Uttarakhand

किच्छा हाईटेक जेल 28 करोड़ खर्च, हजारों पेड़ कटे, फि र क्यों बदल गई सरकार की योजना?

  • भूपिन्दर सिंह मेहता
नौ बरस पहले किच्छा के राजपुरा में हाईटेक जेल के लिए करीब 40 एकड़ भूमि चिन्हित की गई, 5,744 पाॅपुलर के पेड़ काटे गए, बाउंड्री वाॅल सहित निर्माण कार्य शुरू हुआ और लगभग 28-29 करोड़ रुपए खर्च भी हो गए। इसके बावजूद परियोजना रोककर नई जमीन की तलाश शुरू कर दी गई। सरकार के इस बदलाव को लेकर क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कुछ स्थानीय लोगों का दावा है कि एक बड़े औद्योगिक समूह ने जैसे ही अपने सीमेंट प्लांट के लिए इस भूमि में रुचि दिखाई जिसके बाद परियोजना का रुख बदल गया। हालांकि इस सम्बंध में कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है और सरकार की ओर से स्पष्ट जवाब का इंतजार है

उत्तराखण्ड के ऊधमसिंह नगर जिले में प्रस्तावित किच्छा-राजपुरा हाईटेक जेल परियोजना अब केवल एक अधूरी निर्माण योजना नहीं रह गई है बल्कि यह सरकारी निर्णयों, परियोजना नियोजन और सार्वजनिक धन के उपयोग पर गम्भीर सवाल खड़े करने वाला मामला बन गई है। जिस परियोजना को प्रदेश की जेल व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया गया था, वह करोड़ों रुपए खर्च होने और निर्माण कार्य शुरू होने के बाद अचानक ठंडे बस्ते में चली गई जबकि अब नई जेल के लिए सितारगंज में जमीन तलाशे जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

गौरतलब है कि वर्ष 2017 में प्रदेश में नई हाईटेक जेल बनाने की योजना तैयार की गई थी। इसके लिए किच्छा के राजपुरा क्षेत्र में लगभग 40 एकड़ भूमि का चयन किया गया। बाद में इस परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियां शुरू हुईं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 5,744 पाॅपुलर के पेड़ काटे गए, भूमि को निर्माण योग्य बनाया गया और वर्ष 2021 में जेल निर्माण का कार्य भी शुरू कर दिया गया। परियोजना की कुल लागत लगभग 48 करोड़ रुपए आंकी गई थी। अब तक करीब 28 से 29 करोड़ रुपए इस परियोजना पर खर्च हो चुके हैं तथा बाउंड्री वाॅल सहित कई निर्माण कार्य पूरे कराए जा चुके हैं। अब लेकिन जेल को यहां से स्थानांतरित करने का निर्णय ले लिया गया है।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि राजपुरा की भूमि जेल निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं थी तो इसका पता परियोजना शुरू होने से पहले क्यों नहीं लगाया गया? स्थानीय स्तर पर यह चर्चा रही है कि चयनित भूमि औद्योगिक क्षेत्र के अंतर्गत आती है। यदि ऐसा था तो क्या भूमि चयन के समय सम्बंधित विभागों ने सभी तकनीकी और कानूनी पहलुओं की जांच नहीं की? क्या परियोजना शुरू करने से पहले यह स्पष्ट नहीं किया गया कि भविष्य में इस भूमि पर जेल जैसी संवेदनशील परियोजना का संचालन सम्भव होगा या नहीं?
किसी भी बड़ी सरकारी परियोजना में भूमि चयन सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। जमीन की प्रकृति, भूमि उपयोग, पर्यावरणीय प्रभाव, भविष्य की विस्तार क्षमता और कानूनी स्थिति का परीक्षण प्रारम्भिक स्तर पर ही किया जाता है। ऐसे में यदि निर्माण कार्य शुरू होने, करोड़ों रुपए खर्च होने और हजारों पेड़ काटे जाने के बाद परियोजना को रोकना पड़ जाए तो स्वाभाविक रूप से प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं। राजपुरा में जेल निर्माण का कार्य शुरू होने के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि प्रदेश को लगभग 2,580 बंदियों की क्षमता वाली एक आधुनिक हाईटेक जेल मिलेगी, जिससे मौजूदा जेलों पर दबाव कम होगा लेकिन कुछ वर्षों बाद परियोजना की गति रुक गई और सरकार ने वैकल्पिक स्थानों पर विचार शुरू कर दिया। अब सितारगंज में नई जेल विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। हालांकि किसी भी परियोजना में तकनीकी या प्रशासनिक कारणों से बदलाव सम्भव है लेकिन जब सार्वजनिक धन का बड़ा हिस्सा खर्च हो चुका हो तब जवाबदेही का प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है। आखिर वह कौन से कारण थे जिनकी वजह से निर्माणाधीन परियोजना को बीच में रोकना पड़ा? यदि भूमि उपयुक्त नहीं थी तो यह तथ्य पहले क्यों सामने नहीं आया? यदि बाद में कोई नई समस्या उत्पन्न हुई तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
इस पूरे मामले का पर्यावरणीय पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। हजारों पाॅपुलर के पेड़ों की कटाई के बाद पर्यावरणीय क्षति की भरपाई किस प्रकार की गई, यह भी स्पष्ट नहीं है। विकास परियोजनाओं के लिए पेड़ों की कटाई कई बार अपरिहार्य हो सकती है, लेकिन ऐसी स्थिति में प्रतिपूरक पौधारोपण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

स्थानीय निवासी अजीम कुरैशी का कहना है कि जब जेल निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहित की गई, पेड़ काटे गए और करोड़ों रुपए खर्च कर निर्माण कार्य शुरू किया गया तब सरकार और सम्बंधित विभागों को भूमि की स्थिति और उपयोग की जानकारी अवश्य रही होगी। उनके अनुसार अब परियोजना को दूसरी जगह स्थानांतरित करना जनता के मन में कई सवाल पैदा कर रहा है। वे कहते हैं कि ‘‘सरकार स्पष्ट करे कि राजपुरा परियोजना क्यों रोकी गई? निर्माण पर हुए खर्च का वर्तमान स्थिति में क्या उपयोग होगा और सम्बंधित भूमि का भविष्य क्या है।’’

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता सहदाब खान का कहना है कि ‘‘यह केवल एक निर्माण परियोजना का मामला नहीं बल्कि जनता के धन से जुड़ा प्रश्न है।’’ उनके अनुसार सरकार को पूरी परियोजना की समयरेखा, निर्माण कार्य रुकने के कारणों और अब तक हुए खर्च का विस्तृत विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। उनका कहना है कि यदि इस परियोजना के लिए विकसित की गई भूमि और संसाधनों का उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया जाना है तो उसकी जानकारी भी पारदर्शी तरीके से जनता के सामने रखी जानी चाहिए। सहदाब खान की मानें तो स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि जिस भूमि पर हाईटेक जेल प्रस्तावित थी, उसे भविष्य में किसी निजी कम्पनी को दिए जाने की सम्भावना जताई जा रही है। यदि ऐसी कोई योजना है तो सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उनके अनुसार जिस भूमि और बुनियादी ढांचे पर सार्वजनिक धन खर्च हुआ है, उसका उपयोग सार्वजनिक हित में ही होना चाहिए।
कुल मिलाकर किच्छा-राजपुरा हाईटेक जेल परियोजना अब एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन चुकी है कि किसी भी सरकारी योजना में प्रारम्भिक स्तर पर लिए गए निर्णय कितने महत्वपूर्ण होते हैं। जमीन चयन से लेकर पर्यावरणीय मंजूरी और निर्माण कार्य तक की पूरी प्रक्रिया में यदि कहीं भी चूक होती है तो उसका सीधा असर जनता के धन और सरकारी संसाधनों पर पड़ता है। ऐसे में सरकार और सम्बंधित विभागों के लिए यह आवश्यक है कि वे इस परियोजना से जुड़े सभी तथ्यों को सार्वजनिक करें और स्पष्ट करें कि आखिर 28-29 करोड़ रुपए खर्च होने, हजारों पेड़ काटने और निर्माण कार्य शुरू होने के बाद परियोजना को बीच रास्ते में क्यों रोकना पड़ा। यही पारदर्शिता भविष्य में ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति रोकने और जनता का विश्वास बनाए रखने का सबसे प्रभावी माध्यम होगी।

‘जेल को लेकर सरकार की मंशा गलत है’
यह किच्छा के नजदीक है। जेल का चयन तो ठीक किया गया था लेकिन दुर्भाग्य है कि अचानक कार्य रुकवा दिया गया। इसका कारण समझ नहीं आया कि आखिर क्यों रोका गया? पता नहीं सरकार किस उद्योगपति को यह जमीन देना चाहती है। सरकार ने अपनी मंशा आज तक स्पष्ट नहीं की है। मैंने इस सम्बंध में पत्र भी लिखे थे कि अगर यहां जेल नहीं बन पा रही है तो ऊधमसिंह नगर के जिला मुख्यालय रुद्रपुर में फैजलपुर में जगह है। वहां बहुत बड़ा क्षेत्र है, सरकारी सीलिंग की जमीन पड़ी हुई है। वहां जेल बनाई जाए, इसके लिए मैंने कागजी कार्रवाई भी की थी। जेल विभाग ने उस जमीन का निरीक्षण भी किया था लेकिन उसे भी रोक दिया गया और अब इसे सितारगंज की तरफ ले जाया गया है।

जिला मुख्यालय में जेल होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि काशीपुर, जसपुर से लेकर खटीमा तक पूरे जिले के क्षेत्रों से कैदियों को लाने-ले जाने में सरकार का खर्च बचता है। अगर जेल जिले से दूर बनाई जाएगी तो सरकार का अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा। जेल को लेकर सरकार का निर्णय गलत है या तो इसी स्थान पर जेल बनाई जाए, नहीं तो फैजलपुर महरौली क्षेत्र में जो जगह है, वहां जेल बनाई जाए। बार-बार स्थानांतरण क्यों किया गया? इस सम्बंध में मैंने पत्र के माध्यम से सरकार से जवाब मांगा था लेकिन सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया। ऐसा लगता है इसके पीछे कोई न कोई बड़ा उद्योगपति होगा। सरकार की इच्छा किसी उद्योगपति को देने की है।

तिलक राज, विधायक, किच्छा

बात अपनी-अपनी
मेरे संज्ञान में यह प्रकरण नहीं हैं। निर्णय शासन स्तर पर हुआ है।

मनीष बिष्ट, क्षेत्रीय प्रबंधक, सिडकुल पंतनगर

किच्छा में प्रस्तावित जेल की भूमि को सिडकुल को हस्तांतरित कर दिया गया है। जेल निर्माण में अब तक हुए खर्च की भरपाई सिडकुल के माध्यम से की जाएगी। इसके लिए विभागीय प्रक्रिया अभी लम्बित है। सिडकुल ही जेल के लिए  वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराएगा। राजपुरा क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों के लिए भूमि का उपयोग प्रस्तावित होने के कारण जेल को स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया। सितारगंज में पहले से सेंट्रल जेल है जबकि राजपुरा में जिला जेल का प्रस्ताव था। नई जिला जेल के लिए जब सिडकुल अथवा सरकार की ओर से भूमि उपलब्ध करा दी जाएगी, उसके बाद निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा। इस सम्बंध में सभी सरकारी प्रक्रियाएं चल रही हैं।

करण सिंह नगन्याल, पुलिस महानिरीक्षक (जेल), राजपुरा (किच्छा)

किच्छा में प्रस्तावित जेल निर्माण कार्य को रोकना गलत निर्णय है। यह पैसा जनता के टैक्स का है, सरकार का व्यक्तिगत पैसा नहीं है। जेल भूमि पर निर्माण कार्य में लगभग 29 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, उसके बाद कार्य को रोक दिया गया। इससे नुकसान आम जनता का है जो अपने टैक्स के माध्यम से सरकार को पैसा देती है। हमने उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के लिए संघर्ष किया, जेल गए और लाठियां खाईं। हमने जिस उत्तराखण्ड का सपना देखा था, वह सपना अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। राज्य में लम्बे समय से कांग्रेस और भाजपा की मिलीभगत रही है। आज प्रदेश में विकास के बजाय केवल शराब और खनन जैसे मुद्दे ही प्रमुख दिखाई दे रहे हैं।

विनोद जोशी, राज्य आंदोलनकारी
नब्बे प्रतिशत काम होने के बाद उस कार्य को फिर से ऐसे ही छोड़ दिया गया। बाद में यह कहा गया कि दूसरी जगह जेल बनेगी। इससे सरकार की मंशा में संदेह होता है कि वह चाहती क्या है। यहां जेल बनती तो अच्छा होता, लिंक मार्ग बनते और विकास होता। जेल को सिडकुल में स्थानांतरित करने का क्या मतलब होता है। यह तो इनडायरेक्टली किसी बड़े उद्योगपति को फायदा पहुंचाना चाहते हैं। अगर इंडस्ट्रियल एरिया था तो जब जमीन चिन्हित हुई तो तब कैसे काम शुरू हुआ? क्या अधिकारियों को तब ज्ञान की कमी थी?
दिनेश थुवाल, उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी एवं पूर्व दर्जा राज्य मंत्री

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