Uttarakhand

पहाड़ पर चाबुक, मैदान पर मरहम

राजधानी देहरादून का अवैध मलिन बस्ती प्रकरण

प्रदेश को अतिक्रमण मुक्त कराना मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की प्राथमिकताओं में से एक है। उनकी सरकार अपने मुखिया की इस प्राथमिकता को राज्य के पर्वतीय जिलों में सख्ती से लागू कर रही है। संकट यह कि छोटे व्यापारियों और रेहड़ी-पटरी वालों पर उसका चाबुक कस के बरसता है लेकिन जैसे ही मैदानी इलाकों में अतिक्रमण की बात आती है तो यह चाबुक थम जाता है। राजधानी देहरादून की मलिन बस्तियां इसका सटीक उदाहरण हैं जिन्हें 2018 में हाईकोर्ट के आदेश की मार से बचाने के लिए सरकार दो बार अध्यादेश ले आई। अब एक बार फिर से एनजीटी के आदेशों चलते इन अवैध बस्तियों का अस्तित्व संकट में है तो कांग्रेस और भाजपा इन बस्तियों में मौजूद विशाल वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए एक सुर में इनकी रक्षा का दंभ भरने लगी हैं

एक ओर प्रदेश के पहाड़ी जिलों में राष्ट्रीय राजमार्गों और प्रदेश राजमार्गों पर वर्षों से अपना रोजगार चलाने वाल पहाड़ी लोगों के दुकानें आदी को हाईकोर्ट के अतिक्रमण हटाए जाने के आदेश की आड़ में ध्वस्त कर दिया जाता है तो दूसरी तरफ मैदानी क्षेत्रों में अवैध बस्तियों पर कार्यवाही रोकने के लिए पूरा राजतंत्र सक्रिय हो उठता है। गौरतलब है कि कुछ माह पूर्व धामी सरकार ने प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में अतिक्रमण हटाने की मुहिम शुरू कर बड़ी वाहवाही बटोरी थी। हाईकोर्ट के एक आदेश बाद शुरू हुए इस अभियान के दौरान छोटे व्यापारियों और रेहड़ी-पटरी वालों पर विशेष रूप से सरकारी अमले का कहर बरपा था। तब इनके बचाव में न तो सरकार कोई अध्यादेश लेकर सामने आई और न ही जन प्रतिनिधियां या विधायकों ने इनके पक्ष में दबाव बनाया लेकिन जैसे ही देहरादून की अवैध बस्तियों पर कार्यवाही की बात सामने आई तो सरकार के साथ ही विपक्ष भी इन बस्तियों के बचाव में उतर आया है। धामी सरकार के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने इन अवैध बस्तियों को न उजड़ने देने और इसके लिए कोई बीच का रास्ता निकाले जाने की बात कह कर साफ कर दिया है कि पूरा राजनीतिक तंत्र मैदानी क्षेत्र की अवैध बस्तियों के बचाव में उतर पड़ा है।

दरअसल राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी के द्वारा हर हालत में 30 जून तक देहरादून की रिस्पना नदी के किनारे अवैध तरीके से बसी 27 बस्तियों को हटाने का आदेश के साथ-साथ नदी के फल्डजोन को चिन्हीकरण करने के भी आदेश जारी करने के बाद प्रदेश की राजनीति में खासी हलचल देखने को मिल रही है। 2016 के बाद रिस्पना नदी पर 27 अवैध बस्तियों में 525 भवनों को चिन्हित किया गया है। सूत्रों की मानें तो एनजीटी के आदेश का अनुपालन करने में सरकार की हालत खराब हो रही है और इससे बचने के लिए बीच का रास्ता खोजे जाने की कवायद शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि इन कब्जां को लेकर फिर से कोई अध्यादेश जारी हो सकता है।

ऐसा नहीं है कि रिस्पना नदी पर पहली बार अवैध बस्तियों को हटाए जाने का मामला सामने आया हो। पूर्व में हाईकोर्ट द्वारा एक जनहित याचिका पर 18 जून 2018 को प्रदेश के मुख्य सचिव को चार सप्ताह के भीतर देहरादून में सभी प्रकार के अतिक्रमण हटाने के आदेश जारी किए गए थे। इनके अनुपालन में प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाए जाने की कार्यवाही आरंभ की लेकिन उसका तब भारी विरोध अतिक्रमणकारियों द्वारा किया गया था। हाईकोर्ट की अवमानना के अंदेशे से सरकार और जनप्रतिनिधि तब इस मुद्दे पर खामोश रहे थे। लेकिन जैसे ही प्रशासन अवैध मलिन बस्तियों को भी हटाए जाने की कार्यवाही आरम्भ करने लगा तो राजनीतिक दलों में अपने वोट बैंक के खिसकने की आशंका के चलते सरकार पर दबाव बनाना आरम्भ कर दिया। स्वयं सत्ताधारी पार्टी भाजपा के चार विधायक जिनमें राजपुर रोड के खजान दास, रायपुर विधायक उमेश शर्मा काउ और देहरादून कैंट के हरबंश कपूर और मसूरी के विधायक गणेश जोशी अपनी ही सरकार के खिलाफ खड़े हो गए।

अपने ही विधायकों के सरकार के खिलाफ खड़े होने से सरकार और भाजपा संगठन खासा असहज होने लगा। दूसरी ओर कांग्रेस ने भी सरकार के खिलाफ सड़कों पर मोर्चा खोलकर मलिन बस्तियों के निवासियों को अपने पाले में करने के लिए पूरी रणनीति से आंदोलन आरम्भ कर दिया। तब कुछ ही समय बाद प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनाव होने थे और अधिकांश मलिन बस्तियां नगरीय क्षेत्रों में ही बसी हुई हैं जिसके चलते सरकार को निकाय चुनाव में खासी चुनौतियां मिलने की संभावनाएं जताई जाने लगी। निकाय चुनाव में सरकार के खिलाफ माहौल बनने लगा तो मलिन बस्तियों को हाईकोर्ट के अतिक्रमण हटाए जाने के आदेश से बाहर रखने के लिए तत्कालीन त्रिवेंद्र रावत सरकार द्वारा अध्यादेश लाया गया और तीन वर्ष तक इन सभी अवैध बस्तियों को राहत दे दी गई थी। इसके लिए उत्तराखण्ड नगर निकायों और प्राधिकरणों हेतु विशेष प्रावधान अध्यादेश 2018 लाया गया जिसमें इन सभी अवैध बस्तियों को मलिन बस्ती घोषित कर की और इनके सुधार, पुनर्वास और विनियमितीकरण और पुनर्व्यवस्थान तथा अतिक्रमण निषेध नियमावली 2016 को लागू कर दिया गया। इसके तहत तीन वर्ष तक राज्य की किसी भी मलिन बस्ती को न हटाए जाने का प्रावधान रखा गया। इतना ही नहीं सरकार की ओर से दावा किया गया है कि इन तीन वर्षों में मलिन बस्तियां को अन्यत्र बसाए जाने के लिए प्रधानमंत्री निर्बल आवास योजना के तहत आवासां का निर्माण कर मलिन बस्तियों के निवासियों को उनमें पुनर्वास किया जाएगा।

इस एक्ट के लागू होने के बाद पूरे प्रदेश में 584 अवैध बस्तियां चिन्हित की गई जिनमें 1 लाख 80 हजार मकानों का निर्माण हुआ है और इनमें 11 लाख की बड़ी भारी आबादी निवास करती है। ये बस्तियां निकाय क्षेत्रां में ही सबसे ज्यादा हैं और एक बड़ा वोट बैंक के तौर पर सभी राजनीतिक दलों की जरूरत बन चुका है। त्रिवेंद्र सरकार इन अवैध बस्तियों को राहत देने के लिए अध्यादेश तो लेकर आई लेकिन तीन बरसों के भीतर-भीतर इनका पुनर्वास और विनियमितीकरण करना भूल गई। 2021 में अध्यादेश की सीमा समाप्त हो गई। इस दौरान ही राज्य में नेतृत्व परिवर्तन हो गया और नई सरकार के सामने अवैध बस्तियों को बचाने की चुनौती मुंह बाए खड़ी हो गई। धामी सरकार ने ऐसे में त्रिवेंद्र रावत सरकार के अध्यादेश को फिर से तीन वर्ष के लिए बढ़ा दिया।

दिलचस्प बात यह है कि इसी वर्ष 2024 में फिर से अध्यादेश की तीन वर्ष की सीमा खत्म होने वाली है लेकिन अभी तक सरकार ने अपने ही अध्यादेश के अनुरूप कोई काम नहीं किया। केवल नैनीताल जिले के रामनगर के नजूल भूमि के मामलों में ही कुछ कार्यावही की गई है जिसमें कुछ लोगों को भूमिधरी का हक दिया गया है, शेष मामलां में कोई काम नहीं हो पाया है। अब प्रशासन एनजीटी के आदेश के बाद इन बस्तियों को हटाए जाने की कवायद कर रहा है। रिस्पना नदी पर ही 27 अवैध बस्तियों के 525 भवनों को चिन्हित किया गया है। ये बस्तियां 2016 के बाद नई खड़ी हुई हैं।

गौर करने वाली बात है कि यह आकड़ा देहरादून के सिर्फ रिस्पना नदी पर अवैध बस्तियों का ही है जबकि देहरादून में कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें 2016 के बाद नए कब्जे हुए हैं। देहरादून की दूसरी बड़ी नदी विंदाल पर भी 2016 के बाद कब्जे निरंतर होते रहे हैं। हालांकि एनजीटी के आदेश बाद प्रशासन ने इन अवैध बस्तियों में अतिक्रमण की कार्यवाही आरंभ कर दी है और 27 मई से अवैध भवनों को हटाया जा रहा है। लेकिन जिस तरह से इस मामले में विगत 6 वर्ष से जमकर राजनीति होती रही है और सरकार के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी और सत्ताधारी विधायक एक स्वर में इन कॉलोनियों के बचाव में उतरे हैं उससे लगता नहीं कि प्रशासन पूरी कार्यवाही कर पाएगा। कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के वक्तव्य की ‘प्रदेश में हमारी सरकार है और सरकार किसी भी सूरत में अन्याय नहीं होने देगी’ इससे साफ हो गया है कि फिर से अवैध बस्तियों को राहत देने का काम किया जाएगा। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी ने भी इस मामले में सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलकर मलिन बस्तियों के हक में आंदोलन करने की चेतावनी सरकार को दी है। दूसरी ओर पहाड़ी जिलों के निवासियों के साथ सरकार और सिस्टम ने कोई राहत देने का काम नहीं किया है। मैदानी क्षेत्रों की अवैध बस्तियों के मामले ने यह पूरी तरह से साबित कर दिया है कि राज्य में वोट बैंक ही सर्वापरि है और इसको बचाए जाने के लिए सरकार किसी भी सीमा तक जा सकती है भले ही इससे राज्य में पहाड़ और मैदान की तुलना की खाई और भी तेजी से बढ़ चुकी है।

 

बात अपनी-अपनी

सरकार किसी को बेघर नहीं होने देगी। जैसे ही आचार संहिता हटेगी विधानसभा में इस विषय को लेकर आएंगे और प्रदेश के सभी मलिन बस्तियों को टूटने से बचाया जाएगा। पूर्व में जारी अध्यादेश को अगर सरकार समझेगी तो उसे तीसरी बार भी बढ़ा सकती है। सरकार रिस्पना नदी के मामले में भी बीच का रास्ता निकालने का प्रयास कर रही है।
गणेश जोशी, कैबिनेट मंत्री उत्तराखण्ड सरकार

भले ही ताजा कार्यवाही एनजीटी के आदेश से हो रही हो लेकिन यही सरकार मलिन बस्तियों को टूटने से बचाने के लिए अध्यादेश लाई थी जिसे 2021 में फिर से तीन साल के लिए बढ़ाया जा चुका है। रिस्पना नदी के किनारे बसी बस्ती भी तो प्रदेश की मलिन बस्तियों में शामिल है तो फिर किस तरह से सरकार आज इनको तोड़ रही है? सरकार क्यों नहीं एनजीटी में इस पक्ष को लेकर गई? इससे साफ है कि सरकार कोर्ट की आड़ में गरीबों को बेघर कर रही है। लगातार दो बार से प्रदेश में भाजपा की सरकार है तो कैसे सरकार ने रिस्पना नदी पर नए कब्जे होने दिए और उनको सुविधाएं दी? सरकार को इसका जवाब देना चाहिए।
गरिमा मेहरा दासौनी, मुख्य प्रवक्ता उत्तराखण्ड प्रदेश कांग्रेस कमेटी

मैदानी क्षेत्रों की अवैध बस्तियों को बचाने के लिए यहां की सरकारें कोर्ट के आदेशों को भी पलट देती है। लेकिन पहाड़ी क्षेत्र के निवासियों के ऊपर तुरंत कार्यवाही कर देती है। उनके लिए कोई कानून नहीं लाया जाता। यह सब वोट बैंक के लिए किया जा रहा है। एनजीटी के आदेश के बाद लगा कि अब रिस्पना नदी से अवैध कब्जे हटाए जाएंगे लेकिन उनके लिए भी सरकार बीच का रास्ता निकालने की बात कर रही है। आज इसी कारण से प्रदेश में बाहरी लोगों का अवैध कब्जा हो रहा है।
मनमोहन लखेड़ा, वरिष्ठ पत्रकार देहरादून

सरकार और नेताओं का पूरा फोकस मैदानी क्षेत्र के अवैध कब्जाधारियों के हितों के संरक्षण का रहा है। अभी कुछ ही माह पूर्व प्रदेश के पहाड़ी जिलों में सड़कों के किनारे 40-50 सालों से अपना स्वरोजगार करने वाले पहाड़ी लोगों के रोजगार के साधनों को हाईकोर्ट के एक आदेश पर सरकार ने तुरंत तोड़ दिया लेकिन नगरों की मलिन बस्तियों के बचाव में सरकार अध्यादेश लेकर आ गई। आज जो पहाड़ी क्षेत्र के विधायकों की छाती इन मलिन बस्तियों के टूटने पर फट रही है लेकिन पहाड़ी लोगों के रोजगार छीनने पर इनकी छाती कभी नहीं फटी। हमारी तो समझ में यह नहीं आ रहा है कि उत्तराखण्ड राज्य का निर्माण मूल निवासियों के लिए हुआ था या बाहरी लोगों के निवास के लिए। कब कोई सरकार मूल निवासियों के हकों के लिए बात करेगी और कब हमारे लिए भी कोई अध्यादेश आएगा।
रतन सिंह असवाल, संयोजक पलायन एक चिंतन कार्यक्रम
उत्तराखण्ड पूरी तरह से अवैध कब्जां का प्रदेश बन चुका है। भाजपा, कांग्रेस दोनां ने ही बारी-बारी से यहां की जमीनों पर वोट बैंक के लिए अवैध कब्जा करवा कर बस्तियां बसाई हैं। आज प्रदेश के पहाड़ी जिलों में हजारों निवासी आपदाग्रस्त हैं और विस्थापन की मांग कर रहे हैं लेकिन इनके लिए कोई अध्यादेश सरकार कभी नहीं लेकर आई। मलिन बस्तियों को बचाने के लिए सरकार के मंत्री तक कह रहे हैं कि सरकार किसी को बेघर नहीं करेगी। सरकारां का साफ संदेश है कि उत्तराखण्ड आओ नदी नालों और सरकारी जमीनों पर कब्जा करो, सरकार पूरा संरक्षण देगी।
शिव प्रसाद सेमवाल, अध्यक्ष, राष्ट्रवादी रीजनल पार्टी उत्तराखण्ड

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