अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ चलाए जा रहे व्यापक सैन्य अभियान ने शुरुआत में जिस तेज और निर्णायक सफलता का आभास दिया था, वह अब धीरे-धीरे एक जटिल और उलझे हुए संघर्ष की तस्वीर में बदलता दिखाई दे रहा है। ईरान के सैन्य ठिकानों, मिसाइल भंडारों और ड्रोन निर्माण क्षमताओं पर हुए तीव्र हमलों ने निश्चित रूप से उसकी युद्ध क्षमता को कमजोर किया है लेकिन इसके बावजूद यह कहना मुश्किल हो गया है कि क्या इस युद्ध ने अपने मूल राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने की दिशा में कोई ठोस प्रगति की है। ईरान की सत्ता संरचना अब भी कायम है और जिस तरह से बाहरी हमलों के बावजूद वहां कोई व्यापक जनविद्रोह खड़ा नहीं हुआ, उसने यह संकेत दिया है कि केवल सैन्य दबाव से शासन परिवर्तन की उम्मीद करना शायद एक बड़ी रणनीतिक भूल साबित हो रही है।
ईरान युद्ध में घिरते ट्रम्प
अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमलों ने ईरान की सैन्य ताकत को गहरा झटका जरूर दिया है लेकिन यह संघर्ष अब डोनाल्ड ट्रम्प के लिए एक जटिल राजनीतिक और कूटनीतिक जाल बनता जा रहा है, जहां एक ओर घरेलू स्तर पर उनकी लोकप्रियता गिरकर 37 प्रतिशत तक पहुंच गई है तो दूसरी तरफ वैश्विक स्तर पर नाटो की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं। चीन का प्रभाव बढ़ रहा है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम सामरिक क्षेत्र में अमेरिका की पकड़ चुनौती के घेरे में है। इस दौरान पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की वार्ता टलने के बाद ट्रम्प ने युद्ध विराम आगे बढ़ा दिया है जिससे यह संकेत मिल रहा है कि बढ़ते तनाव के बीच भी बातचीत की गुंजाइश पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और दोनों पक्ष आखिरी क्षण तक अपने-अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए समाधान तलाशने की कोशिश कर रहे हैं
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि युद्ध का मूल लक्ष्य, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को निष्क्रिय करना, अब भी अधूरा है। अमेरिकी दावों और आक्रामक बयानों के बीच यह तथ्य लगातार सामने आ रहा है कि उच्च स्तर का संवर्धित यूरेनियम अभी भी ईरान के पास मौजूद है और उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। यही कारण है कि अमेरिकी राजनीति के भीतर भी इस युद्ध की उपयोगिता और दिशा को लेकर गम्भीर सवाल उठने लगे हैं। रोहित खन्ना जैसे नेताओं ने साफ तौर पर कहा है कि इस संघर्ष ने अमेरिका की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने के बजाय और अधिक जटिल बना दिया है और यह आशंका भी जताई जा रही है कि ईरान के भीतर अब और अधिक कठोर और आक्रामक नेतृत्व उभर सकता है।
इस दौरान पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की वार्ता टलने के बाद ट्रम्प ने युद्ध विराम आगे बढ़ा दिया है जिससे यह संकेत मिलता है कि दोनों पक्षों के बीच अविश्वास अपने चरम पर है। वहीं ट्रम्प के युद्ध विराम को आगे बढ़ाने को बढ़ते तनाव के बीच भी बातचीत की गुंजाइश पूरी तरह खत्म् नहीं होने के तौर पर देखा जा रहा है। अब तीसरे दौर की सम्भावित बैठक को केवल एक औपचारिक कूटनीतिक प्रयास के रूप में नहीं देखा जा रहा बल्कि इसे इस संघर्ष के अगले चरण को तय करने वाले निर्णायक क्षण के रूप में भी समझा जा रहा है। यदि यह वार्ता सफल होती है तो यह तनाव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है लेकिन यदि इसमें कोई ठोस प्रगति नहीं होती है तो संघर्ष के और अधिक भड़कने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
इस युद्ध का प्रभाव केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है बल्कि इसने वैश्विक राजनीति और कूटनीति के कई स्थापित समीकरणों को भी हिला दिया है। नाटो के भीतर जिस तरह की असहमति सामने आई है, वह इसका संकेत है कि पश्चिमी गठबंधन की एकजुटता अब पहले जैसी नहीं रही। कई यूरोपीय देशों ने इस युद्ध से दूरी बनाकर रखी, जिससे डोनाल्ड ट्रम्प की नाराजगी खुलकर सामने आई। यह स्थिति अमेरिका के नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था के लिए एक गम्भीर चुनौती के रूप में देखी जा रही है क्योंकि यदि उसके प्रमुख सहयोगी ही उसके साथ खड़े नहीं दिखते तो उसकी रणनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसी के साथ, इस संघर्ष ने अमेरिका की वैश्विक छवि को भी प्रभावित किया है। ट्रम्प द्वारा दिया गया वह बयान, जिसमें उन्होंने ईरानी सभ्यता को समाप्त करने की चेतावनी दी थी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आलोचना का कारण बना। यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं था बल्कि इसे एक ऐसे संकेत के रूप में देखा गया जिसने अमेरिका की विदेश नीति को और अधिक आक्रामक और अनिश्चित बना दिया। यही नहीं, ट्रम्प प्रशासन का टकराव पोप लीओ ग्प्ट जैसे धार्मिक नेतृत्व से भी हुआ, जिसने इस युद्ध को एक नैतिक और वैचारिक बहस में बदल दिया। जब कोई संघर्ष सैन्य और राजनीतिक दायरे से निकलकर नैतिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है तो उसकी जटिलता और भी बढ़ जाती है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू उभरकर सामने आया है, चीन की बढ़ती भूमिका। जहां अमेरिका इस युद्ध में उलझा हुआ है, वहीं चीन ने ईरान के साथ अपने सम्बंधों को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। ऊर्जा, व्यापार और सामरिक सहयोग के स्तर पर चीन का बढ़ता प्रभाव अमेरिका के लिए एक नई चुनौती बन रहा है। आलोचकों का मानना है कि इस युद्ध ने अनजाने में चीन को वह अवसर दे दिया है, जिसके जरिए वह मध्य पूर्व में अपनी पकड़ मजबूत कर सकता है और वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी स्थिति को और सुदृढ़ बना सकता है।
घरेलू स्तर पर भी यह युद्ध ट्रम्प के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गया है। ताजा सर्वेक्षणों में उनकी लोकप्रियता में आई गिरावट इस बात का संकेत है कि अमेरिकी जनता इस संघर्ष को लेकर संतुष्ट नहीं है। चुनावी माहौल में यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है क्योंकि युद्ध की लम्बी अवधि, बढ़ती लागत और अस्पष्ट परिणामों ने मतदाताओं के बीच असंतोष पैदा किया है। विपक्ष लगातार यह आरोप लगा रहा है कि ट्रम्प इस युद्ध में फंस गए हैं और उनके पास इससे बाहर निकलने की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है।
इस संघर्ष का एक और महत्वपूर्ण आयाम है स्ट्रेट ऑफ होरमुज जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है। इस क्षेत्र में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं है बल्कि इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। हाल के घटनाक्रमों में इस जलमार्ग पर आवाजाही को लेकर फिर से अनिश्चितता बढ़ी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अस्थिरता देखने को मिल रही है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य या रणनीतिक कदम पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन जाता है। समय के साथ यह युद्ध उस प्रारंभिक अनुमान से भी आगे निकल चुका है, जिसमें इसे सीमित अवधि का संघर्ष माना गया था। अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि यह एक लम्बा और थकाऊ टकराव बन सकता है, जिसमें कोई भी पक्ष आसानी से पीछे हटने को तैयार नहीं है। ऐसे में इस्लामाबाद में तीसरी सम्भावित वार्ता जिसकी अभी तक तारीख भी तय नहीं हुई है, को लेकर कहा जा रहा है कि इस पूरे संघर्ष के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है क्योंकि यह तय करेगी कि आने वाले दिनों में तनाव कम होगा या टकराव और गहराएगा।
अंततः यह युद्ध केवल सैन्य शक्ति की परीक्षा नहीं है बल्कि यह राजनीतिक इच्छाशक्ति, कूटनीतिक कौशल और वैश्विक रणनीति की भी परीक्षा है। डोनाल्ड ट्रम्प के लिए यह एक ऐसा क्षण है जहां हर निर्णय का प्रभाव न केवल इस संघर्ष के परिणाम को तय करेगा बल्कि अमेरिका की वैश्विक भूमिका और उसकी विश्वसनीयता को भी परिभाषित करेगा। दूसरी ओर ईरान ने यह दिखा दिया है कि भारी सैन्य दबाव के बावजूद उसकी सत्ता संरचना को तोड़ना आसान नहीं है। ऐसे में यह संघर्ष अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां कूटनीति और टकराव के बीच की महीन रेखा पर चलते हुए दोनों पक्ष अपने-अपने हितों को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहे हैं और दुनिया की नजरें अब इस्लामाबाद में होने वाली सम्भावित तीसरी वार्ता पर टिकी हुई हैं जो इस संकट के अगले अध्याय को तय कर सकती है।