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अयोध्या के बाद अब काशी, मथुरा और भोजशाला? चुनावी आहटों के बीच हिंदुत्व की नई पटकथा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हालिया बयान, भोजशाला पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, ज्ञानवापी और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामलों में लगातार बढ़ती न्यायिक गतिविधियों ने देश में एक बार फिर मंदिर- मस्जिद विवादों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। 2027 के विधानसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले अगले लोकसभा चुनाव से पहले क्या भाजपा हिंदुत्व के दूसरे चरण की ओर बढ़ रही है या यह केवल न्यायिक प्रक्रियाओं का स्वाभाविक क्रम है?

अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बाद भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यही था कि अब आगे क्या? तीन दशक तक जिस आंदोलन ने भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक राजनीति को ऊर्जा दी, सत्ता तक पहुंचाया और उसके समर्थक आधार को संगठित रखा, वह अपने निर्णायक मुकाम तक पहुंच चुका था। 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के साथ भाजपा ने अपने सबसे पुराने और सबसे बड़े राजनीतिक व वैचारिक वादे को पूरा कर दिया लेकिन राजनीति में शून्य कभी नहीं रहता। एक बड़ा मुद्दा समाप्त होता है तो उसकी जगह कोई दूसरा मुद्दा ले लेता है। पिछले कुछ महीनों की घटनाओं को एक साथ जोड़कर देखने पर यही सवाल फिर से उठने लगा है कि क्या अब काशी, मथुरा और देश के अन्य धार्मिक विवाद भाजपा की राजनीति के अगले अध्याय का आधार बनने जा रहे हैं?

इस बहस को सबसे अधिक गति उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक बयान ने दी। हाल ही में उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा कि ‘सनातन समाज केवल तीन स्थानों, अयोध्या, काशी और मथुरा की ही बात करता है।’ उन्होंने यह भी कहा कि अयोध्या का समाधान हो चुका है और अब काशी तथा मथुरा के प्रश्नों पर भी चर्चा और समाधान होना चाहिए। यह बयान सामान्य परिस्थितियों में शायद केवल एक राजनीतिक टिप्पणी माना जाता लेकिन जिस समय यह बयान आया, वह अपने आप में महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब बहुत अधिक समय नहीं बचा है। राजनीतिक दल धीरे-धीरे अपनी चुनावी रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं। ऐसे समय में मुख्यमंत्री का यह बयान राजनीतिक गलियारों में व्यापक चर्चा का विषय बन गया है।
योगी आदित्यनाथ का यह पहला बयान नहीं था। पिछले कुछ वर्षों में वे कई बार श्रीकृष्ण जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ से जुड़े प्रश्नों का उल्लेख कर चुके हैं। हालांकि इस बार उनके बयान को इसलिए अधिक महत्व दिया जा रहा है क्योंकि इसके समानांतर ही देश में कई मंदिर- मस्जिद विवादों की न्यायिक प्रक्रिया भी तेज होती दिखाई दे रही है। वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर में विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई जारी है। मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद में अनेक मुकदमे अलग- अलग अदालतों में लम्बित हैं। मध्य प्रदेश की भोजशाला का मामला एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है। सम्भल की शाही जामा मस्जिद और अजमेर शरीफ से जुड़े विवाद भी समय-समय पर न्यायालयों के समक्ष आते रहे हैं। इन सभी मामलों की कानूनी स्थिति अलग-अलग है लेकिन एक समानता अवश्य है, इन सभी का राजनीतिक प्रभाव व्यापक हो सकता है। मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला विवाद ने राष्ट्रीय राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींचा है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इस मामले की सुनवाई के दौरान फिलहाल यथास्थिति बहाल करने से इनकार करते हुए अंतरिम व्यवस्था में मुस्लिम पक्ष के लिए शुक्रवार की नमाज का वैकल्पिक प्रबंध सुनिश्चित करने का निर्देश दिया और यह स्पष्ट किया कि मामले की विस्तृत सुनवाई आगे होगी। इस निर्णय चलते यह तय हो गया है कि भोजशाला का विवाद आने वाले महीनों में सार्वजनिक विमर्श का मुद्दा बनने जा रहा है। राजनीतिक दृष्टि से यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनावी वर्ष नजदीक आते ही धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर होने वाली हर न्यायिक कार्रवाई बहस का हिस्सा बन जाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा को इन मुद्दों को चुनावी बहस में लाने के लिए किसी नए आंदोलन की आवश्यकता नहीं है। राम जन्मभूमि आंदोलन के दौर में पार्टी को जनआंदोलन खड़ा करना पड़ा था। आज स्थिति अलग है। काशी, मथुरा, भोजशाला और अन्य विवाद पहले से अदालतों में लम्बित हैं। हर सुनवाई अपने आप में एक समाचार है। हर आदेश राष्ट्रीय बहस का विषय बनता है। सोशल मीडिया के दौर में अदालती कार्यवाही कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती है। ऐसे में राजनीतिक दलों को केवल उन घटनाओं की अपनी-अपनी व्याख्या प्रस्तुत करनी होती है। यही कारण है कि न्यायालयों में चल रही प्रक्रिया और चुनावी राजनीति के बीच एक नया सम्बंध बनता दिखाई दे रहा है।
फिर गर्माएंगे धार्मिक ध्रुवीकरण के मुद्दे
यदि चुनावी कैलेंडर पर नजर डालें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब और हिमाचल सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर प्रदेश का चुनाव भारतीय राजनीति में हमेशा विशेष महत्व रखता है। देश की सबसे अधिक लोकसभा सीटें इसी राज्य से आती हैं और यहां की राजनीतिक दिशा का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ता है। इन चुनावों के बाद देश अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी में प्रवेश करेगा। राजनीतिक दलों के लिए यह स्वाभाविक है कि वे अभी से ऐसे मुद्दों की तलाश करें जो उनके समर्थक आधार को सक्रिय बनाए रखें और नए मतदाताओं तक भी संदेश पहुंचा सकें।
भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक यात्रा को देखें तो उसके तीन प्रमुख वैचारिक स्तम्भ लम्बे समय तक अनुच्छेद 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर रहे। अनुच्छेद 370 समाप्त किया जा चुका है। समान नागरिक संहिता पर कई राज्यों में पहल शुरू हो चुकी है और केंद्र भी समय-समय पर इस विषय पर अपनी प्रतिबद्धता दोहराता रहा है। राम मंदिर बन चुका है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा स्वाभाविक है कि भाजपा अब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अगले चरण को किस रूप में परिभाषित करेगी। काशी और मथुरा का उल्लेख इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि भाजपा का आधिकारिक पक्ष यह है कि वह इन प्रश्नों को चुनावी मुद्दा नहीं बल्कि आस्था, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक न्याय का विषय मानती है। पार्टी के नेताओं का कहना रहा है कि न्यायालयों में चल रहे मामलों का निर्णय संविधान और कानून के अनुसार होना चाहिए। दूसरी ओर विपक्ष इन घटनाक्रमों को अलग नजरिए से देखता है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल समय-समय पर आरोप लगाते रहे हैं कि धार्मिक विवादों को चुनावी माहौल में अधिक उछाला जाता है ताकि बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे पीछे चले जाएं। यही राजनीतिक टकराव आने वाले महीनों में और तीखा हो सकता है।
राजनीतिक विज्ञान के अध्येताओं का कहना है कि भारत में चुनाव केवल आर्थिक उपलब्धियों या प्रशासनिक प्रदर्शन के आधार पर नहीं लड़े जाते। पहचान, संस्कृति, धर्म, जाति, राष्ट्रवाद और ऐतिहासिक स्मृतियां भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करती हैं। राम मंदिर इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। इसी कारण अब यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या भाजपा 2027 के चुनाव में विकास और कल्याणकारी योजनाओं के साथ- साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नए प्रतीकों को भी प्रमुखता देगी।
राम मंदिर आंदोलन ने बदली थी भारतीय राजनीति
राम मंदिर आंदोलन केवल एक धार्मिक आंदोलन नहीं था बल्कि उसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। 1984 के लोकसभा चुनाव में मात्र दो सीटों पर सिमट चुकी भारतीय जनता पार्टी ने अगले तीन दशकों में जिस राजनीतिक विस्तार का सफर तय किया, उसके केंद्र में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का वही विमर्श था, जिसे राम जन्मभूमि आंदोलन ने जन-जन तक पहुंचाया। लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा, विश्व हिंदू परिषद के अभियान, कारसेवा, 6 दिसम्बर 1992 की घटना और उसके बाद लगभग तीन दशक तक चली न्यायिक लड़ाई ने भाजपा को केवल चुनावी लाभ ही नहीं दिया बल्कि एक वैचारिक पहचान भी दी। यही कारण है कि अयोध्या आंदोलन को भाजपा के राजनीतिक इतिहास की सबसे निर्णायक घटना माना जाता है लेकिन 22 जनवरी 2024 को जब राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा हुई तो एक नया प्रश्न भी खड़ा हो गया। जिस मुद्दे ने तीन दशक तक भाजपा के समर्थकों को भावनात्मक रूप से जोड़े रखा, उसके पूरा हो जाने के बाद आगे क्या होगा? क्या हिंदुत्व की राजनीति अपनी चरम उपलब्धि तक पहुंच चुकी है या अब उसका अगला चरण शुरू होगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि विचारधारा आधारित राजनीति कभी स्थिर नहीं रहती। उसे निरंतर नए प्रतीकों, नए विमर्शों और नए लक्ष्यों की आवश्यकता होती है। कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को लम्बे समय तक अपनी वैचारिक पूंजी बनाया। वामपंथ ने वर्ग संघर्ष को अपनी राजनीतिक धुरी बनाया। उसी प्रकार भाजपा ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सभ्यतागत पहचान को अपनी राजनीति का केंद्रीय तत्व बनाया। राम मंदिर उस विचारधारा का सबसे बड़ा प्रतीक था। अब जब वह लक्ष्य पूरा हो चुका है तो स्वाभाविक रूप से चर्चा इस बात पर है कि क्या काशी और मथुरा उसके अगले प्रतीक बनेंगे।
यहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हालिया बयान का महत्व बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि सनातन समाज केवल तीन स्थानों, अयोध्या, काशी और मथुरा की बात करता है। यह कथन केवल धार्मिक आस्था का उल्लेख नहीं था बल्कि उसने उस पुराने राजनीतिक विमर्श को फिर से जीवित कर दिया जिसमें लम्बे समय तक ‘तीन मंदिर’ का उल्लेख होता रहा है। भाजपा ने आधिकारिक रूप से कभी यह घोषणा नहीं की कि वह काशी और मथुरा को चुनावी मुद्दा बनाएगी लेकिन पार्टी और उससे जुड़े अनेक नेताओं के वक्तव्यों में समय-समय पर इन स्थलों का उल्लेख अवश्य होता रहा है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भरोसे है भाजपा
दरअसल, भाजपा की चुनावी रणनीति केवल एक मुद्दे पर आधारित नहीं रही है। 2014 में नरेंद्र मोदी ने विकास, सुशासन और भ्रष्टाचार विरोध को केंद्र में रखा लेकिन साथ ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी समानांतर रूप से मौजूद रहा। 2019 में बालाकोट एयर स्ट्राइक और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रमुख मुद्दे बने, वहीं अनुच्छेद 370 हटाने और राम मंदिर जैसे वैचारिक वादों की प्रतिबद्धता भी भाजपा के अभियान का हिस्सा रही। 2024 तक आते-आते पार्टी ने विकास, मुफ्त राशन, गरीब कल्याण, डिजिटल इंडिया, बुनियादी

ढांचे और राष्ट्रवाद के साथ राम मंदिर को भी अपनी उपलब्धियों में शामिल किया। यानी भाजपा ने हमेशा बहुस्तरीय चुनावी रणनीति अपनाई है, जिसमें आर्थिक और वैचारिक दोनों प्रकार के मुद्दे साथ-साथ चलते हैं।
2027 के चुनावों को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए केवल एक राज्य नहीं है। 80 लोकसभा सीटों वाला यह प्रदेश राष्ट्रीय सत्ता का सबसे बड़ा आधार है। यदि उत्तर प्रदेश में भाजपा मजबूत रहती है तो राष्ट्रीय राजनीति पर उसका प्रभाव भी बना रहता है। इसलिए यहां का हर चुनाव केवल प्रदेश का चुनाव नहीं माना जाता बल्कि अगले लोकसभा चुनाव की दिशा तय करने वाला राजनीतिक संकेत भी माना जाता है। यही कारण है कि भाजपा के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे अपने विकास मॉडल, बुनियादी ढांचे, एक्सप्रेस वे, निवेश, कानून-व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाओं के आधार पर जनता के बीच जाना है। दूसरी तरफ उसे अपने वैचारिक समर्थक आधार को भी सक्रिय बनाए रखना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विकास, दोनों समानांतर रूप से चुनावी विमर्श में बने रहते हैं तो भाजपा को उसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है।

सोशल मीडिया बनेगा रणक्षेत्र
राजनीतिक दृष्टि से एक और परिवर्तन उल्लेखनीय है। राम मंदिर आंदोलन के समय टीवी और समाचार पत्र जनमत निर्माण के प्रमुख माध्यम थे। आज सोशल मीडिया चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा मंच बन चुका है। किसी भी धार्मिक स्थल से जुड़ी अदालत की सुनवाई, किसी नेता का बयान या किसी पुरातात्विक रिपोर्ट का अंश कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाता है। ऐसे में राजनीतिक नैरेटिव पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बनता और बदलता है। यही कारण है कि ज्ञानवापी, मथुरा, भोजशाला या सम्भल जैसे मामले केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहते बल्कि डिजिटल राजनीति का भी हिस्सा बन जाते हैं। वर्तमान दौर की
राजनीति और 1990 के दशक की राजनीति के बीच सबसे बड़ा अंतर है।
अयोध्या तो झांकी है…
इसी पृष्ठभूमि में 2027 के विधानसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले अगले लोकसभा चुनाव को देखा जा रहा है। अभी यह कहना सम्भव नहीं कि मंदिर-मस्जिद विवाद चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बनेंगे या नहीं लेकिन इतना स्पष्ट है कि भाजपा, विपक्ष, न्यायपालिका और समाज, चारों की गतिविधियां एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही हैं, जहां सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक स्मृतियां और संवैधानिक प्रश्न फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में दिखाई दे रहे हैं।
अयोध्या आंदोलन के दौरान अक्सर एक नारा सुनाई देता था, ‘अयोध्या तो केवल झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है।’ समय बदला, राजनीति बदली, अदालतों ने अपना फैसला दिया और राम मंदिर बन गया लेकिन काशी और मथुरा के साथ-साथ देश के कई अन्य धार्मिक स्थलों को लेकर चल रहे विवाद समाप्त नहीं हुए।
सबसे पहले बात वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर की। काशी विश्वनाथ मंदिर से सटे इस परिसर को लेकर लम्बे समय से विवाद चला आ रहा है। हिंदू पक्ष का दावा है कि मुगल काल में मूल मंदिर को ध्वस्त कर उसके ऊपर मस्जिद का निर्माण कराया गया था। मुस्लिम पक्ष इस दावे को अस्वीकार करता है और ज्ञानवापी मस्जिद को ऐतिहासिक मस्जिद बताते हुए पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 का हवाला देता है। पिछले कुछ वर्षों में अदालत के आदेश पर परिसर का सर्वेक्षण हुआ, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने अपनी रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत की और विभिन्न याचिकाओं पर लगातार सुनवाई जारी है। इन न्यायिक प्रक्रियाओं ने ज्ञानवापी को केवल कानूनी विवाद नहीं रहने दिया बल्कि उसे राष्ट्रीय राजनीति का भी एक प्रमुख विषय बना दिया।
मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद भी लगभग इसी प्रकार की स्थिति में है। यहां हिंदू पक्ष का दावा है कि भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली पर स्थित मूल मंदिर को ध्वस्त कर शाही ईदगाह का निर्माण कराया गया था। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह विवाद दशकों पहले हुए समझौते से समाप्त हो चुका है और नए मुकदमों का कोई औचित्य नहीं है। विभिन्न अदालतों में इस मामले से जुड़ी अनेक याचिकाएं लम्बित हैं। अदालतें अभी केवल मुकदमों की ग्राह्यता, साक्ष्यों और अन्य कानूनी पहलुओं पर विचार कर रही हैं। अंतिम निर्णय अभी दूर है लेकिन प्रत्येक सुनवाई राष्ट्रीय समाचार बन जाती है।
अब मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला की बात करें। यह विवाद अपनी प्रकृति में थोड़ा अलग है। हिंदू समुदाय इसे मां वाग्देवी अर्थात सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में मौजूद इस परिसर में लम्बे समय से पूजा और नमाज को लेकर विशेष व्यवस्था लागू रही है। हाल के महीनों में न्यायालयों में इस मामले की सुनवाई तेज हुई। सर्वेक्षण के आदेश दिए गए, रिपोर्ट प्रस्तुत हुई और मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अंतिम निर्णय नहीं दिया है लेकिन यह स्पष्ट कर दिया है कि मामले की विस्तृत सुनवाई आगे होगी। इसका अर्थ है कि भोजशाला आने वाले समय में भी राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा बनी रहेगी।
उत्तर प्रदेश के सम्भल की शाही जामा मस्जिद का विवाद भी हाल के महीनों में चर्चा में आया। हिंदू पक्ष का दावा है कि यहां पहले हरिहर मंदिर था जबकि मुस्लिम पक्ष इस दावे को अस्वीकार करता है। स्थानीय अदालत के आदेश के बाद हुए सर्वेक्षण और उसके बाद उत्पन्न तनाव ने इस विवाद को राष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया था। इसी प्रकार राजस्थान के अजमेर स्थित अजमेर शरीफ दरगाह को लेकर भी अदालत में याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें मंदिर होने का दावा किया गया है। इन मामलों पर अभी कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं निकला है लेकिन इतना स्पष्ट है कि देश के विभिन्न हिस्सों में धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद अब केवल स्थानीय नहीं रह गए हैं।

क्या है पूजा स्थल अधिनियम, 1991?
यहीं एक कानून सबसे अधिक चर्चा में आता है, पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991। यह कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 को देश के धार्मिक स्थलों की जो स्थिति थी, उसे यथावत माना जाएगा और उसे बदला नहीं जा सकेगा। इस कानून का उद्देश्य स्वतंत्रता के बाद नए धार्मिक विवादों को रोकना था। हालांकि अयोध्या विवाद को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया था क्योंकि उस समय वह पहले से न्यायिक प्रक्रिया में था। आज ज्ञानवापी, मथुरा और अन्य विवादों के संदर्भ में यही कानून सबसे बड़ा कानूनी आधार बन गया है। मुस्लिम पक्ष लगातार कहता है कि 1991 का अधिनियम ऐसे मुकदमों की अनुमति नहीं देता। दूसरी ओर कई हिंदू पक्षकार और याचिकाकर्ता इस कानून की संवैधानिक वैधता को ही चुनौती दे रहे हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इन मामलों में केवल धार्मिक भावनाएं ही नहीं बल्कि संवैधानिक सिद्धांत भी दांव पर हैं। एक ओर संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन और पूजा का अधिकार देता है वहीं दूसरी तरफ वह सार्वजनिक व्यवस्था, सामाजिक सौहार्द और विधि के शासन को भी समान महत्व देता है। इसलिए अदालतों के सामने चुनौती केवल ऐतिहासिक तथ्यों की जांच करना नहीं बल्कि संवैधानिक संतुलन बनाए रखना भी है।
विपक्ष कैसे देगा भाजपा को जवाब?
2027 के चुनावी परिदृश्य को समझने के लिए केवल भाजपा की रणनीति को देखना पर्याप्त नहीं होगा। उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि विपक्ष इस पूरी राजनीति का जवाब किस तरह देता है। पिछले एक दशक का राजनीतिक इतिहास बताता है कि भाजपा जिस मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना देती है, विपक्ष अक्सर उसी मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर हो जाता है। चाहे वह अनुच्छेद-370 हो, नागरिकता संशोधन कानून, समान नागरिक संहिता, राम मंदिर या फिर राष्ट्रवाद का प्रश्न, अधिकांश अवसरों पर भाजपा ने बहस का विषय तय किया और विपक्ष उसके जवाब में अपनी रणनीति बनाता रहा। यही स्थिति आने वाले चुनावों में भी दिखाई दे सकती है।
कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लगातार यह कह रहे हैं कि देश के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय, आर्थिक असमानता, शिक्षा और स्वास्थ्य हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव नजदीक आते ही इन मुद्दों की जगह धार्मिक विवादों को प्रमुखता मिलने लगती है। भाजपा इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है। उसका कहना है कि विकास और सांस्कृतिक विरासत एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सरकार एक ओर एक्सप्रेस-वे, एयरपोर्ट, निवेश, डिजिटल इंडिया और कल्याणकारी योजनाओं पर काम कर सकती है तो दूसरी तरफ देश की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक विरासत से जुड़े प्रश्नों पर भी संवैधानिक दायरे में चर्चा हो सकती है।
यही वह राजनीतिक संघर्ष है जो आने वाले दो वर्षों में भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा। एक ओर भाजपा विकास और हिंदुत्व, दोनों को साथ लेकर चलने का प्रयास करेगी जबकि विपक्ष सामाजिक न्याय, संविधान, आर्थिक मुद्दों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाने की कोशिश करेगा। सवाल यह है कि जनता किस नैरेटिव को अधिक महत्व देती है।
भाजपा के सामने भी चुनौती कम नहीं है। यदि वह इन मुद्दों को बहुत अधिक आक्रामकता से उठाती है तो विपक्ष उसे ध्रुवीकरण का आरोप लगाकर घेरने की कोशिश करेगा। यदि वह इन पर पूरी तरह मौन रहती है तो उसके वैचारिक समर्थक वर्ग में यह संदेश जा सकता है कि राम मंदिर के बाद पार्टी अपने मूल एजेंडे से पीछे हट रही है। इसलिए सम्भव है कि आने वाले समय में भाजपा विकास, सुशासन और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, इन तीनों को समानांतर रूप से आगे बढ़ाने की रणनीति अपनाए।
दूसरी ओर विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह भाजपा द्वारा निर्धारित राजनीतिक विमर्श को बदल पाए या नहीं। यदि विपक्ष रोजगार, महंगाई, कृषि संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बनाने में सफल होता है तो चुनावी तस्वीर अलग हो सकती है लेकिन यदि बहस का केंद्र बार-बार धार्मिक विवाद बनते हैं तो भाजपा को उसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
इतिहास गवाह है कि भारत की राजनीति में धार्मिक प्रतीकों का प्रभाव कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। सोमनाथ से अयोध्या तक और अयोध्या से काशी-मथुरा तक का विमर्श समय-समय पर अलग-अलग रूपों में सामने आता रहा है। अंतर केवल इतना है कि अब राजनीति अधिक परिष्कृत हो चुकी है, न्यायिक प्रक्रिया अधिक महत्वपूर्ण हो गई है और चुनावी संचार के साधन पूरी तरह बदल चुके हैं। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि काशी, मथुरा या भोजशाला का अंतिम फैसला क्या होगा। वह निर्णय अदालतों को करना है। असली प्रश्न यह है कि क्या इन मामलों के इर्द-गिर्द बनने वाला राजनीतिक विमर्श 2027 के विधानसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले अगले लोकसभा चुनाव की दिशा तय करेगा? क्या हिंदुत्व की राजनीति वास्तव में अपने दूसरे चरण में प्रवेश कर चुकी है या यह केवल न्यायिक घटनाक्रमों के कारण पैदा हुई अस्थायी राजनीतिक चर्चा है?

इन सवालों के उत्तर अभी भविष्य के गर्भ में हैं लेकिन इतना निश्चित है कि भारतीय राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां अदालतों के फैसले केवल कानूनी दस्तावेज नहीं रह गए हैं बल्कि चुनावी रणनीतियों, वैचारिक संघर्षों और राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण पड़ाव भी बनते जा रहे हैं। अयोध्या का अध्याय इतिहास में दर्ज हो चुका है। अब देश की निगाहें काशी, मथुरा, भोजशाला और उन तमाम मामलों पर हैं, जिनके बारे में आने वाले वर्षों में अदालतें भी निर्णय देंगी और राजनीति भी अपना रास्ता तय करेगी। यही कारण है कि 2027 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का चुनाव नहीं बल्कि भारत की वैचारिक राजनीति के अगले अध्याय की भूमिका भी साबित हो सकती है।

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