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ट्रम्प के अहंकार चलते वैश्विक संकट

ईरान के गैस भंडार पर हमले से शुरू हुआ संघर्ष कतर तक फैल चुका है, शीर्ष नेतृत्व की मौत, हजारों हताहत और गैस संकट ने दुनिया को आर्थिक अस्थिरता की कगार पर ला खड़ा किया है। यह युद्ध केवल मध्य-पूर्व का संकट नहीं रह गया है बल्कि वैश्विक व्यवस्था के लिए एक गम्भीर चुनौती बन चुका है। ट्रम्प की नीतियों ने एक सीमित सैन्य कार्रवाई को एक व्यापक वैश्विक संकट में बदल दिया है जहां इसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ रही है

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की आक्रामक और एकतरफा विदेश नीति ने दुनिया को एक बड़े आर्थिक संकट की ओर धकेल दिया है और अब अमेरिका इस युद्ध में अलग-थलग पड़ता जा रहा है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किया गया सैन्य अभियान अब चैथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और इसका दायरा लगातार फैलता जा रहा है। यह संघर्ष अब केवल सीमित सैन्य कार्रवाई नहीं रहा बल्कि एक ऐसा बहुआयामी संकट बन चुका है जो मध्य-पूर्व की भौगोलिक सीमाओं को पार कर वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर रहा है।

इस पूरे युद्ध का निर्णायक मोड़ तब आया जब इजरायल ने ईरान के दक्षिण पार्स गैस भंडार जो दुनिया का सबसे बड़ा गैस क्षेत्र माना जाता है और कतर के साथ साझा किया जाता है, पर हमला किया। यह हमला केवल एक सैन्य लक्ष्य पर प्रहार नहीं था बल्कि वैश्विक ऊर्जा प्रणाली की धुरी पर सीधा आघात था। दक्षिण पार्स न केवल ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है बल्कि वैश्विक गैस बाजार का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी है। इस पर हमला होते ही अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता फैल गई और गैस की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला जो अब भी ऊंचे स्तर पर बना हुआ है और बाजार में अनिश्चितता कायम है।
इजरायल के इस कदम के तुरंत बाद ईरान ने प्रतिक्रिया दी और कतर सहित खाड़ी क्षेत्र के कुछ ऊर्जा और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया। यह प्रतिक्रिया केवल सैन्य जवाब नहीं थी बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी था कि यदि उसकी ऊर्जा संरचना को निशाना बनाया जाएगा तो वह क्षेत्रीय ऊर्जा व्यवस्था को अस्थिर करने की क्षमता रखता है। यहीं से यह संघर्ष सीमित दायरे से बाहर निकलकर एक व्यापक क्षेत्रीय संकट में बदल गया।
खाड़ी देशों के लिए यह स्थिति अत्यंत जटिल हो गई है। सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश इस युद्ध का हिस्सा नहीं बनना चाहते लेकिन ऊर्जा ठिकानों पर हमलों ने उन्हें सीधे प्रभावित किया है। उनकी अर्थव्यवस्था और सुरक्षा दोनों इस संघर्ष से जुड़ गई हैं। यही कारण है कि उन्होंने अब तक संयम बरता है और सीधे युद्ध में शामिल होने से बचते हुए केवल रक्षात्मक कदम उठाए हैं साथ ही अपनी ऊर्जा सुरक्षा और सैन्य सतर्कता को भी बढ़ाया है।
इस तनावपूर्ण स्थिति के बीच ईरान ने एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल की। तेहरान ने खाड़ी देशों के साथ मिलकर एक संयुक्त जांच तंत्र (जाॅइंट मेकैनिज्म) बनाने का प्रस्ताव रखा जिसका उद्देश्य क्षेत्र में हुए हमलों की निष्पक्ष जांच करना और जिम्मेदारी तय करना था। ईरान ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका युद्ध अमेरिका और इजरायल के साथ है न कि खाड़ी देशों के साथ। इस प्रस्ताव पर खाड़ी देशों में सतर्कता के साथ चर्चा शुरू हुई है, हालांकि अभी तक कोई ठोस सहमति नहीं बनी है।
इस युद्ध की सबसे बड़ी और गम्भीर विशेषता इसका मानवीय नुकसान है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अब तक इस संघर्ष में दो हजार से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। ईरान में सबसे अधिक हताहत हुए हैं जहां लगातार हवाई हमलों और मिसाइल हमलों ने व्यापक तबाही मचाई है। लेबनान के मोर्चे पर भी सैकड़ों लोग मारे गए हैं जबकि इजरायल में भी नागरिकों को निशाना बनाया गया है। हजारों लोग घायल हैं और लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। रिहायशी इमारतें, अस्पताल, स्कूल और अन्य नागरिक ढांचे इस युद्ध की चपेट में आ चुके हैं।
इस युद्ध का एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और चैंकाने वाला पहलू ईरान की शीर्ष नेतृत्व पर पड़ा प्रभाव है। रिपोर्टों के अनुसार, इस संघर्ष में ईरान के कई उच्च स्तर के सैन्य और राजनीतिक नेता मारे गए हैं जिसके बाद देश के भीतर नेतृत्व स्तर पर पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। नए कमांड और नियंत्रण ढांचे को स्थापित करने की
कोशिशें जारी हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि ईरान इस संघर्ष को लम्बा खींचने के लिए खुद को तैयार कर रहा है।
आर्थिक मोर्चे पर इस युद्ध का प्रभाव और भी व्यापक है। दक्षिण पार्स गैस फील्ड पर हमले और कतर के ऊर्जा ढांचे पर खतरे ने वैश्विक गैस आपूर्ति को गम्भीर रूप से प्रभावित किया है। इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों में तेज उछाल आया है और शुरुआती उथल-पुथल के बाद भी कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। कई देशों ने अपने रणनीतिक भंडार का उपयोग शुरू किया है और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश तेज कर दी है।
इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ा है। घरेलू गैस की कीमतों में वृद्धि ने रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। भारत जैसे देशों में भी इसका प्रभाव महसूस किया जा रहा है जहां एलपीजी की कीमतों को लेकर दबाव बढ़ रहा है। ऊर्जा महंगी होने से परिवहन लागत बढ़ रही है, उद्योगों पर दबाव बढ़ रहा है और खाद्य उत्पादन की लागत भी बढ़ रही है। विश्व व्यापार संगठन ने चेतावनी दी है कि यह युद्ध वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।
इस संघर्ष में किसी स्पष्ट विजेता की सम्भावना नहीं दिखती। हर हमले के जवाब में प्रतिघात हो रहा है जिससे यह युद्ध एक अंतहीन चक्र में फंस गया है। अमेरिका और इजरायल इसे अपनी रणनीतिक सफलता के रूप में पेश कर रहे हैं जबकि ईरान इसे अपने प्रतिरोध और अस्तित्व की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
अमेरिका की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में लगातार सवालों के घेरे में है। वाशिंगटन के पास इस युद्ध का स्पष्ट ‘एंडगेम’ क्या है, यह उसके सहयोगी देशों को भी स्पष्ट नहीं है। खाड़ी देश दूरी बनाए हुए हैं, यूरोपीय देश सतर्क हैं और एशियाई देश ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अमेरिका को पहले जैसा
वैश्विक समर्थन नहीं मिल रहा और वह धीरे-धीरे इस संघर्ष में अलग-थलग पड़ता जा रहा है। दूसरी ओर, चीन इस पूरे संकट में अधिक सक्रिय होता दिखाई दे रहा है। उसने पर्दे के पीछे कूटनीतिक संपर्क बढ़ाए हैं और खाड़ी देशों के साथ संवाद तेज किया है जिससे यह संकेत मिल रहा है कि वह सम्भावित मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। पहले भी वह क्षेत्रीय समझौतों में भूमिका निभा चुका है जिससे उसकी सक्रियता को गम्भीरता से देखा जा रहा है। अंततः यह स्पष्ट होता जा रहा है कि यह युद्ध केवल मध्य-पूर्व का संकट नहीं रह गया है बल्कि यह वैश्विक व्यवस्था के लिए एक गम्भीर चुनौती बन चुका है। ट्रम्प की नीतियों ने एक सीमित सैन्य कार्रवाई को एक व्यापक वैश्विक संकट में बदल दिया है जहां इसकी कीमत हर देश और हर नागरिक चुका रहा है।
अब सवाल यह नहीं रह गया है कि कौन जीतेगा बल्कि यह है कि यह युद्ध कब और किस शर्त पर खत्म होगा और तब तक दुनिया को कितनी बड़ी मानवीय और आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी।

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