नीति आयोग की रिपोर्ट ने उत्तराखण्ड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की उन कमजोरियों को सामने रखा है जिन्हें वर्षों से नजरअंदाज किया जाता रहा। एकल शिक्षक विद्यालय, खाली स्कूल, बढ़ता ड्राॅपआउट और निजी स्कूलों की ओर पलायन अब केवल आंकड़े नहीं बल्कि सरकारी शिक्षा के गहराते संकट की कहानी बन चुके हैं
उत्तराखण्ड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां सबसे बड़ा संकट संसाधनों का नहीं बल्कि भरोसे का दिखाई देता है। कभी सरकारी स्कूल ग्रामीण समाज की पहचान हुआ करते थे। गांव का लगभग हर बच्चा इन्हीं विद्यालयों में पढ़ता था और यहीं से निकलकर डाॅक्टर, इंजीनियर, सैनिक, शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारी बनता था। आज स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। गांवों के सरकारी स्कूलों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रह गया कि वहां पढ़ाई कैसी हो रही है बल्कि यह है कि वहां पढ़ने वाला कोई बच्चा बचा भी है या नहीं। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट इसी कड़वी सच्चाई पर रोशनी डालती है। रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखण्ड में 2,959 सरकारी विद्यालय ऐसे हैं जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि 39 विद्यालय ऐसे हैं जहां सरकारी रिकॉर्ड में 33 शिक्षक कार्यरत हैं लेकिन छात्र एक भी नहीं है। यह केवल प्रशासनिक विसंगति नहीं बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की दिशा और दशा पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड में शिक्षा का संकट केवल विद्यालयों की संख्या का संकट नहीं है। यह जनसंख्या के पलायन, घटती जन्मदर, अव्यवस्थित शिक्षक तैनाती, संसाधनों की असमान उपलब्धता और सरकारी शिक्षा के प्रति घटते विश्वास का संयुक्त परिणाम है। राज्य के अनेक गांव लगातार खाली हो रहे हैं। जहां कभी सैकड़ों बच्चों की आवाज गूंजती थी, वहां अब कुछ दर्जन परिवार भी नहीं बचे। ऐसे में कई विद्यालयों में छात्र संख्या लगातार घटती चली गई लेकिन दूसरी ओर जिन क्षेत्रों में आबादी बढ़ी, वहां पर्याप्त शिक्षक और संसाधन समय पर उपलब्ध नहीं कराए जा सके। नतीजा यह हुआ कि कहीं स्कूल बिना बच्चों के रह गए और कहीं बच्चों के बीच शिक्षक नहीं पहुंचे।
नीति आयोग की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष सरकारी स्कूलों से लगातार घटते भरोसे को लेकर है। वर्ष 2005-06 में देश के लगभग 71 प्रतिशत बच्चे सरकारी विद्यालयों में पढ़ते थे। वर्ष 2024-25 तक यह आंकड़ा घटकर लगभग 49 प्रतिशत रह गया। यानी पहली बार देश में आधे से अधिक बच्चे निजी विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। उत्तराखण्ड भी इस राष्ट्रीय प्रवृत्ति से अलग नहीं है। राज्य के शहरों से लेकर कस्बों और यहां तक कि ग्रामीण इलाकों में भी अभिभावक अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च उठाकर निजी विद्यालयों का रुख कर रहे हैं। कई परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा केवल बच्चों की शिक्षा पर इसलिए खर्च कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकारी विद्यालय अब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में सक्षम नहीं रह गए हैं।
सरकारी विद्यालयों से यह पलायन केवल अंग्रेजी माध्यम या आधुनिक भवनों की वजह से नहीं हो रहा। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण नियमित शिक्षण व्यवस्था पर उठते सवाल हैं। जब किसी विद्यालय में केवल एक शिक्षक हो और उसी शिक्षक को पहली से पांचवीं अथवा आठवीं तक की सभी कक्षाओं को पढ़ाने के साथ-साथ प्रशासनिक काम, ऑनलाइन रिपोर्टिंग, चुनाव ड्यूटी, जनगणना, सर्वेक्षण और अन्य सरकारी जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ें, तब गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं रह जाता। एक शिक्षक चाहे कितना भी समर्पित क्यों न हो, वह एक साथ सभी कक्षाओं को समान गुणवत्ता के साथ पढ़ा ही नहीं सकता।
उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियां इस संकट को और जटिल बनाती हैं। दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में कई विद्यालय ऐसे हैं जहां पहुंचना ही कई किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद सम्भव होता है। ऐसे क्षेत्रों में शिक्षक तैनाती हमेशा चुनौती रही है। कई स्थानों पर शिक्षकों के पद वर्षों तक खाली रहते हैं जबकि दूसरी ओर अपेक्षाकृत सुगम क्षेत्रों में शिक्षक अपेक्षाकृत अधिक संख्या में तैनात दिखाई देते हैं। इस असंतुलन का सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ता है। अभिभावकों को जब यह महसूस होता है कि उनके बच्चों को नियमित शिक्षा नहीं मिल पा रही है तो वे उन्हें निजी विद्यालयों में भेजने का निर्णय लेते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना ही क्यों न करना पड़े।
नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जिस ‘पिरामिड माॅडल’ की चर्चा की है, वह भी उत्तराखण्ड की वास्तविकता से मेल खाता है। राज्य में प्राथमिक विद्यालयों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय कम हैं। परिणाम यह होता है कि आठवीं के बाद बच्चों को दूसरे गांव या कस्बे के विद्यालय में जाना पड़ता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यह दूरी कई बार पांच से दस किलोमीटर या उससे भी अधिक होती है। परिवहन की सीमित व्यवस्था, आर्थिक कठिनाइयां और विशेषकर बालिकाओं की सुरक्षा सम्बंधी चिंताओं के कारण बड़ी संख्या में विद्यार्थी आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं या अनियमित हो जाते हैं।
यही कारण है कि नीति आयोग ने वर्तमान व्यवस्था को बदलकर एकीकृत स्कूल परिसर विकसित करने की सिफारिश की है जहां कक्षा एक से बारहवीं तक की पढ़ाई एक ही परिसर में हो। आयोग का मानना है कि यदि बच्चों को बार-बार विद्यालय बदलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी तो ड्राॅपआउट में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। उत्तराखण्ड जैसे राज्य में यह सुझाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यहां
भौगोलिक दूरी स्वयं शिक्षा के रास्ते में बड़ी बाधा बन जाती है।
उत्तराखण्ड में शिक्षा के संकट को केवल विद्यालयों की संख्या या शिक्षकों की कमी तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में एक ऐसे पहलू की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है, जिस पर अब तक अपेक्षित गम्भीरता से चर्चा नहीं हुई। रिपोर्ट बताती है कि देश में उच्च प्राथमिक स्तर से माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते दस में से लगभग चार बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं। इसका एक बड़ा कारण शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून की वर्तमान सीमा है। आरटीई केवल 6 से 14 वर्ष अर्थात कक्षा आठ तक के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है। इसके बाद पढ़ाई जारी रखने का आर्थिक बोझ परिवारों पर आ जाता है। यूनिफाॅर्म, किताबें, परीक्षा शुल्क, परिवहन और कोचिंग जैसे खर्च गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन जाते हैं। उत्तराखण्ड के पर्वतीय जिलों में यह समस्या और गम्भीर हो जाती है क्योंकि कई गांवों से माध्यमिक विद्यालय काफी दूर हैं। बच्चों को रोज कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है या फिर कस्बों में किराए पर रहना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह सम्भव नहीं हो पाता और अंततः पढ़ाई छूट जाती है।
बालिकाओं के मामले में यह स्थिति और भी चिंताजनक है। पहाड़ी क्षेत्रों में आठवीं के बाद विद्यालय की दूरी बढ़ने पर अनेक परिवार बेटियों को आगे पढ़ाने में हिचकिचाते हैं। परिवहन की सीमित व्यवस्था और सुरक्षा सम्बंधी चिंताएं भी इसके पीछे महत्वपूर्ण कारण हैं। यही वजह है कि माध्यमिक स्तर पर छात्राओं के ड्राॅपआउट को रोकना आज भी राज्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने छात्रवृत्ति, साइकिल योजना और अन्य प्रोत्साहन योजनाएं शुरू कीं लेकिन उनका प्रभाव उतना व्यापक नहीं दिखा जितनी अपेक्षा की गई थी।
राज्य में विद्यालयों के एकीकरण और विलय का मुद्दा भी पिछले कुछ वर्षों से लगातार चर्चा में रहा है। शिक्षा विभाग का तर्क रहा कि जिन विद्यालयों में छात्र संख्या बहुत कम है, वहां सीमित संसाधनों को बिखरने के बजाय उन्हें बड़े विद्यालयों में समाहित कर दिया जाए ताकि बच्चों को बेहतर शिक्षक, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और अन्य सुविधाएं मिल सकें लेकिन इस नीति का ग्रामीण क्षेत्रों में काफी विरोध हुआ। अभिभावकों और स्थानीय समुदायों का कहना था कि यदि गांव का विद्यालय बंद हो जाएगा तो छोटे बच्चों के लिए दूर स्थित विद्यालय तक पहुंचना मुश्किल होगा। कई स्थानों पर विद्यालयों के विलय के बाद बच्चों की नियमित उपस्थिति भी प्रभावित हुई। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि विद्यालयों का विलय केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं होना चाहिए बल्कि प्रत्येक क्षेत्र की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
नीति आयोग की रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण संकेत यह है कि केवल भवन बनाकर शिक्षा की गुणवत्ता नहीं सुधारी जा सकती। पिछले दो दशकों में उत्तराखण्ड में बड़ी संख्या में विद्यालय भवन बने, स्मार्ट क्लास की घोषणाएं हुईं, कम्प्यूटर लैब स्थापित की गईं और डिजिटल शिक्षा पर जोर दिया गया लेकिन कई विद्यालयों में आज भी विज्ञान और गणित के विषय विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं। अनेक माध्यमिक विद्यालय वर्षों से प्रधानाचार्य के बिना चल रहे हैं। कहीं प्रयोगशालाएं हैं तो प्रयोग कराने वाले शिक्षक नहीं हैं, कहीं कंप्यूटर हैं तो इंटरनेट नहीं है और कहीं इंटरनेट है तो प्रशिक्षित शिक्षक नहीं हैं। ऐसी परिस्थितियों में आधुनिक शिक्षा का लक्ष्य अधूरा रह जाता है।
शिक्षक भर्ती और स्थानांतरण की समस्या भी वर्षों से बनी हुई है। राज्य में समय पर भर्तियां नहीं होने के कारण हजारों पद लम्बे समय तक रिक्त रहे। दूसरी ओर स्थानांतरण नीति को लेकर भी लगातार विवाद होते रहे। परिणाम यह हुआ कि कई दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षक नहीं पहुंचे जबकि सुगम क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक शिक्षक तैनात रहे। नीति आयोग ने भी अपने विश्लेषण में संकेत दिया है कि केवल शिक्षकों की कुल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा बल्कि उनकी तैनाती का वैज्ञानिक और संतुलित प्रबंधन भी उतना ही आवश्यक है।
सरकारी विद्यालयों के सामने एक और चुनौती सीखने के स्तर की है। विभिन्न राष्ट्रीय आकलन और स्वतंत्र सर्वेक्षण समय-समय पर यह बताते रहे हैं कि कक्षा के अनुरूप पढ़ने, लिखने और गणना करने की क्षमता अनेक बच्चों में अपेक्षित स्तर तक विकसित नहीं हो पा रही है। कोविड-19 महामारी के दौरान लगभग दो वर्षों तक विद्यालय बंद रहने से यह समस्या और बढ़ गई। ऑनलाइन शिक्षा का लाभ उन बच्चों तक ही सीमित रहा जिनके पास स्मार्टफोन, इंटरनेट और अनुकूल पारिवारिक वातावरण उपलब्ध था। पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों के हजारों विद्यार्थी इस दौरान पढ़ाई से लगभग कट गए। महामारी के बाद विद्यालय खुलने पर भी सीखने की इस कमी की भरपाई पूरी तरह नहीं हो सकी।
इन सब कारणों का सीधा असर सरकारी विद्यालयों की सामाजिक प्रतिष्ठा पर पड़ा है। पहले सरकारी विद्यालय में पढ़ना सामान्य बात मानी जाती थी लेकिन अब कई परिवार इसे मजबूरी के रूप में देखने लगे हैं। जैसे ही किसी परिवार की आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर होती है, वह अपने बच्चों को निजी विद्यालय में भेजने की कोशिश करता है। यही कारण है कि छोटे कस्बों और ग्रामीण बाजारों तक में निजी विद्यालयों की संख्या तेजी से बढ़ी है। सरकारी विद्यालयों में घटती छात्र संख्या केवल शिक्षा विभाग का आंकड़ा नहीं बल्कि समाज के बदलते विश्वास का संकेत है।
यही वह बिंदु है जहां नीति आयोग की रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। रिपोर्ट केवल कमियां गिनाने तक सीमित नहीं रहती बल्कि यह संकेत देती है कि यदि समय रहते शिक्षा व्यवस्था की संरचना नहीं बदली गई तो आने वाले वर्षों में सरकारी विद्यालय और अधिक कमजोर हो सकते हैं। इसलिए आयोग ने ‘सिलेंडर माॅडल’ की अवधारणा प्रस्तुत की है जिसमें प्राथमिक स्तर पर प्रवेश लेने वाला प्रत्येक बच्चा बिना किसी व्यवधान के बारहवीं तक की शिक्षा पूरी कर सके। इसके लिए विद्यालयों का पुनर्गठन, शिक्षक उपलब्धता, बेहतर बुनियादी सुविधाएं, परिवहन, डिजिटल संसाधन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप शिक्षा नीति को एक साथ लागू करने की आवश्यकता बताई गई है।
सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े इस संकट को केवल शिक्षा विभाग की प्रशासनिक समस्या मान लेना बड़ी भूल होगी। इसका सीधा सम्बंध उत्तराखण्ड के सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय भविष्य से है। यदि सरकारी विद्यालय लगातार कमजोर होते गए तो सबसे अधिक नुकसान उन परिवारों को होगा जो निजी शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते। शिक्षा का असमान अवसर अंततः सामाजिक असमानता को भी बढ़ाता है। नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इसी कारण शिक्षा व्यवस्था को केवल विद्यालयों की संख्या या बजट के नजरिए से देखने के बजाय उसे मानव संसाधन विकास और आर्थिक प्रगति से जोड़कर देखने की आवश्यकता बताई है।
उत्तराखण्ड की स्थिति अन्य राज्यों से इसलिए भी अलग है क्योंकि यहां पलायन और शिक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। बेहतर शिक्षा की तलाश में हजारों परिवार हर वर्ष पहाड़ छोड़कर देहरादून, हल्द्वानी, ऋषिकेश, हरिद्वार और राज्य से बाहर के शहरों की ओर जा रहे हैं। अनेक परिवारों ने केवल बच्चों की पढ़ाई के लिए गांवों में बने अपने पुश्तैनी मकान बंद कर दिए। इसका असर केवल सरकारी विद्यालयों पर ही नहीं पड़ा बल्कि पूरे ग्रामीण समाज की संरचना बदलने लगी। जिन गांवों में बच्चे नहीं रहे, वहां विद्यालय भी खाली हो गए और जब विद्यालय कमजोर हुए तो बाकी परिवारों का पलायन और तेज हो गया। इस तरह शिक्षा और पलायन का एक दुष्चक्र बन गया है।
राज्य सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप कई सुधारों की घोषणा की। समग्र शिक्षा अभियान के तहत आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करने, स्मार्ट क्लास, डिजिटल कंटेंट, व्यावसायिक शिक्षा, पुस्तकालय, खेल सुविधाओं और शिक्षक प्रशिक्षण पर जोर दिया गया है। कई विद्यालयों में अटल उत्कृष्ट विद्यालय जैसी पहल भी शुरू की गई, जिसका उद्देश्य सरकारी विद्यालयों को निजी विद्यालयों के समकक्ष बनाना था लेकिन इन पहलों का लाभ अभी सीमित संख्या में विद्यालयों तक ही पहुंच पाया है। अधिकांश ग्रामीण और दूरस्थ विद्यालय आज भी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकारी विद्यालयों में फिर से विश्वास कायम करना है तो सबसे पहले शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। किसी भी शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता का सबसे महत्वपूर्ण आधार शिक्षक होता है। एकल शिक्षक विद्यालयों की संख्या कम करना, विषय विशेषज्ञों की समयबद्ध नियुक्ति, पारदर्शी स्थानांतरण नीति और दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देने वाले शिक्षकों के लिए विशेष प्रोत्साहन जैसी व्यवस्थाएं अब टाली नहीं जा सकतीं। केवल भवन, फर्नीचर और डिजिटल उपकरण उपलब्ध करा देने से शिक्षा की गुणवत्ता स्वतः नहीं सुधरती।
दूसरा बड़ा सुधार विद्यालयों के प्रबंधन और जवाबदेही में लाना होगा। आज भी अनेक सरकारी विद्यालयों में स्थानीय समुदाय की भागीदारी सीमित है। स्कूल प्रबंधन समितियों को अधिक अधिकार और जिम्मेदारी देकर उन्हें विद्यालय की गुणवत्ता सुधारने की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाया जा सकता है। जिन राज्यों में समुदाय की भागीदारी मजबूत हुई है, वहां सरकारी विद्यालयों में नामांकन और सीखने के स्तर दोनों में सुधार देखने को मिला है।
तीसरी आवश्यकता माध्यमिक शिक्षा तक आर्थिक सहायता के विस्तार की है। यदि सरकार वास्तव में ड्राॅपआउट कम करना चाहती है तो कक्षा आठ के बाद भी गरीब परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा की लागत कम करनी होगी। छात्रवृत्ति, निःशुल्क परिवहन, छात्रावास, पुस्तकों और यूनिफाॅर्म की व्यवस्था तथा विशेष रूप से बालिकाओं के लिए सुरक्षित आवागमन जैसी योजनाओं का दायरा बढ़ाना होगा। केवल यह कह देना कि विद्यालय उपलब्ध हैं, पर्याप्त नहीं है, वहां तक पहुंचना और पढ़ाई जारी रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
नीति आयोग द्वारा सुझाया गया ‘एकीकृत स्कूल परिसर’ माॅडल उत्तराखण्ड के लिए अवसर भी हो सकता है और चुनौती भी। जहां सड़क, परिवहन और छात्रावास जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं, वहां एकीकृत विद्यालय शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ा सकते हैं लेकिन दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में इस माॅडल को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप लागू करना होगा। यदि केवल छोटे विद्यालय बंद कर दिए गए और बच्चों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई तो ड्राॅपआउट और बढ़ सकता है। इसलिए किसी भी सुधार का केंद्र केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं बल्कि विद्यार्थी होना चाहिए।
यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि सरकारी विद्यालयों का उद्देश्य केवल परीक्षा परिणाम देना नहीं है। यही विद्यालय समाज के सबसे गरीब, वंचित और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करते हैं। यदि इन विद्यालयों की गुणवत्ता गिरती है तो उसका असर केवल शिक्षा पर नहीं बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और राज्य के समग्र विकास पर भी पड़ेगा। निजी विद्यालय शिक्षा का विकल्प हो सकते हैं लेकिन वे सार्वभौमिक सार्वजनिक शिक्षा का स्थान नहीं ले सकते।
नीति आयोग की रिपोर्ट वस्तुतः उत्तराखण्ड के लिए एक चेतावनी है। रिपोर्ट बता रही है कि यदि अभी भी शिक्षा व्यवस्था में संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में सरकारी विद्यालयों का दायरा और सिमट सकता है। दूसरी ओर यह रिपोर्ट एक अवसर भी देती है कि राज्य अपनी भौगोलिक परिस्थितियों, जनसंख्या वितरण और नई शिक्षा नीति को ध्यान में रखते हुए ऐसा मॉडल विकसित करे जो गुणवत्तापूर्ण और समान शिक्षा सुनिश्चित कर सके।
सरकारी विद्यालयों में घटती छात्र संख्या को केवल अभिभावकों की पसंद या निजी विद्यालयों की बढ़ती लोकप्रियता कहकर टाला नहीं जा सकता। यह उस विश्वास का क्षरण है जो कभी सरकारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत थी। जब तक विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई, आधुनिक संसाधन, सुरक्षित वातावरण और निरंतर जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक यह भरोसा लौटना कठिन होगा। नीति आयोग ने आंकड़ों के माध्यम से जो तस्वीर सामने रखी है, वह केवल उत्तराखण्ड की शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन नहीं बल्कि भविष्य के लिए एक स्पष्ट संदेश भी है, यदि सरकारी विद्यालयों को बचाना है तो अब आधे-अधूरे सुधारों से काम नहीं चलेगा। शिक्षा को फिर से राज्य की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाना ही होगा क्योंकि मजबूत सरकारी विद्यालय केवल बच्चों का भविष्य नहीं बनाते, वे किसी भी राज्य के सामाजिक और आर्थिक भविष्य की सबसे मजबूत नींव भी तैयार करते हैं।