भारत का लोकतंत्र इस विश्वास पर खड़ा है कि सत्ता जनता से निकलती है और जनता के प्रति ही जवाबदेह रहती है। संविधान ने सरकार को शासन करने की शक्ति दी है लेकिन उसी संविधान ने नागरिकों को सरकार से सवाल पूछने, उसकी नीतियों का विरोध करने और अपनी असहमति व्यक्त करने का अधिकार भी दिया है। यही कारण है कि भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों को केवल कानूनी प्रावधान नहीं बल्कि लोकतांत्रिक जीवन की आत्मा माना गया है। यदि नागरिक सरकार की आलोचना करने से डरने लगे या विरोध दर्ज कराने पर उन्हें दंडित किया जाने लगे तो लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। बाॅम्बे हाईकोर्ट का हालिया फैसला इसी मूल प्रश्न को केंद्र में लाता है।
महाराष्ट्र में एक राजनीतिक कार्यकर्ता के खिलाफ पुलिस ने जिला बदर की कार्रवाई की। आरोप था कि वह नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), ज्ञानवापी विवाद और अन्य मुद्दों पर सरकार विरोधी प्रदर्शन आयोजित कर रहे थे। उनके विरुद्ध दर्ज कुछ एफआईआर को आधार बनाकर उन्हें एक वर्ष के लिए सम्बंधित क्षेत्र से बाहर रहने का आदेश दे दिया गया। गत् पखवाड़े (2 जुलाई) मामला जब बाॅम्बे हाईकोर्ट पहुंचा तो न्यायमूर्ति माधव जामदार ने सुनवाई के दौरान कई तीखे प्रश्न उठाए। उन्होंने पूछा कि यदि कोई नागरिक ‘बीजेपी सरकार मुर्दाबाद’ या किसी मंत्री के खिलाफ नारे लगाता है तो क्या केवल यही आधार उसे उसके ही शहर से बाहर निकालने के लिए पर्याप्त है? अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस किसी राजनीतिक दल, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की निजी संस्था नहीं है बल्कि वह संविधान और कानून के अधीन कार्य करने वाली सार्वजनिक संस्था है। अंततः अदालत ने जिला बदर का आदेश रद्द करते हुए माना कि केवल सरकार के विरोध को इस प्रकार की कठोर कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता।
इस फैसले का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि यह किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का निर्णय नहीं है। यदि आज सत्ता में कोई दूसरी पार्टी होती और उसके खिलाफ नारे लगाने वाले व्यक्ति के साथ भी ऐसा ही व्यवहार होता तो संवैधानिक सिद्धांत वही रहता। लोकतंत्र की असली परीक्षा तब नहीं होती जब सरकार की प्रशंसा की जा रही हो बल्कि तब होती है जब सरकार की आलोचना की जा रही हो। लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं मापी जाती कि सत्ता कितनी शक्तिशाली है बल्कि इससे मापी जाती है कि सत्ता अपने विरोध को कितनी सहजता से स्वीकार करती है।
यहां एक मूलभूत अंतर समझना आवश्यक है कि सरकार, राज्य और राष्ट्र एक ही चीज नहीं हैं। राष्ट्र स्थायी है, संविधान स्थायी है और राज्य की संस्थाएं भी संविधान के अधीन स्थायी रूप से कार्य करती हैं लेकिन सरकार अस्थायी होती है। वह चुनाव जीतकर आती है और अगले चुनाव में बदल भी सकती है। इसलिए सरकार की आलोचना को राष्ट्र की आलोचना मान लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल अवधारणा के विपरीत है। यदि सरकार और राष्ट्र को एक ही मान लिया जाए तो विपक्ष की भूमिका समाप्त हो जाएगी, संसद की बहसों का महत्व खत्म हो जाएगा और नागरिकों की अभिव्यक्ति केवल सत्ता की स्वीकृति तक सीमित रह जाएगी। भारतीय संविधान निर्माताओं ने ऐसी व्यवस्था की कभी कल्पना नहीं की थी।
इसी सोच को संविधान के अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में स्थान दिया गया। प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने, सरकार की आलोचना करने, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने और लोकतांत्रिक ढंग से अपनी असहमति व्यक्त करने का अधिकार दिया गया। यह अधिकार पूर्ण नहीं है। संविधान स्वयं कहता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, सम्प्रभुता, मानहानि, न्यायालय की अवमानना या हिंसा के लिए उकसाने जैसी परिस्थितियों में राज्य उचित प्रतिबंध लगा सकता है लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण शब्द है, ‘उचित’। प्रतिबंध का अर्थ यह नहीं कि सरकार की आलोचना ही प्रतिबंध का आधार बन जाए। प्रतिबंध तभी वैध माना जाएगा जब उसके पीछे वास्तविक और ठोस कारण हों तथा वह संविधान की कसौटी पर खरा उतरता हो।
यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले सात दशकों में अनेक ऐतिहासिक फैसलों के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की लगातार रक्षा की है। अदालतों ने बार-बार कहा है कि लोकतंत्र में असहमति कोई कमजोरी नहीं बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है। सरकार की आलोचना से सरकार अस्थिर नहीं होती बल्कि कई बार अधिक जवाबदेह बनती है। यदि नागरिक प्रश्न पूछना छोड़ दें, मीडिया केवल प्रशंसा करे और विपक्ष मौन हो जाए तो लोकतंत्र का स्वरूप धीरे-धीरे औपचारिक रह जाएगा। यही वजह है कि बाॅम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक जिला बदर आदेश को रद्द करने का निर्णय नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस संवैधानिक आत्मा की पुनर्पुष्टि भी है जो सत्ता से अधिक नागरिक की स्वतंत्रता को महत्व देती है।
भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर होने वाली हर बहस अंततः संविधान और न्यायपालिका के दरवाजे पर जाकर ठहरती है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि संविधान निर्माताओं ने यह अच्छी तरह समझ लिया था कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा केवल बाहरी शक्तियों से नहीं बल्कि कभी-कभी सत्ता के असीमित विस्तार से भी पैदा हो सकता है। यही कारण है कि संविधान ने एक ओर सरकार को शासन की शक्ति दी तो दूसरी तरफ नागरिकों को सरकार से असहमति व्यक्ति करने का अधिकार भी दिया। दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी न्यायपालिका को सौंपी गई। पिछले सात दशकों में सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक ऐसे फैसले दिए हैं, जिन्होंने यह स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और राष्ट्र-विरोध दो अलग-अलग बातें हैं।
वर्ष 1950 में सर्वोच्च न्यायालय ने रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य मामले में कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है। तब अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि सरकार केवल इसलिए विचारों पर प्रतिबंध लगाने लगे क्योंकि वे उसके लिए असुविधाजनक हैं तो लोकतंत्र का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। इसके बाद 1962 में आए केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के ऐतिहासिक फैसले ने इस सिद्धांत को और स्पष्ट कर दिया। यह वही निर्णय था जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार की तीखी आलोचना करना, उसके खिलाफ नारे लगाना या उसके इस्तीफे की मांग करना अपने आप में देशद्रोह नहीं माना जा सकता। देशद्रोह तभी होगा जब भाषण या अभिव्यक्ति सीधे तौर पर हिंसा, विद्रोह या सार्वजनिक अशांति को उकसाए। यह फैसला आज भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक आधार माना जाता है।
वर्ष 2015 में ‘श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ए को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। अदालत ने तब कहा था कि केवल इसलिए किसी नागरिक को दंडित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी बात सरकार, किसी संस्था या समाज के एक वर्ग को पसंद नहीं आई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ केवल लोकप्रिय विचारों की रक्षा करना नहीं है बल्कि उन विचारों की भी रक्षा करना है जिनसे सत्ता या बहुसंख्यक वर्ग असहमत हो सकता है। यदि केवल असहमति के कारण लोगों पर दंडात्मक कार्रवाई होने लगे तो संविधान का अनुच्छेद 19 केवल कागज पर लिखा हुआ अधिकार बनकर रह जाएगा।
बाॅम्बे हाईकोर्ट के हालिया फैसले को भी इसी संवैधानिक परम्परा की अगली कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। अदालत ने यह नहीं कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी नहीं है। उसने केवल इतना कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अनावश्यक हनन नहीं किया जा सकता। यदि कोई व्यक्ति हिंसा कर रहा है, सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुंचा रहा है या लोगों को दंगे के लिए उकसा रहा है तो निश्चित रूप से राज्य कार्रवाई करेगा लेकिन यदि कोई व्यक्ति केवल सरकार की आलोचना कर रहा है या राजनीतिक नारे लगा रहा है तो उसे जिला बदर जैसी असाधारण कार्रवाई का सामना क्यों करना पड़े? अदालत का यही प्रश्न इस पूरे फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संदेश है।
इस पूरे विवाद में एक सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और संवैधानिक पक्ष भी है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में यह बहस लगातार तेज हुई है कि क्या सरकार की आलोचना को धीरे-धीरे कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखा जाने लगा है? यह प्रश्न केवल किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ नहीं है।
भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा सौंदर्य यही है कि यहां सरकार और राष्ट्र को कभी एक नहीं माना गया। संसद में विपक्ष का अस्तित्व ही इसलिए है कि वह सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठा सके। मीडिया का दायित्व भी केवल सरकारी घोषणाओं का प्रसारण करना नहीं बल्कि उन पर सवाल उठाना और उनकी जांच करना है। नागरिक समाज, छात्र संगठन, किसान संगठन, श्रमिक संगठन और विभिन्न सामाजिक समूह भी लोकतंत्र में अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। यदि इन सभी की असहमति को अपराध या कानून- व्यवस्था का संकट मान लिया जाए तो लोकतंत्र की पूरी संरचना कमजोर पड़ने लगेगी।
इसी संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि संविधान ने नागरिकों को केवल मतदान का अधिकार नहीं दिया बल्कि सरकार के साथ निरंतर संवाद का अधिकार भी दिया है। विरोध प्रदर्शन उसी संवाद का एक माध्यम है। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन स्वयं विरोध -प्रदर्शनों, सत्याग्रहों, धरनों और जनसभाओं की लम्बी परम्परा पर आधारित था। यदि उस समय अंग्रेजी सरकार यह कहती कि सरकार के खिलाफ नारे लगाना कानून-व्यवस्था के लिए खतरा है तो शायद स्वतंत्रता आंदोलन ही अपराध घोषित कर दिया जाता। यही ऐतिहासिक अनुभव संविधान निर्माताओं के सामने भी था। इसलिए उन्होंने असहमति को लोकतंत्र का स्वाभाविक और वैध अंग माना। हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी प्रकार की भाषा, हिंसा या उकसावे को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। यदि कोई व्यक्ति भाषण या नारे के माध्यम से लोगों को हिंसा के लिए प्रेरित करता है, सांप्रदायिक तनाव फैलाता है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाता है या लोकतांत्रिक संस्थाओं को बलपूर्वक समाप्त करने की बात करता है तो ऐसी गतिविधियां संविधान के संरक्षण में नहीं आतीं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी बार-बार यही कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना राज्य का दायित्व है। इसलिए हर मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर बाॅम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक जिला बदर आदेश को निरस्त करने का निर्णय नहीं है। यह उस मूल संवैधानिक सिद्धांत की पुनर्पुष्टि है कि भारत में किसी भी सरकार से बड़ा संविधान है और किसी भी सत्ता से बड़ा नागरिक का मौलिक अधिकार। लोकतंत्र की असली पहचान भी यही है कि सत्ता बदल सकती है, सरकारें बदल सकती हैं लेकिन नागरिक की स्वतंत्रता और संविधान की सर्वोच्चता कभी नहीं बदलनी चाहिए।