Uttarakhand

सवालों के घेरे में मिशन गंगा

सीएजी की रिपोर्ट ने उत्तराखण्ड में गंगा सफाई योजनाओं की हकीकत को बेनकाब कर दिया है। करोड़ों रुपए खर्च कर बनाए गए श्मशान घाट और घाट परियोजनाएं उपयोग के अभाव में बेकार पड़ी हैं जबकि गंगा और उसकी सहायक नदियों में प्रदूषण पहले की तरह जारी है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की विफलता, योजनाओं में स्थानीय जरूरतों की अनदेखी और निगरानी तंत्र की निष्क्रियता ने पूरे मिशन को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है

‘‘राप्ती नदी भी खुश हो रही होगी। सोचिए जब आप यहां जलाए जाओगे तो सीधा स्वर्ग की प्राप्ति होगी। यह श्मशान घाट फुली इलेक्ट्रिक है। फुकाई में टाइम न लगे, डायरेक्ट पहुंच जाओगे स्वर्ग में, हर हर महादेव।’’ गोरखपुर से भाजपा सांसद और फिल्म अभिनेता रवि किशन द्वारा राप्ती नदी में बने विद्युत शवदाह गृह के लोकार्पण पर दिया गया यह बयान उस सोच को दर्शाता है जिसके तहत नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए आधुनिक शवदाह सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। उद्देश्य स्पष्ट था, नदियों में पारम्परिक दाह संस्कार से होने वाले प्रदूषण को रोकना लेकिन उत्तराखण्ड में यही सोच जमीनी स्तर पर पूरी तरह विफल साबित हुई। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत बनाए गए श्मशान घाटों का न तो सही उपयोग हो सका और न ही गंगा में प्रदूषण को कम किया जा सका। नतीजा यह हुआ कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद पारम्परिक तरीके से नदी तट पर ही शवदाह की प्रक्रिया जारी रही।

वर्ष 2018 से 2019 के बीच नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और उत्तरकाशी जिलों में कुल 11 श्मशान घाटों का निर्माण किया गया। चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे चमोली और नंदप्रयाग में एक-एक जबकि कर्णप्रयाग, पोखरी पुल और उमरकोट में भी एक-एक श्मशान घाट बनाए गए। रुद्रप्रयाग जिले के धौली तीर और गोचर में एक-एक घाट का निर्माण हुआ, वहीं टिहरी जिले के कोटेश्वर में एक श्मशान घाट तैयार किया गया। उत्तरकाशी में भागीरथी नदी के तट पर केदारघाट, हीना और डुंडा में एक-एक श्मशान घाट बनाए गए।

इन 11 में से केवल उत्तरकाशी के केदार श्मशान घाट का सीमित उपयोग हो पाया जबकि बाकी 10 पूरी तरह अनुपयोगी साबित हुए। स्थानीय लोग अब भी परम्परागत तरीके से नदी किनारे ही शवदाह करते रहे जिससे गंगा में प्रदूषण की स्थिति जस की तस बनी रही।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत उत्तराखण्ड को 328 करोड़ 59 लाख रुपए की स्वीकृति दी गई थी। राज्य स्वच्छ गंगा मिशन ने इस राशि से गंगा, अलकनंदा और भागीरथी के तटों पर 31 घाट और 28 श्मशान घाटों का निर्माण कराया लेकिन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की जांच में 88 करोड़ 62 लाख रुपए की लागत से बने 11 घाटों और 15 श्मशान घाटों में गम्भीर खामियां सामने आईं।

रिपोर्ट के अनुसार इन परियोजनाओं की योजना बनाते समय स्थानीय जरूरतों का आकलन ही नहीं किया गया। कई स्थानों पर ऐसे घाट बनाए गए जहां उनकी आवश्यकता नहीं थी जबकि कुछ स्थानों पर एक ही शहर में एक से अधिक श्मशान घाट बना दिए गए। निर्माण के बाद इनका रखरखाव भी नहीं किया गया जिससे ये धीरे-धीरे जर्जर होते गए और उपयोग से बाहर हो गए।

सीएजी ने स्पष्ट कहा है कि कई मामलों में परियोजनाएं ‘आवश्यकता आधारित’ नहीं थीं बल्कि बजट खर्च करने के उद्देश्य से बनाई गई प्रतीत होती हैं। स्थानीय स्तर पर न तो इनकी मांग थी और न ही लोगों को इनके उपयोग के लिए प्रेरित किया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि योजना निर्माण और क्रियान्वयन के बीच गम्भीर असंतुलन रहा।

राज्य सरकार द्वारा सीएजी की आपत्तियों को स्वीकार किया जाना इस बात का प्रमाण है कि गंगा सफाई को लेकर सरकारी तंत्र में गम्भीर कमियां रही हैं। यह भी स्पष्ट होता है कि योजनाएं कागजों में सफल दिखाने के लिए बनाई गईं लेकिन उनका वास्तविक प्रभाव नगण्य रहा।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक है। उत्तराखण्ड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सात वर्षों में भी साॅलिड वेस्ट मैनेजमेंट नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित नहीं कर पाया। सीएजी की टीम ने जोशीमठ, गोपेश्वर, चमोली, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग, रुद्रप्रयाग, गौचर, श्रीनगर, देवप्रयाग, टिहरी और उत्तरकाशी जैसे प्रमुख नगरों का निरीक्षण किया, जहां कूड़े के निस्तारण की स्थिति बेहद खराब पाई गई।

कई स्थानों पर ठोस अपशिष्ट को सीधे नदी की ढलानों पर फेंका जा रहा था। इसके अलावा खुले में कचरा जलाने की प्रवृत्ति भी देखी गई, जिसकी राख और कण वर्षा के दौरान बहकर नदियों में मिल जाते हैं। इससे गंगा और उसकी सहायक नदियों में प्रदूषण और अधिक बढ़ता है। केवल देवप्रयाग और कीर्तिनगर ऐसे क्षेत्र पाए गए जहां डम्पिंग ग्राउंड अपेक्षाकृत सुरक्षित दूरी पर स्थित है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि राज्य और जिला स्तर की गंगा समितियां अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में विफल रहीं। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की बदहाल स्थिति को सुधारने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।
सबसे गम्भीर बात यह है कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आवश्यक विनियामक अधिकार तक प्राप्त नहीं हुए। वर्ष 2018 से 2023 के बीच 78 प्राधिकार आवेदन प्राप्त हुए लेकिन एक भी स्वीकृत नहीं किया गया। इसका अर्थ है कि प्रदूषण नियंत्रण की पूरी व्यवस्था कागजी साबित हुई और वास्तविक कार्रवाई का अभाव रहा।
गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के दावों के बीच जमीनी हकीकत यह है कि अरबों रुपए खर्च होने के बावजूद न तो नदी का प्रदूषण कम हुआ और न ही उसकी सहायक नदियों की स्थिति में कोई सुधार आया। ऋषिकेश के मायाकुंड स्थित घाट पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद टाइलों का उखड़ना निर्माण गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है।

कर्णप्रयाग, गौचर और श्रीनगर जैसे क्षेत्रों में नदी तट के पास ही कूड़ा डम्पिंग जारी है जो सीधे तौर पर नदी को प्रदूषित कर रहा है। यह स्थिति दर्शाती है कि योजनाओं के क्रियान्वयन में समन्वय, निगरानी और जवाबदेही का गम्भीर अभाव है।

समग्र रूप से देखें तो राज्य स्वच्छ गंगा मिशन का उद्देश्य गंगा को स्वच्छ बनाना था लेकिन वर्तमान हालात यह दर्शाते हैं कि मिशन अपने लक्ष्य से भटक गया है। आज भी गंगा में शवों का अर्पण जारी है और कूड़ा भी उसी में समाहित हो रहा है जो न केवल पर्यावरण बल्कि आस्था के प्रतीक इस पवित्र नदी के अस्तित्व के लिए भी गम्भीर चुनौती है।

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