Uttarakhand

स्वच्छता अभियान का जमीनी सच कूड़े के पहाड़ में तब्दील देवभूमि

एक ओर केंद्र सरकार ‘स्वच्छ भारत मिशन’ और धामी सरकार ‘स्वच्छ उत्तराखण्ड’ जैसे अभियानों के माध्यम से प्रदेश को स्वच्छ, सुंदर तथा प्रदूषण मुक्त बनाने के दावे कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। प्रदेश के कई शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई व्यवस्था बदहाल स्थिति में पहुंच चुकी है। जगह-जगह फैला कूड़ा, बजबजाते नाले, गंदगी से अटी सड़कें और दुर्गंध से परेशान लोग अब स्वच्छता अभियानों की वास्तविक स्थिति पर गम्भीर सवाल खड़े कर रहे हैं

वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाथ में झाड़ू लेकर ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत करते हुए देश को स्वच्छ और स्वस्थ बनाने का संकल्प दिलाया था, उसी अभियान की तस्वीर आज उत्तराखण्ड की सड़कों, नालों और कूड़े के ढेरों के बीच कहीं खोती नजर आ रही है। प्रदेश के मुखिया पुष्कर सिंह धामी भी समय-समय पर उत्तराखण्ड को स्वच्छ, और साफ-सुथरा व्यवस्थित राज्य बनाने के दावे करते रहे हैं लेकिन जमीनी हालात इन दावों पर सवाल खड़े करते दिखाई दे रहे हैं। आज सूबे के हालात यह हैं कि पोस्टरों, नारों और सरकारी विज्ञापनों में ‘स्वच्छ उत्तराखण्ड’ के दावे जरूर दिखाई देते हैं लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल उलट नजर आती है। जगह-जगह फैली गंदगी, बदहाल नालियां, जलभराव और कूड़े के पहाड़ अब यह सवाल खड़े कर रहे हैं कि आखिर स्वच्छता अभियान धरातल पर कितना सफल हो पाया है।

‘दि संडे पोस्ट’ की टीम द्वारा उत्तराखण्ड की कई विधानसभा क्षेत्रों में किए गए ग्राउंड सर्वे के दौरान लगभग हर क्षेत्र में सफाई व्यवस्था की भयावह स्थिति देखने को मिली। अधिकांश क्षेत्रों में कूड़ा-करकट खुलेआम सड़कों के किनारे पड़ा मिला। इन कूड़े के ढेरों से उठने वाली दुर्गंध ने आस-पास के वातावरण को दूषित कर दिया है। कई स्थानों पर कुछ मिनट खड़ा होना तक मुश्किल महसूस हुआ।

तराई क्षेत्र के इलाके रुद्रपुर, किच्छा, गदरपुर, रामनगर हल्द्वानी, कालाढूंगी और लालकुआं में हालात बेहद खराब पाए गए। यहां जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण नालों का गंदा पानी सड़कों और रास्तों पर बहता दिखाई दिया। कई क्षेत्रों में जलभराव स्थायी समस्या बन चुका है। गंदे पानी और कूड़े के ढेरों के कारण डेंगू, मलेरिया, त्वचा रोग एवं अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार बरसात के मौसम में स्थिति और अधिक भयावह हो जाती है, वहीं पर्वतीय क्षेत्रों, अल्मोड़ा और रानीखेत में भी हालात चिंताजनक पाए गए। प्राकृतिक सुंदरता के लिए पहचाने जाने वाले इन क्षेत्रों में जगह-जगह फैली गंदगी और कूड़े के ढेर प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करते दिखाई दिए।

ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान यह भी देखने को मिला कि कई क्षेत्रों में एक-दो मीटर की दूरी पर ही नया कूड़े का ढेर मौजूद था। सफाई व्यवस्था की निगरानी लगभग न के बराबर दिखाई दी और सम्बंधित विभाग केवल औपचारिक कार्रवाई तक सीमित नजर आए। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद जमीनी स्तर पर स्वच्छता अभियान का कोई प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दिया। कई इलाकों में महीनों तक कूड़ा नहीं उठाया जाता, जिससे आवारा पशुओं और बदबू की समस्या लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन चुकी है। प्रदेश के कई हिस्सों में नदियों और नालों में सीधे कचरा एवं गंदा पानी डाला जा रहा है, जिससे पर्यावरण को गम्भीर नुकसान पहुंच रहा है। इसी के साथ ‘हर घर शौचालय’ और सार्वजनिक स्वच्छता को लेकर किए गए सरकारी दावों का भी अधिकांश क्षेत्रों में कोई विशेष प्रभाव दिखाई नहीं दिया। ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान कई सार्वजनिक शौचालयों का अभाव देखने को मिला जबकि जहां शौचालय मौजूद थे वहां उनकी स्थिति अत्यंत बदहाल पाई गई। कई स्थानों पर नियमित सफाई, पानी की व्यवस्था एवं रखरखाव का अभाव नजर आया। हालात यह हैं कि जिस प्रदेश को शौच मुक्त का दर्जा कई साल पहले ही दिया जा चुका है वहां के बाशिंदों को खुले में शौच करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। विशेष रूप से महिलाओं, बुजुर्गों एवं यात्रियों को इससे भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार गंदगी और जलभराव के कारण डेंगू, मलेरिया, त्वचा रोग एवं अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। बावजूद इसके, सम्बंधित विभागों द्वारा स्थायी समाधान के बजाय केवल अस्थायी कार्रवाई की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो उत्तराखण्ड में स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए गम्भीर संकट उत्पन्न हो सकता है।

लोगों का कहना है कि सफाई व्यवस्था को लेकर ठोस नीति बनाई जाए, नियमित माॅनिटरिंग हो तथा जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। आखिर ‘स्वच्छ उत्तराखण्ड’ का सपना केवल पोस्टरों, विज्ञापनों और सरकारी दावों तक ही सीमित क्यों रह गया है जबकि धरातल पर हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं।

रुद्रपुर : बदहाल जल निकासी व्यवस्था और बढ़ता स्वास्थ्य संकट
रुद्रपुर विधानसभा क्षेत्र में स्वच्छता एवं जल निकासी व्यवस्था की स्थिति अत्यंत खराब देखने को मिली। शिविर लाइन, आवासीय काॅलोनियों, गलियों एवं मुख्य सड़कों के किनारे बनी नालियां या तो अधूरी मिलीं अथवा उनकी नियमित सफाई नहीं हो रही है। कई स्थानों पर जलभराव और गंदगी के कारण दुर्गंध फैली हुई है जिससे डेंगू, मलेरिया, त्वचा रोग एवं अन्य संक्रामक बीमारियों से लोगों के संक्रमित होने के मामले सामने आए। पूरे क्षेत्र में कचरा प्रबंधन की स्थिति भी चिंताजनक पाई गई। जगह-जगह खुले में पड़े कूड़े के ढेर और गंदा पानी आम दृश्य बन चुके हैं। निरीक्षण के दौरान रिजर्व पुलिस लाइन ऊधमसिंह नगर के प्रवेश द्वार के समीप नाले में लम्बे समय से जमा कचरा एवं गंदा पानी देखा गया जिससे आसपास का वातावरण दूषित हो रहा है। अटरिया ट्रांजिट कैम्प क्षेत्र में भी नालों में जलभराव एवं कचरे का जमाव देखने को मिला।  इसी के साथ रुद्रपुर की कल्याणी नदी भी लगातार प्रदूषण की चपेट में आती दिखाई दी। निरीक्षण के दौरान नदी में गंदगी, कचरे का जमाव एवं रखरखाव की कमी साफ नजर आई। नदी का पानी नाले जैसा दिखाई दिया। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि लम्बे समय से नदी की सफाई एवं संरक्षण को लेकर कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है।

किच्छा : तहसील और अस्पताल के बीच पसरी गंदगी
किच्छा विधानसभा क्षेत्र में भी स्वच्छता एवं जल निकासी व्यवस्था की स्थिति अत्यंत चिंताजनक पाई गई। यहां भी शिविर लाइन, आवासीय काॅलोनियों, गलियों एवं मुख्य सड़कों के किनारे बनी नालियां कई स्थानों पर अधूरी मिलीं जबकि अधिकांश क्षेत्रों में जल निकासी नहीं होने से जलभराव और गंदगी की समस्या स्पष्ट रूप से दिखाई दी। निरीक्षण के दौरान किच्छा तहसील परिसर के समीप स्थित नाले में लम्बे समय से जमा कचरा एवं गंदा पानी देखा गया। विशेष बात यह रही कि उक्त स्थान से लगभग 50 मीटर की दूरी पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) तथा दूसरी ओर लगभग 50 मीटर की दूरी पर थाना किच्छा स्थित है, इसके बावजूद क्षेत्र में स्वच्छता एवं जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं पाई गई। तहसील परिसर एवं उसके आस-पास स्थित सार्वजनिक शौचालय भी बदहाल अवस्था में मिले। शौचालयों की नियमित सफाई एवं रखरखाव कहीं देखने को नहीं मिला, लोग तहसील के सामने स्थित मैदान एवं अस्पताल परिसर के बाहर खुले में शौच करते दिखाई दिए। इसके
अतिरिक्त रजिस्ट्रार कानूनगो कार्यालय के पीछे लम्बे समय से कूड़े का बड़ा ढेर जमा मिला। स्थानीय नागरिकों ने बताया कि बरसात के मौसम में स्थिति और गम्भीर हो जाती है तथा मच्छरों एवं दुर्गंध के कारण आस-पास रहने वाले लोगों को लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

गदरपुर : विधानसभा के प्रवेश मार्ग पर फैली गंदगी
गदरपुर विधानसभा क्षेत्र में भी सफाई व्यवस्था संतोषजनक नहीं पाई गई। काकर सेतु से रुद्रपुर-दिनेशपुर मार्ग पर सड़क के दोनों ओर बड़े पैमाने पर कूड़े के ढेर पड़े मिले। पुल के नीचे बहते पानी में भी प्लास्टिक एवं अन्य कचरा फेंका गया था, जिससे पूरा क्षेत्र प्रदूषित एवं दुर्गंधयुक्त हो चुका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्थिति केवल प्रवेश मार्ग तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे विधानसभा क्षेत्र में जगह-जगह इसी प्रकार गंदगी फैली हुई है। दुर्गंध की स्थिति इतनी गम्भीर है कि वहां कुछ मिनट खड़ा रहना भी मुश्किल महसूस होता है। लोगों ने आरोप लगाया कि नियमित सफाई एवं निगरानी के अभाव में क्षेत्र की स्थिति लगातार खराब होती जा रही है।

लालकुआं : गोलापार डम्पिंग जोन से बढ़ता प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट

गौला पार इलाके में स्थित डम्पिंग जोन भी रेलवे फाटक के समीप मुख्य सड़क मार्ग के किनारे कूड़ा बिखरा पड़ा मिला जो अब ‘कूड़े के पहाड़’ का रूप ले चुका है। यह डम्पिंग जोन इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय खेल स्टेडियम से लगभग एक किलोमीटर पहले स्थित है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस डम्पिंग जोन के ठीक सामने लगभग 45 हजार की आबादी वाला बनभूलपुरा क्षेत्र स्थित है। इसी मार्ग से हल्द्वानी नबीन मंडी जाने वाली सड़क भी गुजरती है जिससे प्रतिदिन हजारों लोगों का आवागमन होता है। स्थानीय लोगों के अनुसार जब-जब इस कूड़े को जलाया जाता है, तब पूरे क्षेत्र में जहरीला धुआं और तेज दुर्गंध फैल जाती है जिससे लोगों का सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि लम्बे समय से फैल रहे प्रदूषण और धुएं के कारण बनभूलपुरा क्षेत्र धीरे-धीरे बीमारियों का गढ़ बनता जा रहा है। लोगों ने आरोप लगाया कि समस्या वर्षों से बनी हुई है लेकिन स्थायी समाधान के लिए अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।

रानीखेत : पर्यटन क्षेत्र में गंदगी और शौचालयों का संकट
रानीखेत विधानसभा क्षेत्र में भी स्वच्छता व्यवस्था की खराब स्थिति सामने आई। खनिया क्षेत्र और किलघर मार्ग पर सड़कों एवं रास्तों के किनारे खुले में पड़े कूड़े के ढेर स्थानीय लोगों एवं पर्यटकों दोनों के लिए परेशानी का कारण बने हुए हैं। रानीखेत कैंट क्षेत्र होने के बावजूद सफाई व्यवस्था संतोषजनक नहीं दिखी, वहीं सार्वजनिक शौचालयों की कमी भी बड़ी समस्या के रूप में सामने आई। स्थानीय नागरिकों ने बताया कि बाजार क्षेत्र को छोड़ अधिकांश इलाकों एवं मुख्य मार्गों पर शौचालय नहीं हैं जिससे महिलाओं, बुजुर्गों एवं यात्रियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

अल्मोड़ा : नगर निगम क्षेत्र में भी बदहाल सफाई व्यवस्था
अल्मोड़ा में जिला मुख्यालय एवं नगर निगम क्षेत्र होने के बावजूद सफाई व्यवस्था सवालों के घेरे में दिखाई दी। शहर के कई हिस्सों में खुले में कूड़ा फेंका जाना आम बात बन चुकी है। बाजार क्षेत्रों, सड़क किनारों एवं आवासीय इलाकों में कूड़े के ढेर स्पष्ट रूप से दिखाई दिए। रिपोर्टिंग के दौरान यह भी सामने आया कि शहर में सार्वजनिक शौचालयों की संख्या सीमित है और जो मौजूद हैं उनकी हालत बेहद खराब है। कई स्थानों पर गंदगी, बदबू एवं पानी की कमी की शिकायतें मिलीं। महिलाओं के लिए यह समस्या और अधिक गम्भीर है क्योंकि सुरक्षित एवं स्वच्छ शौचालयों का अभाव उन्हें असुविधा और असुरक्षा दोनों की स्थिति में डालता है।

निष्कर्ष : ‘स्वच्छ भारत’ और ‘स्वच्छ उत्तराखण्ड’ जैसे अभियानों पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं लेकिन जमीनी हकीकत इन अभियानों की वास्तविक स्थिति उजागर कर रही है। उत्तराखण्ड के कई विधानसभा क्षेत्रों में फैली गंदगी, बदहाल नालियां, जलभराव, खुले में पड़ा कचरा और सार्वजनिक शौचालयों की खराब स्थिति यह दर्शाती है कि योजनाओं और दावों के बीच धरातल पर बड़ा अंतर मौजूद है। यदि समय रहते प्रभावी एवं जवाबदेह व्यवस्था विकसित नहीं की गई तो आने वाले समय में यह समस्या केवल स्वच्छता तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि यह प्रदेश के स्वास्थ्य, पर्यावरण और पर्यटन व्यवस्था के लिए भी गम्भीर चुनौती बन सकती है।

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