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अशोक खरात कांड सत्ता, अंधविश्वास और शोषण का गठजोड़

नासिक के स्वयंभू बाबा अशोक खरात पर लगे गम्भीर आरोपों ने महाराष्ट्र की राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया है। नेताओं से कथित करीबी, महिलाओं के शोषण के आरोप, दर्जनों आपत्तिजनक वीडियो और राज्य की महिला आयोग की उपाध्यक्ष का इस ढोंगी बाबा के पैर धोने का वीडियो सामने आने के बाद उनका इस्तीफा इस पूरे प्रकरण को धर्म और राजनीति के नापाक गठजोड़ की ओर ले जा रहा है

महाराष्ट्र में अशोक खरात प्रकरण अब केवल एक आपराधिक मामला नहीं रह गया है बल्कि यह राज्य की राजनीति, प्रशासनिक तंत्र और समाज में गहराई तक जड़ें जमा चुके अंधविश्वास के नेटवर्क को उजागर करने वाला बड़ा घटनाक्रम बन चुका है। नासिक के इस स्वयंभू बाबा ने वर्षों तक ज्योतिष, आध्यात्मिक मार्गदर्शन और तांत्रिक प्रभाव के नाम पर अपनी एक ऐसी छवि गढ़ी, जिसने उसे आम श्रद्धालुओं से कहीं अधिक प्रभावशाली वर्ग के करीब पहुंचा दिया। यही कारण है कि जब उसके खिलाफ महिलाओं के यौन शोषण, ब्लैकमेलिंग और आपत्तिजनक गतिविधियों के आरोप सामने आए, तो यह मामला सीधे सत्ता के गलियारों तक गूंजने लगा।

अशोक खरात की पहचान किसी पारम्परिक संत या धार्मिक गुरु की तरह नहीं थी। वह आधुनिक दौर का एक ‘वीआईपी बाबा’ है जिसकी पहुंच सीधे नेताओं, अफसरों और उद्योगपतियों तक बताई जाती है। मर्चेंट नेवी की पृष्ठभूमि से आने वाला यह व्यक्ति धीरे-धीरे ज्योतिष और अंक शास्त्र के जरिए प्रभावशाली लोगों के बीच अपनी जगह बनाने लगा। उसने केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक खुद को सीमित नहीं रखा बल्कि लोगों के निजी और राजनीतिक फैसलों पर सलाह देने का भी दावा किया। इस तरह उसने आस्था को प्रभाव और प्रभाव को शक्ति में बदलने का एक संगठित माॅडल खड़ा कर लिया।

जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे प्रकरण में सबसे गम्भीर पहलू महिलाओं के साथ कथित यौन शोषण और ब्लैकमेलिंग का है। आरोप है कि खरात अपनी आध्यात्मिक शक्ति का डर दिखाकर महिलाओं को अपने प्रभाव में लेता था उन्हें नशा देता था और फिर उनके आपत्तिजनक वीडियो बनाकर उन्हें धमकाता था। पुलिस के हाथ कई ऐसे वीडियो लगने की बात सामने आई है जिससे यह संकेत मिलता है कि यह कोई एक या दो घटनाओं तक सीमित नहीं बल्कि एक व्यवस्थित तरीके से संचालित शोषण का नेटवर्क हो सकता है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे नए पीड़ितों के सामने आने की सम्भावना भी बढ़ रही है जो इस मामले को और गम्भीर बना रही हैं।

इस पूरे विवाद ने राजनीतिक रूप तब लिया जब अशोक खरात के कई बड़े नेताओं से कथित सम्बंधों की चर्चा सामने आई। विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों और निजी मुलाकातों की तस्वीरें सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगा कि आखिर एक आरोपी बाबा को इतनी राजनीतिक पहुंच कैसे मिली। विशेष रूप से यह चर्चा तेज हुई कि राज्य के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे भी कभी उसके यहां गए थे या उसके सम्पर्क में रहे हैं। हालांकि इस पर सत्तारूढ़ पक्ष की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि किसी धार्मिक व्यक्ति से मुलाकात को आपराधिक सम्बंध के रूप में नहीं देखा जा सकता लेकिन विपक्ष ने इसे एक बड़ा मुद्दा बना लिया है।

विपक्ष का आरोप है कि ऐसे बाबाओं को राजनीतिक संरक्षण मिलता है जिसके कारण लम्बे समय तक बिना किसी डर के अपना प्रभाव बढ़ाते रहते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि यदि समय रहते कार्रवाई की जाती तो इतने बड़े स्तर पर शोषण की घटनाएं सामने नहीं आतीं। दूसरी ओर सरकार यह दावा कर रही है कि कानून अपना काम कर रहा है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा लेकिन इन दावों और आरोपों के बीच जो सबसे बड़ा सवाल उभरकर सामने आया है, वह यह है कि आखिर इतने गम्भीर आरोपों के बावजूद पूरा तंत्र इतने समय तक सक्रिय कैसे रहा।

इस मामले का सबसे ताजा और महत्वपूर्ण घटनाक्रम महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष का इस्तीफा है। यह इस्तीफा लगातार बढ़ते राजनीतिक दबाव, मीडिया में उठ रहे सवालों और सार्वजनिक आक्रोश के चलते लिया गया निर्णय माना जा रहा है। आरोप हैं कि आयोग ने पीड़ित महिलाओं की शिकायतों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की और संस्थागत स्तर पर लापरवाही बरती गई। जैसे ही यह मुद्दा राजनीतिक रूप से गरमाया, आयोग की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई जिसके बाद उपाध्यक्ष का पद छोड़ना लगभग अनिवार्य हो गया। पद त्यागने के पीछे एक बड़ा कारण रूपाली का एक वीडियो भी है जिसमें वे इस ढोंगी बाबा के पैर धोती नजर आ रही हैं।

यह इस्तीफा इस पूरे मामले को एक नए मोड़ पर ले जाता है जहां अब केवल आरोपी ही नहीं बल्कि संस्थागत जिम्मेदारी भी तय की जा रही है। सवाल उठने लगा है कि जब महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए संस्थान ही समय पर कार्रवाई नहीं कर पाते तो आम नागरिकों को न्याय कैसे मिलेगा। यह घटना प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर भी गम्भीर प्रश्नचिह्न लगाती है।

जांच में यह भी सामने आया है कि अशोक खरात ने धार्मिक गतिविधियों की आड़ में एक बड़ा आर्थिक ढांचा तैयार कर लिया था। ट्रस्ट, जमीन और अन्य सम्पत्तियों के माध्यम से उसने अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया और इसी आधार पर अपने प्रभाव को और बढ़ाया। आरोप हैं कि उसने कई एकड़ जमीन पर कब्जा किया और धार्मिक कार्यों के नाम पर संसाधनों का दुरुपयोग किया। यह पहलू इस मामले को और जटिल बनाता है क्योंकि अब यह केवल अपराध या राजनीति का मामला नहीं बल्कि आर्थिक अनियमितताओं और सत्ता के दुरुपयोग से भी जुड़ गया है।

यदि इस पूरे प्रकरण को व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह भारत में पहले सामने आए कई चर्चित मामलों की याद दिलाता है। आसाराम बापू और बाबा राम रहीम जैसे मामलों में भी यही देखा गया कि कैसे एक व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक छवि के माध्यम से लोगों का विश्वास जीतता है और फिर उसी विश्वास का दुरुपयोग करता है। इन मामलों में भी लम्बे समय तक कार्रवाई नहीं हो पाई जिसका एक प्रमुख कारण उनका व्यापक प्रभाव और राजनीतिक सम्पर्क था। अंततः जब सच्चाई सामने आई तो उसने न केवल समाज को झकझोर दिया बल्कि प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र की कमजोरियों को भी उजागर कर दिया।

अशोक खरात का मामला भी उसी पैटर्न को दोहराता हुआ दिखाई देता है। यहां भी एक व्यक्ति ने आस्था को साधन बनाकर प्रभाव हासिल किया, उस प्रभाव का उपयोग कर अपने लिए सुरक्षा कवच तैयार किया और फिर उसी के सहारे लम्बे समय तक अपने कार्यों को अंजाम देता रहा लेकिन जब यह तंत्र टूटता है तो उसके प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते बल्कि पूरे सिस्टम को प्रभावित करते हैं।

यह भी महत्वपूर्ण है कि ऐसे मामलों में पीड़ितों का सामने आना आसान नहीं होता। सामाजिक दबाव, बदनामी का डर और आरोपी के प्रभाव के कारण वे लम्बे समय तक चुप रहते हैं लेकिन जब एक मामला उजागर होता है तो धीरे-धीरे अन्य पीड़ित भी सामने आने लगते हैं। अशोक खरात प्रकरण में भी यही स्थिति बनती दिखाई दे रही है जहां जांच के साथ-साथ और अधिक खुलासों की सम्भावना जताई जा रही है।

राजनीतिक दृष्टि से यह मामला आने वाले समय में और भी बड़ा रूप ले सकता है। यदि जांच में और बड़े नाम सामने आते हैं तो इसका सीधा असर राज्य की राजनीति पर पड़ेगा। विपक्ष इसे एक बड़े मुद्दे के रूप में इस्तेमाल कर सकता है जबकि सरकार के लिए यह अपनी छवि बचाने की चुनौती बन सकता है। इसके अलावा यह मामला महिला सुरक्षा, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को भी केंद्र में ला सकता है। अंततः अशोक खरात कांड केवल एक ढोंगी बाबा की कहानी नहीं है बल्कि यह उस जटिल और खतरनाक तंत्र का उदाहरण है जिसमें आस्था, सत्ता और आर्थिक हित एक-दूसरे से जुड़कर एक ऐसा ढांचा बना लेते हैं जो लम्बे समय तक बिना किसी चुनौती के चलता रहता है। महिला आयोग की उपाध्यक्ष का इस्तीफा इस बात का संकेत है कि अब इस तंत्र पर सवाल उठने लगे हैं और जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह मामला केवल राजनीतिक बहस तक सीमित रहता है या वास्तव में इसके आधार पर कोई ठोस सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि अशोक खरात प्रकरण ने महाराष्ट्र की राजनीति और समाज दोनों को एक ऐसा आईना दिखाया है जिसमें छिपी सच्चाइयों को नजरअंदाज करना अब सम्भव नहीं है।

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