Uttarakhand

जागेश्वर का गम, राजनीति अधिक विकास कम

जागेश्वर विधानसभा में विकास और बुनियादी सुविधाओं को लेकर लोगों में स्थानीय विधायक मोहन सिंह मेहरा के खिलाफ गहरी नाराजगी दिखाई दी। जनता कहती है कि वर्षों से इस विधानसभा को ऐसा नेतृत्व नहीं मिल पाया जो क्षेत्र की मूल समस्याओं, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार को प्राथमिकता देकर समाधान निकाल सके। अधिकतर लोगों का कहना है कि ‘‘यहां नेता बहुत बने लेकिन काम धरातल पर नहीं हुए। यहां राजनीति तो खूब हुई लेकिन विकास उतना नहीं हुआ।’’ 2022 के बाद जब से मोहन सिंह मेहरा विधायक बने हैं तब से रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई बड़ी नई योजना नहीं आई है। यहां आज भी वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति है। हालात जैसे पहले थे वैसे ही आज भी हैं

उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले की जागेश्वर विधानसभा उन पहाड़ी क्षेत्रों में शामिल है जहां प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक धरोहर और धार्मिक आस्था का अनूठा संगम है। विश्व प्रसिद्ध जागेश्वर मंदिर समूह के कारण यह क्षेत्र सांस्कृतिक और पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां के विधायक मोहन सिंह मेहरा ने वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर इस सीट से विजय प्राप्त की। इस क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास को देखें तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गोविंद सिंह कुंजवाल ने इस सीट का कई बार प्रतिनिधित्व किया है। राज्य गठन के बाद यह सीट अस्तित्व में आई तब यहां से कांग्रेस के गोविंद सिंह कुंजवाल चुनाव जीते। उन्होंने 2002, 2007, 2012, 2017 के विधानसभा चुनाव में लगातार चार बार जीत दर्ज कर इस सीट का प्रतिनिधित्व किया।

प्राचीन मंदिरों और घने देवदार के जंगलों के कारण यह क्षेत्र देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है लेकिन इन खूबसूरत पहाड़ों के बीच बसे गांवों की जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है। इस विधानसभा में दो ब्लाॅक आते हैं धौलादेवी और लमगड़ा। जिसमें पनुवानौला, जागेश्वर, दन्या, जैंती और लमगड़ा मुख्य कस्बे हैं।
‘दि संडे पोस्ट’ ने जब जागेश्वर विधानसभा के क्षेत्रों, पनुवानौला, दन्या, जैंती, लमगड़ा, धौलादेवी, अर्तोला , जागेश्वर और उसके आस-पास के ग्रामीण इलाकों का दौरा किया तथा स्थानीय लोगों से बातचीत की तो सामने आया कि यहां के ग्रामीण आज भी कई मूलभूत समस्याओं के लिए जूझ रहे हैं। लोगों का कहना है कि दशकों से विकास की बातें तो होती रही हैं लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित बदलाव देखने को नहीं मिला। इस विधानसभा क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और रोजगार से जुड़ी समस्याएं आज भी ऐसी ही हैं जितनी कई दशक पहले हुआ करती थीं। यही कारण है कि यहां से पलायन लगातार बढ़ता जा रहा है और कई गांव धीरे-धीरे खाली होते जा रहे हैं।

60 साल बाद भी नहीं बदली गांवों की तस्वीर
समय के साथ-साथ लोगों की जरूरतें बढ़ी हैं लेकिन सुविधाओं का विस्तार उस गति से नहीं हुआ। कई गांवों में आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए लोगों को लम्बी दूरी तय करनी पड़ती है। विकास की योजनाओं पर खर्च होने वाले बजट के बावजूद ग्रामीणों को उसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा। धौलादेवी और लमगड़ा ब्लाॅक के कई गांवों में रहने वाले बुजुर्ग ग्रामीण बताते हैं कि गांवों की स्थिति में पिछले कई दशकों में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया है। 1960 के समय जैसी स्थिति थी, आज भी वैसी ही दिखाई देती है। जागेश्वर के बुजुर्ग पुजारी कोस्तुवा नंद भट्ट ने बताया कि ‘‘हमने अपने बचपन में जो स्थिति देखी थी, वही हाल आज भी कई गांवों में दिखाई देता है। कुछ लोगों ने मेहनत करके अपने मकानों को जरूर पक्का बना लिया है लेकिन गांवों में सड़क, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सुविधाएं आज भी सीमित हैं। सरकारी योजनाओं की घोषणाएं तो अक्सर होती रहती हैं लेकिन उनका लाभ गांवों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता। कई योजनाएं कागजों में दिखाई देती हैं जबकि जमीनी स्तर पर उनका असर सीमित है।’’

जंगली जानवरों के आतंक से चौपट हो रही खेती
जागेश्वर के गांवों में खेती कभी जीवन का आधार हुआ करती थी। यहां के किसान अपने खेतों में मंडुवा, झंगोरा, गेहूं, आलू और कई प्रकार की सब्जियां उगाते थे। खेती से ही लोगों का भरण-पोषण होता था। गांवों की अर्थव्यवस्था भी उसी पर आधारित थी लेकिन पिछले कुछ वर्षों में स्थिति में बदलाव आया है। ग्रामीणों के अनुसार जंगली सूअर और बंदरों की संख्या में लगातार वृद्धि होने के कारण खेती करना बेहद मुश्किल हो गया है। जंगली सूअर और बंदरों के बढ़ते आतंक ने खेती को लगभग चैपट कर दिया है। इसी कारण कई लोगों ने खेती करना कम कर दिया है। लोग अब मजदूरी या छोटे-मोटे काम करके किसी तरह अपना जीवन- यापन कर रहे हैं।
दन्या क्षेत्र के निवासी कमल जोशी कहते हैं कि ‘‘रात के समय जंगली सूअर खेतों में घुसकर पूरी फसल खोद देते हैं। सुबह जब किसान खेत में पहुंचता है तो उसकी महीनों की मेहनत मिट्टी में मिल चुकी होती है।’’ इसी तरह बंदरों के झुंड दिन के समय खेतों में उतर आते हैं और फल- सब्जियों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। कई किसानों का कहना है कि खेती अब घाटे का सौदा बन गई है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में खेत अब बंजर हो रहे हैं।

पलायन बना मजबूरी
खेती कम होने का सीधा असर गांवों की आबादी पर भी दिखाई दे रहा है। बड़ी संख्या में युवा शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं।

धौलादेवी ब्लॉक के ग्रामीण हरीश चंद्र जोशी कहते हैं कि ‘‘गांव में खेती से आमदनी नहीं हो रही और रोजगार के अन्य अवसर भी नहीं हैं। इसलिए युवा हल्द्वानी, देहरादून और दिल्ली जैसे शहरों में काम करने के लिए चले जाते हैं।’’ कई परिवारों में स्थिति यह है कि घर के युवा बाहर काम करते हैं और वहीं से पैसे भेजते हैं। उन्हीं पैसों से गांव में रह रहे बुजुर्ग और अन्य परिवारजन अपना खर्चा चलाते हैं।

कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां लोगों की आजीविका का एक हिस्सा जागेश्वर मंदिर से जुड़े धार्मिक कार्यों पर निर्भर करता है। वहां पूजा-पाठ और छोटे-मोटे कामों से कुछ आय हो जाती है लेकिन यह आय पूरे परिवार का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त नहीं होती। ग्रामीणों का कहना है यदि क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ें तो पलायन की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।

स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल
जागेश्वर विधानसभा में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति को लेकर लोगों ने सबसे ज्यादा चिंता जताई। इस विधानसभा में धौलादेवी और लमगड़ा में दो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है। इसके अलावा एक पनुवानौला में तथा दूसरा दन्या में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं लेकिन इन केंद्रों में पर्याप्त डाॅक्टर और आधुनिक उपकरण उपलब्ध नहीं हैं। क्षेत्र में एक पुराना आयुर्वेदिक अस्पताल है लेकिन वहां भी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

यहां के ग्रामीणों का कहना है कि इलाज के लिए उन्हें करीब 10 से 15 किलोमीटर दूर धौलादेवी जाना पड़ता है। आपात स्थिति में भी यहां कई बार 108 एम्बुलेंस सेवा समय पर नहीं पहुंच पाती। ग्रामीणों ने बताया कि चाहे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हो या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, डॉक्टरों की कमी हर जगह है। यहां अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे जैसी मशीनें उपलब्ध नहीं हैं। लोगों द्वारा बताया गया कि पनुवानौला अस्पताल के विस्तार के लिए गांव वालों ने 50-60 नाली जमीन भी दी थी, जिससे यहां बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं विकसित हो सकें लेकिन कई वर्षों के बाद भी अस्पताल की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। एक स्थानीय निवासी ने बताया कि ‘‘हमने उम्मीद की थी कि यहां बड़ा अस्पताल बनेगा और आस-पास के गांवों के लोगों को बेहतर इलाज मिल सकेगा लेकिन आज भी यहां सीमित सुविधाएं ही उपलब्ध हैं।’’

जागेश्वर एक प्रमुख पर्यटन क्षेत्र भी है जहां हर साल हजारों पर्यटक आते हैं लेकिन स्वास्थ्य सुविधाएं इतनी कमजोर हैं कि यदि किसी प्रकार की आपात स्थिति उत्पन्न होती है तो मरीजों को पहले अल्मोड़ा और फिर वहां से हल्द्वानी स्थित सुशीला तिवारी अस्पताल रेफर कर दिया जाता है।

शिक्षा व्यवस्था भी सवालों के घेरे में
जागेश्वर विधानसभा में शिक्षा की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। क्षेत्र में स्कूलों की संख्या तो पर्याप्त है लेकिन कई विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है। धौलादेवी ब्लॉक में 152 प्राथमिक विद्यालय हैं जबकि 24 जूनियर हाईस्कूल और 19 हाईस्कूल, 17 इंटर कॉलेज स्थित हं। इसके अलावा गुरूडाबांज, दन्या, लमगड़ा और जैंती में डिग्री काॅलेज हैं लेकिन यहां भी संसाधनों और शिक्षकों की कमी है। एक अभिभावक ने कहा कि ‘‘गांव में केवल प्राथमिक स्तर तक ही पढ़ाई की सुविधा है। आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। इससे कई बच्चों की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। कई स्कूलों में एक या दो शिक्षकों के सहारे ही कक्षाएं चल रही हैं। यहां के प्राथमिक स्कूलों में एकल अध्यापक ही सफाई व्यवस्था से लेकर डाक और पढ़ाई करा रहे हैं। बच्चों की संख्या में भी बढ़ोतरी नहीं हो सकी है। लोगों का कहना है कि बच्चों का मानसिक स्तर भी उच्च स्तर पर नहीं बढ़ पाता है। जिससे उनको एक विजन मिल सके। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर बनाने की आवश्यकता है ताकि बच्चों को अच्छी पढ़ाई के लिए शहरों की ओर न जाना पड़े।’’

पेयजल और सड़क की समस्याएं भी बरकरार
जागेश्वर विधानसभा के कई गांव ऐसे हैं जहां पेयजल की समस्या भी लम्बे समय से बनी हुई है। हर घर नल योजना के तहत पाइपलाइन बिछाने का कार्य शुरू तो हुआ लेकिन कई जगहों पर यह अभी तक पूरा नहीं हुआ है। दन्या सहित कुछ गांवों में पाइप लाइन तो है लेकिन नियमित जलापूर्ति नहीं हो पाती है। कई जगहों पर यह कार्य बहुत धीमी गति से किया गया। लोगों के अनुसार जहां एक सड़क से कई गांवों को जोड़ा जा सकता था, वहां अलग-अलग सड़कें बनाकर जंगलों और जल स्रोतों को नुकसान पहुंचाया गया। कुछ ग्रामीणों का आरोप है कि कई स्थानों पर 2 से 5 किलोमीटर की दूरी को 10 से 15 किलोमीटर घुमाकर सड़क बनाई गई जिससे बजट तो अधिक खर्च हुआ ही, साथ ही लोगों को अपेक्षित लाभ नहीं मिला। एक गांव अर्तोला ऐसा है जहां अब तक सड़क नहीं पहुंच पाई है।

आपदा प्रबंधन की व्यवस्था का अभाव
जागेश्वर क्षेत्र में पहले भी प्राकृतिक आपदाएं आ चुकी हैं लेकिन इसके बावजूद भविष्य के लिए कोई ठोस योजना नहीं बनाई जा सकी है। स्थानीय लोगों के अनुसार आपदा प्रबंधन की अधिकांश व्यवस्थाएं घटना के बाद ही शुरू होती हैं जिससे जो नुकसान होना होता है वह पहले ही हो चुका होता है जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और प्राकृतिक आपदाओं की सम्भावना को देखते हुए पहले से ठोस योजना बननी चाहिए।

पुरातत्व विभाग के नियमों से बढ़ी मुश्किलें
जागेश्वर मंदिर क्षेत्र के आस-पास रहने वाले ग्रामीणों ने यहां की एक और समस्या की ओर ध्यान दिलाया। पुरातत्व विभाग के नियमों के तहत मंदिर के आस-पास 100 मीटर की परिधि में निर्माण कार्य पर प्रतिबंध है। उससे उन्हें काफी परेशानी हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि इससे उन्हें अपने घरों की मरम्मत या नए निर्माण में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। एक स्थानीय निवासी ने कहा कि ‘‘अगर कोई छोटा सा निर्माण भी करता है तो नोटिस आ जाता है। इससे लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।’’

मंदिर क्षेत्र में सुविधाओं की कमी
जागेश्वर धाम मंदिर में हर साल हजारों श्रद्धालु आते हैं लेकिन मंदिर क्षेत्र में उपलब्ध सुविधाएं श्रद्धालुओं की संख्या के अनुरूप नहीं हैं। मंदिर क्षेत्र में पार्किंग और अन्य व्यवस्थाओं के लिए शुल्क तो लिया जाता है लेकिन उस हिसाब से समुचित प्रबंधन नहीं हो पा रहा है। साथ ही मंदिर से होने वाली आय का उपयोग किस मद में किया जा रहा है, इसकी जानकारी भी स्पष्ट नहीं है। कुछ वर्ष पहले ही मंदिर के लिए 20 लाख का बजट राज्य सरकार द्वारा दिया गया था जिसका व्यय केवल मंदिर को लाइट द्वारा सजावट में बताया गया है। लोगों का कहना है कि मंदिर क्षेत्र को पर्यटन के लिहाज से बेहतर तरीके से विकसित किया जा सकता है लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

चुनाव के बाद जनप्रतिनिधि नजर नहीं आते
ग्रामीणों का आरोप है कि जब चुनाव आते हैं तो उस समय जनप्रतिनिधि गांवों में पहुंचते हैं और कई घोषणाएं करते हैं लेकिन चुनाव होने के बाद उनकी उपस्थिति कम हो जाती है। उसके बाद गांवों की समस्याओं की ओर भी उनके द्वारा ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है। लोगों ने वर्तमान विधायक के कार्यकाल को लेकर भी असंतोष व्यक्त किया। ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में कोई बड़ी योजना धरातल पर नहीं उतरी है। क्षेत्र में ऐसा कोई बड़ा विकास कार्य नहीं हुआ है जिससे पलायन रुक सके या लोगों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। एक ग्रामीण ने कहा कि ‘‘अभी तक बड़े विकास कार्य नहीं दिखे। ज्यादातर बजट छोटे-मोटे कामों जैसे खड़ंजा या मंदिर सौंदर्यीकरण में ही खर्च होता दिखाई देता है।’’ हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि विधायक क्षेत्र में आते-जाते हैं और लोगों से मिलते भी हैं लेकिन समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है।

2022 के बाद जब से मोहन सिंह मेहरा विधायक बने हैं तब से रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कोई बड़ी नई योजना क्षेत्र में नहीं आई है। यहां आज भी वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति है। हालात जैसे पहले थे वैसे ही आज भी हैं। वर्तमान विधायक कांग्रेस से भाजपा में आए हैं। इसलिए सरकार में भी उनको उचित महत्व नहीं दिया जाता। विधायक चाह कर भी मुख्यमंत्री और सचिवालय से कार्य नहीं करा पा रहे हैं।

नशे की समस्या से अब तक काफी हद तक बचा हुआ है क्षेत्र
जागेश्वर विधानसभा के विभिन्न गांवों, पनुवानौला, लमगड़ा, जैंती, दन्या और धौलादेवी में ग्रामीणों से बातचीत के दौरान एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया। लोगों का कहना है कि जहां पहाड़ के कई अन्य इलाकों में नशे की समस्या तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है, वहीं यह क्षेत्र अब भी इस समस्या से काफी हद तक बचा हुआ है जबकि उत्तराखण्ड के कई पहाड़ी क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में शराब और नशे का प्रकोप युवाओं के बीच बढ़ता देखा गया है।
ग्रामीण कहते हैं कि ‘‘पहाड़ के कई इलाकों में नशे की समस्या तेजी से बढ़ रही है लेकिन हमारे क्षेत्र में अभी तक यह उतनी गम्भीर स्थिति में नहीं पहुंची है। यहां के लोग आज भी इस मामले में सतर्क रहते हैं। यहां परिवार और समाज दोनों ही स्तर पर युवाओं को नशे से दूर रहने की सीख दी जाती है। यही कारण है कि अभी तक यहां वह स्थिति नहीं बनी जो दूसरे क्षेत्रों में देखने को मिल रही है।’’
कुल मिलाकर जागेश्वर विधानसभा में विकास और बुनियादी सुविधाओं को लेकर लोगों में स्थानीय विधायक मोहन सिंह मेहरा के खिलाफ गहरी नाराजगी दिखाई दी। जनता कहती है कि वर्षों से इस विधानसभा को ऐसा नेतृत्व नहीं मिल पाया जो क्षेत्र की मूल समस्याओं, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार को प्राथमिकता देकर समाधान निकाल सके। अधिकतर लोगों का कहना है कि ‘‘यहां नेता बहुत बने लेकिन काम धरातल पर नहीं हुए। यहां राजनीति तो खूब हुई लेकिन विकास उतना नहीं हुआ।’’

बात अपनी-अपनी

भारतीय जनता पार्टी की सरकार को लगभग दस वर्ष पूरे होने जा रहे हैं लेकिन इस अवधि में जागेश्वर विधानसभा क्षेत्र में अपेक्षित विकास कार्य नहीं हो पाए हैं। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के अंतर्गत कुछ सड़कों का डामरीकरण अवश्य हुआ है, किंतु इसके अतिरिक्त राज्य सरकार द्वारा क्षेत्र में कोई बड़ा विकास कार्य नहीं कराया गया। वर्ष 2022 के बाद से अब तक एक भी नई सड़क का शासनादेश जारी नहीं हुआ है। मेरे कार्यकाल में दन्या (धौलादेवी) और लमगड़ा के अस्पतालों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के रूप में उच्चीकृत किया गया था और इसके लिए बजट भी स्वीकृत हुआ था। धौलादेवी में भवन का निर्माण हो चुका है जबकि लमगड़ा में भवन निर्माण कार्य आज भी अधूरा पड़ा है। पूर्ववर्ती सरकार के समय शुरू किए गए कई कार्यों को वर्तमान सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया। कांग्रेस सरकार में ‘हरि प्रसाद टम्टा पारम्परिक शिल्प ऑनलाइन संस्थान’ की स्थापना के लिए स्वीकृति प्राप्त की गई थी। इस संस्थान के निर्माण के लिए भूमि हस्तांतरण, सड़क और पानी की व्यवस्था की जा चुकी थी तथा प्रशासनिक भवन के निर्माण हेतु लगभग 5 करोड़ रुपए उत्तर प्रदेश निर्माण निगम को उपलब्ध कराए गए थे। भवन का निर्माण कार्य ग्राउंड फ्लोर तक पूरा हो गया था और दूसरे तल के पिलर भी खड़े हो चुके थे, किंतु सरकार बदलने के बाद यह परियोजना भी अधूरी रह गई। यदि यह संस्थान बन जाता तो पारम्परिक शिल्प और कलाओं से जुड़े लगभग 10 हजार लोगों को प्रतिमाह रोजगार मिलने की सम्भावना थी। जो बजट क्षेत्र के विकास के लिए आता है, उसका पूरा उपयोग जमीनी स्तर पर नहीं हो पा रहा है। कई स्थानों पर बजट का दुरुपयोग हो रहा है और विकास कार्य अपेक्षित गति से नहीं हो रहे। विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और अस्पतालों में पर्याप्त उपचार सुविधाओं के अभाव के कारण कई स्वास्थ्य केंद्र केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं। अपने कार्यकाल में हमने लगभग 35-35 करोड़ रुपए की तीन से चार पेयजल पम्प योजनाओं का निर्माण कराया था, जिसके कारण आज कई क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति सम्भव हो पा रही है। वर्तमान विधायक मुख्य रूप से विधायक निधि के कार्यों तक सीमित हैं और शासन स्तर से नए विकास कार्यों के लिए प्रभावी पहल नहीं की जा रही है। प्रदेश में घोषणाएं तो बहुत की जा रही हैं लेकिन उनका प्रभाव जमीन पर दिखाई नहीं देता। जनप्रतिनिधियों का मुख्य ध्यान क्षेत्र की समस्याओं के समाधान और ठोस विकास योजनाओं
पर होना चाहिए।

गोविंद सिंह कुंजवाल, पूर्व विधायक, जागेश्वर 
अब तक जितनी भी सरकारें, विधायक और जनप्रतिनिधि रहे हैं, उनसे क्षेत्र की जनता की अपेक्षा यही रही है कि पहाड़ के लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं ताकि स्थानीय लोगों को छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी पलायन न करना पड़े। वर्तमान समय में क्षेत्र से पलायन लगातार बढ़ता जा रहा है जिसका प्रमुख कारण स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था की बदहाल स्थिति है। जागेश्वर विधानसभा का प्रमुख आधार पर्यटन है लेकिन इसके बावजूद पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस विकास कार्य दिखाई नहीं देता। पर्यटकों के लिए पार्किंग, आपातकालीन सुरक्षा व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। यहां तक कि जागेश्वर धाम क्षेत्र में एक मेडिकल स्टोर तक उपलब्ध नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व क्षेत्र के पूर्व विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल के कार्यकाल में कई गांवों को सड़कों से जोड़ने का प्रयास किया गया था। उस दौरान सड़कों के निर्माण के लिए पेड़ काटे गए और स्थानीय लोगों ने अपनी जमीनें भी दीं। इसके बावजूद वर्तमान समय में अधिकांश सड़कों की स्थिति खराब बनी हुई है। वर्तमान विधायक को क्षेत्र की समस्याओं की पूरी जानकारी है क्योंकि जनता समय-समय पर उन्हें इन मुद्दों से अवगत कराती रहती है। इसके बावजूद अब तक इन समस्याओं के समाधान की दिशा में कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दी है। पिछले लगभग दो वर्षों से जागेश्वर धाम में केवल मंदिर परिसर का लाइटों के माध्यम से सौंदर्यीकरण किया जा रहा है जबकि क्षेत्र की बुनियादी समस्याएं अभी भी जस की तस बनी हुई हैं। अगर क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं मजबूत हों, शिक्षा व्यवस्था बेहतर बने, स्थानीय स्तर पर
रोजगार के अवसर मिले तो पलायन काफी हद तक कम हो सकता है। जागेश्वर जैसे ऐतिहासिक और पर्यटन क्षेत्र को अगर योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया जाए तो यह क्षेत्र आर्थिक रूप से भी मजबूत हो सकता है।
मुकेश भट्ट, अध्यक्ष, व्यापार मंडल, जागेश्वर

उत्तराखण्ड का पांचवा धाम जागेश्वर धाम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहुंचने के बाद भी विकास कार्यों में कोई तेजी नहीं आई जबकि पर्यटकों की संख्या में बेहताशा वृद्धि दिन दूनी रात चौगुनी की गति से हो रही है। हमें भाजपा के विधायक मोहन सिंह मेहरा से काफी उम्मीदें थीं जो पूरी न हो सकीं। हां घोषणाएं जरूर बम्पर की गई। आज भी यहां की प्रमुख समस्या एक अदद हास्पिटल, सीवर लाइन का निर्माण कुड़ा प्रबंधन, जटागंगा नदी का गिरता जलस्तर आदि है। विशेष रूप से यहां शौचालय का प्रबंध न होना है जबकि लाखों पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं। यहां औसतन सौ महिलाओं में तीन के लिए ही महिला शौचालय है। कुल मिलाकर जो विकास का सपना हमने देखा वो पूरा हुआ नहीं हुअर। स्थानीय विधायक यहां के लिए कुछ खास नहीं कर पाए, केवल आश्वासन से ही काम चला रहे हैं। यहां का स्कूल भवन बनने से पहले ही समाप्ति के कगार पर आ चुका है। मेहरा का यह कार्यकाल कोई विशेष छाप नहीं छोड़ पाया। लोगों के हाथ मायूसी ही लगी। बीते चार सालों में यहां मानस खंड कॉरिडोर के तहत फैंसी लाइटों के अलावा कोई भी कार्य नहीं हुआ है जबकि आरतोला जागेश्वर मार्ग पर लगी लाइटें काम नहीं कर रही हैं। जटा गंगा नदी पर रिवर फ्रंट का निर्माण भी हवा-हवाई होकर रह गया है।
हरिमोहन भटट्, पूर्व प्रधान, जागेश्वर

जागेश्वर विधानसभा की स्थिति अभी भी वैसी ही बनी हुई है जैसी पहले थी। जब गोविंद सिंह कुंजवाल विधायक थे और सरकार भी उनकी थी, तब कुछ काम जरूर हुए थे लेकिन उसके बाद हालात लगातार बिगड़ते गए हैं। आज स्थिति यह है कि गांवों में स्कूल बंद हो रहे हैं, शिक्षा के क्षेत्र में लगातार गिरावट देखी जा रही है। रोजगार के अवसर लगभग न के बराबर हैं, जिससे आर्थिक स्थिति कमजोर बनी हुई है। क्षेत्र का बड़ा हिस्सा आज भी सरकारी राशन पर निर्भर है और लोग मजबूरी में पलायन कर रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाएं भी ठीक नहीं हैं। कई जगहों पर आपात स्थिति में मरीजों, खासकर गर्भवती महिलाओं को डोली में उठाकर सड़क तक लाना पड़ता है। स्वास्थ्य केंद्रों में डाॅक्टरों की कमी है जिसके कारण मरीजों को पहले अल्मोड़ा और फिर हल्द्वानी रेफर कर दिया जाता है। कुल मिलाकर, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार, तीनों ही क्षेत्रों में स्थिति खराब है और अभी तक कोई ऐसा बड़ा या ठोस बदलाव नजर नहीं आता।
विनीत बोहरा, समाजसेवी, जागेश्वर

जागेश्वर विधानसभा 2026 – विधायक रिपोर्ट कार्ड
विधायक : मोहन सिंह मेहरा (अवधि: 4 वर्ष)
 

क्र. क्षेत्र                                                 मुद्दा/जमीनी स्थिति                अंक  (10 में)

  1. सड़क व सम्पर्क मार्ग कई गांव अब भी सड़क से वंचित, बनी सड़कों की हालत खराब, योजना में विसंगतियां 3/1
  2. स्वास्थ्य सेवाएं सीएचसी-पीएचसी में डॉक्टरों व उपकरणों की भारी कमी, मरीजों को रेफर करना मजबूरी 2.5/10
  3. शिक्षा व उच्च शिक्षा स्कूलों में शिक्षकों की कमी, उच्च शिक्षा के लिए दूरी, संसाधनों का अभाव 3/10
  4. रोजगार व उद्योग स्थानीय रोजगार के अवसर नगण्य, पर्यटन क्षमता का उपयोग नहीं 2.5/10
  5. पलायन व युवा स्थिति भारी पलायन, गांव खाली होते जा रहे 2/10
  6. कृषि व आजीविका जंगली जानवरों से खेती चौपट, खेत बंजर होते जा रहे 2.5/10
  7. प्रशासनिक व्यवस्था योजनाएं कागजों तक सीमित, क्रियान्वयन कमजोर 3/10
  8. पेयजल व मूलभूत सुविधाएं जल संकट बरकरार, ‘हर घर नल’ योजना अधूरी 3/10
  9. आपदा व पर्यावरण प्रबंधन आपदा प्रबंधन की ठोस व्यवस्था नहीं, भूस्खलन जोखिम बना हुआ 2.5/10
  10. जनसम्पर्क व राजनीतिक सक्रियता विधायक की मौजूदगी सीमित प्रभाव वाली, समाधान कम, असंतोष ज्यादा 4/10
औसत :  2.9/10           फाइनल ग्रेड : फेल

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