एनएच-309 पर बने 29.65 करोड़ की लागत वाले धनगढ़ी पुल का मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 5 जुलाई 2026 को लोकार्पण किया। फीता कटा, तालियां बजीं, भाषण हुए और मंच से घोषणा हुई कि अब बरसात में परेशानी नहीं होगी। कुमाऊं और गढ़वाल को जोड़ने वाला यह सेतु वर्षों के इंतजार के बाद जनता को समर्पित हुआ लेकिन इस समारोह के शोर के बीच रामनगर की सड़कों पर एक अलग सन्नाटा भी था। यह सन्नाटा उन 25 सालों का था जो इस पुल के बिना बीते। यह सन्नाटा उन परिवारों का था जो आज इस जश्न में शामिल नहीं हो सके। क्योंकि यह पुल समय पर नहीं बना और समय पर न बनने की कीमत इस क्षेत्र ने अपनी सबसे कीमती पूंजी-इंसानी जान से चुकाई है। आज सवाल सिर्फ विकास का नहीं है। सवाल जवाबदेही का है। सवाल उस गणित का है जिसमें एक पुल की लागत को करोड़ों में तोला जाता है, पर उन जिंदगियों की कीमत नहीं आंकी जाती जो फाइलों के इंतजार में चली गईं। रामनगर, हल्द्वानी, काशीपुर और नैनीताल को जोड़ने वाला एनएच-309 उत्तराखण्ड की लाइफलाइन है और इसी लाइफलाइन के बीच में पड़ता है धनगढ़ी नाला। बरसात आते ही यह नाला चार महीने के लिए पूरे क्षेत्र की आवाजाही बंद कर देता था। पानी का बहाव इतना उग्र हो जाता था कि बड़े से बड़ा वाहन भी उसके सामने बेबस हो जाता था। मानसून के चार महीने यहां आवागमन जुए जैसा हो जाता था। पार होंगे या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं थी। एम्बुलेंस फंसती थी, स्कूल बसें रुकती थीं, गर्भवती महिलाओं को घंटों इंतजार करना पड़ता था, मजदूरों की दिहाड़ी मारी जाती थी और सबसे बड़ी बात-हर बरसात जान जाने का डर साथ लेकर आती थी। समय के साथ यह डर भी सामान्य हो गया। मौतें भी सामान्य हो गईं। अखबार में खबर आई, मुआवजे की घोषणा हुई, आश्वासन मिले और फिर अगली बरसात तक सब भूल गए। प्रशासन के लिए यह ‘प्राकृतिक आपदा’ थी। लोगों के लिए यह ‘हर साल की बात’ थी। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार पिछले दो दशकों में इस नाले में 40 से 50 मौतें दर्ज हैं लेकिन जमीनी हकीकत इससे बहुत अलग है। कई शव मिले ही नहीं। कई परिवार इतने गरीब थे कि थाने तक नहीं जा सके। कई दुर्घटनाएं रात में हुईं और सुबह तक सबूत बह चुका था। मतलब हर साल औसतन 3 से 4 जानें। हर तीन महीने में एक घर का चिराग बुझा। 25 साल तक यही चलता रहा। उत्तराखण्ड 9 नवम्बर 2000 को बना। धनगढ़ी की समस्या 2001 से ही विधायकों और सांसदों के सामने रखी जाने लगी थी। उसके बाद 10 मुख्यमंत्री बदले। दर्जनों मंत्री आए-गए। हर चुनाव में यह मुद्दा उठा। हर बरसात में यह मुद्दा जिंदा हुआ। फिर भी पुल नहीं बना।

आखिर 25 साल क्यों लगे?
धनगढ़ी नाला एनएच-309 पर है। यानी यह सड़क केंद्र की है। जमीन वन विभाग की है। आपदा प्रबंधन राज्य का विषय है और रखरखाव जिला प्रशासन का। पुल बनाने के लिए चार विभागों की एनओसी चाहिए थी। हर फाइल एक टेबल से दूसरे टेबल जाती, टिप्पणी लगती, वापस आती। 25 साल तक यही फेर होता रहा। कोई भी विभाग जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था। सब कहते थे ‘यह हमारा काम नहीं’। हर सरकार ने कहा कि धन की कमी है। 29.65 करोड़ का बजट बड़ा है लेकिन क्या किसी ने उस 25 साल में उन जिंदगियों का हिसाब लगाया जिनका कोई मुआवजा नहीं हो सकता? आर्थिक गणित कहता है कि समय पर बना पुल न सिर्फ सस्ता पड़ता बल्कि सैकड़ों करोड़ की सामाजिक और आर्थिक क्षति भी बचा लेता। यह सबसे बड़ा कारण है कि धनगढ़ी कोई वीआईपी रूट नहीं था। यहां से कोई मंत्री नहीं गुजरता था। यहां के वोटर बिखरे हुए थे। इसलिए हर सरकार के लिए यह प्राथमिकता नहीं बन पाया। चुनाव से पहले शिलान्यास हुआ, चुनाव के बाद फाइल ठंडे बस्ते में चली गई। बरसात में 2-3 मौतें हुईं, मीडिया ने 2 दिन कवरेज किया, विपक्ष ने हंगामा किया और फिर सब सामान्य। एनडी तिवारी के समय इस पुल की अवधारणा बनी। त्रिवेंद्र सरकार में टेंडर की प्रक्रिया शुरू हुई। हरीश रावत सरकार ने इसे ‘अति आवश्यक’ बताया लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हुआ। हर सरकार ने पिछली सरकार को दोष दिया और अपनी पीठ थपथपाई। आज बना पुल 220.9 मीटर लम्बा, 2 लेन का आरसीसी पुल है। तकनीकी रूप से मजबूत है। अब 12 महीने, 24 घंटे आवागमन सम्भव है। भारी वाहन भी आसानी से निकलेंगे। कुमाऊं और गढ़वाल के बीच की दूरी और समय दोनों कम होंगे। व्यापार बढ़ेगा, पर्यटन बढ़ेगा, मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचने में मदद मिलेगी। मुख्यमंत्री ने मंच से इसे ‘कंक्रीट का ढांचा नहीं बल्कि विकास का सेतु’ बताया। यह सच है। पर यह भी सच है कि यह सेतु उन 80 से 100 लोगों की कुर्बानी के बाद बना है। आज के भाषण में राजनीति भी हुई। विपक्ष पर निशाना साधा गया। 2027 चुनाव की बात हुई। पूर्व मुख्यमंत्रियों से तुलना के सवाल टाले गए। यह लोकतंत्र का हिस्सा है लेकिन आज का दिन सिर्फ राजनीति का नहीं था। आज का दिन उन लोगों के नाम था जो इस पुल को देखने के लिए जिंदा नहीं बचे। धनगढ़ी पुल सिर्फ एक पुल नहीं है। यह उत्तराखण्ड के विकास माॅडल पर एक बड़ा सवालिया निशान है। हम स्मार्ट सिटी, एक्सप्रेसवे और टनल की बात करते हैं। अच्छी बात है लेकिन जब तक गांव का एक पुल नहीं बनता, जब तक पहाड़ में 24 घंटे बिजली-इंटरनेट नहीं आता, जब तक एक एम्बुलेंस समय पर नहीं पहुंचती, तब तक विकास अधूरा है। 29.65 करोड़ आज खर्च हुए हैं। अगर यही 25 साल पहले खर्च हो जाते तो न सिर्फ पैसे बचते बल्कि सबसे बड़ी बचत, इंसानी जान की हो जाती। सिस्टम की लापरवाही की सजा जनता भुगतती है। जो अफसर फाइल दबाते रहे, वह रिटायर हो गए। जो नेता वादे करके भूल गए, वह फिर चुनाव जीत गए लेकिन जिस मां ने अपना बेटा खोया, जिस पत्नी ने अपना सुहाग खोया, उसका दर्द आज भी वही है। सिस्टम को इस दर्द का हिसाब देना होगा, अब और देर नहीं होनी चाहिए।’ धनगढ़ी अकेला नहीं है।

उत्तराखण्ड में दर्जनों ऐसे नाले, नदियां और कच्चे रास्ते हैं जो हर बरसात में मौत बांटते हैं। पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर में ऐसे कई पाॅइंट हैं जहां आज भी लोग जान हथेली पर रखकर निकलते हैं। क्या हम फिर किसी धनगढ़ी के पुल के लिए 25 साल इंतजार करेंगे? क्या फिर किसी त्रासदी के बाद ही फाइलें खुलेंगी? यह रिपोर्ट सरकार की बधाई के लिए नहीं लिखी गई है। यह रिपोर्ट उन सभी अज्ञात लोगों के नाम है जिनका नाम कभी अखबार में नहीं छपा। जिनकी मौत को ‘सिर्फ एक हादसा’ कहकर फाइल बंद कर दी गई। जिनके घर आज भी खाली हैं और जिनके नाम लेने वाला कोई नहीं है। यह रिपोर्ट उन माताओं के नाम है जिन्होंने हर बरसात अपने बेटे के लौटने की दुआ की और वह नहीं लौटा। उन बच्चों के नाम है जो पिता के बिना बड़े हुए। उन परिवारों के नाम है जो 25 साल तक उम्मीद और मायूसी के बीच झूलते रहे। आज धनगढ़ी पुल पर फूल बरसेंगे। ढोल-नगाड़े बजेंगे। नेताओं के भाषण होंगे लेकिन कुछ आंखें आज भी उस नाले की तरफ देखेंगी। शायद अपने किसी को खोजेंगी। पुल के एक छोर पर एक छोटा स्मारक बनाया जाए। उस पर उन सभी लोगों के नाम अंकित हों जिन्होंने इस नाले के कारण जान गंवाई। ताकि हर गुजरने वाला यह समझे कि यह पुल कितनी कीमत पर बना है। विकास का जश्न मनाएं, पर कुर्बानी को भूलें नहीं।

राज्य सरकार पूरे उत्तराखण्ड में ऐसे सभी खतरनाक नालों और नदियों की सूची बनाए जहां बरसात में आवागमन बंद हो जाता है। एक साल के अंदर सभी जगह पक्के पुल और वैकल्पिक मार्ग बनाने की समय-सीमा तय की जाए। मुख्यमंत्री ने कहा- ‘अब बरसात में परेशानी नहीं होगी।’ हम इस बात का स्वागत करते हैं। काश यह बात 2001 में कही गई होती। काश यह पुल 2005 में बन गया होता। आज हम पुल का स्वागत करते हैं। साथ ही उन सभी से माफी भी मांगते हैं जिन्हें हमने 25 साल इंतजार कराया। जिन्हें हमने सिस्टम की लापरवाही की भेंट चढ़ा दिया। विकास का मतलब सिर्फ नई सड़कें बनाना नहीं है। विकास का मतलब पुराने जख्मों को भरना भी है। धनगढ़ी पुल एक जख्म को भरता है। उम्मीद है यह आखिरी जख्म होगा।

You may also like