2018 में हुए कर्नाटक ने विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन उभरी थी। उसे 104 सीटें मिली, कांग्रेस 79 तो जद(सेक्युलर) ने 38 सीटों पर जीत हासिल की थी। बहुमत न होते हुए भी राज्यपाल ने बीएस येदियुरप्पा को सरकार बनाने का मौका दिया। 17 मई, 2018 को वे सीएम तो बन गए लेकिन सदन में बहुमत साबित न कर पाने के चलते मात्र दो दिन में ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। 23 मई को जद(से) और कांग्रेस ने वहां गठबंधन की सरकार बनाई जो मात्र 14 माह बाद 17 विधायकों के दलबदल चलते गिर गई। एक बार फिर से भाजपा को राज्य में सरकार बनाने का मौका इस दलबदल के चलते हासिल हो गया। तभी से राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। येदियुरप्पा को इस वर्ष जुलाई में सीएम पद से हटा भाजपा आलाकमान ने बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बना सबको हैरत में डालने का काम किया। बोम्मई अपने पूर्ववर्ती की भांति राजनीतिक पैतरेबाजी में खास माहिर नहीं है। नतीजा राज्य में भाजपा कमजोर होती नजर आने लगी है। कुछ अर्सा पहले हुए विधानसभा के उपचुनाव में सीएम के गृह जनपद हावेरी में भाजपा को करारी हार कांग्रेस के हाथों उठानी पड़ी। अब राज्य विधानसभा के चुनाव में भी कांग्रेस ने दमदार जीत दर्ज करा भाजपा और जद(सेक्युलर) के नेताओं को सकते में डाल दिया है। 25 सीटों के लिए हुए इस चुनाव में भाजपा को ग्यारह, कांग्रेस को भी ग्यारह तो जद(से) को मात्र 2 सीटें मिली है। जानकारों का मानना है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिव कुमार को केंद्रीय जांच एजेंसियों के द्वारा लगातार टारगेट में लिए जाने बाद शिव कुमार ज्यादा एग्रेसिव हो प्रदेश में पार्टी को मजबूत करने में जुटे हैं। बीएस येदियुरप्पा को हटाए जाने से नाराज लिंगायत वोट बैंक अब शिव कुमार की रणनीति के चलते कांग्रेस की तरफ शिफ्ट होता नजर आने लगा है। शिव कुमार स्वयं राज्य के दूसरे बड़े वोट बैंक वोकालिंगा से आते हैं। देवगौड़ा भी वोकालिंगा हैं। विधान परिषद चुनावों में कांग्रेस ने वोकालिंगा समाज का गढ़ कहलाए जाने वाले मैसूर इलाके में पांच सीटें जीत डाली जबकि देवगौड़ा की जद(से) को मात्र दो सीटों पर विजय हासिल हुई है। कांग्रेस के बढ़ते जनाधार ने भाजपा और जनता दल(सेक्युलर) के नेताओं को हलकान करने का काम कर दिया है।
कर्नाटक भाजपा सकते में, पद (से) भी हलकान

