एक समय था जब हिंदी सिनेमा परिवार के साथ बैठकर देखे जाने वाले मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम माना जाता था लेकिन बदलते समय के साथ फिल्मों और वेबसीरीज की भाषा, विषय और प्रस्तुति तेजी से बदली है। आज बड़े पर्दे और ओटीटी प्लेटफाॅर्म पर हिंसा, अंतरंग दृश्य, उत्तेजक संवाद और सनसनीखेज कथानक पहले से कहीं अधिक दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि क्या बाॅलीवुड समाज की बदलती सोच का आईना बन रहा है या फिर दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए मनोरंजन को धीरे-धीरे उत्तेजना के कारोबार में बदला जा रहा है?
हिंदी सिनेमा का चेहरा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदला है। एक समय था जब फिल्मों में प्रेम का इजहार प्रतीकों और गीतों के माध्यम से किया जाता था। नायक-नायिका के बीच दूरी बनाए रखना ही मर्यादा माना जाता था लेकिन आज फिल्मों और वेब सीरीज में अंतरंग दृश्य, उत्तेजक संवाद और हिंसक प्रस्तुति आम होती जा रही है।
यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं बल्कि सांस्कृतिक भी है। दर्शकों की पसंद, डिजिटल प्लेटफार्म की प्रतिस्पर्धा और तेजी से बदलती मनोरंजन की दुनिया ने सिनेमा की भाषा बदल दी है। अब फिल्में केवल कहानी सुनाने का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि दर्शकों को ‘शाॅक’ और ‘सेंसशन’ देने की होड़ भी बन गई हैं।
हाल के वर्षों में कई ऐसी फिल्में और वेबसीरीज चर्चा में रहीं जिनमें बोल्ड और विवादित दृश्यों ने सबसे अधिक ध्यान खींचा। उदाहरण के तौर पर ‘एनिमल’ अपने हिंसक दृश्यों और आक्रामक रिश्तों की प्रस्तुति के कारण लम्बे समय तक बहस का विषय बनी रही। अभिनेता रणबीर कपूर और अभिनेत्री रश्मिका मंदाना के बीच फिल्माए गए कई अंतरंग दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल हुए।
इसी तरह ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई वेब सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ ने भी अपने नग्न दृश्यों, गाली-गलौज और हिंसा के कारण भारी चर्चा बटोरी थी। इस सीरीज में अपराध, सेक्स और सत्ता के मेल को जिस खुलेपन के साथ दिखाया गया, वह भारतीय दर्शकों के लिए एक नया अनुभव था।
इसके बाद ‘मिर्जापुर’ जैसी वेब सीरीज आईं जिनमें हिंसा और यौन सम्बंधों को बेहद खुले अंदाज में प्रस्तुत किया गया। सीरीज के कई दृश्य और संवाद सोशल मीडिया पर मीम और वायरल क्लिप्स का हिस्सा बन गए वहीं ‘लस्ट स्टोरीज’ ने शहरी रिश्तों और यौन इच्छाओं को केंद्र में रखकर नई बहस छेड़ दी। इस सीरीज के कुछ अंतरंग दृश्यों को लेकर काफी विवाद हुआ लेकिन युवाओं के एक बड़े वर्ग ने इसे ‘बोल्ड और ईमानदार प्रस्तुति’ कहा।
दरअसल ओटीटी प्लेटफाॅर्म ने फिल्मकारों को वह स्वतंत्रता दी जो पारम्परिक सिनेमाघरों और सेंसर व्यवस्था में सीमित थी। यही कारण है कि अब कई निर्माता ऐसे विषयों और दृश्यों पर काम कर रहे हैं जिन्हें पहले जोखिम भरा माना जाता था लेकिन इस पूरी प्रवृत्ति का एक बड़ा आर्थिक पक्ष भी है। मनोरंजन उद्योग अब केवल टिकट खिड़की तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर ट्रेंड होना, वायरल क्लिप बनना और विवाद पैदा करना भी अब मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा बन चुका है। कई बार किसी फिल्म या वेब सीरीज का सबसे ज्यादा चर्चित हिस्सा उसकी कहानी नहीं बल्कि उसका कोई बोल्ड या हिंसक दृश्य होता है।
दरअसल ओटीटी प्लेटफाॅर्म ने फिल्मकारों को वह स्वतंत्रता दी जो पारम्परिक सिनेमाघरों और सेंसर व्यवस्था में सीमित थी। यही कारण है कि अब कई निर्माता ऐसे विषयों और दृश्यों पर काम कर रहे हैं जिन्हें पहले जोखिम भरा माना जाता था लेकिन इस पूरी प्रवृत्ति का एक बड़ा आर्थिक पक्ष भी है। मनोरंजन उद्योग अब केवल टिकट खिड़की तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर ट्रेंड होना, वायरल क्लिप बनना और विवाद पैदा करना भी अब मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा बन चुका है। कई बार किसी फिल्म या वेब सीरीज का सबसे ज्यादा चर्चित हिस्सा उसकी कहानी नहीं बल्कि उसका कोई बोल्ड या हिंसक दृश्य होता है।
यही कारण है कि कुछ आलोचक कहते हैं कि आज का सिनेमा भावनाओं और संवेदनशीलता से ज्यादा ‘उत्तेजना’ बेचने की कोशिश कर रहा है। उनका मानना है कि कहानी और पात्रों की गहराई की जगह अब त्वरित सनसनी ने ले ली है। हालांकि फिल्मकारों का पक्ष अलग है। उनका कहना है कि समाज बदल चुका है और सिनेमा केवल उसी बदलाव को दिखा रहा है। आज का युवा दर्शक इंटरनेट और अंतरराष्ट्रीय कंटेंट के दौर में अधिक खुले विषय देखना चाहता है। इसलिए फिल्में और वेब सीरीज भी उसी दिशा में विकसित हो रही हैं।
दिलचस्प बात यह है कि बोल्डनेस का यह दौर पूरी तरह नया नहीं है। 1990 और 2000 के दशक में भी ‘जिस्म’, ‘मर्डर’ और ‘जूली’ जैसी फिल्मों ने अंतरंग दृश्यों और उत्तेजक गीतों के कारण खूब सुर्खियां बटोरी थीं। फर्क केवल इतना है कि उस समय यह सब बड़े पर्दे तक सीमित था जबकि आज डिजिटल माध्यमों ने इसे हर मोबाइल स्क्रीन तक पहुंचा दिया है।
दिलचस्प बात यह है कि बोल्डनेस का यह दौर पूरी तरह नया नहीं है। 1990 और 2000 के दशक में भी ‘जिस्म’, ‘मर्डर’ और ‘जूली’ जैसी फिल्मों ने अंतरंग दृश्यों और उत्तेजक गीतों के कारण खूब सुर्खियां बटोरी थीं। फर्क केवल इतना है कि उस समय यह सब बड़े पर्दे तक सीमित था जबकि आज डिजिटल माध्यमों ने इसे हर मोबाइल स्क्रीन तक पहुंचा दिया है।
सवाल यह नहीं है कि फिल्मों और वेब सीरीज में बोल्ड विषय क्यों दिखाए जा रहे हैं। असली सवाल यह है कि क्या यह सब कहानी की जरूरत है या केवल दर्शकों का ध्यान खींचने का फार्मूला? क्योंकि सिनेमा हमेशा समाज को प्रभावित करता है। यह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि सोच और संस्कृति को भी आकार देता है। ऐसे में जब हिंसा और अंतरंगता को लगातार ग्लैमराइज किया जाता है तो यह बहस स्वाभाविक है कि कहीं मनोरंजन धीरे-धीरे उत्तेजना के कारोबार में तो नहीं बदल रहा।
यह भी सच है कि हर बोल्ड फिल्म या वेब सीरीज को केवल अश्लीलता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। कई बार ऐसे विषय समाज की वास्तविकताओं और मानवीय जटिलताओं को सामने लाने का माध्यम भी बनते हैं। यानी हिंदी सिनेमा और ओटीटी आज एक ऐसे दौर में खड़े हैं जहां रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।
शायद इसी वजह से यह सवाल लगातार हमारे सामने बना हुआ है कि क्या बाॅलीवुड का बदलता चेहरा आधुनिक अभिव्यक्ति है या फिर मनोरंजन के नाम पर उत्तेजना का बढ़ता कारोबार?