पशुपालन एवं डेयरी विभाग के सचिव नरेश गंगवार
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार की जमीन खरीद मामले से भाजपा नेतृत्व की किरकिरी अभी थमी भी नहीं थी कि अब केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चैधरी, उनके परिवार और कृषि मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को अपने ही मंत्रालय की करोड़ों रुपए की सब्सिडी योजना का लाभ मिलने का मामला सामने आ गया है। एक के बाद एक सामने आ रहे इन मामलों ने सरकार के सुशासन और पारदर्शिता के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कानूनी वैधता अपनी जगह हो सकती है लेकिन सत्ता से जुड़े लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने से हितों के टकराव (काॅन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) और नैतिक जवाबदेही पर बहस तेज हो गई है। विपक्ष को भी सरकार को घेरने का एक नया और बड़ा मुद्दा मिल गया है

‘अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे’ यह कहावत उस समय चरितार्थ होती दिखाई देती है जब सार्वजनिक धन के वितरण में निष्पक्षता पर सवाल उठने लगें। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी से जुड़ी एक परियोजना को लेकर सामने आई जानकारी ने राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (एनएचबी) की सब्सिडी व्यवस्था और हितों के टकराव (काॅन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) पर गम्भीर बहस छेड़ दी है।

अंग्रेजी दैनिक ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ की पड़ताल के अनुसार, केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चैधरी के राजस्थान स्थित ककड़ी (ककम्बर) उत्पादन फार्म को राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की योजना के तहत लगभग 99 लाख रुपए की सब्सिडी स्वीकृत की गई। उल्लेखनीय है कि कृषि राज्य मंत्री होने के नाते वे राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के पदेन (Ex-Officio) उपाध्यक्ष भी हैं। हालांकि मंत्री के सहयोगियों का कहना है कि परियोजना को मंजूरी मंत्री बनने से पहले मिली थी और पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप सम्पन्न हुई।
रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना लगभग 1.98 करोड़ रुपए की थी, जिस पर अधिकतम सीमा के अनुसार करीब 99 लाख रुपए की सब्सिडी स्वीकृत हुई। जांच में यह भी सामने आया कि इसी योजना के लाभार्थियों में विभाग के सचिव की पत्नी, पुत्र और उनकी माता के नाम भी शामिल हैं। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकारी योजनाओं का लाभ प्रभावशाली लोगों और उनके परिवारों तक अधिक आसानी से पहुंच रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, सब्सिडी प्राप्त करने की प्रक्रिया चार चरणों में होती है। पहले ऑनलाइन आवेदन, फिर संयुक्त निरीक्षण, उसके बाद परियोजना अनुमोदन समिति की मंजूरी और अंत में परियोजना पूरी होने पर सब्सिडी राशि सीधे ऋण खाते में जमा की जाती है। नियमों में यह भी उल्लेख है कि अंतिम अनुमोदन समिति में बोर्ड के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष शामिल नहीं होते। बावजूद इसके, मंत्री के पद और उनके परिवार को मिले लाभ ने नैतिकता और पारदर्शिता को लेकर नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
विपक्षी दलों का कहना है कि भले ही प्रक्रिया तकनीकी रूप से नियमों के अनुरूप रही हो लेकिन जब किसी विभाग का राजनीतिक प्रमुख या उसके निकट सम्बंधी उसी विभाग की योजनाओं के लाभार्थी बनते हैं तो हितों के टकराव की आशंका स्वतः पैदा होती है। ऐसे मामलों में केवल कानूनी वैधता ही नहीं बल्कि नैतिक जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।
दूसरी ओर मंत्री पक्ष का तर्क है कि परियोजना के लिए आवेदन और प्रारम्भिक स्वीकृति उनके मंत्री बनने से पहले की है तथा उन्होंने अनुमोदन प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। उनका कहना है कि योजना सभी पात्र किसानों के लिए खुली है और परिवार के सदस्यों ने निर्धारित नियमों के तहत आवेदन किया था।
फिर भी यह मामला एक बड़ा प्रश्न छोड़ जाता है, क्या सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में समान अवसर के आधार पर सभी पात्र नागरिकों तक पहुंच रहा है या फिर सत्ता और प्रभाव के निकट रहने वालों के लिए रास्ते अपेक्षाकृत आसान हैं? यही वजह है कि यह पूरा प्रकरण आम लोगों के बीच एक बार फिर उस पुरानी कहावत को याद दिला रहा है ‘अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे।’
अफसरों ने भी नहीं छोड़ी सब्सिडी
केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी के 99 लाख रुपए की सब्सिडी वाले मामले के बाद अब ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच ने एक और चौंकाने वाला खुलासा किया है। जांच में सामने आया है कि राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (एनएचबी) की करोड़ों रुपए की सब्सिडी योजना का लाभ केवल नेताओं तक सीमित नहीं रहा बल्कि कृषि मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और उनके परिवारों ने भी इस योजना से लाखों-करोड़ों रुपए की सब्सिडी प्राप्त की। इससे यह सवाल और गम्भीर हो गया है कि क्या किसानों के लिए बनाई गई योजनाएं धीरे-धीरे सत्ता और नौकरशाही के प्रभावशाली वर्ग का साधन बनती जा रही हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, कृषि मंत्रालय में पशुपालन एवं डेयरी विभाग के सचिव नरेश पाल गंगवार के परिवार के तीन सदस्य इस योजना के लाभार्थी रहे हैं। जांच में सामने आया कि उनकी पत्नी, पुत्र और उनकी मां के नाम पर राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की योजना के तहत परियोजनाओं को मंजूरी मिली और उन्हें कुल 1.16 करोड़ रुपए से अधिक की सब्सिडी प्राप्त हुई।
सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि गंगवार स्वयं वर्ष 2021-22 में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) में सचिव थे और उससे पहले कृषि मंत्रालय में भी महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। उनके परिवार को मिली सब्सिडी ने इस पूरी योजना की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
जांच के अनुसार, गंगवार की पत्नी डाॅ. रंजीता के नाम पर राजस्थान के जोबनेर क्षेत्र में व्यावसायिक खीरा उत्पादन परियोजना को मंजूरी मिली। करीब 88.80 लाख रुपए की इस परियोजना पर उन्हें लगभग 46 लाख रुपए की सब्सिडी प्रदान की गई। परियोजना में पॉलीहाउस और आधुनिक संरक्षित खेती विकसित की गई।
इसी प्रकार गंगवार के पुत्र कुमार ऋत्विक को भी जोबनेर क्षेत्र में संरक्षित खेती की परियोजना के लिए करीब 46.49 लाख रुपए की सब्सिडी स्वीकृत हुई। जांच में कहा गया है कि यह परियोजना भी राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की उसी योजना के अंतर्गत स्वीकृत हुई जिसका संचालन कृषि मंत्रालय के अधीन होता है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि गंगवार की मां बिंदुमती के नाम पर एक अन्य परियोजना को भी स्वीकृति मिली, जिसके लिए लगभग 23.54 लाख रुपए की सब्सिडी जारी की गई। इस प्रकार परिवार के तीन सदस्यों को मिलाकर कुल सब्सिडी 1.16 करोड़ रुपए से अधिक हो गई।

‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, गंगवार ने अपने स्पष्टीकरण में कहा है कि उनकी पत्नी और पुत्र व्यस्क हैं तथा उनकी अपनी स्वतंत्र आय और सम्पत्ति है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी मां भी स्वयं सम्पत्ति की स्वामिनी हैं और उन्होंने नियमों के अनुसार आवेदन किया था। गंगवार का कहना है कि उन्होंने किसी भी स्तर पर अपने पद का दुरुपयोग नहीं किया और परियोजनाएं पूरी तरह नियमों के तहत स्वीकृत हुईं। हालांकि जांच में यह भी सामने आया कि सेवा नियमों के अनुसार वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को अपनी और परिवार की अचल सम्पत्तियों की जानकारी सरकार को देनी होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि उपलब्ध रिकाॅर्ड में गंगवार ने केवल एक परियोजना का उल्लेख किया था। इस पहलू ने भी कई सवाल खड़े किए हैं कि क्या सभी जानकारियां नियमानुसार घोषित की गई थीं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यहां सबसे बड़ा मुद्दा कानूनी वैधता से अधिक हितों के टकराव (काॅन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) का है। यदि किसी मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी या उनके निकट सम्बंधी उसी मंत्रालय के अधीन संचालित योजनाओं से आर्थिक लाभ प्राप्त करते हैं तो इससे सरकारी व्यवस्था की निष्पक्षता पर संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। भले ही अधिकारी सीधे अनुमोदन प्रक्रिया में शामिल न हों लेकिन जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सामान्य किसानों को भी इतनी सहजता से वही लाभ मिल पाता है।

भागीरथ चौधरी और नरेश पाल गंगवार के परिवारों से जुड़े मामलों के सामने आने के बाद अब राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की सब्सिडी योजना की कार्यप्रणाली व्यापक बहस के केंद्र में आ गई है। विपक्षी दल इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग कर सकते हैं जबकि सुशासन के पैरोकारों का कहना है कि सरकार को ऐसे मामलों में केवल नियमों का हवाला देने के बजाय पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक कर यह साबित करना चाहिए कि प्रभावशाली लोगों को कोई विशेष लाभ नहीं मिला।

इन खुलासों ने एक बार फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है कि किसानों के नाम पर चलने वाली योजनाओं का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है। यदि लाभार्थियों की सूची में मंत्री, सचिव और उनके परिवार लगातार दिखाई दें तो आम किसान के मन में यह धारणा बनना स्वाभाविक है कि सरकारी खजाने की ‘रेवड़ियां’ जरूरतमंदों से अधिक रसूखदारों तक पहुंच रही हैं।

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