नीतीश कुमार को शायद आज मेरी याद न हो लेकिन मैं उन्हें आज भी अपना मित्र मानता हूं। यह मित्रता किसी राजनीतिक लाभ या निजी स्वार्थ की नहीं थी। एक पत्रकार और एक नेता के बीच बनने वाला वह रिश्ता था जिसमें औपचारिकता से अधिक विश्वास था। यह रिश्ता आज से लगभग 26 वर्ष पहले शुरू हुआ था, जब नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। वह सरकार महज सात दिन चली लेकिन उन सात दिनों में शायद ही कोई ऐसा दिन या रात रही हो जब हमारी राजनीति पर लम्बी चर्चा न हुई हो। उन दिनों मैं उनमें एक ऐसे राजनेता को देख रहा था जिसकी सबसे बड़ी राजनीतिक आकांक्षा बिहार का मुख्यमंत्री बनना थी। उन्होंने इस सपने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्री जैसा प्रतिष्ठित पद छोड़ दिया था लेकिन विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर सके। सात दिन बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और फिर दिल्ली लौटकर दोबारा रेल मंत्री बनना पड़ा। उन सात दिनों में मैंने जिस नीतीश कुमार को देखा, वह सत्ता का भूखा नेता नहीं था लेकिन सत्ता के बिना अपने राजनीतिक अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सकता था। वह बार-बार कहते थे कि बिहार को बदलना है, व्यवस्था बदलनी है, राजनीति की दिशा बदलनी है। उनकी बातों में लोहिया का समाजवाद था, जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की गूंज थी और कर्पूरी ठाकुर की सादगी का असर भी दिखाई देता था। उस समय शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन वही राजनीति उन्हें ऐसे मुकाम पर ले जाएगी जहां उनकी सरकार ‘सनातन स्वाभिमान महायात्रा’ का आयोजन करेगी और जनता दल (यूनाइटेड) के मंत्री उस कार्यक्रम की शोभा बढ़ाते नजर आएंगे।
इसलिए जब मैंने आज बिहार सरकार का वह विज्ञापन देखा जिसमें ‘सनातन स्वाभिमान महायात्रा’ के नाम पर 1150 श्रद्धालुओं को विशेष ट्रेन से सोमनाथ भेजने की घोषणा की गई और मंच पर भाजपा के नेताओं के साथ जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ मंत्री विजय कुमार चौधरी और विजेंद्र प्रसाद यादव भी पूरे उत्साह के साथ मौजूद नजर आए तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। यह दृश्य अचानक पैदा नहीं हुआ है। यह लगभग ढाई दशक की उस
राजनीतिक यात्रा का परिणाम है जिसमें विचारधारा धीरे-धीरे सत्ता की आवश्यकता के सामने पीछे हटती चली गई।
नीतीश कुमार का राजनीतिक जीवन शायद भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा वैचारिक प्रयोग भी है और सबसे बड़ा विरोधाभास भी। उन्होंने समाजवादी राजनीति से शुरुआत की। लालू प्रसाद यादव के खिलाफ सामाजिक न्याय की दूसरी धारा खड़ी की। भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सत्ता हासिल की। फिर नरेंद्र मोदी का विरोध करते हुए भाजपा से अलग हो गए। उन्होंने सार्वजनिक मंचों से नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले किए। इतना ही नहीं, एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने साफ कहा कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वह राजनीति नहीं कर सकते। इसके बाद वे राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ महागठबंधन में चले गए। फिर उसी भाजपा के साथ लौट आए जिसके खिलाफ उन्होंने वर्षों तक राजनीतिक लड़ाई लड़ी थी। भारतीय राजनीति में गठबंधन बदलने के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन इतनी बार राजनीतिक ध्रुव बदलने के बाद भी सत्ता के केंद्र में बने रहने का उदाहरण शायद ही दूसरा मिले।
यही कारण है कि आज जब जनता दल (यूनाइटेड) के नेता भाजपा की सांस्कृतिक राजनीति के साथ पूरी सहजता से खड़े दिखाई देते हैं तो इसे केवल गठबंधन की मजबूरी कहकर टाला नहीं जा सकता। यह बदलाव अब राजनीतिक व्यवहार से आगे बढ़कर वैचारिक स्वीकृति का रूप ले चुका है।
सोमनाथ यात्रा का आयोजन इसी बड़े बदलाव का प्रतीक है। सरकार चाहती तो श्रद्धालुओं को चुपचाप यात्रा पर भेज सकती थी। इससे पहले भी अनेक राज्य सरकारें धार्मिक यात्राओं के लिए आर्थिक सहायता देती रही हैं लेकिन बिहार सरकार ने इसे जिस तरह ‘सनातन स्वाभिमान महायात्रा’, ‘अटूट आस्था की गौरव गाथा’ और ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ जैसे नारों के साथ जोड़ा, उससे यह केवल तीर्थयात्रा नहीं रही। यह एक राजनीतिक संदेश बन गई। सरकारी विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कथन प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। पूरा सरकारी तंत्र इस आयोजन को एक बड़े सांस्कृतिक उत्सव की तरह प्रस्तुत करता दिखाई दिया। सवाल यह नहीं है कि सरकार श्रद्धालुओं को सोमनाथ क्यों भेज रही है। सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक सरकार स्वयं किसी विशेष धार्मिक पहचान की प्रचारक बन सकती है?
इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि इन 1150 श्रद्धालुओं का चयन किन आधारों पर हुआ? क्या इसके लिए सार्वजनिक आवेदन मांगे गए? क्या पात्रता के मानदंड तय किए गए? क्या चयन प्रक्रिया पारदर्शी थी? इन सवालों का स्पष्ट उत्तर कहीं दिखाई नहीं देता।
लोकतंत्र में सरकार का हर खर्च सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में आता है। इसलिए यह जानने का अधिकार नागरिकों को है कि सरकारी धन से धार्मिक यात्रा पर भेजे जाने वाले लोगों का चयन किन मानकों पर हुआ लेकिन यदि इसे एक अकेली घटना माना जाए तो शायद तस्वीर अधूरी रह जाएगी। पिछले कुछ वर्षों के फैसलों को एक साथ रखकर देखें तो बिहार सरकार की प्राथमिकताओं में स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है। श्रावणी मेले के प्रचार के लिए लाखों रुपए के पुरस्कार घोषित किए जाते हैं। सिंधु दर्शन तीर्थ यात्रा के लिए सरकारी अनुदान दिया जाता है। पुनौरा धाम को ‘अयोध्या की तर्ज’ पर विकसित करने की योजना बनाई जाती है। धार्मिक पर्यटन अब केवल पर्यटन नहीं रह गया बल्कि सांस्कृतिक पहचान की राजनीति का माध्यम बनता जा रहा है।
यहीं शिक्षा के क्षेत्र में भी एक उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई देता है। बिहार सरकार ने जिन मॉडल स्कूलों की घोषणा की थी, उनका नाम बदलकर ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ कर दिया गया। यह नाम संयोग नहीं है। दशकों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिक्षा संस्थानों की पहचान इसी नाम से जुड़ी रही है। केवल नाम ही नहीं बदला गया, स्कूलों के भवनों का रंग भी भगवा कर दिया गया। उस समय जनता दल (यूनाइटेड) के कुछ नेताओं ने जरूर कहा कि शिक्षा का कोई रंग नहीं होता लेकिन उनका विरोध कुछ दिनों में समाप्त हो गया। भाजपा के नेताओं ने भगवा रंग को देवी सरस्वती और भगवान सूर्य से जोड़कर उसका बचाव किया लेकिन मूल प्रश्न आज भी वहीं है, क्या सरकारी शिक्षा व्यवस्था को किसी विशेष सांस्कृतिक प्रतीक से जोड़ना उचित है?
दरअसल राजनीति में प्रतीकों का महत्व कानूनों से कम नहीं होता। जनता वही देखती है जो सरकार उसे दिखाना चाहती है। जब सरकारी स्कूल भगवा रंग में रंगे जाते हैं, जब सरकारी योजनाओं को ‘सनातन स्वाभिमान’ जैसे नाम दिए जाते हैं, जब मंदिरों के विकास को सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि की तरह प्रस्तुत करती है, तब यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं रह जाते। यह राज्य की वैचारिक दिशा का संकेत बन जाते हैं।
विडम्बना यह है कि यही नीतीश कुमार कभी राम मंदिर आंदोलन से पूरी दूरी बनाए रखते थे। उन्होंने हमेशा स्वयं को उस आंदोलन से अलग रखा। लेकिन बाद के वर्षों में सीतामढ़ी के पुनौरा धाम को ‘अयोध्या की तर्ज’ पर विकसित करने के लिए सैकड़ों करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए। धार्मिक पर्यटन के नाम पर शुरू हुई योजनाएं धीरे-धीरे मंदिर निर्माण और धार्मिक प्रतीकों के सरकारी संरक्षण तक पहुंच गईं। यह बदलाव अचानक नहीं आया। यह धीरे- धीरे हुआ और शायद इसी कारण लोगों ने इसे उतनी गम्भीरता से नहीं देखा।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा लम्बे समय से होती रही है कि जनता दल (यूनाइटेड) के भीतर एक बड़ा वर्ग वैचारिक रूप से भाजपा के अधिक निकट हो चुका है। संजय कुमार झा के प्रभाव की चर्चा भी होती है। अशोक चैधरी जैसे नेताओं की भूमिका भी बताई जाती है। इन चर्चाओं की पुष्टि या खंडन राजनीतिक इतिहास करेगा लेकिन इतना स्पष्ट है कि आज की जदयू और पंद्रह वर्ष पहले की जदयू में जमीन-आसमान का अंतर है। कभी यह पार्टी भाजपा के सांस्कृतिक एजेंडे को संतुलित करती थी, आज वही एजेंडा उसके अपने कार्यक्रमों का हिस्सा बनता दिखाई देता है।
यहां यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि किसी भी नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था का पालन करने का पूरा अधिकार है। सरकार तीर्थयात्रा में सहायता दे, इसमें भी अपने आप में कोई आपत्ति नहीं हो सकती लेकिन भारत का संविधान राज्य को किसी एक धार्मिक पहचान का प्रतिनिधि बनने की अनुमति नहीं देता। सरकार का दायित्व सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार करना है। यदि सरकारी संसाधन और सरकारी प्रचार किसी एक धार्मिक पहचान को लगातार केंद्र में रखने लगे तो स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठेंगे।
बिहार की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि समाजवादी आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्ष राजनीति थी। लोहिया ने पिछड़ों की राजनीति की लेकिन उसे किसी धार्मिक पहचान से नहीं जोड़ा। जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का आंदोलन चलाया लेकिन उसका आधार लोकतंत्र था। कर्पूरी ठाकुर ने गरीबों और वंचितों को सत्ता में हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई लड़ी। जनता दल (यूनाइटेड) स्वयं इन्हीं परम्पराओं की उत्तराधिकारी होने का दावा करती रही है लेकिन आज उसी पार्टी की राजनीति की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं।
यह भी सम्भव है कि इसके पीछे केवल चुनावी गणित हो। भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए उसके मूल एजेंडे का विरोध करना आसान नहीं होता। हिंदुत्व आज भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है। जदयू शायद यह मान बैठी है कि इस एजेंडे के साथ चलकर ही वह अपने अस्तित्व को बचा सकती है लेकिन राजनीति का इतिहास बताता है कि जब कोई क्षेत्रीय दल किसी बड़े दल की विचारधारा को पूरी तरह स्वीकार कर लेता है, तब धीरे-धीरे उसकी अपनी अलग पहचान समाप्त होने लगती है। यही खतरा आज जनता दल (यूनाइटेड) के सामने भी दिखाई देता है।
मुझे आज भी उन सात दिनों के नीतीश कुमार याद आते हैं जो रात देर तक बिहार की राजनीति पर चर्चा करते थे। वह सत्ता चाहते थे लेकिन सत्ता को परिवर्तन का माध्यम बताते थे। आज वही सत्ता स्वयं परिवर्तन का विषय बन चुकी है। कभी समाजवाद उनकी पहचान था, फिर सुशासन उनकी पहचान बना और अब ऐसा लगता है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भाषा भी उन्हें असहज नहीं करती। राजनीति में बदलाव स्वाभाविक है लेकिन जब बदलाव इतना व्यापक हो कि पुराने साथी भी पहचानने में संकोच करें, तब इतिहास सवाल पूछता है।
शायद आने वाले वर्षों में राजनीतिक विश्लेषक इस दौर को केवल एक गठबंधन की कहानी नहीं बल्कि भारतीय राजनीति में समाजवादी धारा के क्रमिक भगवाकरण की कहानी के रूप में याद करें। यदि ऐसा हुआ तो ‘सनातन स्वाभिमान महायात्रा’ इतिहास में केवल सोमनाथ जाने वाली एक विशेष ट्रेन नहीं होगी बल्कि वह उस लम्बी राजनीतिक यात्रा का प्रतीक होगी जिसमें विचारधारा धीरे-धीरे सत्ता के साथ समझौता करती चली गई।