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जनकल्याण की आड़ में ‘घूस’ की राजनीति

चुनावी मौसम में सरकारें और राजनीतिक दल जनकल्याणकारी योजनाओं के नाम पर हजारों करोड़ रुपए की घोषणाएं कर रहे हैं, कहीं नकद सहायता, कहीं मुफ्त सुविधाएं और अब ‘कूपन माॅडल’ के जरिए उपभोक्ता वस्तुएं खरीदने की छूट। महिलाओं, युवाओं, किसानों और गरीब वर्ग को सीधे लाभ पहुंचाने की इस होड़ ने लोकतांत्रिक नैतिकता पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह वास्तविक सामाजिक सुरक्षा है या फिर मतदाताओं को प्रभावित करने की एक वैध लेकिन सुनियोजित ‘घूस’?

देश में चुनावी माहौल गहराते ही जनकल्याणकारी योजनाओं की बाढ़ आ गई है। पहले जहां विभिन्न राज्यों में हजारों करोड़ रुपए की योजनाओं की घोषणा ने राजनीतिक बहस को जन्म दिया था, वहीं अब कुछ दलों ने इसे और एक कदम आगे बढ़ाते हुए ‘कूपन माॅडल’ और सीधे उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद की छूट जैसी योजनाएं भी पेश कर दी हैं। इससे यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या ये योजनाएं वास्तव में कल्याणकारी हैं या मतदाताओं को लुभाने का एक परिस्कृत माध्यम।

हाल ही में एक प्रमुख क्षेत्रीय दल ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में महिलाओं के लिए 8,000 तक का कूपन देने का वादा किया है जिससे वे अपनी पसंद का घरेलू सामान, जैसे फ्रिज, वाशिंग मशीन, टीवी या अन्य उपकरण, खरीद सकें। इस मॉडल को ‘स्वतंत्रता’ और ‘सम्मानजनक सहायता’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि लाभार्थी अपनी जरूरत के अनुसार वस्तु चुन सकें न कि सरकार द्वारा तय की गई वस्तु ही लें।

इसके साथ ही अन्य वादों में महिलाओं को मासिक नकद सहायता, वरिष्ठ नागरिकों के लिए पेंशन बढ़ाने, छात्रों को आर्थिक सहयोग और युवाओं के लिए रोजगार व प्रशिक्षण योजनाएं शामिल हैं। कुछ राज्यों में तो हर परिवार को मुफ्त या सब्सिडी पर उपकरण देने, बिजली-पानी की छूट और प्रत्यक्ष नकद अंतरण जैसी घोषणाएं भी की गई हैं।

दिलचस्प बात यह है कि पहले जहां मुफ्त वस्तुएं सीधे बांटने का चलन था, अब उसकी जगह ‘कूपन’ या ‘डायरेक्ट बेनिफिट’ जैसे अधिक लचीले विकल्प सामने आ रहे हैं। राजनीतिक दल इसे आधुनिक और पारदर्शी व्यवस्था बताते हैं लेकिन आलोचकों के अनुसार इसका मूल उद्देश्य मतदाता को तत्काल लाभ देकर उसका समर्थन हासिल करना है।

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की योजनाएं राज्य के खजाने पर भारी बोझ डाल सकती हैं। कई राज्यों में इन योजनाओं का खर्च पहले ही राजस्व के बड़े हिस्से को प्रभावित कर रहा है। यदि चुनावी प्रतिस्पर्धा में यह प्रवृत्ति और बढ़ती है तो राज्यों की वित्तीय स्थिति पर गम्भीर असर पड़ सकता है जिससे बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक विकास परियोजनाएं प्रभावित होंगी।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के स्वरूप को भी बदल रही है। चुनाव अब नीतियों, विचारधाराओं और दीर्घकालिक विकास के बजाय तात्कालिक लाभ और व्यक्तिगत आर्थिक सहायता पर केंद्रित होते जा रहे हैं। इसे एक तरह की ‘संस्थागत घूस’ के रूप में देखा जा रहा है जहां लाभ वैध है लेकिन उसका उद्देश्य चुनावी लाभ हासिल करना है। हालांकि जमीनी स्तर पर तस्वीर कुछ अलग भी है। गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के लिए ये योजनाएं वास्तविक राहत लेकर आती हैं। महंगाई और बेरोजगारी के बीच उन्हें यह आर्थिक सहयोग जरूरी लगता है। महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं उन्हें आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र और सशक्त बनाने का माध्यम भी बन रही हैं। यही द्वंद्व इस पूरे मुद्दे का केंद्र है, एक ओर ये योजनाएं सामाजिक सुरक्षा का साधन हैं तो दूसरी तरफ चुनावी राजनीति का शक्तिशाली हथियार भी। सवाल यह नहीं है कि योजनाएं दी जानी चाहिए या नहीं बल्कि यह है कि क्या उनका समय, स्वरूप और उद्देश्य लोकतांत्रिक मर्यादाओं के अनुरूप है। कुल मिलाकर देश की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां ‘जनकल्याण’ और ‘मतदाता प्रलोभन’ के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। आने वाले चुनाव यह तय करेंगे कि मतदाता इन योजनाओं को राहत के रूप में देखते हैं या फिर एक सुनियोजित राजनीतिक ‘घूस’ के रूप में।

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