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किसका खेल बिगाड़ेंगे सिद्धू?

किसका खेल बिगाड़ेंगे सिद्धू?

पंजाब में विधानसभा चुनाव अगले साल की शुरुआत में प्रस्तावित हैं लेकिन प्रदेश की राजनीति अभी से गरमाने लगी है। कांग्रेस के पूर्व पंजाब अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी डॉ. नवजोत कौर सिद्धू ने नई पार्टी की घोषणा के साथ ही नया तूफान खड़ा कर दिया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म ‘एक्स’ पर भारतीय राष्ट्रवादी पार्टी के गठन की औपचारिक घोषणा की है। इसके बाद से राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सिद्धू की नई पार्टी किसका वोट बैंक प्रभावित करेगी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब पंजाब कांग्रेस लम्बे समय से आंतरिक कलह से जूझ रही है। इसका सीधा असर कांग्रेस पर पड़ सकता है क्योंकि सिद्धू काफी समय तक कांग्रेस का चेहरा रहे हैं। उनके समर्थक और पारम्परिक कांग्रेस वोटर नई पार्टी की ओर आकर्षित हो सकते हैं जिससे कांग्रेस को नुकसान होने की सम्भावना है वहीं आम आदमी पार्टी जो वर्तमान में पंजाब की सत्ता में है, उसे भी चुनौती मिल सकती है। सिद्धू यदि भ्रष्टाचार, शासन और स्थानीय मुद्दों को जोर-शोर से उठाते हैं तो आम आदमी पार्टी के लिए राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। हालांकि आप का मजबूत संगठन और सरकार में होने का फायदा उसे संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकता है।

कैसे पार होगी टीएमसी की नैया?

पश्चिम बंगाल की 294 सीटों वाली विधानसभा के लिए 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होगा, जिसके नतीजे 4 मई को आएंगे। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में मुख्य मुकाबला होने की सम्भावना है लेकिन टीएमसी के लिए हालात चुनौतीपूर्ण नजर आ रहे हैं। पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी को उस समय बड़ा झटका लगा जब मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (एसआईआई) और एडजुडिकेशन प्रक्रिया के बाद बड़ी संख्या में नाम हटने की खबरें सामने आईं। सूत्रों के मुताबिक करीब 60 लाख मामलों की समीक्षा में 27 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं वहीं अब तक कुल मिलाकर 90 लाख से अधिक नाम हटने की चर्चा है। सबसे ज्यादा असर मुस्लिम बहुल जिलों मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना तथा उत्तर दिनाजपुर में देखा जा रहा है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक हलकों से लेकर मीडिया और सोशल मीडिया तक सवाल उठ रहा है कि क्या बीच मझधार में फंसी टीएमसी की नैया पार हो पाएगी? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव और उससे जुड़े विवाद चुनाव को और ज्यादा संवेदनशील बना रहे हैं। टीएमसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस संकट को राजनीतिक अवसर में कैसे बदलती है। एडजुडिकेशन मामलों में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी उनकी कुल आबादी के अनुपात से काफी ज्यादा है जिससे सियासी विवाद गहरा गया है। कोलकाता की भवानीपुर और बालीगंज सीटों के आंकड़े भी यही संकेत देते हैं। भवानीपुर में जहां मुस्लिम मतदाता करीब 22 प्रतिशत हैं वहीं एडजुडिकेशन मामलों में उनकी हिस्सेदारी 50 फीसदी से ज्यादा बताई जा रही है। बालीगंज में भी यही ट्रेंड दिख रहा है। हालांकि जिन मतदाताओं के नाम एडजुडिकेशन में हैं, उन्हें ट्रिब्यूनल में अपील का मौका मिलेगा। लेकिन अंतिम फैसला आने तक वे मतदान नहीं कर पाएंगे जिससे चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। टीएमसी अब इसे मताधिकार छीनने का मुद्दा बनाकर अल्पसंख्यक वोटरों को लामबंद कर सकती है। कुल मिलाकर मतदाता सूची का शुद्धिकरण जरूरी है लेकिन पारदर्शिता और निष्पक्षता उतनी ही अहम है। अगर इन दोनों पर सवाल उठते हैं तो यह सिर्फ चुनावी नतीजों ही नहीं बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता को भी प्रभावित कर सकता है।

किसकी होगी छुट्टी, किसे मिलेगा मौका?

राजस्थान की राजनीति में इन दिनों मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर अटकलों का दौर तेज हो गया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के दिल्ली दौरे और प्रदेश प्रभारी राधामोहन दास अग्रवाल के बयान के बाद सियासी हलकों से लेकर मीडिया और सोशल मीडिया तक चर्चाओं का बाजार गर्म है। मीडिया से बातचीत में अग्रवाल ने साफ किया कि मंत्रिमंडल विस्तार एक प्रक्रिया के तहत होता है। यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है कि वे तय करें कौन मंत्री सही काम कर रहा है और कौन नहीं लेकिन अंतिम फैसला पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के हाथ में होता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार अपने मौजूदा कामकाज से संतुष्ट है तो बदलाव की जरूरत नहीं होती। हालांकि यह भी संकेत दिया कि मुख्यमंत्री अपने मंत्रियों के कामकाज का लगातार मूल्यांकन कर रहे हैं और समय आने पर राष्ट्रीय अध्यक्ष से चर्चा कर निर्णय लिया जाएगा। इसी बीच जिस दिन यह बयान सामने आया उसी दिन मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा दिल्ली में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मुलाकात कर रहे थे। बैठक में क्या चर्चा हुई इसकी आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है लेकिन राजनीतिक गलियारों में कयास लगाए जा रहे हैं कि जल्द ही मंत्रिमंडल में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। गौरतलब है कि वर्तमान में मुख्यमंत्री सहित सरकार में 24 मंत्री हैं। माना जा रहा है कि जिन विभागों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा, उन मंत्रियों की छुट्टी हो सकती है जबकि कुछ नए चेहरों को मौका मिल सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसे मिलेगी मंत्री की कुर्सी और किसकी जाएगी? इसका जवाब आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा लेकिन फिलहाल राजस्थान की राजनीति में सस्पेंस बना हुआ है।

क्या फिर बिखरेगी शिवसेना
महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है और सवाल उठ रहा है कि क्या शिवसेना में फिर कोई बड़ा राजनीतिक भूचाल आने वाला है। हाल ही में ऐसी खबरें सामने आईं कि उद्धव ठाकरे गुट के 9 में से 8 सांसदों ने राज्य के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे से मुलाकात की है। इस दावे ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी और अटकलों का बाजार गर्म हो गया है। हालांकि इन खबरों को उद्धव गुट के नेताओं ने सिरे से खारिज कर दिया है। अरविंद सावंत और ओमप्रकाश राजेनिंबाळकर ने स्पष्ट किया कि ऐसी कोई बैठक नहीं हुई। यही नहीं संजय राउत ने भी इन अटकलों को बेबुनियाद बताते हुए कहा कि पार्टी के सभी 9 सांसद एकजुट हैं और यह खबर केवल भ्रम फैलाने के उद्देश्य से चलाई जा रही है। राउत ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी और देवेंद्र फडणवीस पर निशाना साधा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बार-बार ऑपरेशन करना लाश का ऑपरेशन करने जैसा है। उनका इशारा साफ तौर पर विपक्षी दलों को तोड़ने की राजनीति की ओर था। राउत का यह बयान बताता है कि शिवसेना के भीतर फिलहाल सार्वजनिक तौर पर एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की जा रही है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि महाराष्ट्र की राजनीति में पहले भी बड़े राजनीतिक उलटफेर हो चुके हैं। 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना का बड़ा धड़ा अलग हो गया था, जिसने राज्य की सत्ता का समीकरण ही बदल दिया। उसी घटना के बाद से शिवसेना दो खेमों में बंटी हुई है। एक तरफ उद्धव ठाकरे का गुट और दूसरी ओर शिंदे गुट। ऐसे में जब भी किसी सम्भावित टूट या बगावत की खबर सामने आती है, वह स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस को तेज कर देती है। हालांकि इस बार की खबरों में अब तक कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है और सम्बंधित नेताओं ने भी इसे अफवाह करार दिया है। फिलहाल शिवसेना में किसी नई टूट के संकेत स्पष्ट नहीं हैं लेकिन अतीत के अनुभवों को देखते हुए इन अटकलों को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। महाराष्ट्र की राजनीति में कब क्या हो जाए? यह कहना मुश्किल है और यही इसकी सबसे बड़ी खासियत भी है।

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