Uttarakhand

भाजपा की पॉलिटिकल सर्जिकल स्ट्राइक

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बहुप्रतीक्षित कैबिनेट विस्तार हो चुका है। जिसमें 4 मंत्री उनकी पसंद के बने हैं उससे कयास लगाए जा रहे हैं कि अब वे अपने विरोधियों को मात देकर मजबूत राजनेता साबित हो चुके हैं। साथ ही केंद्रीय नेतृत्व यह भी तय कर चुका है कि आगामी 2027 का विधानसभा चुनाव उनके ही नेतृत्व में होगा। सूबे में चर्चा यह है कि भाजपा 20 से ज्यादा विधायकों के टिकट काटने की योजना बना रही है। जिनमें कई विधायक ऐसे हैं जो 70 साल की उम्र पार कर चुके हैं। बताया जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनावों में टिकट बंटवारे में भाजपा ‘ऐज फैक्टर’ को एक महत्वपूर्ण बिंदु मानकर चल रही है। हालांकि पार्टी इस पर भी मंथन कर रही है कि जिनके आड़े उम्र आ रही है और वह जिताऊ कंडीडेट है तो ऐसे विधायकों के परिवार के किसी सदस्य को भी चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है 

विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा ने अपने राष्ट्रीय नेतृत्व की बागडोर युवा हाथों में सौंपने की दिशा में सराहनीय कदम उठाए हैं जिसका उदाहरण पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का 45 वर्ष का होना है। नितिन नवीन ही नहीं बल्कि हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, सहित कई ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो 50 की उम्र पार नहीं हैं। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी युवा हैं। ऐसे में यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भाजपा अब पूर्ण रूप से युवा नेतृत्व की ओर शिफ्ट हो रही है इसके तहत ही अब उत्तराखण्ड में आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे में ऐज फैक्टर को एक महत्वपूर्ण बिंदु माना गया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि 70 पार के विधायकों को टिकट के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है।

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी एक युवा नेता हैं और वह सूबे में युवाओं का प्रतिनिधित्व चाहते हैं। सत्ता से जुड़े सूत्र बताते हैं कि सीएम धामी नहीं चाहते कि उम्र दराज हो चुके विधायकों को आगामी विधानसभा चुनावों में मैदान में उतारा जाए। इसके लिए ‘एज फैक्टर’ महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि 70 साल से अधिक के जनप्रतिनिधियों को रिपीट करने से पहले अब ऐसे विधायकों को गुप्त अग्नि परीक्षा (आंतरिक सर्वे) से गुजरना होगा। यह सर्वविदित है कि भाजपा अपने सम्भावित प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारने से पहले उनके विधानसभा क्षेत्र में एक नहीं दो नहीं बल्कि तीन-तीन सर्वे कराती है। पार्टी आंतरिक सर्वे में यह देखती है कि विधायक का अपने विधानसभा क्षेत्र में कैसा प्रदर्शन रहा है। उनका रिपोर्ट कार्ड और जनता में उनका फीड बैक कैसा है। इसी के साथ यह भी देखा जाता है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं की राय में उस विधायक की कैसी इमेज है और विकास कार्यों में वह कितना सफल और असफल हैं। इस तरह हर विधायक की अलग-अलग रिपोर्ट तैयार की जाती है और उसके आधार पर ही यह तय किया जाता है कि आगामी विधानसभा चुनावों में इस विधायक को अवसर मिलेगा या नहीं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बहुप्रतीक्षित कैबिनेट विस्तार हो चुका है। जिस तरह से कैबिनेट विस्तार में 4 मंत्री उनकी पसंद के बने हैं उससे कयास लगाए जा रहे हैं कि अब वे अपने विरोधियों को मात देकर मजबूत राजनेता साबित हो चुके हैं। साथ ही केंद्रीय नेतृत्व यह भी तय कर चुका है कि आगामी 2027 का विधानसभा चुनाव उनके ही नेतृत्व में होगा।
जिस तरह से उत्तराखण्ड में लगातार दो बार भाजपा की सरकार रही है उससे एंटी इनकम्बेंसी का सामना पार्टी को करना पड़ सकता है लेकिन पिछले कुछ समय को ही देखा जाए तो देश के कई राज्यों में भाजपा का चुनावी प्रबंधन एंटी इनकम्बेंसी को मात देने में कामयाब रहा है। इनमें गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और बिहार जैसे राज्य इसके उदाहरण हैं। फिलहाल उत्तराखण्ड की सरकार और संगठन आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी में पूरी तन्मयता और एकजुटता के साथ मैदान में उतर चुका है। गत 14 अप्रैल को देहरादून में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए दिल्ली देहरादून एक्सप्रेस-वे के उद्घाटन अवसर को आगामी विधानसभा चुनावों का आगाज कहा जा रहा है।
सूबे में चर्चा यह है कि  भाजपा 20 से ज्यादा विधायकों के टिकट काटने की योजना बना रही है। जिनमें कई विधायक ऐसे हैं जो 70 साल की उम्र पार कर चुके हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी आगामी विधानसभा चुनावों मे टिकट बंटवारे में ‘ऐज फैक्टर’ को एक महत्वपूर्ण बिंदु मानकर चल रही है। हालांकि पार्टी इस पर भी मंथन कर रही है कि जिनके आड़े उम्र आ रही है और वह जिताऊ कंडीडेट है तो ऐसे विधायकों के परिवार के किसी सदस्य को भी चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है।
बंशीधर भगत : ऐसे ही विधायक बंशीधर भगत हैं। भगत कालाढूंगी से विधायक हैं। वह 76 साल के हो चुके हैं। चर्चा यह भी है कि धामी सरकार में वरिष्ठ विधायक बंशीधर भगत को अगर जगह नहीं मिली तो उसकी वजह भी उनका उम्र दराज होना है। उम्र का यही आंकड़ा अब उनके 2027 में विधानसभा जाने में बाधक बन सकता है।
अगर भगत का राजनीतिक सफर देखा जाए तो वो प्रदेश के पुराने और जमीनी नेताओं में शुमार रहे हैं। उनका राजनीतिक जीवन 1970 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से शुरू हुआ। 1975 में वह जनसंघ में शामिल हुए। इसके बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश में वर्ष 1989 में वह भाजपा के नैनीताल-ऊधमसिंह नगर के जिलाध्यक्ष बनाए गए।
1991 में वह पहली बार नैनीताल सीट से विधायक चुने गए। इसके बाद 1993 में दूसरी बार और 1996 में तीसरी बार विधायक बने। 1996 में उत्तर प्रदेश सरकार में भगत खाद्य, रसद एवं पर्वतीय विकास मंत्री बनाए गए। वर्ष 2000 में जब उत्तराखण्ड राज्य का गठन हुआ तो नित्यानंद स्वामी की अंतरिम सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए। तब उन्हें कृषि, सहकारिता, दुग्ध, पशुपालन, गन्ना जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपी गई। 2007 में हुए चुनाव में हल्द्वानी विधानसभा सीट से कांग्रेस की कद्दावर नेता डाॅ. इंदिरा हृदयेश को हराया। तब वह खण्डूरी सरकार में वन, परिवहन मंत्री समेत कई विभागों के मंत्री बने। 2012 में हल्द्वानी से अलग कालाढूंगी विधानसभा का सृजन किया गया। तब वह कालाढूंगी से चुनाव लड़े और जीत गए। 2017 में फिर से कालाढूंगी विधानसभा सीट पर जीत हासिल की। वर्ष 2012 से 2015 तक वो विधानसभा की लोक लेखा समिति के अध्यक्ष भी चुने गए। 2020 में वह भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। 2022 में वह फिर से कालाढूंगी के विधायक निर्वाचित हुए लेकिन धामी सरकार में जगह नहीं पा सकें।
फिलहाल उनके राजनीतिक रिटायरमेंट की चर्चाओं के बाद कालाढूंगी का माहौल बदला-बदला सा लग रहा है। पिछले दिनों उन्होंने अपने राजनीतिक रिटायरमेंट पर बोलते हुए कहा कि अभी वह राजनीति में दो बार का टर्म और चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन इसी के साथ ही उन्होंने अपने पुत्र विकास भगत की कालाढूंगी से चुनाव लड़ने की पैरवी कर दी। गत फरवरी माह में उन्होंने मीडिया को दिए एक बयान में यह स्पष्ट कहा है कि वह अपने पुत्र विकास भगत को कालाढूंगी से विधानसभा चुनाव लड़ाने के इच्छुक हैं। विकास विधानसभा क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं और आगामी 2027 के चुनाव को लेकर पूरी तैयारी कर रहे हैं।
मोहन सिंह मेहरा : जागेश्वर के विधायक मोहन सिंह मेहरा भी उम्र पार की श्रेणी में शामिल हैं। वे 75 वर्ष के है। किसी समय पर मोहन सिंह मेहरा गोविंद सिंह कुंजवाल के करीबियों में गिने जाते थे। तब वे कुंजवाल के चेले कहें जाते थे लेकिन कहते हैं कि गुरु गुड़ ही रहा और चेला चीनी बन गया। मेहरा ने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। इसके बाद भाजपा ने उन्हें टिकट दे दिया। वे 2022 में जागेश्वर से भाजपा के विधायक बन गए। इससे पहले मेहरा अल्मोड़ा के जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुके हैं जबकि राज्य गठन के बाद साल 2002, 2007, 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में दिग्गज कांग्रेसी नेता गोविंद सिंह कुंजवाल लगातार जागेश्वर से विधायक बनते आ रहे थे। फिलहाल 2027 में एक बार फिर भाजपा सुभाष पांडेय को चुनाव मैदान में उतारने पर विचार कर रही है। पांडेय 2017 में भी जागेश्वर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन तब वह कांग्रेस के  गोविंद सिंह कुंजवाल से चुनाव हार गए थे।
सतपाल महाराज : धामी सरकार में केबिनेट मंत्री सतपाल महाराज का नाम भी उम्र दराज विधायकों की सूची में शामिल है। वे 74 साल के हो चुके हैं। महाराज को हमेशा से उत्तराखण्ड के सम्भावित सीएम उम्मीदवार के तौर पर देखा जाता रहा है। कांग्रेस में रहते हुए कई बार उनका नाम मुख्यमंत्री के तौर पर सामने आया था। 2014 में जब उत्तराखण्ड में कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को हटाया था तब भी उनका नाम मुख्यमंत्री के तौर पर खूब चला था लेकिन इस बार बाजी हरीश रावत के हाथ लगी थी। ऐसे में सतपाल महाराज ने बाद में कांग्रेस को अलविदा कह दिया और भाजपा का दामन थाम लिया। हालांकि उस दौरान उनकी पत्नी अमृता रावत कांग्रेस से विधायक थीं और वह कांग्रेस में ही रहीं। इसके बाद सतपाल महाराज ने 2017 के चुनाव में चैबट्टाखाल विधानसभा से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा जिसे जीतने के बाद वह भाजपा की तत्कालीन त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए। 2022 में वह फिर से विधायक बने, इस बार उन्हें धामी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने का मौका मिला।
सतपाल महाराज को केंद्र में सांसद और मंत्री बनने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है। 1996 में उन्होंने पौड़ी संसदीय सीट से ही पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खण्डूड़ी के खिलाफ चुनाव जीता। उन्होंने केंद्र में रेल राज्यमंत्री और राज्य वित्त मंत्री का पदभार सम्भाला लेकिन इसके बाद 1998,1999 और 2004 में हुए लोक सभा चुनावों में पौड़ी संसदीय सीट से हार का सामना किया। इसके बाद 2009 में पौड़ी से ही टीपीएस रावत के खिलाफ चुनाव जीता। इस बीच महाराज रक्षा मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष भी रहे। सतपाल महाराज सिर्फ राजनेता ही नहीं हैं बल्कि उनके पीछे धर्म का भरा पूरा साम्राज्य है। महाराज के धार्मिक अनुयायियों में सबसे बड़ी संख्या सिक्किम के लोगों की है। उम्मीद की जा रही है कि भाजपा उन्हें भविष्य में सिक्किम से सांसद या वहां का राज्यपाल बना सकती है।
बिशन सिंह चुफाल : डीडीहाट के विधायक बिशन सिंह चुफाल को भी उम्र अधिक होने के चलते अब उत्तराखण्ड विधानसभा से महफूज होना पड़ सकता है। वें उम्र के 71 वे पड़ाव पर हंै। चुफाल प्रदेश के उन गिने-चुने राजनीतिज्ञों में शुमार रहे हैं जिन्होंने कभी चुनाव नहीं हारा है और वे एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने वर्ष 2000 में सूबे के गठन के बाद से सभी विधानसभाओं में उत्तराखण्ड विधानसभा के सदस्य के रूप में कार्य किया है। वे अब तक 1996 से लगातार सात बार चुनाव जीत कर रिकार्ड बना चुके हैं। उत्तराखण्ड सरकार में ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री और सहकारिता मंत्री रहे चुफाल प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
धामी सरकार में उन्हें स्थान नहीं मिला है। शायद यही वजह है कि गाहे-बगाहे वह धामी सरकार की खामियां गिनवाने लगते हैं। चुफाल यहां तक कह चुके हैं कि सीएम पुष्कर सिंह धामी द्वारा विधानसभा क्षेत्र में 10 विकास कार्यों के प्रस्ताव मांगे थे, जिस पर लोक निर्माण विभाग को भी नए सड़कों के प्रस्ताव दिए थे लेकिन लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों ने इन प्रस्तावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया। कई बार प्रस्तावों को लेकर अधिकारियों से सम्पर्क किया गया लेकिन फिर भी प्रस्तावों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसी तरह का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में तीन महीने में होने वाले कार्य तीन साल में भी नहीं हो रहे हैं। विधायक के इस बयान की हर तरफ चर्चा रही। विपक्ष को भी मौका मिल गया कि सरकार का एक विधायक ही अपनी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। फिलहाल उन्होंने अपनी पुत्री दीपिका चुफाल को राजनीतिक विरासत सौंपने का मन बना लिया है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि दीपिका को वह आगामी 2027 में डीडीहाट से विधानसभा चुनाव लड़वाना चाहते हैं। दीपिका वर्तमान में पिथौरागढ़ की चिटगल सीट से जिला पंचायत सदस्य हैं। हालांकि 2019 में वह इसी सीट पर कांग्रेस के बंशीधर भट्ट से चुनाव हार चुकी हैं।
सविता कपूर : देहरादून कैंट से भाजपा की विधायक सविता कपूर की भी टिकट बंटवारे में आयु बाधक बन सकती है। वे भी 70 पार की श्रेणी में शामिल हैं। सविता कपूर ने 2022 के चुनावों में देहरादून कैंट विधानसभा से जीत दर्ज की और अपने पति, आठ बार के दिवंगत विधायक हरबंश कपूर  की विरासत को आगे बढ़ाया। कपूर उत्तराखण्ड के साथ ही यूपी में भी विधायक रह चुके थे। वे आठ बार विधायक रहें।

You may also like