बच्चों का बचपन क्या अब एल्गोरिदम तय करेंगे या परिवार और समाज? इसी सवाल के बीच ब्रिटेन ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। ऑस्ट्रेलिया के बाद ऐसा कदम उठाने वाला ब्रिटेन दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि तकनीक इंसान के लिए है, इंसान तकनीक के लिए नहीं। यह केवल एक कानून नहीं बल्कि बचपन को फिर से खेल के मैदान, किताबों, परिवार और वास्तविक दुनिया से जोड़ने की कोशिश है
कभी शाम होते ही मोहल्लों के मैदान बच्चों की आवाजों से गूंज उठते थे। कहीं क्रिकेट की पिच बन जाती थी, कहीं फुटबाॅल दौड़ रहा होता था, कहीं साइकिलों की रेस होती थी और कहीं बच्चे बिना किसी योजना के सिर्फ इसलिए खेल रहे होते थे क्योंकि खेलना उन्हें अच्छा लगता था। उस समय बच्चों के हाथों में गेंद होती थी, पतंग होती थी, कंचे होते थे या फिर किसी पेड़ की टहनी से बनी तलवार। आज वही शाम है, वही घर हैं, वही बच्चे हैं लेकिन दृश्य बदल गया है। अब लाखों घरों में बच्चे अपने- अपने कमरों में बैठे हैं। उनके हाथ में मोबाइल फोन है, आंखें स्क्रीन पर टिकी हैं और उंगलियां लगातार ऊपर की ओर स्क्रोल कर रही हैं। एक वीडियो खत्म होता है, दूसरा शुरू होता है, फिर तीसरा, चौथा और देखते- देखते दो-तीन घंटे कब बीत जाते हैं, इसका एहसास तक नहीं होता। बाहर का मैदान खाली है लेकिन मोबाइल स्क्रीन के भीतर एक दूसरी दुनिया लगातार चल रही है। शायद इसी बदलते बचपन ने ब्रिटेन को वह निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया है जिसकी चर्चा आज पूरी दुनिया में हो रही है।
ब्रिटेन सरकार ने घोषणा की है कि अगले वर्ष से 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग प्रतिबंधित कर दिया जाएगा। इंस्टाग्राम, फेसबुक, टिकटाॅक, स्नैपचैट, यूट्यूब और एक्स जैसे प्लेटफार्म इस प्रतिबंध के दायरे में आएंगे जबकि व्हाट्सऐप और सिग्नल जैसी मुख्य रूप से निजी संदेश भेजने वाली सेवाओं को इससे बाहर रखा जाएगा। सरकार का कहना है कि यह कदम बच्चों को उनका बचपन वापस लौटाने की दिशा में उठाया गया है। सरकार ने इसे केवल तकनीकी नियमन नहीं बल्कि सामाजिक सुधार की पहल बताया है। ब्रिटेन की तकनीकी मामलों की मंत्री लिज केंडल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि तकनीकी कंपनियों को वर्षों तक बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का अवसर दिया गया लेकिन उन्होंने पर्याप्त जिम्मेदारी नहीं निभाई। अब सरकार बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं लेना चाहती है।
ब्रिटेन का यह फैसला अचानक नहीं आया। इसके पीछे कई वर्षों की बहस, शोध, जनमत और अभिभावकों की चिंता छिपी हुई है। ब्रिटेन सरकार द्वारा कराए गए सार्वजनिक परामर्श में लगभग 90 प्रतिशत अभिभावकों ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध का समर्थन किया। यह अपने आप में असाधारण जनसमर्थन है। आमतौर पर किसी भी तकनीकी प्रतिबंध का विरोध देखने को मिलता है लेकिन यहां स्थिति उलटी थी। बड़ी संख्या में माता-पिता ने कहा कि यदि सरकार स्पष्ट नियम बनाएगी तो उन्हें अपने बच्चों को समझाने में आसानी होगी। तब यह केवल किसी एक परिवार का निर्णय नहीं रहेगा बल्कि पूरे समाज का साझा नियम बन जाएगा।
ब्रिटेन की प्रतिष्ठित संस्था ‘एकेडमी आॅफ मेडिकल राॅयल काॅलेजेज’ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बच्चे लगातार ऐसी ऑनलाइन सामग्री के संपर्क में आ रहे हैं जो नफरत फैलाने वाली, हिंसक, अश्लील, मानसिक रूप से विचलित करने वाली या लत लगाने वाली हो सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बच्चों में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग को लेकर चिकित्सा जगत की चिंता अब उसी स्तर पर पहुंच गई है, जिस स्तर पर कभी धूम्रपान या सड़क सुरक्षा जैसे मुद्दे थे। यह तुलना अपने आप में बताती है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस समस्या को कितनी गम्भीरता से देख रहे हैं।
वास्तव में सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत उसका कंटेंट नहीं बल्कि एल्गोरिदम है। पहले लोग अखबार पढ़ते थे, रेडियो सुनते थे या टेलीविजन देखते थे जहां सामग्री का चयन सम्पादकों द्वारा किया जाता था। अब मोबाइल स्क्रीन पर हर व्यक्ति के सामने अलग दुनिया खुलती है। यदि कोई बच्चा एक बार किसी विशेष प्रकार का वीडियो देखता है तो कुछ ही मिनटों में उसी तरह के दर्जनों वीडियो उसके सामने आने लगते हैं। यदि वह किसी हास्य वीडियो पर रुकता है तो पूरा फीड हास्य से भर जाता है, यदि वह किसी हिंसक दृश्य पर रुकता है तो एल्गोरिदम उसे उसी दिशा में ले जाने लगता है। बच्चे को पता भी नहीं चलता कि उसकी पसंद कब उसकी आदत और फिर उसकी निर्भरता में बदल गई।
यही कारण है कि सोशल मीडिया पर बिताया गया समय केवल मनोरंजन का समय नहीं रह जाता। यह धीरे-धीरे बच्चों की सोच, उनकी भावनाओं, उनके आत्मविश्वास और यहां तक कि सामाजिक पहचान को भी प्रभावित करने लगता है। आज दुनिया भर में किशोरों के बीच ‘लाइक’ और ‘फाॅलोअर्स’ केवल डिजिटल आंकड़े नहीं रह गए हैं। कई बच्चों के लिए यही उनकी लोकप्रियता, आत्मसम्मान और सामाजिक स्वीकार्यता का पैमाना बनते जा रहे हैं। यदि किसी तस्वीर पर अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलती तो निराशा होती है। यदि किसी मित्र के अधिक फॉलोअर्स हैं तो तुलना शुरू हो जाती है। यदि कोई वीडियो वायरल हो जाए तो अचानक लोकप्रियता मिल जाती है। इस पूरे खेल में बच्चे यह भूलने लगते हैं कि वास्तविक जीवन और डिजिटल जीवन में बड़ा अंतर होता है।
ब्रिटेन सरकार का कहना है कि बचपन की सबसे बड़ी जरूरत प्रयोग करने, गलतियां करने, सीखने और वास्तविक रिश्ते बनाने की होती है लेकिन सोशल मीडिया की दुनिया में हर गतिविधि दर्ज होती है, हर प्रतिक्रिया मापी जाती है और हर व्यवहार का विश्लेषण किया जाता है। ऐसे वातावरण में बड़ा होने वाला बच्चा कई बार बिना जाने ही लगातार मूल्यांकन के दबाव में जीने लगता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही दबाव चिंता, अकेलेपन, अवसाद और आत्मविश्वास में कमी जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है। इस पूरे अभियान की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसकी शुरुआत सरकार ने नहीं बल्कि अभिभावकों ने की। ब्रिटेन में ‘स्मार्टफोन फ्री चाइल्डहुड’ नाम से एक सामाजिक अभियान शुरू हुआ, जिसने कुछ ही महीनों में लाखों परिवारों को जोड़ लिया। इस अभियान से जुड़े माता-पिता का कहना था कि वे अपने बच्चों को मोबाइल फोन देने के लिए सामाजिक दबाव महसूस करते हैं। यदि पूरा स्कूल सोशल मीडिया पर सक्रिय है और केवल एक बच्चा उससे बाहर है तो वह स्वयं को अलग-थलग महसूस करने लगता है। ऐसे में कोई भी परिवार अकेले अपने बच्चे को सोशल मीडिया से दूर नहीं रख पाता। इसलिए उन्होंने सरकार से सामूहिक नीति बनाने की मांग की। हालांकि यह फैसला जितना साहसिक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि किसी बच्चे की वास्तविक उम्र की पहचान कैसे की जाएगी? यदि केवल जन्मतिथि पूछी जाएगी तो कोई भी गलत जानकारी भर सकता है। यदि पहचान पत्र मांगा जाएगा तो निजता से जुड़े प्रश्न उठेंगे। यदि चेहरे की पहचान जैसी तकनीक अपनाई जाएगी तो डेटा सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू होगी। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि कानून बनाने से भी अधिक कठिन उसका प्रभावी और संतुलित क्रियान्वयन होगा। यही वह कसौटी होगी जिस पर ब्रिटेन की यह ऐतिहासिक पहल परखी जाएगी।
ब्रिटेन के सामने सबसे बड़ा उदाहरण आॅस्ट्रेलिया का है। ऑस्ट्रेलिया ने वर्ष 2025 में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून लागू कर दुनिया को चैंका दिया था। ऑस्ट्रेलिया के अनुभव ने एक और महत्वपूर्ण बात सामने रखी। पहले सोशल मीडिया कम्पनियां यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच निकलती थीं कि उपयोगकर्ता ने स्वयं गलत उम्र दर्ज की थी। नए कानूनों ने यह तर्क कमजोर कर दिया है। अब कम्पनियों से पूछा जा रहा है कि यदि उनके पास दुनिया के सबसे उन्नत एल्गोरिदम हैं जो लोगों की पसंद, व्यवहार और रुचियों का अनुमान लगा सकते हैं तो क्या वे कम उम्र के उपयोगकर्ताओं की पहचान करने के लिए पर्याप्त तकनीक विकसित नहीं कर सकतीं? यही प्रश्न अब ब्रिटेन की संसद में भी बार-बार उठ रहा है।
यह बहस केवल ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया तक सीमित नहीं है। फ्रांस में 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक सम्बंधी कानून को मंजूरी मिल चुकी है। डेनमार्क बच्चों के डिजिटल अधिकारों को लेकर नई नीति तैयार कर रहा है। न्यूजीलैंड में भी इस पर गम्भीर चर्चा चल रही है। यूरोप के अनेक देशों में यह मान्यता मजबूत हो रही है कि बच्चों की सुरक्षा को केवल माता-पिता की जिम्मेदारी मानना पर्याप्त नहीं है। यदि कोई तकनीक बच्चों पर व्यापक सामाजिक प्रभाव डाल रही है तो उसके नियमन की जिम्मेदारी सरकारों को भी उठानी होगी।
सोशल मीडिया के समर्थक भी अपने तर्क रखते हैं। उनका कहना है कि इंटरनेट ने बच्चों को ज्ञान, रचनात्मकता और संवाद के अभूतपूर्व अवसर दिए हैं। आज कोई बच्चा दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी कुछ ही सेकंड में प्राप्त कर सकता है। वह नई भाषा सीख सकता है, संगीत सीख सकता है, विज्ञान के प्रयोग देख सकता है, चित्रकला सीख सकता है या अपने जैसे रुचि रखने वाले बच्चों से जुड़ सकता है। यह भी सच है कि अनेक बच्चों ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिभा को पहचान दिलाई है। ऐसे में प्रश्न यह नहीं है कि सोशल मीडिया अच्छा है या बुरा। असली प्रश्न यह है कि क्या वर्तमान स्वरूप में सोशल मीडिया बच्चों के लिए सुरक्षित है?
यहीं से बहस का दूसरा पक्ष शुरू होता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि समस्या तकनीक नहीं बल्कि उसका डिजाइन है। अधिकांश सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म इस तरह तैयार किए गए हैं कि उपयोगकर्ता अधिक से अधिक समय तक स्क्रीन से जुड़ा रहे। हर कुछ मिनट में आने वाले नोटिफिकेशन, लगातार बदलती फीड, छोटे-छोटे वीडियो, आॅटो-प्ले सुविधा और एल्गोरिदम आधारित सुझाव, ये सभी मिलकर उपयोगकर्ता को लम्बे समय तक आॅनलाइन बनाए रखने का काम करते हैं। इस माॅडल का सीधा सम्बंध विज्ञापन से होने वाली आय से है। जितना अधिक समय उपयोगकर्ता प्लेटफार्म पर बिताएगा, उतने अधिक विज्ञापन देखेगा और कम्पनी को उतना अधिक लाभ होगा।
ब्रिटेन सरकार का नया कानून इसी व्यापक सोच का हिस्सा है। सरकार यह संदेश देना चाहती है कि यदि कोई उद्योग बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास पर प्रभाव डाल रहा है तो उसके लिए केवल नैतिक अपील पर्याप्त नहीं होगी। उसे कानूनी जिम्मेदारी भी उठानी होगी लेकिन केवल कानून बना देने से समाज नहीं बदलता। यदि बच्चों के हाथ से मोबाइल फोन लेकर उन्हें फिर किसी दूसरी स्क्रीन के सामने बैठा दिया जाए तो समस्या का समाधान नहीं होगा। इसलिए अनेक शिक्षाविद इस बहस को केवल प्रतिबंध तक सीमित नहीं रखना चाहते। उनका कहना है कि यदि बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखना है तो उन्हें वास्तविक विकल्प भी देने होंगे।
सुरक्षित खेल के मैदान, पुस्तकालय, खेल
प्रतियोगिताएं, संगीत, कला, विज्ञान क्लब, सामुदायिक गतिविधियां और परिवार के साथ गुणवत्तापूर्ण समय, ये सभी मिलकर ही बचपन को समृद्ध बना सकते हैं। केवल मोबाइल छीन लेने से बचपन वापस नहीं आएगा, बचपन को आकर्षक विकल्प भी देने होंगे।
भारत के लिए भी यह बहस अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपभोक्ता देशों में शामिल है। करोड़ों बच्चे बहुत कम उम्र में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया से परिचित हो जाते हैं। ऑनलाइन शिक्षा के विस्तार के बाद मोबाइल फोन घर-घर पहुंच चुका है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या भारत को भी बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग की न्यूनतम आयु, अभिभावकीय नियंत्रण और प्लेटफार्म की जवाबदेही जैसे विषयों पर गम्भीर राष्ट्रीय चर्चा शुरू करनी चाहिए? अभी भारत में इस दिशा में व्यापक प्रतिबंध नहीं है लेकिन डिजिटल सुरक्षा, आयु सत्यापन और बच्चों के लिए सुरक्षित ऑनलाइन वातावरण को लेकर बहस लगातार मजबूत हो रही है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे सकारात्मक संदेश शायद यही है कि दुनिया अब तकनीक को लेकर अंधे उत्साह के दौर से आगे बढ़ रही है। पिछले डेढ़ दशक में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को लगभग बिना किसी गम्भीर प्रश्न के स्वीकार कर लिया गया था। यह मान लिया गया था कि नई तकनीक अपने आप समाज के लिए बेहतर साबित होगी। लेकिन अब पहली बार सरकारें यह पूछ रही हैं कि यदि तकनीक के लाभ हैं तो उसके दुष्प्रभावों की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? यदि एल्गोरिदम बच्चों की आदतें बदल रहे हैं तो उन्हें नियंत्रित करने की जिम्मेदारी किसकी होगी? यदि किसी प्लेटफार्म का व्यावसायिक मॉडल बच्चों का अधिक से अधिक समय अपने पास रोकने पर आधारित है तो क्या समाज को उस मॉडल की समीक्षा नहीं करनी चाहिए?
ब्रिटेन ने इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर नहीं दिया है। सम्भव है कि आने वाले वर्षों में इस कानून में कई संशोधन हों। सम्भव है कि इसके क्रियान्वयन में कठिनाइयां आएं। सम्भव है कि बच्चे नए तकनीकी रास्ते खोज लें लेकिन किसी भी बड़े सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत इसी तरह होती है। पहले प्रश्न उठते हैं, फिर बहस होती है, उसके बाद कानून बनते हैं और अंततः समाज नई दिशा की ओर बढ़ता है।
शायद इसलिए ब्रिटेन के इस निर्णय का सबसे बड़ा महत्व कानून में नहीं बल्कि उसके संदेश में छिपा है। वह संदेश यह है कि बचपन किसी कम्पनी का बाजार नहीं है। बच्चों का ध्यान, उनकी भावनाएं, उनकी
कल्पना शक्ति और उनका समय केवल मुनाफे का साधन नहीं बन सकते। तकनीक का उद्देश्य जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए, जीवन पर अधिकार जमाना नहीं।