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‘पीडीए’ की काट या ओबीसी कार्ड?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने से पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की नई टीम की घोषणा हो गई है। उनकी अगुवाई वाली इस टीम में 18 उपाध्यक्ष, 8 महामंत्री और 18 प्रदेश मंत्रियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है। पूर्वांचल की नेता और समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुईं पूजा पाल को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है, वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभावशाली नेता और पूर्व मंत्री सुरेश राणा को भी उपाध्यक्ष बनाकर बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। संगठन की यह नई टीम केवल पदों का बंटवारा नहीं बल्कि भाजपा की चुनावी रणनीति का स्पष्ट संकेत मानी जा रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि समाजवादी पार्टी के पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) फार्मूले की काट के लिए भाजपा ने ओबीसी और गैर-यादव पिछड़े वर्गों पर विशेष फोकस किया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह पीडीए की काट है या भाजपा का नया ओबीसी कार्ड?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने प्रदेश कार्यकारिणी, क्षेत्रीय अध्यक्षों और विभिन्न मोर्चों के पदाधिकारियों की नियुक्ति में जातीय और सामाजिक संतुलन साधने का प्रयास किया है। विशेष रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग और गैर-यादव पिछड़े समाज को अधिक प्रतिनिधित्व देकर पार्टी ने नया सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश की है। प्रदेश संगठन में पूजा पाल की नियुक्ति को विशेष महत्व दिया जा रहा है। उनके पति और पूर्व विधायक राजू पाल की 2005 में हत्या हुई थी, जिसमें माफिया अतीक अहमद और उसके सहयोगियों पर आरोप लगे थे। बाद में इस मामले की पैरवी कर रहे अधिवक्ता उमेश पाल की भी 2023 में हत्या कर दी गई थी।
ऐसे में भाजपा ने पूजा पाल को बड़ी जिम्मेदारी देकर कानून-व्यवस्था, माफिया विरोधी राजनीति और पीड़ित परिवारों के साथ खड़े होने का संदेश देने की कोशिश की है। इसके साथ ही सुरेश मौर्य, सत्यपाल सैनी, दुर्विजय शाक्य और सरोज कुशवाहा जैसे नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर भाजपा ने विभिन्न पिछड़ी जातियों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास किया है। पार्टी लम्बे समय से गैर-यादव पिछड़ा वर्ग को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम करती रही है। विभिन्न मोर्चों में भी नए चेहरों को आगे बढ़ाया गया है। दिनेश प्रताप सिंह को प्रदेश प्रवक्ता, देवेंद्र सिंह चौधरी को किसान मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष, रोहित मिश्रा को युवा मोर्चा की कमान, अशोक रावत को अनुसूचित जाति मोर्चा तथा सरोज कुशवाहा को महिला मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। प्रदेश संगठन में नीरज सिंह को भी उपाध्यक्ष बनाया गया है, जिन्हें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र होने के कारण भाजपा के भावी नेतृत्व और संगठनात्मक विस्तार के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जातीय समीकरणों पर भी भाजपा ने विशेष ध्यान दिया है। गुर्जर नेता और पूर्व मंत्री नवाब सिंह नागर को पश्चिम क्षेत्र की जिम्मेदारी देकर पार्टी ने गुर्जर समाज को स्पष्ट संदेश दिया है। हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी द्वारा गुर्जर मतदाताओं को साधने की कोशिशों के बीच यह नियुक्ति राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसी तरह किसान मोर्चा की जिम्मेदारी देवेंद्र सिंह चौधरी को और प्रदेश उपाध्यक्ष पद पर मोहित बेनीवाल को बनाए रखकर भाजपा ने जाट नेतृत्व को भी महत्व देने का संकेत दिया है, वहीं राजपूत समाज को साधने के लिए सुरेश राणा को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। सैनी समाज से आने वाले सत्यपाल सैनी को जिम्मेदारी देकर पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश की गई है।

त्यागी समाज को भी साधने का प्रयास किया गया है। बसंत त्यागी को प्रदेश टीम में स्थान देकर भाजपा ने संकेत दिया है कि संगठन का विस्तार क्षेत्रीय और जातीय संतुलन को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। भाजपा की नई टीम में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और ब्रज क्षेत्र के नेताओं को प्रतिनिधित्व दिया गया है। इससे पार्टी ने चुनाव से पहले सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन का संदेश देने की कोशिश की है। हालांकि विधानसभा चुनाव में अभी कुछ समय बाकी है लेकिन भाजपा ने संगठनात्मक बदलावों के जरिए चुनावी तैयारियों का स्पष्ट संकेत दे दिया है। नई टीम में सामाजिक, क्षेत्रीय और राजनीतिक संतुलन बनाने का प्रयास साफ दिखाई देता है।

कुल मिलाकर भाजपा की नई संगठनात्मक टीम यह संकेत देती है कि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए ओबीसी, दलित, जाट, गुर्जर, राजपूत, सैनी और अन्य प्रभावशाली सामाजिक समूहों के बीच अपना आधार मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। अब देखने वाली बात यह होगी कि भाजपा का यह सामाजिक प्रतिनिधित्व वाला दांव समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ फार्मूले की धार को कितना कुंद कर पाता है। फिलहाल इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरणों की लड़ाई एक बार फिर केंद्र में आ चुकी है।

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