पश्चिम बंगाल की राजनीति में जब-जब चुनाव का बिगुल बजता है, तब-तब उत्तर प्रदेश की सियासत की धमक कोलकाता से लेकर सिलीगुड़ी तक सुनाई देती है। अब जब राज्य में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है तो एक बार फिर यूपी के दो ‘धुरंधर’ समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बंगाल के अखाड़े में आमने-सामने होंगे। एक तरफ अखिलेश यादव ममता बनर्जी के लिए ‘रक्षा कवच’ बनकर उतरेंगे तो दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ का ‘बुलडोजर’ वाला अंदाज टीएमसी के किलों को ढहाने की कोशिश करेगा। सूत्रों की मानें तो अखिलेश यादव अप्रैल के दूसरे या तीसरे हफ्ते में बंगाल पहुंच सकते हैं। वह उन इलाकों में प्रचार करेंगे जहां उत्तर भारतीय और विशेष रूप से यादव मतदाताओं की संख्या अधिक है। अखिलेश का मिशन साफ है इंडिया गठबंधन की एकजुटता दिखाना और टीएमसी के पक्ष में माहौल बनाना। दूसरी ओर बीजेपी ने अपने सबसे बड़े ‘फायर ब्रांड’ योगी आदित्यनाथ को बंगाल में उतारने की पूरी तैयारी कर ली है। योगी बीजेपी के स्टार प्रचारकों की सूची में सबसे ऊपर हैं। खबर है कि योगी प्रथम चरण के मतदान 23 अप्रैल से पहले मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर बंगाल के इलाकों में ताबड़-तोड़ रैलियां करेंगे। ‘बुलडोजर बाबा’ के नाम से मशहूर योगी का मुख्य एजेंडा हिंदुत्व, घुसपैठ और कानून-व्यवस्था होगा। वह अपनी सभाओं में अक्सर यूपी के ‘सुशासन माॅडल’ का जिक्र करते हैं और ममता सरकार पर तुष्टीकरण का आरोप लगाकर सीधे हमला बोलते हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या अखिलेश ममता की ढाल बनेंगे या योगी का बुलडोजर डेढ़ दशक से सत्ता पर काबिज टीएमसी को ध्वस्त कर देगा? राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इन दोनों नेताओं के बीच बंगाल की धरती पर होने वाला वाकयुद्ध हमेशा सुर्खियों में रहता है। पिछली बार योगी आदित्यनाथ ने जब बंगाल में रैली की थी तो ममता ने उन्हें ‘बाहरी’ कहा था, जिस पर योगी ने पलटवार करते हुए कहा था कि ‘ममता दीदी को भगवान राम के नाम से चिढ़ है। वहीं अखिलेश ने योगी के दौरों पर चुटकी लेते हुए कहा था कि जो यूपी में विकास नहीं कर पाए वो बंगाल में क्या करेंगे। 2026 के इस चुनाव में यह पुरानी तल्खी और भी बढ़ने वाली है क्योंकि इस बार मुकाबला सीधे तौर पर अस्तित्व का है। बीजेपी को उम्मीद है कि योगी की रैलियों से हिंदू वोट बैंक पूरी तरह गोलबंद होगा जबकि टीएमसी को भरोसा है कि अखिलेश के आने से हिंदी भाषी मतदाताओं का झुकाव ममता की ओर बना रहेगा। बंगाल की चुनावी जंग इस बार कोलकाता की गलियों से ज्यादा यूपी के इन दो दिग्गजों के बयानों में लड़ी जाएगी जहां एक तरफ ममता के ‘अंगने’ में अखिलेश की मौजूदगी उन्हें मजबूती देगी वहीं योगी की ‘गर्जना’ टीएमसी के लिए चुनौती पेश करेगी। अब देखना यह होगा कि बंगाल की जनता ‘यूपी के बेटे’ की सुनती है या ‘यूपी के बाबा’ की।
तेज हुई आप की अंतर्कलह
आम आदमी पार्टी की राजनीति में इन दिनों बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है और इसके केंद्र में हैं युवा सांसद राघव चड्ढा। राज्यसभा में डिप्टी लीडर के पद से उनकी विदाई ने न सिर्फ राजनीतिक हलकों में हलचल मचाई है बल्कि पार्टी के भीतर सम्भावित खींचतान को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। राघव चड्ढा ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया में खुलकर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि उन्हें संसद में जब भी बोलने का मौका मिलता है वे आम जनता के मुद्दे उठाते हैं। ऐसे मुद्दे जिन्हें अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या जनता की आवाज़ उठाना गुनाह है? उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि पार्टी ने राज्यसभा सचिवालय से उनके बोलने के अवसर सीमित करने की बात कही है। उनका यह बयान कि ‘‘मेरी खामोशी को मेरी हार मत समझ लेना, मैं वो दरिया हूं जो वक्त आने पर सैलाब बनता है।’’ काफी कुछ संकेत देता है। इस घटनाक्रम के बाद मीडिया और राजनीतिक गलियारों में कई तरह के कयास तेज हो गए हैं। क्या उनकी बढ़ती लोकप्रियता पार्टी को असहज कर रही थी? क्या उन्हें जान-बूझकर साइड लाइन किया जा रहा है? या फिर यह केवल एक रणनीतिक पुनर्गठन है? पार्टी सूत्रों की मानें तो अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पार्टी अब संगठन को नए सिरे से व्यवस्थित कर रही है। इसमें भूमिकाओं का पुनर्वितरण, नई प्राथमिकताओं का निर्धारण और क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर नेतृत्व में बदलाव शामिल हैं। ऐसे में यह बदलाव एक संगठनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा भी हो सकता है। सियासी विश्लेषक इसे सामान्य फेरबदल से ज्यादा मानते हैं। उनका कहना है कि राघव चड्ढा प्रकरण पार्टी के भीतर सम्भावित बदलावों की ओर इशारा करता है। चड्ढा लम्बे समय तक पार्टी के प्रमुख चेहरों में गिने जाते रहे हैं और खासकर पंजाब चुनाव के दौरान उनकी रणनीतिक भूमिका काफी अहम रही थी। ऐसे में उनका अचानक हाशिए पर दिखना कई तरह के संकेतों को जन्म दे रहा है। यह अंदरूनी खींचतान है या सोची-समझी रणनीति यह अभी स्पष्ट नहीं है लेकिन इतना तय है कि आने वाले समय में पार्टी की दिशा, नेतृत्व और शक्ति संतुलन पर इसका गहरा असर देखने को मिल सकता है। गौरतलब है कि चड्ढा एक समय केजरीवाल के करीबी माने जाते थे लेकिन हाल के महीनों में दोनों के बीच दूरी सामने आई है। इसका ताजा उदाहरण पार्टी ने चड्ढा को राज्यसभा में डिप्टी लीडर पद से हटाया तो राघव ने भी आप से दुश्मनी के संकेत वीडियो के जरिए दे दिए हैं तो दूसरी तरफ पार्टी के कुछ वर्गों का यह भी मानना है कि चड्डा कई बार पार्टी लाइन से हटकर मुद्दे उठाते हैं जो हमेशा पार्टी के राजनीतिक एजेंडे से मेल नहीं खाते।
ढाल बनेंगे अखिलेश या चलेगा बुलडोजर?
थके कदम या सियासी चाल?
उत्तराखण्ड में आगामी विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर हैं लेकिन इनकी तैयारियों को लेकर सभी दल सक्रिय हो चुके हैं। सत्ताधारी पार्टी भाजपा जहां पूरी तरह चुनावी मोड में है वहीं कांग्रेस भी अपनी रणनीति मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने सक्रिय राजनीति से 15 दिनों के ‘अर्जित अवकाश’ की घोषणा की है जिसे उन्होंने अवकाश की पहली किश्त बताया जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। सूत्रों के मुताबिक हाल के दिनों में पार्टी के भीतर कुछ मुद्दों खासकर भाजपा से निष्कासित नेताओं की वापसी को लेकर रावत असहज थे। दिल्ली में हुई बैठकों में भी मतभेद की चर्चा रही। हालांकि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर असंतोष जाहिर नहीं किया लेकिन उनके इस कदम ने कई अटकलों को हवा दी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या इसके पीछे सियासी परतें छिपी हुई हैं। क्या यह फैसला थकान का परिणाम है या किसी बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा? राजनीतिक तौर पर इस ‘अवकाश’ के कई मायने निकाले जा रहे हैं। एक ओर यह उनके लम्बे राजनीतिक सफर के बाद थकान और आत्ममंथन का संकेत हो सकता है तो वहीं दूसरी तरफ इसे रणनीतिक ब्रेक भी माना जा रहा है। कांग्रेस में पीढ़ी परिवर्तन, आंतरिक गुटबाजी और चुनावी निराशा भी इस फैसले के पीछे अहम कारण माने जा रहे हैं। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि राजनीति में ‘अवकाश’ का मतलब हमेशा विदाई नहीं होता। रावत का अनुभव और जनाधार ऐसा है कि उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। सीधे शब्दों में कहें तो यह कहानी खत्म नहीं हुई है बल्कि शायद एक नए अध्याय की शुरुआत है। सम्भव है कि सही समय आने पर वह फिर किसी बड़े रोल में दिखें। यह फैसला जितना व्यक्तिगत लगता है, उतना ही राजनीतिक भी है। आने वाले समय में यह साफ होगा कि यह फैसला थकान का परिणाम है या किसी बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा।