महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़े बदलाव की चर्चा है। हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) में टूट के बाद अटकलें लग रही थीं कि अगला नम्बर शरद पवार की एनसीपी का हो सकता है लेकिन अब संकेत इसके उलट हैं। चर्चा है कि एनसीपी के दोनों धड़े शरद पवार गुट और सुनेत्रा पवार के नेतृत्व वाला गुट एक बार फिर साथ आ सकते हैं। इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि 2023 में हुई एनसीपी की टूट से जुड़ी है। उसी वर्ष अजित पवार ने अलग राह अपनाई थी। इस साल जनवरी में विमान दुर्घटना में उनके निधन के बाद पार्टी की कमान उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार के हाथों में आई। हालांकि उनके नेतृत्व को लेकर पार्टी के भीतर लगातार सवाल उठते रहे। हाल ही में एनसीपी के कई वरिष्ठ नेताओं की मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से हुई मुलाकात ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी। बताया गया कि इस बैठक की जानकारी पार्टी अध्यक्ष होने के बावजूद सुनेत्रा पवार को नहीं थी। इससे उनके संगठन पर कमजोर होते नियंत्रण की चर्चा तेज हो गई। बैठक में शरद पवार गुट के नेताओं की मौजूदगी ने दोनों धड़ों के सम्भावित एकीकरण की अटकलों को और मजबूत किया। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यदि यह विलय होता है तो माना जा रहा है कि पार्टी की कमान अंततः शरद पवार के प्रभाव में रहेगी और उनकी बेटी सुप्रिया सुले की भूमिका और मजबूत होगी। 85 वर्षीय शरद पवार सक्रिय राजनीति में अब भी प्रभावशाली हैं और लम्बे समय से सुप्रिया को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने की तैयारी करते रहे हैं। कई बार सांसद रह चुकी सुप्रिया सुले को एक परिपक्व और सर्वस्वीकार्य नेता माना जाता है। इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। केंद्र सरकार को महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर एनसीपी- एसपी के सांसदों के समर्थन की आवश्यकता हो सकती है। इसी कारण भाजपा और शरद पवार के बीच संवाद बढ़ने की चर्चा है। हाल में शरद पवार की देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे से मुलाकातों को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। यदि दोनों धड़ों का विलय होता है तो इससे शरद पवार अपनी राजनीतिक विरासत को फिर मजबूत कर सकते हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में मदन मित्रा का ‘ममता तृणमूल’ छोड़कर ‘ऋतोब्रत तृणमूल’ में शामिल होना महज एक और दल-बदल नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर बढ़ते असंतोष का संकेत है। वर्षों तक ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाने वाले मदन मित्रा के इस फैसले ने पार्टी की अंदरूनी राजनीति पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मदन मित्रा का आरोप है कि संगठन में निर्णय लेने की प्रक्रिया अब सीमित दायरे में सिमट गई है और वरिष्ठ नेताओं की राय को पहले जैसी अहमियत नहीं मिल रही। इसके बाद से राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पार्टी के भीतर असंतोष का केंद्र लगातार अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली बनती जा रही है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या संगठन एक व्यक्ति तक सिमट गया है? क्या अभिषेक के बचाव से संकट टल जाएगा और क्या यह असंतोष भविष्य में पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। इन आरोपों के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहली बार खुलकर अभिषेक बनर्जी के बचाव में सामने आईं। उन्होंने कहा कि अभिषेक को हर समस्या का जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। ममता ने केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि अभिषेक और उनके परिवार ने लम्बे समय तक राजनीतिक और कानूनी संघर्ष झेला है तथा उन्होंने कभी समझौते का रास्ता नहीं चुना। इसके बाद चर्चा यह भी है कि क्या ममता बनर्जी संगठन में संवाद बढ़ाकर असंतोष दूर करने की कोशिश करेंगी या फिर अभिषेक के नेतृत्व पर पूरा भरोसा बनाए रखते हुए मौजूदा रणनीति जारी रखेंगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल सार्वजनिक बचाव से संगठनात्मक सवाल खत्म नहीं होंगे। यदि लगातार कई वरिष्ठ नेता समान शिकायतें उठा रहे हैं तो पार्टी नेतृत्व को उन संकेतों को गम्भीरता से लेना होगा। आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन तृणमूल छोड़ रहा है बल्कि यह है कि लगभग हर असंतुष्ट नेता के निशाने पर अभिषेक बनर्जी ही क्यों हैं। विडम्बना यह है कि जो नेता कभी उन्हें पार्टी का भविष्य और नई पीढ़ी का चेहरा बताते थे, वही अब उनकी कार्यशैली पर सबसे तीखे सवाल उठा रहे हैं। यदि नाराज नेताओं को समय रहते नहीं साधा गया तो आने वाले चुनावों से पहले तृणमूल कांग्रेस को और झटके लग सकते हैं। फिलहाल पार्टी की ओर से किसी बड़े संगठनात्मक बदलाव के संकेत नहीं मिले हैं लेकिन मदन मित्रा के जाने के बाद यह बहस तेज हो गई है कि यह केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं बल्कि संगठन के भीतर गहराते असंतोष का संकेत है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि ममता बनर्जी इस चुनौती का राजनीतिक समाधान कैसे तलाशती हैं।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है लेकिन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सम्भावित गठबंधन को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। राजनीतिक हलकों में अटकलें हैं कि क्या मानसून सत्र के दौरान राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच चुनावी फार्मूले पर पहली गंभीर चर्चा होगी? क्या कांग्रेस इस बार 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों की मांग रख सकती है? क्या सपा अधिक सीटें देकर गठबंधन बचाने की कोशिश करेगी? या फिर कांग्रेस पश्चिम बंगाल की तरह उत्तर प्रदेश में भी ‘एकला चलो’ की रणनीति अपनाएगी? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दोनों दल लोकसभा चुनाव-2024 की तरह साथ रहेंगे या इस बार अपने-अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरेंगे। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस के भीतर गठबंधन को लेकर अलग-अलग राय है। एक वर्ग पश्चिम बंगाल की तर्ज पर ‘एकला चलो’ की रणनीति का समर्थक है जबकि दूसरा मानता है कि भाजपा को चुनौती देने के लिए सपा के साथ गठबंधन ही बेहतर विकल्प होगा। कांग्रेस का तर्क है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में 17 सीटों पर लड़कर छह सीटें जीतने और कई विधानसभा क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन के बाद अब वह पहले से अधिक विधानसभा सीटों की दावेदार है। दूसरी ओर सपा की प्राथमिकता अखिलेश यादव के नेतृत्व में सरकार बनाना है। ऐसे में सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच लम्बी बातचीत की सम्भावना जताई जा रही है। सपा के सामने यह भी चुनौती होगी कि वह कांग्रेस को कितना राजनीतिक स्पेस देने के लिए तैयार होती है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि यदि दोनों दलों के बीच सीटों और नेतृत्व को लेकर सहमति बनती है तो गठबंधन की राह आसान हो सकती है लेकिन यदि मतभेद बढ़े तो दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला भी कर सकते हैं। इतिहास भी इस गठबंधन के सामने बड़ी चुनौती है। 2017 में सपा-कांग्रेस गठबंधन अपेक्षित सफलता नहीं दिला सका था जबकि 2022 में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़कर बेहद खराब प्रदर्शन किया। इसके उलट 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों के साथ आने से विपक्ष को बड़ा फायदा मिला और 80 में 43 सीटों पर जीत दर्ज हुई। यही वजह है कि गठबंधन की संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। फिलहाल इन सभी सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में हैं।