उत्तराखण्ड में विधायकी और नौकरशाही का विवाद नई बात नहीं है। आए दिन विधायक नौकरशाहों पर कार्य न करने के आरोप लगाते रहते हैं। विपक्ष के विधायक नौकरशाहों पर विशेषाधिकार हनन से सम्बंधित सवाल उठाते रहते हैं। गैरसैंण में बजट सत्र के दौरान धारचूला के विधायक हरीश धामी ने विधानसभा में अनशन की धमकी दे डाली। उसके पीछे भी मुद्दा विशेषाधिकार हनन से जुड़ा हुआ है। यह मुद्दा एक नेपाली महिला से जुड़ा हुआ है जिस पर फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के सहारे धारचूला का ब्लाॅक प्रमुख बनने के आरोप लगे हैं। आश्चर्यजनक यह है कि जिन जाति प्रमाण पत्रों की जिलाधिकारी द्वारा दो माह में जांच का प्रावधान है वह जांच आज सात माह बाद भी पूरी नहीं हो सकी है। इसी से आहत होकर विधायक धामी विधानसभा में अनशन करने पर मजबूर हुए
‘धारचूला विधानसभा में दो बॉर्डर लगते हैं चीन और नेपाल। यहां के रंग (या रं) समुदाय के लोग इन बाॅर्डरों पर निःशुल्क प्रहरी का काम करते हैं जिसके लिए हम सबको इस समुदाय पर हमेशा गर्व महसूस होता है। अब आप लोग ही बताएं अगर जनजाति से कोई जनजाति महिला मेरे पास मदद के लिए आती है सबूतों के साथ तो धारचूला विधानसभा का विधायक होने के नाते उनका साथ देना मेरा पहला कर्तव्य बनता है या नहीं। अगर सच के साथ खड़े होना गुनाह है तो ये गुनाह में बार-बार करने को तैयार हूं फिर चाहे सामने कोई भी खड़ा हो।
भीड़ देखकर कौरवों के साथ खड़े होना बहुत आसान है
सच का साथ देने के लिए श्री कृष्ण जैसा जिगर चाहिए।’
गैरसैंण विधानसभा सत्र में धारचूला के विधायक हरीश धामी ने गैरसैंण सत्र के दौरान विधानसभा में उक्त बातें करते हुए अनुसूचित जनजाति के आधार पर ब्लॉक प्रमुख बनी मंजुला बुदियाल का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने इस मुद्दे को न केवल विधानसभा में उठाया बल्कि अनशन पर भी बैठे। हालांकि बाद में सरकार ने उनकी मांग को मान लिया और जल्द ही जांच कराने का आश्वासन दिया।
ऐसा नहीं है कि विधायक हरीश धामी ने यह मुद्दा पहली बार उठाया है बल्कि इससे पहले भी वह कई बार अपनी आवाज उठा चुके हैं। आठ माह पहले जब उत्तराखण्ड में पंचायत चुनाव हुए तो तब धारचूला ब्लॉक प्रमुख की सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हुई थी। तब भाजपा की प्रत्याशी मंजूला बुदियाल यहां से चुनाव जीत गई। इसके बाद एक महिला विधायक हरीश धामी के पास पहुंची और उसने तमाम साक्ष्य देते हुए बताया कि ब्लॉक प्रमुख बनी मंजुला बुदियाल की जाति फर्जी है। उस महिला ने इस मामले पर विधायक हरीश धामी को कहा कि वह इसकी जांच कराएं। इसके बाद विधायक धामी द्वारा मामला जिला अधिकारी के समक्ष ले जाया गया। इतना ही नहीं बल्कि यह मुद्दा न्यायालय तक पहुंचा।
धारचूला विधायक ने आरोप लगाए कि धारचूला ब्लॉक प्रमुख बनी मंजुला बुदियाल अनुसूचित जनजाति की नहीं है बल्कि वह सामान्य जाति की है जो राजपूत वर्ग में आती हैं। वह नेपाल की निवासी हैं। उनके पिता गजेंद्र सिंह बोहरा और माता सरस्वती बोहरा के नाम नेपाल के भूमि अभिलेखों में दर्ज हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मंजुला बुदियाल फर्जी दस्तावेज जमा करके क्षेत्र पंचायत की सदस्य बनीं।
धामी का कहना है कि ‘सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार ऐसी शिकायतों का निपटारा जिला अधिकारी स्तर पर दो महीने के भीतर किया जाना चाहिए। इस सम्बंध में उन्होंने 29 अगस्त को पिथौरागढ़ के जिला अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराई थी लेकिन आज तक इस पर कोई सुनवाई नहीं हुई है। मैं जांच और दोषियों को सजा की मांग करता रहा हूं लेकिन मेरी आवाज अनसुनी कर दी गई।’
उन्होंने आरोप लगाया कि जो जांच प्रशासन द्वारा दो माह में कर देनी चाहिए थी वह आज आठ माह बाद तक नहीं हो पाई है। इस मामले को अधिकारी सुनने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि ब्लॉक प्रमुख सत्तासीन पार्टी
भाजपा की है। मजबूरन मुझे इस मामले को विशेषाधिकार हनन के तहत विधानसभा में अध्यक्ष के समक्ष उठाना पड़ा है। जहां धामी ने कहा कि जब तक इस मामले की सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक वे आमरण अनशन पर रहेंगे। धारचूला विधायक हरीश धामी ने सदन में कहा कि ‘मैं मधुमेह का रोगी हूं। अगर मुझे कुछ हो जाता है तो इसकी जिम्मेदारी अध्यक्ष की होगी।’ उन्होंने यह भी दावा किया कि अगर उनके आरोप गलत साबित होते हैं तो वे परिणाम भुगतने के लिए तैयार हैं। यही नहीं बल्कि उन्होंने सदन में यह तक कह डाला कि अगर मैं गलत साबित होता हूं तो मेरी विधायक सदस्यता रद्द कर दी जानी चाहिए। हालांकि इस मामले को विधानसभा में उठाने के बाद धारचूला में विधायक हरीश धामी के खिलाफ स्थानीय लोगों ने धरना-प्रदर्शन किया जिसमें उन्होंने कहा कि वे एक जाति विशेष की महिला को आरोपित कर रहे हैं। इसके साथ ही धारचूला के लोगों ने विधायक पर अनुसूचित जनजाति की महिला को जाति के नाम पर प्रताड़ित करने के भी आरोप लगाए।
पिथौरागढ़ के अधिवक्ता महेंद्र सिंह के अनुसार सबसे पहली बात यह है कि भारत में एक राज्य का मूल निवासी किसी दूसरे राज्य की आरक्षित सीट पर चुनाव नहीं लड़ सकता है जबकि दूसरे देश का तो भूल ही जाओ। धारचूला वाले मामले में बात किसी की नागरिकता या रोटी-बेटी की नहीं हो रही है, वहां अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट की बात हो रही है। अगर यहां पर सामान्य सीट का मामला होता तो शायद इतना विवाद नहीं होता क्योंकि सामान्य सीटों पर ये नियम लागू नहीं होता। कुछ समय पहले बिहार विधानसभा चुनाव में भी एक ऐसा ही मामला आया था जिसमें एक महिला का नामांकन यह कहकर रद्द कर दिया कि वह उत्तर प्रदेश की मूल निवासी है और किसी दूसरे राज्य का मूल निवासी आरक्षित सीट पर चुनाव नहीं लड़ सकता। यहां भी मामला आरक्षित सीट का ही है। एक व्यक्ति जिस प्रदेश में जन्मा हो, जहां का उसका मूल निवास हो, उसकी वहीं की जाति मान्य होती है। यहां तक की शादी करना भी किसी स्त्री या पुरुष की जाति का ‘स्टेट्स’ नहीं बदल सकता। जाति का निर्धारण माता-पिता से होता है। इस पर विधायक मुन्ना सिंह चौहान भी बहुत पहले कह चुके हैं- ‘जो उत्तर प्रदेश का ओबीसी है, वो उत्तर प्रदेश का ही ओबीसी है वह उत्तराखण्ड का ओबीसी नहीं हो सकता है।’
बिहार में श्वेता सुमन का हो चुका है नामांकन रद्द
गत वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव में मोहनिया सीट से नामांकन करने वाली श्वेता सुमन का चुनाव आयोग ने पर्चा सिर्फ इस वजह से निरस्त कर दिया कि वह दूसरे प्रदेश की है तथा वहां इनकी जाति भी अनुसूचित जाति में दर्ज नहीं है।
निर्वाचन आयोग ने शिकायत के आधार पर श्वेता सुमन की जांच की जिसमें सामने आया कि वह बिहार की मूल निवासी नहीं हैं। श्वेता उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले की रहने वाली हैं। नियम के अनुसार, बिहार की किसी आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ने के लिए वहां का मूल निवासी होना जरूरी है। निर्वाचन आयोग ने जांच में पाया कि श्वेता सुमन ने 2020 के चुनाव में भी मोहनिया से नामांकन दाखिल किया था जिसमें उन्होंने अपना पता उत्तर प्रदेश के चंदौली, सकलडीहा विधानसभा के रूप में दर्ज कराया था। वहां इस आधार पर उनका नामांकन रद्द कर दिया गया। श्वेता सुमन के पास उत्तर प्रदेश की ‘रविदास’ जाति का प्रमाण पत्र पाया गया जो कि बिहार में अनुसूचित जाति सूची में शामिल नहीं है जबकि उसने अनुसूचित जाति की आरक्षित सीट मोहनिया से टिकट भर दिया था। जिसे नियम विरुद्ध पाया गया। इस आधार पर श्वेता सुमन का पर्चा चुनाव आयोग द्वारा निरस्त कर दिया गया। बाद में उसने पटना उच्च न्यायालय में भी इस मामले पर याचिका दायर की। जिसे न्यायालय द्वारा भी निरस्त कर दिया गया।
क्या है निर्वाचन आयोग के नियम
निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार किसी राज्य में आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार को उसी राज्य की अनुसूचित जाति का सदस्य होना चाहिए।
बात अपनी-अपनी
वर्ष 2014 में जब इन्हीं की पार्टी की सरकार थी तब मैं श्रृद्धांग 01 सीट से जिला पंचायत सदस्य बनी थी। तब सभी प्रमाण पत्र देखकर ही मेरा पर्चा सही पाया गया था और मुझे चुनाव लड़ने के लिए उपयुक्त पाया गया था। इसके अलावा 2023 में मैं बरम क्षेत्र से निर्विरोध क्षेत्र पंचायत सदस्य बनी। मेरे सभी डाक्यूमेंट्स सही हैं। कहीं कोई गड़बड़ नहीं है। ग्राम सभा के माध्यम से सभी प्रमाण पत्र दिए गए हैं जिसमें परिवार रजिस्टर की नकल भी लगी है। खाता खतौनी की नकल भी लगी है और मायके की जाति का प्रमाण पत्र भी लगा है। विधायक जी मुझ पर बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं। नेपाल में मेरी माता जी के नाम पर जमीन है। ऐसी धारचूला की 80 प्रतिशत महिलाएं हैं जिनका नाम आज भी नेपाल में दर्ज है। विधायक जी मात्र एक जमीन के टुकड़े का कागज लेकर कहते हैं कि उनके पास बहुत बड़ा साक्ष्य है।
मंजूला बुदियाल, ब्लाॅक प्रमुख, धारचूला