Editorial

गोदी मीडिया, ग्लोबल सवाल और लोकतंत्र

भारतीय लोकतंत्र का शायद यह सबसे दिलचस्प लेकिन सबसे चिंताजनक दौर है कि देश के प्रधानमंत्री खुले प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल नहीं लेते लेकिन ‘नाॅन-पॉलिटिकल इंटरव्यू’ में यह जरूर बताते हैं कि उन्हें आम पसंद है या नहीं। यह केवल एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान मीडिया संस्कृति का गम्भीर प्रतीक बन चुका है। 24 अप्रैल 2019 को अभिनेता अक्षय कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चर्चित इंटरव्यू लिया था। उस समय देश में बेरोजगारी, नोटबंदी के दुष्प्रभाव, किसानों की आत्महत्याएं, आर्थिक सुस्ती और विदेशों से काला धन वापस लाने जैसे मुद्दे राष्ट्रीय बहस के केंद्र में थे। लोगों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री से पूछा जाएगा कि विदेशों से काला धन लाने के वादे का क्या हुआ, हर साल दो करोड़ रोजगार देने की बात क्यों अधूरी रह गई, नोटबंदी से आखिर देश को क्या लाभ हुआ, छोटे उद्योग क्यों टूट गए, युवाओं में बेरोजगारी क्यों बढ़ी लेकिन प्रधानमंत्री से पूछे गए सवाल थे- ‘क्या आपको आम पसंद है?’, ‘आप आम काटकर खाते हैं या चूसकर?’, ‘क्या आप सोशल मीडिया पर मीम्स देखते हैं?’, ‘क्या आपकी मां आपको डांटती थीं?’

यह इंटरव्यू भारतीय राजनीति और मीडिया के रिश्ते का एक हास्यास्पद प्रतीक बन गया। लोकतंत्र में पत्रकारिता का काम सत्ता से जवाब मांगना होता है लेकिन यहां संवाद सत्ता की सहजता और छवि निर्माण के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई दिया। यही कारण है कि उस इंटरव्यू के बाद ‘गोदी मीडिया’ शब्द फिर तेजी से चर्चा में आया। यह शब्द असल में उस मीडिया संस्कृति की आलोचना है जिसमें पत्रकार सरकार से असहज प्रश्न पूछने के बजाय उसकी सार्वजनिक छवि को चमकाने का माध्यम बन जाते हैं।

दरअसल, यह समस्या केवल एक इंटरव्यू तक सीमित नहीं है। पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री के साथ हुए अनेक टीवी इंटरव्यू में यह पैटर्न लगातार दिखाई देता है। सुधीर चैधरी सहित कई टीवी एंकरों ने प्रधानमंत्री से पूछा- ‘आप इतना काम कैसे कर लेते हैं?’, ‘आप कितने घंटे सोते हैं?’, ‘आप थकते नहीं?’, ‘आपकी ऊर्जा का स्रोत क्या है?’ इसी प्रकार अंजना ओम कश्यप, श्वेता सिंह और अन्य चर्चित टीवी चेहरों के साथ हुए संवादों में भी बातचीत का स्वर बेहद चापलूसी भरा स्पष्ट नजर आया था। उस समय देश जिन गम्भीर सवालों से जूझ रहा था, वे प्रश्न प्रायः हाशिए पर रहे।

बेरोजगारी, चीन सीमा विवाद, संस्थाओं की स्वतंत्रता, चुनावी बाॅन्ड, किसानों का आंदोलन, मणिपुर हिंसा, महंगाई, मीडिया पर दबाव, ये वे विषय थे जिन पर जनता उत्तर चाहती थी लेकिन मुख्यधारा के बड़े इंटरव्यू कई बार इन प्रश्नों से बचते दिखाई दिए।

17 मई 2019 को भाजपा मुख्यालय में प्रधानमंत्री पहली बार औपचारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उपस्थित हुए। लेकिन वह दृश्य भारतीय लोकतंत्र के लिए विचित्र था। प्रधानमंत्री मंच पर मौजूद थे लेकिन उन्होंने कोई सवाल नहीं लिया। सभी जवाब तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दे रहे थे। पत्रकार लगातार प्रधानमंत्री की ओर देख रहे थे लेकिन उन्होंने मुस्कुरा के प्रश्नों को टाल दिया।

लोकतांत्रिक परम्पराओं में प्रेस कॉन्फ्रेंस का अर्थ ही यह होता है कि सत्ता सीधे सवालों का सामना करे। लेकिन यहां प्रेस कॉन्फ्रेंस थी, प्रेस थी, कैमरे थे, प्रधानमंत्री भी थे, केवल जवाबदेही अनुपस्थित थी और इस अनुपस्थिति के कारण ही प्रश्न उठे कि क्या भारत में प्रेस की स्वतंत्रता बची हुई है जो किसी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक होती है? क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र सवालों से चलता है। सत्ता से असहमति, आलोचना और जवाब मांगने की संस्कृति ही लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करती है।

हाल के यूरोप दौरे ने इस बहस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिर जीवित कर दिया। नॉर्वे में प्रधानमंत्री मोदी और नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनस इस्टोरे की संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान नाॅर्वे की पत्रकार हेले लिग ने प्रधानमंत्री से सीधा सवाल पूछा- ‘प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवाल क्यों नहीं लेते? क्या आप हमारी सरकार के विश्वास के योग्य हैं?’ प्रधानमंत्री ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया और आगे बढ़ गए। यूरोप में विदेशी नेताओं से सीधे सवाल पूछना सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया मानी जाती है लेकिन भारत में यह घटना तुरंत राजनीतिक विवाद का विषय बन गई।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि वे कठिन सवालों से बचते हैं। दूसरी ओर सोशल मीडिया पर उस महिला पत्रकार के खिलाफ जबरदस्त ट्रोलिंग शुरू हो गई। उन्हें ‘भारत विरोधी’, ‘पश्चिमी एजेंडा’ और ‘एंटी इंडिया’ जैसे आरोपों का सामना करना पड़ा। यह स्थिति स्वयं में गम्भीर है क्योंकि लोकतंत्र में पत्रकार द्वारा सवाल पूछना असामान्य नहीं होना चाहिए लेकिन भारत में अब यह स्थिति बनती दिखाई दे रही है कि यदि कोई पत्रकार सत्ता से कठिन सवाल पूछे तो उसे राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया जाता है। विवाद बढ़ने पर विदेश मंत्रालय को भी सफाई देनी पड़ी।

विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी सिबी जाॅर्ज ने कहा कि ऐसे सवाल ‘सवाल पूछने वाले व्यक्ति की समझ की कमी’ को दिखाते हैं। बाद में विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग में हेले लिग ने मानवाधिकार और प्रेस स्वतंत्रता को लेकर फिर सवाल उठाए। भारतीय पक्ष ने भारत को ‘सिविलिजेशनल नेशन’ बताते हुए लोकतंत्र का बचाव किया लेकिन असली प्रश्न वही बना रहा कि यदि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तो उसके प्रधानमंत्री खुले सवालों से बचते क्यों दिखाई देते हैं?

यह पहली बार नहीं था। 2022 में जर्मनी यात्रा के दौरान भी यही प्रश्न उठा था। उस समय जर्मनी के चांसलर ओलाफ स्काॅलज थे। जर्मनी की लोकतांत्रिक परम्परा में यह सामान्य माना जाता है कि विदेशी नेता संयुक्त प्रेस वार्ता में पत्रकारों के सवाल लें लेकिन उस यात्रा में कोई सवाल नहीं लिया गया। जर्मन ब्राॅडकास्टर ‘देउत्सुचे वेले’ के इंटरनेशनल एडिटर रिचर्ड वाॅकर ने तब लिखा था कि भारतीय पक्ष के आग्रह पर पत्रकारों के सवाल नहीं लिए गए। इसी प्रकार हाल की नीदरलैंड यात्रा के दौरान भी स्थानीय पत्रकारों ने इस मुद्दे पर सवाल उठाए।

हालांकि जून 2023 में अमेरिका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो सवालों के जवाब दिए थे। एक अमेरिकी पत्रकार ने मानवाधिकार और लोकतंत्र पर प्रश्न पूछा था। प्रधानमंत्री ने उत्तर दिया- ‘लोकतंत्र हमारी रगों में बहता है। हमारे लोकतंत्र में भेदभाव के लिए बिल्कुल कोई जगह नहीं है।’ लेकिन पश्चिमी मीडिया ने इसे भी ‘दुर्लभ घटना’ बताया क्योंकि प्रधानमंत्री सामान्यतः प्रेस के सवाल नहीं लेते। ‘एसोसिएटेड प्रेस’ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारतीय अधिकारियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए अंतिम समय में सहमति दी थी और व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया था कि प्रेस के सवाल लेना स्टेट विजिट की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।

मई 2024 में ‘इंडिया टुडे’ को दिए इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं इस प्रश्न पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि वे मीडिया का ‘उपयोग’ करने वाली राजनीति में विश्वास नहीं करते। उन्होंने कहा कि अब मीडिया ही जनता तक पहुंचने का एकमात्र माध्यम नहीं रह गया है और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए सीधे संवाद सम्भव हैं। यह तर्क अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हो सकता है। वास्तव में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने राजनीतिक संवाद की प्रकृति बदल दी है। नेता अब सीधे जनता तक पहुंच सकते हैं लेकिन इसके बावजूद प्रेस कॉन्फ्रेंस की आवश्यकता समाप्त नहीं होती। क्योंकि सोशल मीडिया संवाद ‘वन-वे कम्युनिकेशन’ होता है जबकि प्रेस कॉन्फ्रेंस जवाबदेही का माध्यम होती है। वहां नेता से असुविधाजनक सवाल पूछे जा सकते हैं। लोकतंत्र की आत्मा उसी असुविधा में छिपी होती है।

यही कारण है कि पूर्व प्रधानमंत्रियों के दौर का उदाहरण बार-बार सामने आता है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे। उनसे चीन, कश्मीर, आर्थिक नीतियों और विदेश नीति पर तीखे सवाल पूछे जाते थे। नेहरू का प्रसिद्ध कथन है “I would rather have a completely free press with all the dangers involved in the wrong use of that freedom than a suppressed or regulated press.” नेहरू से जुड़ा एक चर्चित प्रसंग आज भी याद किया जाता है। एक महिला ने उनसे गुस्से में पूछा- ‘हमें आजादी से मिला क्या?’ बताया जाता है कि महिला ने उनका गिरेबान पकड़ लिया था। आसपास मौजूद लोग नाराज हो गए लेकिन नेहरू ने उन्हें रोकते हुए कहा- ‘यह जो आप प्रधानमंत्री का गिरेबान पकड़कर सवाल पूछ पा रही हैं, यही आजादी है।’ यह प्रसंग केवल एक राजनीतिक किस्सा नहीं बल्कि उस लोकतांत्रिक संस्कृति का प्रतीक है जिसमें आलोचना को राष्ट्रविरोध नहीं माना जाता था।

दरअसल, लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता केवल संवैधानिक प्रावधान नहीं होती, वह राजनीतिक संस्कृति का भी हिस्सा होती है। जब मीडिया सत्ता से सवाल पूछना बंद कर देता है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे एकतरफा संवाद में बदलने लगता है। आज भारत में बड़ी संख्या में लोग यह महसूस करते हैं कि मुख्यधारा का एक हिस्सा सत्ता से असहज सवाल पूछने से बचता है। यही कारण है कि स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता और वैकल्पिक मीडिया प्लेटफाॅम्र्स का प्रभाव लगातार बढ़ा है।’

भारत पर अध्ययन करने वाले फ्रांसीसी राजनीतिक वैज्ञानिक क्रिस्टोफ जैफ्रेलाॅट के अनुसार भारतीय प्रधानमंत्री मोदी नियंत्रित संवाद को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि कठिन सवाल राजनीतिक नैरेटिव को प्रभावित कर सकते हैं। जैफ्रेलाॅट के अनुसार बेरोजगारी, चीन, सामाजिक तनाव और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे ऐसे विषय हैं जिन पर सरकार असहज प्रश्नों से बचना चाहती है। उन्होंने कहा कि इसी कारण संवाद ‘वन वे ट्रैफिक’ बन जाता है लेकिन अंततः प्रश्न किसी एक प्रधानमंत्री, किसी एक पत्रकार या किसी एक दल का नहीं है। प्रश्न लोकतांत्रिक परम्परा का है। यदि मीडिया केवल सरकार की उपलब्धियां दिखाए और जनता की ओर से सवाल पूछना छोड़ दे तो लोकतंत्र कमजोर होता है। सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि क्या पत्रकार बिना भय के सवाल पूछ सकते हैं और क्या सत्ता उन सवालों का सामना करने के लिए तैयार है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसलिए यहां लोकतांत्रिक मानक भी बड़े होने चाहिए। प्रेस काॅन्फ्रेंस कोई औपचारिक रस्म नहीं होती। वह लोकतंत्र की सार्वजनिक परीक्षा होती है। वहां सत्ता को बिना स्क्रिप्ट, बिना तैयारी और बिना नियंत्रण के जनता के प्रश्नों का सामना करना पड़ता है। यही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है क्योंकि लोकतंत्र चापलूसी से नहीं सवालों से मजबूत होता है।

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