘भारतीय अर्थव्यवस्था नाना प्रकार के बंधनों के मकड़जाल में उलझकर रह गई है। इस प्रकार के बंधन भ्रष्टाचार को जन्म दे रहे हैं। हम इसे समाप्त करना चाहते हैं।’

पूंजी बाजार (कैपिटल मार्केट) में व्यवस्थागत सुधार लाने के उद्देश्य से एक बड़ा कदम उठते हुए 1987 में सेबी (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) का गठन किया गया, जिसने आधुनिक एवं सुव्यस्थित स्टॉक बाजार तैयार किया। दूर संचार एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में राजीव सरकार का योगदान अतुलनीय कहा जा सकता है। राजीव टेलीफोन को उच्च वर्ग अथवा मध्यम वर्ग मात्र की जरूरत नहीं मानते थे। उन्होंने गांव-गांव इस संचार माध्यम को आसानी से उपलब्ध कराने का काम किया। इसके लिए उन्होंने ख्याति प्राप्त तकनीकी विशेषज्ञ सत्यनारायण गंगाराम पित्रेदा (सैम पित्रेदा) को अपना सलाहकार नियुक्त कर भारत में दूरसंचार क्रांति की राह प्रशस्त करने की जिम्मेदारी सौंपी। सैम पित्रेदा ने 1987 में दूरसंचार, पानी, साक्षरता, टीकाकरण (वैक्सिीनेशन), डेयरी तथा तेल उत्पादक बीजों के क्षेत्र में व्यापक बदलाव एवं गति लाने के उद्देश्य से छह विशेष तकनीकी मिशन गठित किए, जिनके कारण इन सभी क्षेत्रों में भारी सुधार और प्रगति दर्ज की गई। पित्रेदा ने दूरसंचार को आम आदमी की पहुंच में लाने के लिए ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में सार्वजनिक दूरसंचार केंद्र (पीसीओ बूथ) स्थापित कर दूरसंचार के क्षेत्र में क्रांति ला दी। राजीव सरकार के कार्यकाल में ही महानगर टेलीफोन निगम तथा विदेश संचार नेटवर्क निगम का गठन किया गया, जिनके चलते देश एवं विदेश के साथ संचार प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन का लक्ष्य प्राप्त किया जा सका।

राजीव गांधी ने कम्प्यूटरीकरण की तरफ विशेष प्रयास किए। अमेरिकी तकनीकी कम्पनी टेक्सस इंस्टुमेंट्स ने बैंगलोर (अब बेंगलुरु) में अपनी पहली रिसर्च यूनिट की शुरुआत राजीवकाल में ही की थी। इस विदेशी पूंजीनिवेश की राह आसान करने में स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री ने विशेष दिलचस्पी दिखाई। उस समय की सरकारी नीति के चलते टैक्सस इंस्टुमेंट्स को अमेरिका के ‘यूसटन शहर स्थित अपने मुख्यालय के साथ सीधे सैटेलाइट लिंक स्थापित करने की स्वीकृति नहीं मिल पा रही थी। ऐसे में राजीव गांधी ने हस्तक्षेप कर इस समस्या का निवारण किया था। आने वाले वर्षों में बहुतायत में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने बैंगलोर में बडा पूंजी निवेश किया और आज सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में बैंगलोर एक बड़ा केंद्र बनकर उभर चुका है।’

क्रमंशः

You may also like

MERA DDDD DDD DD