Uttarakhand

बजट के अभाव में थमा आधुनिक बस पोर्ट निर्माण विकास के दावों पर उठते सवाल

नैनीताल जनपद के रामनगर में करीब तीन एकड़ भूमि पर बनने वाला उत्तराखण्ड का पहला आधुनिक पांच मंजिला बस पोर्ट छह वर्ष बाद भी अधूरा है। अतिरिक्त बजट स्वीकृत न होने से निर्माण कार्य ठप है जबकि पुराने रोडवेज स्टेशन की बदहाली से यात्रियों, पर्यटकों और स्थानीय लोगों को भारी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं

उत्तराखण्ड में विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर साफ दिखाई देता है। सूबे की सरकार प्रदेश में विकास का कितना ही दम्भ भर ले लेकिन कई योजनाएं धरातल तक आते-आते दम तोड़ देती हैं। एक ओर सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे करती है और तमाम मंचों पर जिम्मेदार लोग विकास के अनेक मुद्दों पर जोर देते सुनाई पड़ते हैं, वहीं जमीनी स्थिति कुछ और ही तस्वीर पेश करती है। इसका एक उदाहरण करोड़ों रुपए की लागत से रामनगर में बन रहा उत्तराखण्ड का पहला पांच मंजिला आधुनिक बस पोर्ट है, जिसका निर्माण कार्य बजट के अभाव में फिलहाल थम गया है।

सूत्रों की मानें तों निर्माण कार्य में देरी और प्रोजेक्ट के डिजाइन में आंशिक बदलाव के बाद अतिरिक्त बजट का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है लेकिन अभी तक इसकी स्वीकृति नहीं मिल सकी है। इसके चलते कुमाऊं-गढ़वाल के प्रवेश द्वार के रूप में पहचाने जाने वाले इस शहर का रोडवेज बस स्टेशन लम्बे समय से बदहाली का दंश झेल रहा है। हालत यह है कि यहां बसों को खड़ा करने के लिए पर्याप्त जगह तक उपलब्ध नहीं है। यात्रियों के बैठने के लिए मात्र दो बेंचों की व्यवस्था है जबकि परिवहन निगम के कर्मचारियों के लिए बना प्रशासनिक भवन भी काफी जर्जर हो चुका है।

प्रस्तावित बस पोर्ट लगभग तीन एकड़ भूमि पर विकसित किया जा रहा है जिसमें आधुनिक प्रतीक्षालय, वर्कशाॅप, नलकूप, पार्किंग और टिकट काउंटर जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित की जानी हैं। इस परियोजना को जून 2020 में केंद्र सरकार की स्वीकृति मिली थी। परिवहन विभाग के अधिकारियों के अनुसार बस पोर्ट (बड़ा, मध्यम और लघु श्रेणी) बनाने में जो भी लागत आएगी, उसमें 40 प्रतिशत केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाना था। इसके अलावा निर्माण कार्य मंत्रालय द्वारा चयनित सेंट्रल एजेंसी के माध्यम से किया जाना तय किया गया था।

यहां के रोडवेज डिपो को आईएसबीटी के रूप में विकसित किया जाना है जिसकी कार्यदायी संस्था उत्तराखण्ड पेयजल निर्माण निगम को बनाया गया है। वर्ष 2024-25 में इसका निर्माण पूरा होना प्रस्तावित था लेकिन डिजाइन में बदलाव और यात्रियों के लिए कुछ नई सुविधाएं जोड़े जाने के कारण परियोजना की लागत और निर्माण अवधि दोनों में वृद्धि हुई। इसके बाद निर्माण पूरा करने की समयसीमा मार्च 2026 तक बढ़ा दी गई। इसके बावजूद निर्माण कार्य शुरू हुए छह वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी बस पोर्ट आज तक पूरा नहीं हो सका है। इसका सीधा असर यात्रियों, पर्यटकों और रोडवेज से यात्रा करने वाले स्थानीय लोगों पर पड़ रहा है। उत्तराखण्ड परिवहन मुख्यालय ने राज्य सरकार की पहल पर इस स्थान को परियोजना के लिए चुना था और केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया था।

शुरुआत में परियोजना की लागत कम आंकी गई थी लेकिन डिजाइन और सुविधाओं में बदलाव के कारण लागत बढ़ गई। बस पोर्ट निर्माण के लिए पहले 28 करोड़ रुपए मिल चुके हैं लेकिन अब कार्यदायी संस्था ने कुल 50 करोड़ रुपए की मांग की है जिसमें 22 करोड़ रुपए अतिरिक्त हैं। इस अतिरिक्त धनराशि के लिए प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है लेकिन स्वीकृति न मिलने के कारण पिछले कुछ महीनों से निर्माण कार्य लटका हुआ है।

बस स्टैंड के अभाव में यात्रियों का बुरा हाल
रोडवेज बस स्टैंड के अभाव में यात्रियों को रोजाना भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। रानीखेत रोड से होकर गुजरने वाले मुख्य मार्ग पर सुबह और शाम के समय स्थिति और भी विकट हो जाती है। रोडवेज बसें यात्रियों को चढ़ाने-उतारने के लिए सड़क किनारे ही रुक जाती हैं। प्राइवेट बसें और टेम्पो भी सड़क पर ही खड़े होकर सवारियां भरते हैं, जिससे सड़क की चैड़ाई कम हो जाती है और वाहनों की लम्बी कतार लग जाती है।
कई बार एम्बुलेंस और स्कूली वाहन भी जाम में फंस जाते हैं जिससे लोगों की चिंता बढ़ जाती है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि इस जाम के कारण बाजार में ग्राहकों की संख्या कम हो गई है। उनका कहना है कि यदि जल्द बस स्टैंड बन जाए तो सड़कें खाली रहेंगी और बाजार में रौनक भी बढ़ेगी।

छात्र-छात्राओं को भी बस पकड़ने के लिए सड़क किनारे खड़ा होना पड़ता है। तेज रफ्तार वाहनों के बीच सवारी चढ़ते-उतरते समय दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बस स्टैंड न होने की वजह से यहां दुर्घटनाएं भी आम हो गई हैं। लोग सड़क किनारे खड़े रहते हैं और अचानक आने वाली बस पकड़ने के चक्कर में गिर जाते हैं या तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आ जाते हैं।

अभिभावकों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी बस स्टैंड का निर्माण बेहद आवश्यक है। यात्रियों को न तो बैठने की समुचित व्यवस्था मिलती है और न ही शौचालय व पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं। धूप, बारिश और सर्दी में यात्रियों को खुले में ही इंतजार करना पड़ता है जिससे महिलाओं और बुजुर्गों को विशेष असुविधा होती है। इसकी दुर्दशा और उपेक्षा से लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।

बस स्टैंड निर्माण से जुड़े आंदोलन का इतिहास
इस बस स्टेशन के निर्माण की मांग का लम्बा आंदोलनकारी इतिहास रहा है। वर्ष 1960 के आस-पास पैठ-पड़ाव क्षेत्र में एक छोटे से कमरे से बसों का संचालन किया जाता था जो वर्ष 2000 तक चलता रहा। समय के साथ परिवहन सुविधाओं की मांग बढ़ती गई और डिपो तथा स्टेशन निर्माण की मांग ने जोर पकड़ लिया।

राजनीतिक, सामाजिक और छात्र संगठनों के साथ-साथ कई प्रबुद्ध नागरिकों ने इस मांग को लेकर आंदोलन की मुहिम शुरू की। वर्ष 1992 में आंदोलनकारियों ने शासन-प्रशासन का विरोध करते हुए वर्तमान घासमंडी और लीसा डिपो क्षेत्र में जबरन कब्जा कर बसों का संचालन भी शुरू कर दिया था। स्थानीय नागरिकों, लघु व्यापार मंडल, भवन व्यवसायिक संघ और अन्य संगठनों के सहयोग से यात्रियों के लिए सुविधाएं जुटाने का प्रयास किया गया। उस समय तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया। आंदोलनकारियों को पुलिस ने निर्ममता से पीटा और कई लोगों को गिरफ्तार कर काशीपुर जेल भेज दिया गया।

राज्य गठन के बाद लोगों को उम्मीद थी कि परिवहन ढांचे का विकास तेजी से होगा लेकिन राज्य और केंद्र सरकार की अनदेखी तथा अपर्याप्त बजट के कारण डिपो निर्माण आज भी अधर में लटका हुआ दिखाई देता है। मौजूदा स्थिति यह है कि स्टेशन पर न तो जन सुविधाएं उपलब्ध हैं और न ही बेहतर प्रतीक्षालय। यहां तक कि निर्माणाधीन परिसर में पीने के पानी और साफ-सुथरे शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। यात्रियों को मूलभूत सुविधाओं के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है।

स्थानीय नागरिक तथा आंदोलनकारी भूपेंद्र खाती का कहना है कि तमाम आंदोलनों के बाद भी सरकारें स्टेशन की उपेक्षा कर रही हैं और इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर छोड़ दिया गया है। उन्होंने बताया कि इस निर्माण के लिए उन्होंने अपने साथियों के साथ कई दिनों तक अन्न-जल त्यागकर अनशन भी किया था। इसके बाद 2020 में निर्माण कार्य शुरू हुआ, लेकिन बजट की कमी के कारण कुछ महीनों से काम फिर रुक गया है।

यहां से प्रतिदिन सैकड़ों बसों का संचालन होता है। ऐसे में स्टेशन की यह स्थिति सरकारों की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करती है। राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी शासन-प्रशासन की उदासीनता के कारण हजारों लोगों को रोजाना असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी नीतियों, घोषणाओं और वादों की वास्तविकता क्या है, इसका आइना यह अधूरा बस पोर्ट प्रोजेक्ट खुद ही दिखा देता है।

बात अपनी-अपनी

रामनगर बस पोर्ट का कार्य चल रहा था, जिसमें निर्माण से जुड़े सम्बंधित विभाग द्वारा बजट के सम्बंध में बताया गया है कि इसका प्रस्ताव बनाकर भेज दिया गया है। जल्द बजट मिलने पर कार्य सुचारू रूप से चालू हो जाएगा। बस पोर्ट अपने अंतिम चरण में है, बहुत जल्द महानगरों की तर्ज पर यहां भी एक बस पोर्ट बनकर तैयार होने वाला है जिससे रामनगर के लोगों का सपना जल्द साकार होने जा रहा है।
दीवान सिंह बिष्ट, विधायक, रामनगर 

कार्यदायी संस्था पेयजल निर्माण निगम की ओर से संशोधित प्रस्ताव में शासन से लगभग 50 करोड़ रुपए के अतिरिक्त बजट की मांग की गई है। साथ ही, उनके द्वारा दिए गए बिल का भुगतान अभी सचिवालय से नहीं हो पाया है। जैसे ही भुगतान होगा, वैसे ही कार्य शुरू हो जाएगा। बजट मिलते ही कार्यदायी संस्था काम शुरू करेगी।
नवीन आर्या, सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक, रोडवेज डिपो, रामनगर

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