Uttarakhand

झूठे मुकदमों से लेकर सम्मान तक

सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई एक्ट) जनसाधारण को शासन के कामकाज में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का अधिकार प्रदान करता है, परंतु इस अधिकार का प्रयोग करने वाले कई जागरूक नागरिक वर्षों से उत्पीड़न, फर्जी मुकदमों और हिंसा का शिकार होते रहे हैं। देशभर में आरटीआई कार्यकर्ताओं को जान से मारने, धमकाने और झूठे मुकदमों में फंसाने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। नैशनल कैम्पेन फाॅर पीपल्स राइट टू इन्फाॅरमेशन (एनसीपीआरआई) के अनुसार, वर्ष 2005 से अब तक 100 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में ऐसे मामलों की संख्या सर्वाधिक रही है। कई मामलों में तो शिकायतकर्ता की हत्या के बाद भी उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं होती। उत्तराखण्ड में आरटीआई और मानवाधिकार कार्यकर्ता विनय शुक्ला का मामला इसी कड़ी की एक गम्भीर मिसाल बनकर सामने आया है।

वर्ष 2017 में चम्पावत जनपद की फागपुर ग्रामसभा में शौचालय निर्माण में हुए घोटाले और अवैध लाॅटरी कारोबार का पर्दाफाश करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता विनय शुक्ला को झूठे मुकदमों में फंसाकर प्रताड़ित किया गया। ग्राम प्रधान गीता देवी और उनके पति अजय लाल के कार्यकाल में स्वजल योजना के तहत स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत 243 शौचालयों के लिए प्राप्त राशि में गम्भीर अनियमितताएं पाई गईं। आरटीआई से प्राप्त सूचना में जहां 243
लाभार्थियों को भुगतान दिखाया गया था, वहीं वास्तविकता में सिर्फ 52 लाभार्थियों को ही चेक जारी किए गए थे। शेष राशि का कोई ठोस लेखा-जोखा नहीं था। इस भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकार विनय शुक्ला के खिलाफ बनबसा थाने में आईपीसी की धारा 384, 500, 501, 120-बी और एससी/ एसटी अधिनियम के तहत 19 दिसम्बर 2017 को मुकदमा दर्ज करवा दिया गया। यह मुकदमा ग्राम प्रधान के दबाव और पुलिस की मिलीभगत का परिणाम माना गया। अंततः सात वर्षों की लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद चम्पावत जिला सत्र न्यायालय ने आरटीआई कार्यकर्ता विनय शुक्ला को सभी आरोपों से दोषमुक्त कर दिया, जिससे एक बार फिर यह स्पष्ट हुआ कि आरटीआई कार्यकर्ताओं को सच्चाई उजागर करने की कीमत चुकानी पड़ती है।

गौरतलब है कि वर्ष 2016 में विनय शुक्ला ने राज्य के पुलिस महानिदेशक को एक पत्र लिखकर बनबसा और ऊधमसिंहनगर जिले में अवैध लाॅटरी संचालन और काले धन की शिकायत की थी। जांच में ये आरोप सत्य पाए गए और महेंद्र सिंह बिष्ट व अन्य के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 के तहत मामला दर्ज हुआ। चैंकाने वाली बात यह थी कि इस अवैध कारोबार में ग्राम प्रधान के पति अजय लाल, जो एक सरकारी शिक्षक भी हैं, संलिप्त पाए गए। उनके द्वारा फर्जी फर्म ‘प्रिंस स्टील एंड फर्नीचर्स’ के माध्यम से शौचालय निर्माण के सामान की खरीददारी की गई थी। यह उत्तराखण्ड सरकारी सेवा आचरण नियमावली 2002 और भारतीय दंड संहिता की धारा 168 का खुला उल्लंघन था, लेकिन फिर भी पुलिस प्रशासन ने इन पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की।

विनय शुक्ला जैसे कार्यकर्ता तमाम दबावों और प्रताड़नाओं के बावजूद जनहित में कार्यरत हैं। उन्होंने अब तक लगभग पांच प्रमुख मामलों में भ्रष्टाचार उजागर कर 20 से अधिक लोगों को जेल भिजवाने में निर्णायक भूमिका निभाई है। इसके लिए उन्हें ‘प्रखर आरटीआई कार्यकर्ता सम्मान’ और प्रशस्ति पत्र से भी सम्मानित किया गया है। वर्तमान में वह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संघ भारत संगठन के उत्तराखण्ड प्रदेश अध्यक्ष के रूप में गरीब व असहायों को निशुल्क कानूनी परामर्श और सूचना अधिकार सम्बंधी जानकारी देकर उन्हें सशक्त बना रहे हैं।

विनय शुक्ला का यह मामला केवल एक व्यक्ति की कानूनी जीत नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था को आईना दिखाने वाली एक मिसाल है कि सूचना मांगने वाले को अपराधी बना देने की प्रवृत्ति किस तरह लोकतंत्र को कमजोर कर रही है। सरकार और समाज को मिलकर ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है, जिससे कि आरटीआई जैसे सशक्त अधिकार का दुरुपयोग न हो और इसका प्रयोग करने वाले नागरिक भयमुक्त रहकर जनहित में कार्य कर सकें।

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