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आप में आखिर चल क्या रहा है?

गत् सप्ताह आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा में अपने उपनेता राघव चड्ढा को इस पद से हटा दिया। यह बदलाव स्पष्ट करता है कि चड्डा किसी खास रणनीति के तहत बीते लम्बे अर्से से केंद्र सरकार के विरुद्ध कुछ कहने से बच रहे थे। जब अरविंद केजरीवाल, संजय सिह और मनीष सिसोदिया जैसे शीर्ष नेता कानूनी संकटों में घिरे, गिरफ्तारी तक की नौबत आई, तब भी चड्ढा की ओर से कोई आक्रामक राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। यहां तक कि जब अदालत से पार्टी नेताओं को राहत मिली और पूरे मामले पर सवाल उठे, तब भी उनकी ओर से सार्वजनिक प्रतिक्रिया का अभाव बना रहा। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि राघव की यह चुप्पी केवल व्यक्तिगत रणनीति नहीं बल्कि किसी सम्भावित दबाव या भय का परिणाम हो सकती है, खासकर केंद्रीय जांच एजेंसियों को लेकर। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं है लेकिन राजनीति में धारणाएं भी कई बार वास्तविकता जितनी प्रभावी होती हैं

दिल्ली की राजनीति में एक दशक पहले उम्मीद और बदलाव का प्रतीक बनकर उभरी आम आदमी पार्टी आज खुद अपने भीतर उठ रहे सवालों से जूझती नजर आ रही है। कभी आंदोलन से निकली इस पार्टी ने पारदर्शिता, आंतरिक लोकतंत्र और जवाबदेही को अपनी पहचान बनाया था लेकिन हालिया घटनाक्रम, खासतौर पर राघव चड्डा को राज्यसभा में डिप्टी लीडर पद से हटाया जाना, इस धारणा को चुनौती देता है कि क्या पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य है।

राघव चड्डा का मामला सिर्फ एक पद परिवर्तन का नहीं, बल्कि उस चुप्पी का है जो पिछले लम्बे समय से उनके राजनीतिक व्यवहार में दिखाई दे रही है। वह नेता, जो कभी टीवी डिबेट्स में पार्टी का सबसे मुखर चेहरा हुआ करता था। पिछले कुछ महीनों से लगभग खामोश हैं। जब अरविंद केजरीवाल,  संजय  सिह और मनीष सिसोदिया जैसे शीर्ष नेता कानूनी संकटों में घिरे, गिरफ्तारी तक की नौबत आई, तब भी चड्डा की ओर से कोई आक्रामक राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। यहां तक कि जब अदालत से पार्टी नेताओं को राहत मिली और पूरे मामले पर सवाल उठे, तब भी उनकी ओर से सार्वजनिक प्रतिक्रिया का अभाव बना रहा।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ती रही कि राघव की यह चुप्पी केवल व्यक्तिगत रणनीति नहीं बल्कि किसी सम्भावित दबाव या भय का परिणाम हो सकती है, खासकर केंद्रीय जांच एजेंसियों को लेकर। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं है लेकिन राजनीति में धारणाएं भी कई बार वास्तविकता जितनी प्रभावी होती हैं।
अब  चड्डा को डिप्टी लीडर पद से हटाकर अशोक मित्तल को नियुक्त करना भी महज एक साधारण संगठनात्मक फेरबदल के रूप में नहीं देखा जा रहा है। यह फैसला उस समय आया है जब पार्टी पहले से ही कई मोर्चों पर दबाव में है। संजय सिंह का राज्यसभा में सांसद दल का नेता अपनी जगह बने रहना इस बात की ओर इशारा करता है कि यह बदलाव व्यापक नहीं बल्कि चयनात्मक है और ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चड्ढा को जान-बूझकर किनारे किया गया है?
दरअसल, आम आदमी पार्टी का इतिहास देखें तो यह पहली बार नहीं है जब किसी प्रमुख चेहरे को इस तरह हाशिए पर जाते देखा गया हो। पार्टी की जड़ें इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन में हैं जहां अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा हुआ था। उसी आंदोलन से निकले कई चेहरे बाद में आप की नींव बने। उस दौर में यह सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं बल्कि एक वैचारिक प्रयोग था जिसमें आम लोगों की भागीदारी, पारदर्शिता और सामूहिक नेतृत्व की बात की जाती थी लेकिन समय के साथ यह प्रयोग कई मोड़ों से गुजरा और उसके साथ जुड़े कई प्रमुख चेहरे अलग होते चले गए। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे नेता, जो पार्टी के वैचारिक स्तम्भ माने जाते थे, 2015 में ही बाहर का रास्ता देख चुके हैं। उनका आरोप था कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो रहा है और निर्णय लेने की प्रक्रिया कुछ लोगों तक सीमित होती जा रही है। यह आरोप उस समय भी गम्भीर था और आज भी उतना ही प्रासंगिक नजर आता है।
इसी क्रम में मयंक गांधी का नाम भी सामने आता है, जिन्होंने पार्टी छोड़ने के बाद अपनी किताब ‘आप एंड डाउन: एन इनसाइडर स्टोरी आॅफ इंडिया मोस्ट कंट्रोवर्शियल पार्टी’ में अंदरूनी हालात का विस्तृत वर्णन किया। इस किताब में उन्होंने यह दावा किया है कि पार्टी में धीरे-धीरे आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होता गया और फैसले एक सीमित दायरे में केंद्रित होते चले गए। उनके मुताबिक असहमति के लिए जगह कम होती गई और जो लोग सवाल उठाते थे, वे धीरे-धीरे हाशिए पर चले जाते थे।
यह केवल वैचारिक असहमति तक सीमित नहीं रहा। स्वाति मालीवाल जैसी नेता, जो कभी पार्टी का मजबूत चेहरा थीं, नेतृत्व से टकराव के बाद दूरी बनाती नजर आईं। वहीं एच.एस. फुलका जैसे वरिष्ठ वकील, जिन्होंने 1984 सिख दंगों के पीड़ितों के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी, पार्टी से अलग होकर अब गत् सप्ताह ही बीजेपी के साथ जुड़ गए हैं। यह घटनाएं केवल व्यक्तिगत फैसले नहीं बल्कि उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है जिसमें आप के भीतर करीबी सहयोगियों का धीरे-धीरे अलग होना एक पैटर्न बनता जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में एक बड़ा सवाल नेतृत्व शैली को लेकर भी है। अरविंद केजरीवाल की नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक कौशल ने आप को तेजी से आगे बढ़ाया, इसमें कोई संदेह नहीं है। दिल्ली और पंजाब में सत्ता हासिल करना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है लेकिन इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि पार्टी का नेतृत्व धीरे-धीरे अधिक केंद्रीकृत होता गया है। आलोचकों का कहना है कि पार्टी में निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित हो गई है और असहमति को उतनी जगह नहीं मिलती जितनी शुरुआत में दी जाती थी।
हालांकि इस आलोचना का दूसरा पक्ष भी है। समर्थकों का मानना है कि भारतीय राजनीति में सफलता हासिल करने के लिए एक मजबूत और निर्णायक नेतृत्व जरूरी होता है। उनके अनुसार, अगर नेतृत्व ढीला होता तो शायद आप इतनी जल्दी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान नहीं बना पाती लेकिन यही तर्क अब एक दुविधा भी पैदा करता है कि क्या मजबूत नेतृत्व और आंतरिक लोकतंत्र साथ-साथ चल सकते हैं या एक को चुनने की कीमत दूसरे को चुकानी पड़ती है?
राघव चड्डा की मौजूदा स्थिति इस बहस को और जटिल बना देती है। वह न तो खुले तौर पर विरोध में हैं और न ही पहले की तरह पूरी तरह सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। उनकी चुप्पी कई तरह के संकेत देती है कि क्या वह रणनीतिक रूप से खुद को विवादों से दूर रख रहे हैं या फिर पार्टी के भीतर उनकी स्थिति कमजोर हो गई है? या फिर यह सब केवल राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम है जहां हर नेता अपने तरीके से संतुलन बनाने की कोशिश करता है?
आप का वर्तमान परिदृश्य यह भी दिखाता है कि सत्ता में आने के बाद किसी भी पार्टी के सामने चुनौतियां बदल जाती हैं। आंदोलन के दौर में जो आदर्श और सिद्धांत प्रमुख होते हैं, सत्ता में आने के बाद उन्हें व्यवहार में लागू करना कहीं अधिक कठिन हो जाता है। संगठन को संभालना, सरकार चलाना, विरोधियों से मुकाबला करना और साथ ही आंतरिक संतुलन बनाए रखना, ये सभी काम एक साथ करना आसान नहीं होता। फिर भी आप से अपेक्षाएं ज्यादा इसलिए हैं क्योंकि उसने खुद को पारम्परिक राजनीति के विकल्प के रूप में पेश किया था। अगर वही पार्टी अब उन्हीं समस्याओं से जूझती नजर आती है जिनके खिलाफ वह बनी थी तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
इस पूरे घटनाक्रम का निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगी लेकिन इतना साफ है कि आप एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। राघव चड्डा का डिमोशन, उनकी चुप्पी, पुराने नेताओं का मोहभंग और नेतृत्व को लेकर उठते सवाल, ये सभी संकेत हैं कि पार्टी के भीतर कुछ न कुछ बदल रहा है। आखिरकार, सवाल वही है जो राजनीति के गलियारों से लेकर आम लोगों तक गूंज रहा है कि क्या आम आदमी पार्टी अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रह पाएगी या फिर वह भी भारतीय राजनीति के उसी ढांचे का हिस्सा बन जाएगी, जिससे अलग होने का दावा उसने कभी किया था? फिलहाल जवाब भविष्य के गर्भ में है लेकिन इतना तय है कि आप के भीतर जो कुछ भी चल रहा है, वह आने वाले समय में न केवल पार्टी की दिशा तय करेगा बल्कि भारतीय राजनीति की तस्वीर को भी प्रभावित करेगा।

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