वेनेजुएला में 25 जून को आए दो शक्तिशाली भूकम्पों ने एक बार फिर पूरी दुनिया को यह एहसास करा दिया कि आधुनिक सभ्यता जितनी अजेय दिखाई देती है, उतनी है नहीं। कुछ ही क्षणों के भीतर सड़कें फट गईं, पुल क्षतिग्रस्त हो गए, इमारतें मलबे में बदल गईं और लाखों लोग अपने घरों से निकलकर खुले आसमान के नीचे खड़े हो गए। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के प्रारम्भिक माॅडल ने आशंका जताई कि यदि प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति अनुमान के अनुरूप निकली तो यह इस सदी की सबसे भीषण प्राकृतिक त्रासदियों में से एक हो सकती है। अंतिम आंकड़े आने में समय लगेगा लेकिन इतना स्पष्ट है कि प्रकृति ने एक बार फिर मनुष्य को उसकी सीमाएं याद दिला दी हैं लेकिन इस खबर को पढ़ते हुए मेरे मन में भूकम्प से भी बड़ा एक प्रश्न उठा। क्या सचमुच हम मनुष्य इतिहास से सीखते हैं? या फिर हमारी सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि हम हर आपदा को दूसरों की कहानी मानकर आगे बढ़ जाते हैं? शायद यही मनुष्य की सबसे पुरानी प्रवृत्ति है। हम यह स्वीकार तो कर लेते हैं कि दुर्घटनाएं होती हैं, युद्ध होते हैं, महामारियां आती हैं, भूकम्प आते हैं, बाढ़ आती है, मृत्यु होती है लेकिन हमारे भीतर कहीं न कहीं एक अदृश्य विश्वास हमेशा जीवित रहता है कि यह सब दूसरों के साथ होगा, हमारे साथ नहीं।
मृत्यु से बड़ा कोई सत्य नहीं है। इस संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि एक दिन उसे इस दुनिया से जाना है। फिर भी कोई भी व्यक्ति सुबह उठकर यह सोचकर अपना दिन शुरू नहीं करता कि शायद आज उसकी अंतिम सुबह हो। यदि ऐसा हो जाए तो शायद जीवन चल ही न सके। इसलिए मनुष्य का मन उसे आश्वस्त करता रहता है कि अभी बहुत समय है। यही मनोविज्ञान जीवन को गति देता है लेकिन यही मनोविज्ञान हमें लापरवाह भी बना देता है। यही कारण है कि हम जीवन की तरह प्रकृति के प्रति भी भ्रम पाल लेते हैं। हम मान लेते हैं कि जो त्रासदी किसी दूसरे देश में आई है, वह हमारे शहर तक नहीं पहुंचेगी, जो पहाड़ कहीं और टूटे हैं, वे हमारे पहाड़ नहीं होंगे, जो नदी किसी और का घर बहा ले गई, वह हमारे दरवाजे तक नहीं आएगी। यहीं से हमारी सबसे बड़ी भूल शुरू होती है।
प्राकृतिक आपदाएं कभी सीमाएं नहीं पहचानतीं। धरती को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके ऊपर किस देश की सीमा खिंची हुई है। भूकम्प किसी धर्म, किसी जाति, किसी राजनीतिक विचारधारा या किसी आर्थिक स्थिति के आधार पर निर्णय नहीं करता। वह केवल भूगर्भीय नियमों का पालन करता है। नदी यह नहीं देखती कि उसके किनारे खड़ा भवन किसी गरीब का है या किसी उद्योगपति का। जंगल की आग यह नहीं पूछती कि जिस पेड़ को वह जलाने जा रही है, वह किसी राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है या किसी निजी सम्पत्ति का। प्रकृति का अपना संविधान है और वह उसी के अनुसार काम करती है।
दुर्भाग्य यह है कि मनुष्य ने अपनी तकनीकी उपलब्धियों को प्रकृति पर विजय का प्रमाण मान लिया है। हमने समुद्र पर पुल बना लिए, पहाड़ों के भीतर सुरंगें खोद दीं, नदियों को बांध दिया, रेगिस्तान में शहर बसा दिए और आकाश को छूती इमारतें खड़ी कर दीं। इन उपलब्धियों पर गर्व होना भी चाहिए लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब उपलब्धियां हमें विनम्र बनाने के बजाय अहंकारी बना देती हैं। हम यह मान बैठते हैं कि अब प्रकृति भी हमारे नियंत्रण में है। इतिहास बताता है कि यही भ्रम हर युग में टूटा है।
मैं यह लेख नोएडा में बैठकर लिख रहा हूं। मेरे चारों ओर ऊंची -ऊंची इमारतें हैं। एक्सप्रेसवे हैं, मेट्रो है, चमचमाती काॅलोनियां हैं और आधुनिक जीवन की लगभग हर सुविधा मौजूद है लेकिन जब भी किसी बड़े भूकम्प की खबर आती है तो मेरे मन में एक ही प्रश्न उठता है कि यदि आज रात इसी प्रकार का कोई शक्तिशाली भूकम्प इस शहर में आ जाए तो क्या हम सचमुच तैयार हैं? क्या यहां रहने वाले लाखों लोगों को पता है कि भूकंप के समय सबसे पहले क्या करना चाहिए? क्या हर सोसायटी में नियमित माॅक ड्रिल होती है? क्या हर भवन का समय-समय पर संरचनात्मक परीक्षण किया जाता है? क्या निर्माण के समय वास्तव में वही गुणवत्ता अपनाई गई थी, जिसका दावा कागजों में किया गया था? या फिर हमारी सुरक्षा भी उसी भरोसे पर टिकी है, जिस पर हमारी अधिकांश योजनाएं टिकी होती हैं- ‘कुछ नहीं होगा।’
यही तीन शब्द शायद आधुनिक सभ्यता के सबसे खतरनाक शब्द हैं- ‘कुछ नहीं होगा।’ इन्हीं तीन शब्दों ने नदियों के किनारे शहर बसा दिए। इन्हीं तीन शब्दों ने पहाड़ों को काटकर होटल खड़े कर दिए। इन्हीं तीन शब्दों ने जंगलों को साफ करके कंक्रीट के जंगल उगा दिए और फिर जब प्रकृति ने अपना संतुलन वापस लेने की कोशिश की तो हमने उसे आपदा का नाम दे दिया।
मेरा गृह प्रदेश उत्तराखण्ड है। हिमालय की गोद में बसा यह प्रदेश जितना सुंदर है, उतना ही संवेदनशील भी। वैज्ञानिक दशकों से चेतावनी देते आ रहे हैं कि पूरा हिमालय भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत सक्रिय क्षेत्र है। भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है। यह टकराव रुक नहीं रहा बल्कि आज भी जारी है। इसका अर्थ है कि धरती के भीतर ऊर्जा लगातार जमा हो रही है। यह ऊर्जा कब और कहां बड़े भूकम्प के रूप में बाहर आएगी, इसका सटीक अनुमान कोई नहीं लगा सकता लेकिन इतना निश्चित है कि यह केवल सम्भावना नहीं बल्कि वैज्ञानिक वास्तविकता है।
विडम्बना यह है कि जितनी गम्भीर वैज्ञानिकों की चेतावनियां होती जा रही हैं, उतनी ही तेजी से हिमालय में निर्माण भी बढ़ता जा रहा है। चैड़ी सड़कें, सुरंगें, विशाल होटल, नदी किनारे रिसाॅर्ट, पहाड़ों की ढलानों पर बहुमंजिला इमारतें, सब कुछ विकास के नाम पर हो रहा है। विकास आवश्यक है, इसमें कोई विवाद नहीं लेकिन विकास और अंधविकास के बीच की दूरी बहुत कम होती है। जब विकास प्रकृति की वहन क्षमता को नजरअंदाज करने लगता है, तब वही विकास भविष्य की त्रासदियों की नींव बन जाता है। यदि भारत में किसी एक घटना ने हमें यह सबसे स्पष्ट रूप से दिखाया था तो वह 2013 की केदारनाथ आपदा थी।
केदारनाथ केवल एक त्रासदी नहीं थी, वह एक चेतावनी थी। उसने कहा था कि हिमालय कोई साधारण पर्वत श्रृंखला नहीं है। उसकी अपनी सीमाएं हैं। उसकी अपनी वहन क्षमता है। यदि हम उसे केवल पर्यटन उद्योग या आर्थिक अवसर के रूप में देखेंगे और उसकी पारिस्थितिकी की उपेक्षा करेंगे तो उसकी कीमत केवल पहाड़ नहीं चुकाएंगे, मनुष्य भी चुकाएगा लेकिन क्या हमने वह सबक सीखा? दुर्भाग्य से उत्तर बहुत उत्साहजनक नहीं है। कुछ वर्षों बाद ही हमने फिर वही रास्ता पकड़ लिया। पहाड़ों पर निर्माण जारी रहा। नदियों के किनारे कंक्रीट फैलती रही। जंगल सिकुड़ते रहे। विकास की गति और तेज होती गई लेकिन पर्यावरणीय संतुलन पर चर्चा धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई।
जोशीमठ इसका दूसरा उदाहरण है। शहर एक दिन में नहीं धंसते। वे वर्षों तक संकेत देते हैं। पहले दीवारों में महीन दरारें पड़ती हैं, फिर जमीन बैठने लगती है, फिर जलधाराओं का व्यवहार बदलता है। वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं, रिपोर्टें तैयार होती हैं लेकिन विकास की जल्दबाजी अक्सर विज्ञान की आवाज से अधिक शक्तिशाली साबित होती है और फिर एक दिन पूरा देश टेलीविजन पर दरकती हुई इमारतें देखता है और पूछता है अरे! यह अचानक कैसे हो गया? सच तो यह है कि प्रकृति में बहुत कम चीजें अचानक होती हैं। अचानक केवल हमारी चेतना जागती है। आपदा आने से पहले संकेत वर्षों तक मिलते रहते हैं लेकिन हम उन्हें तब तक अनदेखा करते रहते हैं, जब तक वे त्रासदी में बदल नहीं जाते।
यही बात आज वेनेजुएला का भूकंप भी हमसे कह रहा है। यह केवल एक देश की कहानी नहीं है। यह पूरी मानव सभ्यता के लिए एक आईना है। वह आईना जिसमें हमें अपनी उपलब्धियां नहीं, अपनी कमजोरियां दिखाई देती हैं। वह हमें याद दिलाता है कि हम चाहे कितनी भी ऊंची इमारतें बना लें, धरती की नींव आज भी हमारे नियंत्रण में नहीं है। हम चाहे कितनी भी उन्नत तकनीक विकसित कर लें, प्रकृति के नियम आज भी वही हैं जो हजारों वर्ष पहले थे।
शायद सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम अगली चेतावनी का इंतजार करेंगे या इस बार धरती हिलने से पहले ही जाग जाएंगे? यदि हम ईमानदारी से अपने चारों ओर देखें तो पाएंगे कि वेनेजुएला का भूकम्प कोई अकेली घटना नहीं है। वह एक लम्बी श्ृंखला की नवीनतम कड़ी भर है। पिछले दो दशकों में दुनिया ने जितनी बड़ी प्राकृतिक आपदाएं देखी हैं, उनमें यदि कोई एक समान सूत्र दिखाई देता है तो वह यह कि प्रकृति अपना काम करती है लेकिन मनुष्य की लापरवाही उस आपदा को कई गुना अधिक भयावह बना देती है। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि प्रकृति बदल रही है बल्कि यह है कि क्या हम स्वयं बदलने के लिए तैयार हैं?
साल 2004 की हिंद महासागर सुनामी को कौन भूल सकता है। समुद्र की एक लहर ने कुछ ही घंटों में इंडोनेशिया, श्रीलंका, भारत और कई अन्य देशों में लाखों लोगों का जीवन बदल दिया था। 2011 में जापान का तोहोकू भूकंप और उसके बाद आई सुनामी ने यह साबित कर दिया कि दुनिया की सबसे विकसित तकनीकी व्यवस्थाएं भी प्रकृति के सामने पूरी तरह अभेद्य नहीं हैं। 2023 में तुर्किए और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप ने हजारों इमारतों को मलबे में बदल दिया। बाद में जांच में सामने आया कि अनेक भवन निर्माण मानकों का पालन नहीं करते थे। अर्थात् भूकम्प ने जितनी जानें नहीं लीं उससे कहीं अधिक जानें निर्माण सम्बंधी
लापरवाही ने ले लीं। यही अंतर हमें समझना होगा। प्राकृतिक घटना और मानवीय त्रासदी हमेशा एक ही बात नहीं होती। भूकम्प प्राकृतिक है लेकिन असुरक्षित इमारतों का गिरना मानवीय विफलता है। उत्तराखण्ड का उदाहरण फिर हमारे सामने खड़ा हो जाता है। केदारनाथ के बाद जोशीमठ और फिर सिलक्यारा सुरंग की घटना ने यह प्रश्न और गहरा किया कि क्या हिमालय में विकास की गति और प्रकृति की क्षमता के बीच संतुलन बना हुआ है? विकास आवश्यक है, सड़कें भी चाहिए, सुरंगें भी चाहिए और बेहतर सुविधाएं भी चाहिए लेकिन विकास का अर्थ केवल निर्माण नहीं होता, विकास का अर्थ सुरक्षा भी होता है, स्थायित्व भी होता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों को सुरक्षित रखना भी होता है। यदि विकास भविष्य को असुरक्षित बना दे तो वह विकास नहीं, केवल विस्तार रह जाता है।
यहीं पर भारतीय सभ्यता का दृष्टिकोण आधुनिक विकास की अवधारणा से अलग दिखाई देता है। हमारी परम्परा ने पृथ्वी को ‘माता’ कहा, नदियों को ‘जीवंत’ माना, पर्वतों को देवतुल्य सम्मान दिया और वृक्षों को पूजा का विषय बनाया। यह केवल धार्मिक प्रतीक नहीं थे, इनके पीछे एक गहरा पर्यावरणीय दर्शन छिपा था। हमारे पूर्वज जानते थे कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक छोटा-सा हिस्सा है। आधुनिक विज्ञान भी आज लगभग यही बात कह रहा है लेकिन हमने विज्ञान और परम्परा, दोनों की चेतावनी को कई बार अनदेखा किया है। आज हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बात करते हैं, अंतरिक्ष में मानव बस्तियां बसाने की योजनाएं बनाते हैं, मंगल ग्रह तक पहुंचने के सपने देखते हैं। यह सब मानव बुद्धिमत्ता की अद्भुत उपलब्धियां हैं लेकिन क्या यह विडम्बना नहीं कि हम दूसरे ग्रहों पर जीवन खोज रहे हैं और अपने ही ग्रह पर जीवन के संतुलन को बिगाड़ते जा रहे हैं? यदि पृथ्वी सुरक्षित नहीं रही तो हमारी सारी तकनीकी उपलब्धियां भी अंततः अर्थहीन हो जाएंगी।
वेनेजुएला का भूकंप हमें केवल संवेदना व्यक्त करने के लिए नहीं बुला रहा। वह हमें आत्मचिंतन के लिए बुला रहा है। वह पूछ रहा है कि क्या हम हर आपदा के बाद कुछ दिनों का शोक मना कर फिर भूल जाएंगे या इस बार सचमुच अपने विकास मॉडल, अपनी प्राथमिकताओं और अपने व्यवहार पर पुनर्विचार करेंगे? क्या हम वैज्ञानिक चेतावनियों को केवल रिपोर्टों में पढ़ेंगे या उन्हें नीतियों का हिस्सा भी बनाएंगे? क्या हम हिमालय को केवल पर्यटन उद्योग की दृष्टि से देखेंगे या उसे एक जीवित, संवेदनशील पर्वत प्रणाली मानेंगे? क्या हम नदियों को केवल जल का स्रोत समझेंगे या उन्हें जीवन की धारा के रूप में सम्मान देंगे?
इसलिए सवाल यह नहीं है कि धरती फिर कब हिलेगी। सवाल यह है कि धरती हिलने से पहले क्या हमारा विवेक जागेगा? यदि इस प्रश्न का उत्तर हमने समय रहते खोज लिया तो शायद भविष्य की अनेक त्रासदियों की तीव्रता कम की जा सकेगी। यदि नहीं तो इतिहास की तरह भविष्य भी हमें यही याद दिलाता रहेगा कि प्रकृति के साथ युद्ध में मनुष्य कभी विजेता नहीं होता, वह केवल यह चुन सकता है कि वह उसके साथ संतुलन में जीना चाहता है या उसके नियमों की अनदेखी करके अपनी ही बनाई हुई त्रासदियों का सामना करना चाहता है।