पौड़ी गढ़वाल जिले की लैंसडाउन विधानसभा सीट से भाजपा विधायक दिलीप रावत द्वारा पेशावर विद्रोह के अमर नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की बुद्धिमत्ता को लेकर की गई टिप्पणी ने उत्तराखण्ड में तीखी राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी है। सवाल केवल विधायक के शब्दों का नहीं बल्कि उस ऐतिहासिक चेतना और राजनीतिक संवेदनशीलता का भी है, जो स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों के सम्मान, उनकी विरासत और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा से जुड़ी है
पेशावर विद्रोह के अमर नायक और उत्तराखण्ड के गौरव वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को लेकर पौड़ी गढ़वाल जिले की लैंसडाउन विधानसभा सीट से भाजपा विधायक दिलीप रावत की टिप्पणी विवादों में घिर गई है। एक जुलाई को देहरादून में स्व. विजय सुंदरियाल की स्मृति में आयोजित स्वरोजगार कार्यक्रम में क्रांति और बुद्धिमत्ता के बीच संबंध समझाने के दौरान विधायक ने वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की बुद्धिमत्ता को लेकर टिप्पणी की। इसका वीडियो सामने आने के बाद प्रदेश में तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई हैं। राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे महानायक के बारे में सार्वजनिक मंच से इस तरह की टिप्पणी किस हद तक उचित है।
प्रसारित वीडियो में विधायक दिलीप रावत यह कहते सुनाई दे रहे हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति कभी क्रांति नहीं करता। इसी क्रम में वह वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का उल्लेख करते हुए उन्हें अधिक पढ़ा-लिखा नहीं बताते और उनकी बुद्धिमत्ता को लेकर भी टिप्पणी करते हैं। सम्भव है कि विधायक यह समझाने का प्रयास कर रहे हों कि क्रांति निजी लाभ-हानि का आकलन करने वाले अत्यधिक व्यावहारिक लोग नहीं बल्कि व्यवस्था से टकराने और परिणामों की परवाह किए बिना जोखिम उठाने वाले लोग करते हैं लेकिन इस विचार को व्यक्त करने के लिए वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की बुद्धिमत्ता पर सवाल उठाने वाले शब्दों का चयन पूरे कथन को विवाद के केंद्र में ले आया।
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के ऐतिहासिक योगदान को औपचारिक शिक्षा अथवा बुद्धिमत्ता के किसी सामान्य पैमाने पर नहीं परखा जा सकता। 23 अप्रैल 1930 को पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोली चलाने के ब्रिटिश अधिकारियों के आदेश को अस्वीकार करना केवल साहस का प्रदर्शन नहीं था। यह असाधारण नैतिक विवेक, मानवीय संवेदना और दूर दृष्टि से लिया गया निर्णय था। सैनिक अनुशासन में आदेश की अवहेलना के गम्भीर परिणामों को जानते हुए भी चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके साथियों ने औपनिवेशिक सत्ता के आदेश से ऊपर मानवता को रखा। इसी निर्णय ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर कर दिया।
विधायक की टिप्पणी इसलिए भी अधिक संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं बल्कि उत्तराखण्ड की सामूहिक अस्मिता और गौरव के सबसे बड़े प्रतीकों में शामिल हैं। प्रदेश में उनका नाम साहस, मानवीय संवेदना और अन्यायपूर्ण सत्ता के विरुद्ध नैतिक प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। ऐसे में एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि द्वारा उनकी बुद्धिमत्ता को लेकर की गई टिप्पणी को महज शब्दों की असावधानी मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है। इस घटनाक्रम का एक असहज पक्ष कार्यक्रम में मौजूद लोगों की प्रतिक्रिया को लेकर भी सामने आया है। विधायक की टिप्पणी के तत्काल बाद कार्यक्रम में किसी गम्भीर विरोध अथवा आपत्ति की तस्वीर दिखाई नहीं दी। कार्यक्रम सामान्य रूप से आगे बढ़ता रहा और विधायक भी आयोजन में बने रहे। इसे लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं कि यदि मंच से उत्तराखण्ड के एक महान स्वतंत्रता सेनानी के बारे में ऐसी टिप्पणी की गई तो वहां मौजूद लोगों ने उसी समय आपत्ति क्यों नहीं जताई। कार्यक्रम के दौरान विधायक के हाथों को खिलाए जाने की तस्वीरों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि कार्यक्रम के पूरे घटनाक्रम और वहां मौजूद लोगों की प्रतिक्रियाओं के सम्बंध में सामने आए अलग-अलग दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है।
बयान सामने आने के बाद विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने विधायक से सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करने और माफी मांगने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि विधायक का उद्देश्य वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का अपमान करना नहीं था, तब भी उन्हें यह स्वीकार करना चाहिए कि अपनी बात रखने के लिए चुने गए शब्द अनुचित और असंवेदनशील थे। दूसरी ओर विधायक के समर्थकों की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि बयान के एक हिस्से को पूरे संदर्भ से अलग करके प्रस्तुत किया गया है। उनके अनुसार विधायक का आशय क्रांतिकारियों को कमतर बताना नहीं बल्कि यह कहना था कि बड़े परिवर्तन करने वाले लोग निजी लाभ-हानि की गणना से ऊपर उठकर निर्णय लेते हैं।
इस स्पष्टीकरण के बावजूद मूल प्रश्न अपनी जगह बना हुआ है कि क्या किसी महान स्वतंत्रता सेनानी के त्याग और साहस को समझाने के लिए उन्हें कम बुद्धिमान बताना उचित उदाहरण हो सकता है। इतिहास में क्रांति और बुद्धिमत्ता कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे। अन्याय को पहचानना, सत्ता के आदेश की नैतिकता पर विचार करना और उसके परिणामों को जानते हुए भी सही पक्ष में खड़े होना अपने आप में उच्च मानवीय विवेक का परिचायक है। पेशावर में चंद्र सिंह गढ़वाली ने जो निर्णय लिया, वह क्षणिक आवेश अथवा परिणामों से अनभिज्ञ होने के कारण लिया गया निर्णय नहीं था। वह एक सैनिक द्वारा अपनी अंतरात्मा, मानवीय मूल्यों और न्याय को सत्ता के आदेश से ऊपर रखने का साहसिक निर्णय था।
ब्रिटिश शासन ने इस अवज्ञा को विद्रोह माना। चंद्र सिंह गढ़वाली और उनके साथियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की गई। उन्हें गिरफ्तार किया गया, मुकदमा चला और लम्बे कारावास का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने अपने निर्णय से पीछे हटने या उस पर पछतावा करने का रास्ता नहीं चुना। देश उन्हें किसी राजनीतिक पद, सरकारी उपाधि अथवा चुनावी उपलब्धि के कारण नहीं जानता। उनका नाम उस ऐतिहासिक साहस और नैतिक विवेक के कारण जीवित है जिसने औपनिवेशिक शासन को यह संदेश दिया कि भारतीय सैनिक अन्यायपूर्ण आदेश के सामने अपनी अंतरात्मा को समाप्त नहीं कर सकते।
विधायक दिलीप रावत की टिप्पणी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों को इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन और अपने प्रदेश के महान व्यक्तित्वों के बारे में बोलते समय कितनी सावधानी बरतनी चाहिए। विधायक या सांसद के शब्द केवल निजी विचार नहीं रह जाते। वे सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनते हैं और समाज के बड़े वर्ग को प्रभावित करते हैं। इसलिए जनप्रतिनिधियों से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का उल्लेख करते समय तथ्यों, संदर्भ और भाषा, तीनों के प्रति जिम्मेदार रहें।
उत्तराखण्ड सैनिक परम्परा वाला प्रदेश है। यहां लगभग हर क्षेत्र और बड़ी संख्या में परिवारों का सेना से गहरा सम्बंध रहा है। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की विरासत इस सैनिक परम्परा को केवल युद्ध और वीरता से नहीं बल्कि मानवीय संवेदना और नैतिक साहस से भी जोड़ती है। उन्होंने यह स्थापित किया कि सैनिक का साहस केवल हथियार चलाने में नहीं बल्कि अन्यायपूर्ण आदेश के सामने हथियार रोक लेने में भी दिखाई देता है। पेशावर की घटना इसी कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे विशिष्ट घटनाओं में गिनी जाती है।
इस विवाद को केवल सत्ता और विपक्ष के राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित कर देना भी चंद्र सिंह गढ़वाली की विरासत के साथ न्याय नहीं होगा। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आज की राजनीति अपने ऐतिहासिक नायकों को उनकी पूरी वैचारिक और नैतिक ऊंचाई के साथ समझ पा रही है। जयंती और पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देना आसान है लेकिन उनके विचारों और निर्णयों की गम्भीरता को समझना अधिक कठिन है। चंद्र सिंह गढ़वाली की विरासत सत्ता की प्रशंसा की नहीं बल्कि अन्यायपूर्ण सत्ता के सामने नैतिक साहस दिखाने की विरासत है।
यह विवाद राजनीतिक भाषा में लगातार बढ़ रही असावधानी की ओर भी संकेत करता है। पिछले कुछ वर्षों में नेताओं के अनेक ऐसे बयान सामने आए हैं जिन पर विवाद होने के बाद यह कहा गया कि शब्दों को संदर्भ से अलग कर दिया गया अथवा वक्ता का आशय कुछ और था लेकिन सार्वजनिक जीवन में शब्दों की जिम्मेदारी अंततः वक्ता की ही होती है। यदि किसी कथन से किसी महान ऐतिहासिक व्यक्तित्व की गरिमा पर सवाल खड़ा होता है तो केवल आशय का स्पष्टीकरण पर्याप्त नहीं माना जा सकता। यह भी महत्वपूर्ण होता है कि वक्ता अपने शब्दों से पैदा हुई असहजता को स्वीकार करता है या नहीं।
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा किसी विधायक, सरकार अथवा राजनीतिक दल की स्वीकृति पर निर्भर नहीं है। सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दल सत्ता में आते-जाते हैं और जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल समाप्त हो जाते हैं लेकिन इतिहास उन लोगों को लम्बे समय तक याद रखता है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में असाधारण नैतिक साहस दिखाया। चंद्र सिंह गढ़वाली का नाम इसलिए अमर है क्योंकि उन्होंने उस समय मानवता का पक्ष चुना, जब ऐसा करने की कीमत उन्हें अपना सैन्य जीवन, स्वतंत्रता और जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष देकर चुकानी पड़ी।
दिलीप रावत के बयान से उपजा विवाद आने वाले दिनों में राजनीतिक रूप से कितना आगे बढ़ता है, यह अलग प्रश्न है लेकिन इसने उत्तराखण्ड के समाज के सामने एक महत्वपूर्ण बहस अवश्य रख दी है, क्या स्वतंत्रता संग्राम के नायकों का मूल्यांकन सामान्य राजनीतिक भाषणों और तात्कालिक उदाहरणों के जरिए किया जाना चाहिए? क्या क्रांति को बुद्धिमत्ता के विपरीत खड़ा करना ऐतिहासिक रूप से उचित है? क्या जनप्रतिनिधियों को अपने प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत के बारे में बोलने से पहले अधिक अध्ययन, संवेदनशीलता और सावधानी की आवश्यकता नहीं है? इस विवाद का उत्तर केवल विधायक के स्पष्टीकरण अथवा विपक्ष की आलोचना में नहीं मिलेगा। इसका उत्तर उस इतिहास में है जिसमें एक भारतीय सैनिक ने निहत्थे लोगों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था। उस निर्णय के लिए केवल साहस ही नहीं, सही और गलत के बीच अंतर करने की असाधारण नैतिक बुद्धिमत्ता भी चाहिए थी। इसलिए वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की विरासत किसी एक बयान से छोटी नहीं हो सकती लेकिन उनके बारे में बोले गए शब्दों पर उठे सवाल यह अवश्य बताते हैं कि उत्तराखण्ड का समाज आज भी अपने इस महानायक की स्मृति, विरासत और सम्मान को लेकर सजग है।
बात अपनी-अपनी
मैं वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी के चरणों की धूल के बराबर भी नहीं हूं। मैं उनका अपमान करने की हिम्मत नहीं कर सकता। मेरे बयान का कुछ ही हिस्सा दिखाकर उसको विवादित बनाया गया है। पूरे बयान को देखें तो उसमें मैंने कहीं भी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली जी का अपमान नहीं किया है। मैंने इतना कहा था कि पढ़े-लिखे लोग सोचते बहुत हैं लेकिन जो कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ होते हैं, वह समाज और देश के लिए तुरंत खड़े हो जाते हैं, क्रांति कर देते हैं। मेरा आरोप उन कांग्रेसियों पर है जिन्होंने 1970 में चंद्र सिंह गढ़वाली जी को एक सभा में बोलने नहीं दिया और उन पर हमला करके उन्हें घायल किया। कांग्रेसियों के इसी हमले के कारण गढ़वाली जी ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह सके। आज यही कांग्रेसी मेरे ऊपर गढ़वाली जी का अपमान करने का आरोप लगा रहे हैं और बयान को काट-छांट कर मेरे खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं।
महंत दिलीप रावत, विधायक, लैंसडॉन
मुझे तो लगता है कि माननीय विधायक दिलीप रावत जी ने अपना परिचय अपने बयान में दिया है। महान क्रांतिकारी चंद्र सिंह गढ़वाली जी को अनपढ़ बताकर दिलीप रावत जी ने अपने आप को ही अनपढ़ साबित कर दिया है। डिग्री लेने से सिर्फ शैक्षिक योग्यता का प्रमाण पत्र मिलता है, उससे कोई योग्य नहीं हो जाता। देश और समाज के लिए जो काम करते हैं वे ही योग्य होते हैं। सत्ता किसी की भी हो, जो देश और समाज के लिए अपना जीवन देने का काम करता है उन्हें सत्ताधारी हमेशा मूर्ख समझते हैं। संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति से इस तरह के स्तरहीन बयानों की आशा नहीं की जाती।
समर भंडारी, वामपंथी विचारक और आंदोलनकारी, देहरादून
विधायक दिलीप रावत ने अपने आप को ही अनपढ़ और मूर्ख साबित कर दिया है। जो आदमी देश और पर्यावरण के लिए काम करते हैं, आंदोलन करते हैं उनको यह लोग आंदोलन जीवी, पर्यावरण जीवी और न जाने क्या-क्या कहते हैं। विधायक दिलीप रावत सत्ताधारी पार्टी भाजपा के विधायक हैं। सत्ताधारी हमेशा जनता की बातों को उठाने वाले लोगों के खिलाफ रहते हैं। दिलीप रावत भी ऐसे ही व्यक्ति हैं लेकिन एक दिलीप रावत की ही क्या बात करें, यहां तो हर कोई इस तरह की बातें कर क्रांतिकारियों और आंदोलनकारियों का अपमान करता ही रहा है।
सुरेश भाई, राज्य आंदोलनकारी एवं पर्यावरणविद्, उत्तरकाशी
स्व. विजय सुंदरियाल की स्मृति में आयोजित स्वरोजगार कार्यक्रम के दौरान तस्वीर पर पुष्प अॢपत करते महंत दिलीप रावत