पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पर ममता बनर्जी की पकड़ कमजोर पड़ रही है? कभी ‘वन वुमन शो’ कही जाने वाली टीएमसी आज बगावत, अंदरूनी असंतोष और बदलते राजनीतिक समीकरणों के दौर से गुजरती दिखाई दे रही है। लगातार सामने आ रहे घटनाक्रमों ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या पार्टी की कमान अब धीरे-धीरे ममता बनर्जी के हाथों से फिसल जाएगी जैसे तमाम सवाल राजनीतिक गलियारों और मीडिया में गूंज रहे हैं।
गौरतलब है कि टीएमसी को पहला बड़ा झटका तब लगा जब पार्टी के 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने विद्रोह का बिगुल बजा दिया। इन विधायकों ने अलग गुट बनाते हुए पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुन लिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि विधानसभा अध्यक्ष ने भी इस गुट को मान्यता दे दी। इससे विधानसभा में टीएमसी की स्थिति कमजोर हुई और नेतृत्व की पकड़ पर सवाल उठने लगे।
विधायकों की बगावत का संकट अभी थमा भी नहीं था कि लोकसभा में भी पार्टी को बड़ा झटका लग गया। टीएमसी के 28 सांसदों में से 20 सांसद खुलकर बगावत पर उतर आए। इन सांसदों ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने और कानूनी जटिलताओं से बचने के लिए ‘नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया’ (एनसीपीआई) में विलय की घोषणा कर दी। बागी गुट की अगुवाई कर रहीं शताब्दी राॅय और काकोली घोष ने इसकी पुष्टि की। इतना ही नहीं, बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर संसद में अलग बैठने की अनुमति भी मांगी और औपचारिक पत्र सौंपा। राजनीतिक रूप से सबसे अहम घटनाक्रम यह रहा कि एनसीपीआई में शामिल होने के बाद इन सांसदों ने सत्तारूढ़ एनडीए को समर्थन देने का फैसला लिया है। इसके बाद सवाल उठने लगे कि क्या टीएमसी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष अब खुलकर सामने आ रहा है? क्या पार्टी अब केवल ममता बनर्जी के करिश्मे के भरोसे नहीं चल सकती?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले दो दशकों से पश्चिम बंगाल की राजनीति का केंद्र ममता बनर्जी रही हैं। टीएमसी की स्थापना से लेकर 34 वर्षों के वामपंथी शासन को सत्ता से बेदखल करने और लगातार चुनावी सफलताएं हासिल करने तक पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता रही है लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने पार्टी के भीतर बदलते शक्ति समीकरणों की ओर संकेत किया है। इस चर्चा का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी का बढ़ता प्रभाव है। बीते कुछ वर्षों में अभिषेक ने संगठन के भीतर मजबूत पकड़ बनाई है। उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनावी रणनीति और संगठनात्मक फैसलों तक उनकी भूमिका लगातार बढ़ी है। युवा नेताओं और कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग उन्हें पार्टी के भविष्य के चेहरे के रूप में देख रहा है।
कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि टीएमसी इस समय नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि नेतृत्व विस्तार के दौर से गुजर रही है। हालांकि पार्टी के भीतर सभी नेता इस बदलाव को लेकर एकमत नहीं दिखते। पुराने और नए नेतृत्व के बीच संतुलन बनाए रखना ममता बनर्जी के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। टीएमसी की मुश्किलें केवल आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं हैं। शिक्षक भर्ती घोटाले समेत कई भ्रष्टाचार सम्बंधी मामलों और केंद्रीय एजेंसियों की जांच ने भी पार्टी की छवि को प्रभावित किया है। विपक्ष लगातार इन मुद्दों को लेकर सरकार और पार्टी नेतृत्व को घेर रहा है। ऐसे में बागी विधायकों और सांसदों का अलग होना टीएमसी के लिए राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दोनों स्तरों पर बड़ा झटका माना जा रहा है।
दूसरी ओर भाजपा पश्चिम बंगाल में अपने जनाधार को लगातार मजबूत करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस और वाम दल भी अपने खोए हुए आधार को वापस पाने के प्रयास में जुटे हैं। ऐसे में टीएमसी के भीतर किसी भी प्रकार की टूट विपक्ष के लिए अवसर बन सकती है। हालांकि इन तमाम चुनौतियों के बावजूद यह कहना जल्दबाजी होगी कि ममता बनर्जी के हाथ से पूरी तरह टीएमसी निकल गई है। आज भी बंगाल में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा और सबसे प्रभावशाली नेता ममता बनर्जी ही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी मतदाताओं तक, पार्टी का बड़ा वोट बैंक उनकी छवि और नेतृत्व पर टिका हुआ है। फिर भी बगावत, असंतोष और नए शक्ति केंद्रों के उभार ने टीएमसी के सामने गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या टीएमसी अभी भी पूरी तरह ‘दीदी’ की पार्टी है या फिर पार्टी किसी नए नेतृत्व और नई राजनीतिक दिशा की ओर बढ़ रही है? आने वाले महीनों के राजनीतिक घटनाक्रम इस सवाल का जवाब तय करेंगे।