हर चुनावी हार के बाद विपक्ष का एक वर्ग सबसे पहले राहुल गांधी और कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करता है लेकिन वही नेता शायद ही कभी राहुल गांधी की तरह सड़क पर उतरकर जनता के बीच संघर्ष करते दिखाई देते हैं। ऐसे दौर में जब अधिकांश विपक्षी राजनीति बयान, ट्वीट और प्रेस काॅन्फ्रेंस तक सीमित होती जा रही है, वहीं राहुल गांधी ने यात्राओं, जनसंवाद और वैचारिक संघर्ष के जरिए खुद को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बनाए रखा है। सवाल यह है कि राहुल गांधी की आलोचना करने वाले नेता स्वयं लोकतांत्रिक संघर्ष में कितना योगदान दे रहे हैं? भारतीय राजनीति में यह एक दिलचस्प परिघटना है कि जब कभी भी विपक्ष किसी संकट में होता है, चुनावी नतीजे अपेक्षा के अनुरूप नहीं आते और भाजपा के सामने विपक्ष कमजोर पड़ता दिखाई देता है तो सबसे पहले कांग्रेस, विशेष रूप से राहुल गांधी पर सवाल उठाए जाते हैं। ऐसा लगता है मानो पूरे विपक्ष की सफलताओं और असफलताओं का केंद्र केवल राहुल गांधी ही हैं। यदि विपक्ष जीतता है तो श्रेय कई दलों में बंट जाता है लेकिन यदि हारता है तो उंगलियां कांग्रेस और राहुल गांधी की ओर उठने लगती हैं
हाल ही में आयोजित इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कांग्रेस को ‘बड़ा दिल’ रखने की सलाह दी। गठबंधन राजनीति में ऐसी सलाहें नई नहीं हैं। क्षेत्रीय दल अक्सर कांग्रेस से अपेक्षा करते हैं कि वह अधिक उदार बने, अधिक समझौते करे और सहयोगियों के लिए अधिक जगह छोड़े लेकिन शायद ही कभी यह प्रश्न पूछा जाता है कि क्या विपक्ष के अन्य दल भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी निभाने को तैयार हैं जितनी वे कांग्रेस से अपेक्षा करते हैं? यहीं से राहुल गांधी की राजनीति को समझने की शुरुआत होती है।
राहुल गांधी के बारे में राय चाहे जो हो लेकिन एक तथ्य से इनकार करना मुश्किल है कि पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा और नरेंद्र मोदी के विरुद्ध सबसे लगातार, सबसे दमदार और सबसे जोखिमपूर्ण राजनीतिक संघर्ष यदि किसी नेता ने किया है तो वह राहुल गांधी हैं। यह बात उनके समर्थकों के लिए नहीं बल्कि उनके आलोचकों के लिए भी विचारणीय है। कांग्रेस को ‘बड़ा दिल’ रखने की सलाह देने वाले अखिलेश यादव एक ऐसे राजनीतिक परिवार से आते हैं जिसकी नींव संघर्ष पर रखी गई थी। उनके पिता मुलायम सिंह यादव राजनीति के उन नेताओं में थे जिन्होंने सड़क से संसद तक का सफर तय किया था। किसान आंदोलनों से लेकर आपातकाल के दौर तक, जेल यात्राओं से लेकर जनसभाओं तक, मुलायम सिंह का पूरा राजनीतिक जीवन संघर्ष की पाठशाला था। वे उन नेताओं में थे जिन्होंने जनता के बीच अपनी जगह बनाई थी, न कि तैयार मंच पर आकर खड़े हो गए थे लेकिन अखिलेश यादव का राजनीतिक जीवन अलग परिस्थितियों में विकसित हुआ। उन्हें एक मजबूत संगठन मिला, स्थापित राजनीतिक आधार मिला और एक ऐसी विरासत मिली जिसे बनाने में उनके पिता ने कई दशक लगाए थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि अखिलेश एक कुशल चुनावी नेता हैं और उन्होंने समाजवादी पार्टी को नई ऊर्जा भी दी है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि वे अपने पिता जैसी आंदोलनकारी राजनीति विकसित करने का माद्दा नहीं रखते।
उत्तर प्रदेश में पिछले एक दशक के दौरान अनेक ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया। ‘हाथरस कांड’, ‘उन्नाव प्रकरण’, किसानों के मुद्दे, बेरोजगारी, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध, कानून-व्यवस्था से जुड़े सवाल इत्यादि सभी ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विपक्ष के सामने व्यापक जनआंदोलन खड़ा करने का अवसर था। समाजवादी पार्टी ने इन मुद्दों पर प्रतिक्रिया दी, सरकार की आलोचना की, प्रेस काॅन्फ्रेंस कीं और सोशल मीडिया पर सक्रियता दिखाई लेकिन शायद ही कोई ऐसा आंदोलन दिखाई देता है जिसकी पहचान अखिलेश यादव के नेतृत्व से जुड़ गई हो। यह आलोचना केवल अखिलेश यादव तक सीमित नहीं है। भारतीय विपक्ष का बड़ा हिस्सा आज इसी समस्या से जूझ रहा है। राजनीति धीरे-धीरे आंदोलन से प्रबंधन की ओर खिसक गई है। संघर्ष की जगह रणनीति ने ले ली है, संगठन की जगह मीडिया ने और जनसम्पर्क की जगह सोशल मीडिया ने।
राहुल गांधी का राजनीतिक व्यवहार लेकिन अखिलेश यादव तथा अन्य विपक्षी नेताओं से अलग नजर आता है। राहुल गांधी भी राजनीतिक वंश से आते हैं। वे उस परिवार के सदस्य हैं जिसने स्वतंत्र भारत की राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने अपने राजनीतिक व्यक्तित्व को केवल विरासत तक सीमित रखने से इनकार किया है। यदि वे चाहते तो केवल चुनावी राजनीति कर सकते थे। वे संसद में भाषण देते, चुनावी सभाएं करते और दिल्ली की राजनीति तक सीमित रहते लेकिन उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना जो आधुनिक भारतीय राजनीति में लगभग लुप्त हो चुका है, जनसंवाद का रास्ता।
‘भारत जोड़ो यात्रा’ इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। कन्याकुमारी से कश्मीर तक हजारों किलोमीटर की पदयात्रा केवल राजनीतिक कार्यक्रम भर नहीं था। यह एक प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों प्रकार की
राजनीतिक पहल थी। प्रतीकात्मक इसलिए कि उसने यह संदेश दिया कि राजनीति अभी भी जनता के बीच जाकर की जा सकती है। व्यावहारिक इसलिए कि इस यात्रा ने राहुल गांधी को देश के विभिन्न हिस्सों, समुदायों और वर्गों से सीधे संवाद का अवसर दिया।
राजनीतिक पहल थी। प्रतीकात्मक इसलिए कि उसने यह संदेश दिया कि राजनीति अभी भी जनता के बीच जाकर की जा सकती है। व्यावहारिक इसलिए कि इस यात्रा ने राहुल गांधी को देश के विभिन्न हिस्सों, समुदायों और वर्गों से सीधे संवाद का अवसर दिया।
भारतीय राजनीति में लम्बे समय से नेताओं और जनता के बीच दूरी बढ़ती गई है। अधिकांश नेता जनता तक हेलीकाॅप्टर से पहुंचते हैं और कुछ घंटों बाद लौट जाते हैं। ऐसे समय में हजारों किलोमीटर पैदल चलने का निर्णय अपने आप में असाधारण था। इससे सहमति या असहमति हो सकती है लेकिन इसे केवल चुनावी स्टंट कहकर खारिज करना कठिन है।
‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद राहुल गांधी की छवि में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई दिया। लम्बे समय तक उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया जो राजनीति को गम्भीरता से नहीं लेते लेकिन यात्रा ने एक अलग तस्वीर प्रस्तुत की। लोगों ने उन्हें लगातार चलते हुए देखा, लोगों से बात करते हुए देखा, आलोचनाओं का सामना करते हुए देखा और अपने विचारों को विस्तार से रखते हुए देखा। इसके बाद ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ ने भी इसी राजनीतिक शैली को आगे बढ़ाया। यह संकेत था कि राहुल गांधी अपनी राजनीति को केवल चुनावी घटनाओं तक सीमित नहीं रखना चाहते लेकिन राहुल गांधी की राजनीति को समझने के लिए केवल यात्राओं को देखना पर्याप्त नहीं है। उनके सामने मौजूद चुनौतियों को भी समझना होगा।
भारतीय राजनीति का वर्तमान दौर सामान्य दौर नहीं है। चुनावी राजनीति की प्रकृति बदल चुकी है। संसाधनों का असमान वितरण, मीडिया का बदलता स्वरूप, डिजिटल प्रचार की शक्ति, संस्थागत प्रश्न और राजनीतिक ध्रुवीकरण, इन सबने विपक्षी राजनीति को पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन बना दिया है। ऐसे समय में किसी भी विपक्षी नेता का मूल्यांकन केवल चुनावी जीत और हार के आधार पर करना अधूरा होगा।
राहुल गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक विशेषता यह है कि उन्होंने वैचारिक प्रश्नों को राजनीति के केंद्र में बनाए रखने की कोशिश की है। वे लगातार संविधान, सामाजिक न्याय, आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, किसानों के मुद्दे, जातीय जनगणना और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका जैसे विषयों पर बात करते हैं। यह अलग बात है कि इन विषयों का चुनावी लाभ हमेशा तत्काल नहीं मिलता। दरअसल भारतीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा अब विचारों से अधिक चुनावी गणित पर केंद्रित हो गया है। ऐसे माहौल में वैचारिक राजनीति अक्सर अलोकप्रिय दिखाई देती है लेकिन इतिहास बताता है कि कई बार वही नेता लम्बे समय में प्रभाव छोड़ते हैं जो तत्काल चुनावी लाभ से ऊपर उठकर व्यापक प्रश्नों को उठाते हैं।
राहुल गांधी की आलोचना करने वालों का एक वर्ग यह भी कहता है कि वे चुनाव नहीं जिता पाते। यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं है। कांग्रेस ने उनके नेतृत्व में कई चुनावी पराजय देखी हैं लेकिन यहां एक प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि क्या भारतीय विपक्ष की सभी पराजयों का कारण केवल राहुल गांधी हैं? यदि ऐसा है तो फिर क्षेत्रीय दलों की जिम्मेदारी क्या है? क्या उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में क्षेत्रीय दल, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, महाराष्ट्र में विपक्षी दल और अन्य राज्यों के नेता अपनी सफलताओं और असफलताओं के लिए जवाबदेह नहीं हैं? वास्तव में राहुल गांधी की आलोचना कई बार एक सुविधाजनक राजनीतिक विकल्प बन जाती है। इससे विपक्ष के अन्य दल अपनी कमजोरियों पर चर्चा से बच जाते हैं। वे कांग्रेस की आलोचना करके अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने का प्रयास करते हैं लेकिन राजनीति केवल आलोचना से नहीं चलती। राजनीति संघर्ष मांगती है। यहीं राहुल गांधी की सबसे बड़ी ताकत दिखाई देती है। वे लगातार मैदान में बने हुए हैं। चुनाव हारने के बाद भी सक्रिय रहते हैं। व्यक्तिगत हमलों के बावजूद सार्वजनिक जीवन से पीछे नहीं हटते। उनके खिलाफ वर्षों तक एक संगठित राजनीतिक अभियान चला, उन्हें उपहास का विषय बनाया गया लेकिन उन्होंने राजनीति छोड़ने का विकल्प नहीं चुना। भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण कम हैं।
इतिहास में कई नेताओं को अपने समय में कम आंका गया। अब्राहम लिंकन अनेक चुनाव हारने के बाद राष्ट्रपति बने। नेल्सन मंडेला ने दशकों जेल में बिताए। महात्मा गांधी को भी अपने समय में अनेक आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। इन उदाहरणों का उद्देश्य राहुल गांधी की तुलना इन नेताओं से करना नहीं है बल्कि यह समझना है कि किसी राजनीतिक नेता का मूल्यांकन केवल तात्कालिक सफलता के आधार पर नहीं किया जाता। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं होती। उसका कार्य सत्ता से प्रश्न पूछना, वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना भी होता है। राहुल गांधी की राजनीति को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह भी सच है कि राहुल गांधी पूर्ण नहीं हैं। उनसे गलतियां हुई हैं। उनकी रणनीतियों पर सवाल उठ सकते हैं। कांग्रेस संगठन की कमजोरियों के लिए उनसे जवाब मांगा जा सकता है लेकिन आलोचना और उपहास में अंतर होता है। लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है लेकिन किसी नेता को केवल मजाक का पात्र बना देना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।
आज भारतीय विपक्ष की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि वह राहुल गांधी से नेतृत्व की अपेक्षा तो करता है लेकिन राहुल गांधी जैसा जोखिम उठाने को तैयार नहीं दिखता। वह चाहता है कि राहुल गांधी भाजपा का मुकाबला करें, राष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाएं, लोकतंत्र और संविधान की लड़ाई लड़ें, जनता के बीच जाएं और साथ ही हर चुनाव भी जीतें लेकिन राजनीति में ऐसी अपेक्षाएं शायद ही कभी पूरी होती हैं।
यदि विपक्ष को मजबूत होना है तो उसे केवल कांग्रेस से ‘बड़ा दिल’ मांगने की बजाय स्वयं भी बड़ा राजनीतिक साहस दिखाना होगा। उसे ट्वीट और प्रेस काॅन्फ्रेंस से आगे बढ़कर जनता के बीच जाना होगा। उसे संघर्ष की उस परम्परा को पुनर्जीवित करना होगा जिसने कभी भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाया था।
राहुल गांधी की राजनीति की अंतिम परीक्षा भविष्य करेगा। सम्भव है कि वे बड़ी चुनावी सफलताएं हासिल करें, सम्भव है कि न करें लेकिन वर्तमान समय में एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि भारतीय विपक्ष में यदि कोई नेता लगातार संघर्ष, संवाद और वैचारिक प्रतिरोध की राजनीति करता दिखाई दे रहा है तो वह राहुल गांधी हैं। शायद यही कारण है कि वे विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत भी हैं और सबसे आसान निशाना भी।